भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 449

विष्णुपर्व ] पश्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२७


देवकी वसुदेवश्च रोहिणी च विशाम्पते ॥ ७८ ॥
न किंचित्करणे शक्ता हर्षक्लमविमोहिता ।
'प्रजानाथ ! देवकी, वसुदेव और रोहिणी—ये हर्षके उद्रेकसे मोहित हो गये थे; अतः उस समय कुछ भी न कर सके ॥ ७८ १/२ ॥

कंसमाता ततो राजन्नर्चयामास केशवम् ॥ ७९ ॥
नानादिग्देशजानीतं कंसेनोपार्जितं धनम् ।
देशकालं समालोक्य पादयुग्मे न्यवेदयत् ॥ ८० ॥
उग्रसेनं समाहूय उवाच श्लक्ष्णया गिरा ।
राजन् ! तब कंसकी माता पद्मावतीने भगवान् केशवका पूजन किया और कंस अनेक देशोंसे जिस धनको जीतकर लाया था, उसे देशकालका विचार करके श्रीकृष्णके युगल चरणोंमें निछावर कर दिया। इस समय श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनको बुलाकर मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ॥७९-८० १/२॥

श्रीकृष्ण उवाच
न चाहं मथुराकाङ्क्षी न मया वित्तकाङ्क्षया ॥ ८१ ॥
घातितस्तव पुत्रोऽयं कालेन निधनं गतः ।
श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! मैं मथुराका राज्य नहीं चाहता । मैंने धनकी अभिलाषासे आपके पुत्रका वध नहीं किया है। यह कालसे ही मृत्युको प्राप्त हुआ है ॥ ८१ १/२ ॥

यजस्व विविधान् यज्ञान् ददस्व विपुलं धनम् ॥ ८२ ॥
जयस्व रिपुसैन्यानि मम बाहुबलाश्रयात् ।
राजन् ! आप नाना प्रकारके यज्ञ कीजिये, प्रचुर धनका दान दीजिये और मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाइये ॥ ८२ १/२ ॥

त्यजस्व मनसस्तापं कंसनाशोद्भवं भयम् ॥ ८३ ॥
नयस्व वित्तनिचयं मया दत्तं पुनस्तव ।
आप मानसिक संतापको त्याग दीजिये । कंस-वधजनित भयको मनसे निकाल दीजिये तथा मेरी दी हुई इस धन-राशिको पुनः अपने ही भवनमें ले जाइये ॥ ८३ १/२ ॥

इति प्राश्वास्य राजानं कृष्णस्तु हलिना सह ॥ ८४ ॥
प्रविवेश ततः श्रीमान् मातापित्रोरथान्तिकम् ।
इस तरह राजा उग्रसेनको आश्वासन दे श्रीमान् श्रीकृष्ण हलधरके साथ माता-पिताके पास गये ॥ ८४ १/२ ॥

आनन्दपरिपूर्णाभ्यां हृदयाभ्यां महाबलौ ॥ ८५ ॥
पितृमात्रोस्तु पादान् वै नमश्चक्रतुरानतौ ।
वहाँ उन दोनों महाबली वीरोंने आनन्दपूर्ण हृदयसे विनीत होकर माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार किया ॥८५ १/२॥


तस्मिन् मुहूर्ते नगरी मथुरा तु बभूव सा ॥ ८६ ॥
स्वर्गलोकं परित्यज्यावतीर्णेवामरावती ।
उस मुहूर्तमें मथुरा नगरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो अमरावतीपुरी स्वर्गलोकका परित्याग करके भूतलपर उतर आयी हो ॥ ८६ १/२ ॥

वसुदेवस्य भवनं समीक्ष्य पुरवासिनः ॥ ८७ ॥
मनसा चिन्तयामासुर्देवलोकं न भूतुलम् ।
वसुदेवके घरकी ओर देखकर पुरवासी अपने मनमें सोचने लगे कि यह भूलोक नहीं देवलोक है ॥ ८७ १/२ ॥

विसृज्य मथुरेशं तु महिषीसहितं तदा ॥ ८८ ॥
भवनं वसुदेवस्य प्रविश्य बलकेशवौ ।
न्यस्तशस्त्रावुभौ वीरौ स्वगृहे स्वैरचारिणौ ॥ ८९ ॥
उस समय रानीसहित मथुरानरेशको विदा करके दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए और अस्त्र-शस्त्र रखकर अपने घरमें इच्छानुसार विचरने लगे ॥ ८८-८९ ॥

ततः कृताह्निकौ भूत्वा सुखासीनौ कथान्तरे ।
एतस्मिन्नेव काले तु महोत्पातो बभूव ह ॥ ९० ॥
तदनन्तर, नित्य कर्म करके सुखपूर्वक बैठकर जब वे दोनों बातचीत करने लगे, इसी समय वहाँ महान् उत्पात प्रकट हुआ ॥ ९० ॥

बभ्रमुश्च घनाकाशे चेलुश्च भुवि पर्वताः ।
समुद्राः क्षुभिताः सर्वे विभ्रान्तो भोगिनां वरः ॥९१॥
कम्पिता यादवाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ।
आकाशमें बादल चक्कर काटने लगे । पृथ्वीपर पर्वत हिलने लगे । सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे और सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनाग भी चकरा गये । समस्त यादव कम्पित हो औंधे मुँह पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९१ १/२ ॥

तौ तान् निपतितान् दृष्ट्वा रामकृष्णौ तु निश्चलौ ॥ ९२ ॥
महता पक्षवातेन विज्ञातौ पतगोत्तमम् ।
उन सबको गिरा हुआ देखकर भी बलराम और श्रीकृष्ण विचलित नहीं हुए । पाँखोंसे उठी हुई प्रचण्ड वायुके द्वारा उन्हें यह पता लग गया कि पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ आ रहे हैं ॥ ९२ १/२ ॥

ददर्श समुदप्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम् ॥ ९३ ॥
प्रणम्य शिरसा ताभ्यां सौम्यरूपी कृतासनः ।
इतनेमें ही श्रीकृष्णने देखा, गरुड़जी आ गये । वे दिव्य पुष्पोंके हार और दिव्य चन्दनसे अलंकृत थे । उन्होंने सिर