विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भोजराजाय मथुरां दत्त्वा केशिनिसूदनः ॥ ६३ ॥
नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये न चासीनो नृपासने ।
राजेन्द्रत्वं च सम्प्राप्य मथुरामाविशत् ततः ॥ ६४ ॥
'इन केशिनिसूदन केशवने समस्त दैत्यसमूहोंका वध करके बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको मारकर मथुराका राज्य भोजराज उग्रसेनको दे दिया; किंतु न तो स्वयं ये राज्यपर अभिषिक्त हुए और न राजाके सिंहासनपर ही बैठे। इस समय राजेन्द्र-पद प्राप्त करके ये मथुरामें प्रविष्ट हुए हैं' ॥ ६३-६४ ॥
एवमन्योन्यसंजल्पं श्रुत्वा पुरनिवासिनाम् ।
वन्दिमागधसूतानामिदमूचुर्गणाधिपाः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार आपसमें कही गयी पुरवासियोंकी बातें सुन-कर सूत, मागध और वन्दीजनोंके प्रधान लोग इस प्रकार कहने लगे— ॥ ६५ ॥
किं वा शक्यामहे वक्तुं गुणानां ते गुणोदधे ।
मानुषेणैकजिह्वेन प्रभावोत्साहसम्भवान् ॥ ६६ ॥
'गुणसागर ! हम मनुष्यको मिली हुई एक जिह्वाके द्वारा आपके गुणोंका प्रभाव, उत्साह और प्राकट्य कैसे बता सकते हैं ? ॥ ६६ ॥
स तत्र भोगी नागेन्द्रः कदाचिद् देव बुद्धिमान् ।
द्विसाहस्रेण जिह्वेन वासुकिः कथयिष्यति ॥ ६७ ॥
'देव ! कदाचित् पाताललोकमें रहनेवाले सर्पशरीरधारी नागराज बुद्धिमान् वासुकि (शेष) अपनी दो हजार जिह्वाओं-द्वारा आपके गुण प्रभावका वर्णन कर सकेंगे ॥ ६७ ॥
किं त्वद्भुतमिदं लोके मानवेन्द्रेषु भूतले ।
न भूतं न भविष्यं च शक्रादासनमागतम् ॥ ६८ ॥
'इस भूतलपर या जगत्मे नरेशोंके लिये कभी इन्द्रलोक-से सिंहासन आया हो, यह अद्भुत बात न कभी हुई थी और न भविष्यमें कभी होनेवाली है । (किंतु आपने इस असम्भव-को भी सम्भव कर दिखाया ) ॥ ६८ ॥
सभावतरणं चैव कलशैरागतं स्वयम् ।
न श्रुतं न च दृष्टं वा तेन मन्यामहेऽद्भुतम् ॥ ६९ ॥
'स्वर्गसे सभाभवनका उतरना और आकाशमें दिव्य कलशोंका प्रकट होकर स्वयं ही अभिषेक करना न तो किसीने देखा था और न कभी सुननेमें ही आया था। इसलिये हम इस घटना-को अद्भुत मानते हैं ॥ ६९ ॥
धन्या देवी महाभागा देवकी योषितां वरा ।
भवन्तं त्रिदशश्रेष्ठं धृत्वा गर्भेण केशवम् ॥ ७० ॥
कृष्णं पद्मपलाशाक्षं श्रीपुञ्जममरार्चितम् ।
नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम् ॥ ७१ ॥
'युवतियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकीदेवी धन्य हैं, जिन्होंने आप देवप्रवर केशवको गर्भमें धारण करनेका महान् सौभाग्य प्राप्त किया और अब वे अपने स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे आपके श्याम-सुन्दर कमलनयन शोभाधाम देवपूजित मुखारविन्दको निहारा करती हैं' ॥ ७०-७१ ॥
इति संजल्पमानानां शृण्वन्तौ पृथगीरितम् ।
उग्रसेनं पुरस्कृत्य भ्रातरौ रामकेशवौ ॥ ७२ ॥
प्राकारद्वारि सम्प्राप्तावर्चयामास वै तदा ।
अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा पाद्यं पाद्येति चाब्रवीत् ॥ ७३ ॥
उग्रसेनस्ततो धीमान् केशवस्य रथाग्रतः ।
ऐसी बातें कहनेवाले सूत, मागध और वन्दियोंके पृथक्-पृथक् वचनोंको सुनते हुए दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण उग्रसेनको आगे करके नगरकी चहारदीवारीके दरवाजेपर आ पहुँचे । उस समय बुद्धिमान् राजा उग्रसेनने भगवान् श्री-कृष्णके रथके आगे खड़ा होकर कहा—'पाद्य लाओ, पाद्य लाओ।' फिर स्वयं ही पाद्य, अर्घ्य और आचमन देकर उनका पूजन किया ॥ ७२-७३ ½ ॥
प्रणम्य शिरसा कृष्णं गजमारुह्य वीर्यवान् ॥ ७४ ॥
घनवत् तोयधारेण ववर्ष कनकाम्बुभिः ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्णको सिरसे प्रणाम करके वे पराक्रमी राजा उग्रसेन हाथीपर चढ़ गये और जैसे मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार वे सुवर्णमय जलकी वर्षा करने लगे ॥ ७४ ½ ॥
घनौघैर्वर्षमाणस्तु सम्प्राप्तः पितृवेश्मनि ॥ ७५ ॥
मथुराधिपतिः श्रीमानुवाच मधुसूदनम् ।
उस वर्षाके साथ ही श्रीकृष्ण अपने पिताके घर जा पहुँचे । वहाँ श्रीमान् मथुरानरेश उग्रसेनने मधुसूदन श्रीकृष्ण-से कहा— ॥ ७५ ½ ॥
राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य युक्तं मे नृपवेश्मनि ॥ ७६ ॥
स्थापितुं देवराजेन दत्तं सिंहासनं प्रभो ।
'प्रभो ! आपने राजेन्द्रका पद प्राप्त किया है; अतः आपके लिये यही उचित है कि आप देवराज इन्द्रके दिये हुए सिंहासनको इस राजमहलमे स्थापित करें ॥ ७६ ½ ॥
नेष्यामि मथुरेशस्य सभां भुजबलार्जिताम् ॥ ७७ ॥
प्रसादयिष्ये भगवन् न कोपं कर्तुमर्हसि ।
भगवन् ! 'आप ही मथुराके स्वामी हैं। आपने यहाँकी राजसभाको अपनी भुजाओके बलसे प्राप्त किया है। मैं आपको उस सभामें ले चलूँगा। एवं अपने व्यवहारोंसे आपको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करूँगा । आप मुझपर क्रोध न करें ॥ ७७ ½ ॥