भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 446
४२८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हो रहे हैं। अद्भुत शोभासे व्याप्त दिखायी देते हैं। उन देवेश्वर श्रीहरिकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा है ॥ ३२-३४ ॥

दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्र हर्षगद्गदया गिरा।
बभाषे पुण्डरीकाक्षं रामं बलनिषूदनम् ॥ ३५॥

राजेन्द्र ! भगवान् श्रीकृष्णको इस रूपमें देखकर राजा उग्रसेन शत्रुसैन्यहन्ता कमलनयन बलरामजीसे हर्षगद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३५ ॥

रथेन न मया गन्तुं युक्तपूर्वमिति चिन्त्य वै।
अवतीर्णो महाभाग गच्छ त्वं स्यन्दनेन च ॥ ३६॥

'महाभाग ! मैंने पहलेसे ही यह सोच लिया है कि मुझे रथपर बैठकर भगवान्‌के सामने नहीं जाना चाहिये। अतः तुम्हीं रथसे यात्रा करो।' ऐसा कहकर वे रथसे उतर गये ॥ ३६ ॥

विष्णुना छद्मरूपेण गत्वेमां मथुरां पुरीम्।
अनुप्रकाशितमात्मानं देवेन्द्रत्वं नृपार्णवे ॥ ३७॥
तमहं स्तोतुमिच्छामि सर्वभावेन केशवम्।

उतरकर वे फिर बोले—भगवान् विष्णु छद्मरूप धारण करके इस मथुरापुरीमें आये थे। इन्होंने राजाओंके समुद्रमें जाकर अपने देवेन्द्र-रूपको प्रकाशित किया है; अतः मैं केशवकी सर्वतोभावसे स्तुति करना चाहता हूँ ॥ ३७॥

प्रत्युवाच महातेजा राजानं कृष्णपूर्वजः ॥ ३८ ॥
न युक्तं नृपते स्तोतुं व्रजन्तं देवसत्तमम्।
विना स्तोत्रेण संतुष्टस्तव राजञ्जनार्दनः ॥ ३९॥
तुष्टस्य स्तुतिना किं ते दर्शनेन तव स्तुतिः।

तब श्रीकृष्णके बड़े भाई महातेजस्वी बलरामने राजा उग्रसेनको इस प्रकार उत्तर दिया—'नरेश्वर ! यहाँ आते हुए देवप्रवर श्रीकृष्णकी स्तुति करना आपके लिये उचित नहीं है। राजन् ! आपपर तो श्रीकृष्ण बिना स्तुतिके ही संतुष्ट हैं। जब वे संतुष्ट ही हैं तो उनकी स्तुतिसे आपको क्या लेना है । आपके दर्शनमात्रसे ही उनकी स्तुति हो गयी ॥ ३८-३९॥

राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य आगतस्तव वेश्मनि ॥ ४० ॥
न त्वया स्तुतवान् राजन् दिव्यैः स्तोत्रैरमानुषैः।

राजन् ! श्रीकृष्ण राजेन्द्रका पद पाकर आपके घर आ रहे हैं; इसलिये आप अमानुषिक दिव्य स्तुतियोंद्वारा उनकी स्तुति करें—यह आपके लिये उचित नहीं है ॥ ४० ॥

एवमाद्युद्यमाणौ तौ सम्प्राप्तौ केशवान्तिकम् ॥ ४१ ॥
अर्घोद्यतभुजं दृष्ट्वा स्थापयित्वा रथोत्तमम्।
उवाच वदतां श्रेष्ठ उग्रसेनं नराधिपम् ॥ ४२ ॥

इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों श्रीकृष्णके निकट जा पहुँचे। राजा उग्रसेनको हाथमें अर्घ्य लिये खड़ा देख वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथको ठहराकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ ४१-४२ ॥

यन्मया चाभिषिक्तस्त्वं मथुरेशो भवत्विति।
न युक्तमन्यथा कर्तुं मधुराधिपते त्वयम् ॥ ४३॥

'मधुरापते ! मैंने जो आपका इसलिये अभिषेक किया था कि आप मथुराराज्यके स्वामी हों, उसे आप स्वयं ही मटियामेट कर दें—यह आपके लिये उचित नहीं है ॥४३॥

अर्घ्यमाचमनीयं च पाद्यं चास्मै निवेदितम्।
न दातुमर्हसे राजन्नेष मे मनसः प्रियः ॥ ४४॥

'राजन् ! मैंने आपको अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय निवेदन किया है। अतः आप मुझे ये सब वस्तुएँ न दें — यही मेरे मनको प्रिय है ॥ ४४ ॥

तवाभिप्रायं विज्ञाय ब्रवीमि नृपते वचः।
त्वमेव माधुरो राजा नान्यथा कर्तुमर्हसि ॥ ४५॥

'नरेश्वर ! मैं आपके मनोभावको जानकर कहता हूँ। आप ही मथुराके राजा हैं और रहेंगे। इसे अन्यथा करना आपके लिये उचित नहीं है ॥ ४५ ॥

स्थानभागं च नृपते दास्यामि तव दक्षिणम्।
यथा नृपाणां सर्वेषां तथा ते स्थापितोऽग्रतः ॥ ४६ ॥

'महाराज ! मैं आपको पुरस्कारके रूपमें नियत धनका भाग अर्पित करूँगा। जैसे अन्य सब राजाओंको दिया गया है, वैसे आपके लिये भी सामने रखा हुआ है ॥ ४६ ॥

शतसाहस्रिको भागो वस्त्राभरणवर्जितः।
आरुहस्व रथं शुभ्रं चामीकरविभूषितम् ॥ ४७ ॥

'वस्त्र और आभूषण छोड़कर केवल एक लाख स्वर्ण (दीनार) आपके हिस्सेमें अर्पित हैं। अब आप इस स्वर्ण-भूषित शुभ्र रथपर आरूढ़ होइये ॥ ४७ ॥

चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं च मनुजेश्वर।
दिव्याभरणसंयुक्तं मुकुटं भास्करप्रभम् ॥ ४८ ॥
धारयस्व महाभाग पालयस्व पुरीमिमाम्।

'महाभाग ! मनुजेश्वर ! चँवर, व्यजन, छत्र, ध्वज और दिव्य आभूषणोंसहित सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुट धारण कीजिये। साथ ही इस पुरीका पालन करते रहिये ॥४८॥