भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 447

विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२५


पुत्रपौत्रैः प्रमुदितो मथुरां परिपालय ॥ ४९ ॥
जित्‍वारिगणसंघांश्च भोजवंशं विवर्द्धय ।

आप पुत्रों और पौत्रोंके साथ आनन्दित रहकर मथुरा-पुरीका पालन कीजिये। शत्रुगणोंको पराजित करके भोजवंशको बढ़ाइये ॥ ४९॥

देवदेवाद्यनन्ताय शौरिणे वज्रपाणिना ॥ ५० ॥
प्रेषितं देवराजेन दिव्याभरणमम्बरम् ।

‘वज्रधारी इन्द्रने शूरसेनके कुलमें उत्पन्न हुए देवताओंके भी देवता, सबके आदि कारण शेषस्वरूप बलरामजीके लिये दिव्य वस्त्र और आभूषण भेजा है ॥ ५०॥’

माथुराणां च सर्वेषां भागा दीनारका दश ॥ ५१ ॥
सूतमागधबन्दीनामेकैकस्य सहस्रकम् ।
वृद्धस्त्रीजनसंघानां गणिकानां शतं शतम् ॥ ५२ ॥
नृपेण सह तिष्ठन्ति विकद्रुप्रमुखाश्च ये ।
दशसाहस्रिको भागस्तेषां धात्रा प्रकल्पितः ॥ ५३ ॥

‘मथुराके सभी नागरिकोंके लिये पृथक्-पृथक् दस-दस दीनार सुवर्णके भाग नियत किये गये हैं। सूत, मागध और वन्दीजनोंमेंसे एक-एकको एक-एक हजार दीनार प्राप्त होंगे। मङ्गल गानेवाली बूढ़ी स्त्रियों तथा नर्तकियोंको सौ-सौ दीनार दिये जायेंगे। विकद्रु आदि जो प्रमुख यादव राजा उग्रसेनके साथ रहते हैं, उनमेंसे प्रत्येकका भाग इन्द्रने दस दस हजार दीनार नियत किया है’ ॥ ५१-५३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूज्य राजानं माथुराणां चमूमुखे ।
कृत्वा सुमहदानन्दां मथुरां मधुसूदनः ॥ ५४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार मथुरावासियोंकी सेनाके मुहानेपर राजा उग्रसेनका सम्मान करके भगवान् मधुसूदनने सारी मथुराको महान् आनन्दसे परिपूर्ण करते हुए उसमे प्रवेश किया ॥ ५४ ॥

दिव्याभरणमाल्यैश्च दिव्याम्बरविलेपनैः ।
दीप्यमानाः समन्ताच्च देवा इव त्रिविष्टपे ॥ ५५ ॥

जैसे स्वर्गमें देवता शोभा पाते हैं, उसी प्रकार मथुरामें भगवान् श्रीकृष्ण और वहाँके नागरिक दिव्य आभूषणों, दिव्य पुष्पोंकी मालाओं तथा दिव्य वस्त्र और चन्दनॉसे अलंकृत हो सब ओर प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५५ ॥


भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च ॥ ५६ ॥
सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।
तुमुलः सुमहानासीन्मेघनाद इवाम्बरे ॥ ५७ ॥

‘भेरी, पटह, शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, शूरवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट होनेसे जो सम्मिलित महान् शब्द होता था, वह आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ ५६-५७ ॥

बन्दिभिः स्तूयमानं च नमश्चक्रुरपि प्रजाः ।
दत्त्वा दानमनन्तं च न ययौ विस्मयं हरिः ॥ ५८ ॥

बन्दीजन भगवान्‌की स्तुति करते थे और प्रजावर्गके लोग उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उस समय धनका अनन्त दान करके भी श्रीहरिको कोई विस्मय या गर्व नहीं हुआ ॥ ५८ ॥

स्वभावोन्नतभावत्वाददृष्टपूर्वात्ततोऽधिकम् ।
अनहंकारभावाच्च विस्मयं न जगाम ह ॥ ५९ ॥

एक तो स्वभावसे ही उनका ऊँचा भाव था। वे उससे पहले उसकी अपेक्षा भी अधिक धनका दान देख चुके थे और स्वाभाविक ही उन्हें अहंकार छू नहीं गया था; इसलिये उनको विस्मय या गर्व नहीं हुआ ॥ ५९ ॥

दीप्यमानं स्ववपुषा आयान्तं भास्करप्रभम् ।
दृष्ट्वा मथुरवासिन्यो नमश्चक्रुः पदे पदे ॥ ६० ॥

अपने इस शरीरसे प्रकाशित होते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णको आते देख मथुरावासी स्त्रियाँ पग-पगपर उन्हें नमस्कार करती थीं ॥ ६० ॥

एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः ।
नागपर्यङ्कमुत्सृज्य प्राप्तोऽयं मथुरां पुरीम् ॥ ६१ ॥

(उस समय मथुरावासी आपसमें इस प्रकार कहते थे) ‘ये ही क्षीरसमुद्रमें निवास करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, जो इस समय शेषशय्याका परित्याग करके मथुरा पुरीमें आ गये हैं ॥ ६१ ॥

बद्ध्वा बलिं महावीर्यं दुर्जयं त्रिदशैरपि ।
शक्राय प्रददौ राज्यं त्रैलोक्यं वज्रपाणये ॥ ६२ ॥

‘इन्होंने देवताओंके लिये भी दुर्जय महापराक्रमी राजा बलिको बाँधकर वज्रधारी इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य दे दिया था ॥ ६२ ॥

हत्वा दैत्यगणान् सर्वान् कंसं च बलिनां वरम् ।


^१. एक हजार स्वर्णमुद्राओंका एक दीनार होता है। इसके अनुसार मथुराके प्रत्येक नागरिकको दस-दस हजार स्वर्णमुद्रायें अर्पित की गयीं।