विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२३
चकार महतीं पूजां देवतायतनेष्वपि।
यह समाचार आत्मीय जनोंसे सुनकर तथा लोकवृत्तान्तकी जानकारी करानेवाले गुप्तचरके मुखसे जानकर उग्रसेनने देवमन्दिरोंमें विशेष रूपसे पूजाकी व्यवस्था करायी ॥ १८ १/२ ॥
वसुदेवस्य भवने तोरणोभयपार्श्वतः ॥ १९ ॥
नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः।
वसुदेवके भवनके दोनों बगलमें तोरण लगे और सब ओर नटोंके नाच-गान होने और बाजे बजने लगे ॥ १९ १/२ ॥
पताकाध्वजमालाढ्यां कारयामास वै नृपः ॥ २० ॥
कंसराजस्य च सभां विचित्राम्बरसुप्रभाम्।
राजा उग्रसेनने कंसराजकी सभाको विचित्र वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा / ध्वजा-पताका एवं मालाओंसे अलंकृत कराया ॥ २० १/२ ॥
पताका विविधाकारा दापयामास भोजराट् ॥ २१ ॥
तोरणं गोपुरं चैव सुधापङ्कानुलेपनम् ।
कारयामास राजेन्द्रो राजेन्द्रस्यासनालयम् ॥ २२ ॥
भोजराजने सब ओर भाँति-भाँतिकी पताकाएँ लगवायीं और प्रत्येक फाटक एवं गोपुरको चूनेसे लिपवाया। इस प्रकार राजेन्द्र उग्रसेनने राजेन्द्र श्रीकृष्णके लिये सिंहासन और भवन तैयार करवाया ॥ २१-२२ ॥
नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः ।
पताका वनमालाढ्याः पूर्णकुम्भाः समन्ततः ॥ २३ ॥
राजमार्गेषु राजेन्द्र चन्दनोदकसेचितम् ।
राजेन्द्र ! नगरमें चारों ओर नाच-गान होने और बाजे बजने लगे । राजमार्गोंपर चन्दनयुक्त जलका छिड़काव किया गया था और वहाँ चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे । उन कलशोंको पताका और वनमालाओंसे अलंकृत किया गया था ॥ २३ १/२ ॥
वस्त्राभरणकं राजा दापयामास भूतले ॥ २४ ॥
धूपं पार्श्वोभये चैव चन्दनागुरुगुग्गुलैः ।
गुडं सर्जरसं चैव दह्यमानं ततस्ततः ॥ २५ ॥
राजा उग्रसेनने भूतलपर पाँवड़ेके रूपमें वस्त्र बिछवा दिये थे और वहाँ फूलोंकी मालाएँ रखवा दी थीं तथा सड़कोंके दोनों बगल चन्दन, अगुरु और गुग्गुलकी धूप जलवायी । जहाँ-तहाँ राल और गुड जलाये जा रहे थे ॥ २४-२५ ॥
वृद्धस्त्रीजनसंघैश्च गायद्भिः स्तुतिमङ्गलम्।
अर्घ्यं कृत्वा प्रतीक्षन्ते स्वेषु स्थानेषु योषितः ॥ २६ ॥
बूढी स्त्रियोंके समुदाय स्थान-स्थानपर स्तुति और मङ्गल गाते थे । उनके साथ ही युवतियाँ अपने-अपने घरोंपर अर्घ्य सजाकर श्रीकृष्णके शुभागमनकी बाट जोह रही थीं ॥ २६ ॥
एवं कृत्वा पुरानन्दमुग्रसेनो नराधिपः ।
वसुदेवगृहं गत्वा प्रियाख्यानं निवेद्य च ॥ २७ ॥
रामेण सह सम्मन्त्र्य निर्गतो रथमन्तिकम् ।
इस प्रकार राजा उग्रसेन नगरमें आनन्दोत्सवकी व्यवस्था करके वसुदेवके घरपर गये और श्रीकृष्णके अभिषेक तथा आगमनका प्रिय समाचार निवेदन करके बलरामके साथ सलाहकर श्रीकृष्णके रथके निकट चले ॥ २७ १/२ ॥
तस्मिन्नेवान्तरे राजञ्छङ्खध्वनिरभून्महान् ॥ २८ ॥
पाञ्चजन्यस्य निनदं श्रुत्वा मथुरावासिनः ।
स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च सूता मागधवन्दिनः ॥ २९ ॥
विनिर्ययुर्महासेना रामं कृत्वाग्रतो नृप ।
अर्घ्यं पाद्यं पुरस्कृत्य उग्रसेनेन धीमता ॥ ३० ॥
राजन् ! नरेश्वर ! इसी बीचमें बड़े जोरसे शङ्ख-ध्वनि सुनायी दी । पाञ्चजन्यका गम्भीर नाद सुनकर मथुरावासी स्त्री, बालक, वृद्ध, सूत, मागध और वन्दी बलरामजीको आगे करके विशाल सेनाके साथ अर्घ्य-पाद्य आदि लिये नगरसे बाहर निकले । इन सबके साथ बुद्धिमान् राजा उग्रसेन भी थे ॥ २८-३० ॥
दृष्टिपन्थानमासाद्य उग्रसेनो महीपतिः ।
अवतीर्य रथाच्छुभ्रात् पादमार्गेण चाग्रतः ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णके दृष्टिपथमें आकर राजा उग्रसेन अपने उज्ज्वल रथसे उतर पड़े और पैदल ही आगे बढ़े ॥ ३१ ॥
दृष्ट्वाऽऽसीनं रथे रम्ये दिव्यरत्नविभूषितम् ।
अङ्गेष्वाभरणं चैव दिव्यरत्नप्रभायुतम् ॥ ३२ ॥
वनमालोरसं दिव्यं तपन्तमिव भास्करम् ।
चामरं व्यजनं छत्रं खगेन्द्रध्वजमुच्छ्रितम् ॥ ३३ ॥
राजलक्षणसम्पूर्णमाप्तार्कमिवोज्ज्वलम् ।
श्रियाभिभूतं देवेशं दुर्निरीक्ष्यतरं हरिम् ॥ ३४ ॥
उन्होंने देखा, भगवान् श्रीकृष्ण एक रमणीय रथपर विराजमान हैं । दिव्य रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं । उनके अङ्गोंके आभूषण दिव्य रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशित हो रहे हैं । उनके वक्षःस्थलपर वनमाला विराज रही है। वे दिव्य रूपधारी श्रीहरि तपते हुए सूर्यके समान जान पड़ते हैं । उनके दोनों पार्श्वमें चँवर और व्यजन डुलाये जाते हैं । सिरपर छत्र तना हुआ है । रथपर ऊँचा गरुड़ध्वज फहरा रहा है । वे समस्त राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं और निकट आये हुए सूर्यके समान दिव्य ज्योतिसे जाज्वल्यमान