भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 444
४२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

असम्प्राप्ते च नगरीं मधुरां मधुसूदने।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयो महाद्युतिः॥ ४ ॥
यदुक्तं देवदेवेन नृपाणामग्रतः प्रभो।
यास्यामि मधुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम्॥ ५॥
इति तद्वचनस्यान्ते गमिष्येति विचिन्तयन्।
कृताञ्जलिपुटः धीमान् प्रणिपत्याब्रवीदिदम्॥ ६ ॥

प्रभो ! मधुसूदन श्रीकृष्ण विदर्भनगरसे चलकर अभी मार्गमें ही थे, मथुरापुरी नहीं पहुँचे थे। तभी महातेजस्वी गरुड़ने मन-ही-मन विचार किया कि देवाधिदेव श्रीहरिने सब राजाओंके सामने जो कहा था कि 'मैं भोजराज उग्रसेनके द्वारा पालित रमणीय नगरी मथुराको जाऊँगा' उनके उस कथनके अन्तमें 'चलूँगा' यह कहकर मैंने भी चलना स्वीकार कर लिया था। यही सोचते हुए गरुड़को एक कार्य सूझ गया और उन तेजस्वी पक्षिराजने दोनों हाथ जोड़ भगवान्‌को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ ४-६॥

गरुड उवाच

देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम्।
रैवतं च गिरिं रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्॥ ७ ॥

गरुड़ बोले—देव ! मैं राजा रैवतकी कुशस्थली नगरीको जाऊँगा। वहाँ रमणीय रैवत गिरि है, जहाँ नन्दनके समान मनोहर वन है॥ ७॥

रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम्।
वृक्षगुल्मलताकीर्णां पुष्परेणुविभूषिताम्॥ ८ ॥

रुक्मीने पर्वत और समुद्रतटका आश्रय लेकर बसी हुई उस रमणीय नगरीको उजाड़ दिया है। वहाँ हरे-भरे वृक्ष, गुल्म और लताएँ फैली हुई हैं। फूलोंके पराग उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ८॥

गजेन्द्रभुजगाकीर्णामृक्षवानरसेविताम् ।
वराहमहिषाक्रान्तां मृगयूथैरनेककः॥ ९ ॥

वहाँ हाथी और सर्प भरे हुए हैं। रीछ तथा वानर उसका सेवन करते हैं। वाराह, भैंसे तथा मृगोंके अनेकानेक झुंड वहाँ वास करते हैं॥ ९ ॥

तां समन्तात् समालोक्य वासार्थं ते क्षमां क्षमा।
यदि स्याद् भवतो रम्या प्रशस्ता नगरीति च॥ १०॥
कण्टकोद्धरणं कृत्वा आगमिष्ये तवान्तिकम्।

उस भूमिको सब ओरसे निरीक्षण करके मैं यह देखूँगा कि वह आपके निवासके लिये उपयुक्त है या नहीं। यदि वह आपके योग्य रमणीय या उत्तम नगरी हो सकेगी तो वहाँके कण्टकोंको (आपके मार्गका अवरोध करनेवाले शत्रुओंको) उखाड़ फेंकूँगा और आपके पास लौट आऊँगा॥ १०१/२॥


वैशम्पायन उवाच

एवं विज्ञाप्य देवेशं प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ११ ॥
जगाम पतगेन्द्रोऽपि पश्चिमाभिमुखो बली।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन करके देवेश्वर जनार्दनको प्रणाम करनेके अनन्तर बलवान् पक्षिराज गरुड़ पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ १११/२ ॥

कृष्णोऽपियदुभिः सार्द्धं विवेश मधुरां पुरीम्॥ १२ ॥
स्वैरिण्य उग्रसेनश्च नागराश्चैव सर्वशः।
प्रत्युद्गम्यार्चयन् कृष्णं प्रहृष्टजनसंकुलम्॥ १३ ॥

इधर श्रीकृष्ण भी यदुवंशियोंके साथ मथुरापुरीमें जा पहुँचे। उस समय राजा उग्रसेन, नर्तकियों तथा मथुराके नागरिक सबने आगे बढ़कर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंके साथ आये हुए श्रीकृष्णका स्वागत सत्कार किया ॥ १२-१३ ॥

जनमेजय उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिर्वसुधाधिपैः।
किं चकार महाबाहुरुग्रसेनो महीपतिः॥ १४ ॥

जनमेजयने पूछा—बहुत-से राजाओंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक किया है—यह समाचार सुनकर महाबाहु राजा उग्रसेनने क्या किया ? ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिः पार्थिवोत्तमैः।
इन्द्रेण कृतसंधानं दूतं चित्राङ्गदं कृतम्॥ १५ ॥
एकैकं नृपतेर्भागं शतसाहस्रसम्मितम्।
राजेन्द्रे त्वर्बुदं दत्तं मानवेषु च वै दश॥ १६ ॥
ये तत्र समनुप्राप्ता न रिक्तास्ते गृहं गताः।
शङ्खो यादवरूपेण प्रददौ हरिचिन्तितम्॥ १७ ॥
एवं निधिपतिः श्रीमान् दैवतैरनुमोदितः।

वैशम्पायनजीने कहा—बहुत-से श्रेष्ठ नरेशोंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक किया है। इन्द्रका अभिप्राय निवेदन करनेके लिये चित्राङ्गद दूत बनकर आये थे। एक-एक राजाको एक-एक लाख मुद्राएँ पुरस्कारमें दी गयीं। जो राजेन्द्र था, उसे एक अर्बुद (दस करोड) दिया गया तथा साधारण मनुष्योंको भी दस दस हजार रुपये दिये गये। जो वहाँ पहुँच गये थे, वे खाली हाथ घर नहीं लौटे। श्रीमान् निधिपति शङ्ख ही यादवरूपसे उपस्थित हो भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार धन देता था और सम्पूर्ण देवता इसका अनुमोदन करते थे ॥ १५-१७१/२ ॥

इति श्रुत्वात्मिकजनाल्लोकप्रवृत्तिकात्नरात्॥ १८ ॥

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