भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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४२८] श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया । फिर वे सौम्यरूप धारण करके एक आसनपर बैठ गये ॥ ९३॥

तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं सचिवं साम्परायिकम् ॥ ९४ ॥
धृतिमन्तं गरुत्मन्तमुवाच बलिसूदनः।
अपने समरसचिव धैर्यवान् गरुड़को आया देख बलिको बाँधनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—॥ ९४ १/२ ॥

स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ॥ ९५ ॥
विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय।
'पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड ! तुम्हारा स्वागत है। देवसेनाके शत्रुओंको कुचल देनेवाले पक्षिराज ! तुम्हारा स्वागत है। विनताके हृदयको आनन्द देनेवाले केशवप्रिय गरुड़ ! तुम्हारा स्वागत है' ॥ ९५ १/२ ॥

तमुवाच ततः कृष्णः स्थितं देहमिवापरम् ॥ ९६ ॥
तुल्यसामर्थ्यया वाचा आसीनं विनतात्मजम् ।
तदनन्तर, श्रीकृष्ण अपने दूसरे शरीरके समान बैठे हुए विनतानन्दन गरुड़से अपनी शक्तिके अनुरूप वाणी-द्वारा इस प्रकार बोले—॥ ९६ १/२ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
यास्यामः पतगश्रेष्ठ भोजस्यान्तःपुरं महत् ॥ ९७ ॥
तत्र गत्वा सुखासीना मन्त्रयामो मनोगतम् ।
श्रीकृष्णने कहा—पक्षिप्रवर ! हमलोग भोजराजके विशाल अन्तःपुरमें चलेंगे और वहीं सुखपूर्वक बैठकर मनोगत विषयपर गुप्तरूपसे विचार करेंगे ॥ ९७ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
प्रविष्टौ तौ महावीर्यौ बलदेवजनार्दनौ ॥ ९८ ॥
वैनतेयतृतीयौ च गुहां मन्त्रमथाब्रुवन् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ ९९ ॥
वृतः सैन्येन महता महद्भिश्च नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ॥१००॥
न शक्ष्यामः क्षयं कर्तुं जरासंधस्य वाहिनीम् ।
अतोऽर्थे वैनतेय त्वां ब्रवीमि मथुरां पुरीम् ॥१०१॥
वसतोरावयोः श्रेयो न भवेदिति मे मतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसके बाद महापराक्रमी बलराम और श्रीकृष्ण तीसरे गरुड़को साथ लेकर उक्त भवनमें प्रविष्ट हुए और गुप्त विषयपर मन्त्रणा करने लगे । उस समय श्रीकृष्ण बोले—'विनतानन्दन ! जरासंधको हमलोगोंके लिये अवध्य बना दिया गया है (यहाँ दशा कालयवनकी भी है) । परंतु हमारे उस शत्रु‌का सैनिक एवं शारीरिक बल बहुत बढ़ा है। यह बहुत बड़ी सेना तथा महान् नरेशोंसे घिरा रहता है। उसकी सेनाएँ इतनी अधिक हैं कि हमलोग जरासंधकी उस विशालवाहिनीका सौ वर्षोंमें भी संहार नहीं कर सकेंगे। अतः मैं तुमसे कहता हूँ कि अब मथुरापुरीमें रहनेसे हम दोनोंका भला नहीं होगा। मेरा तो ऐसा ही विश्वास है' ॥ ९८—१०१ १/२ ॥

गरुड उवाच
देवदेवं नमस्कृत्य गतोऽहं भवतोऽन्तिकात् ॥१०२॥
वासार्थमीक्षितुं भूमिं तव देव कुशस्थलीम् ।
गरुड़ बोले—देव ! आप देवताओंके भी देवता हैं । आपको नमस्कार करके मैं आपके निकटसे आपकेही रहनेयोग्य निवासभूमिका निरीक्षण करनेके लिये कुशस्थलीकी ओर चला गया था ॥ १०२ १/२ ॥

गत्वाहं खे समास्थाय समन्तादवलोक्य ताम् ॥१०३॥
दृष्ट्वाहं विबुधश्रेष्ठ पुरीं लक्षणपूजिताम् ।
सुरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर आकाशका आश्रय ले सब ओरसे निरीक्षण करके मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि वहाँ सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एवं सम्मानित पुरीका निर्माण हो सकता है ॥ १०३ १/२ ॥

सागरानूपविपुलां प्रागुदक्प्लवशीतलाम् ॥१०४॥
सर्वतोदधिमध्यस्थामभेद्यां त्रिदशैरपि ।
कुशस्थलीके बहुत-से प्रदेश सागरके समीप होनेसे जलप्राय हैं । वहाँकी भूमि पूर्व और उत्तरकी ओरसे कुछ ढालू और शीतल है। वह सब ओरसे समुद्रके बीचमें है, इस कारण वहाँ बसी हुई पुरीका भेदन करना देवताओंके लिये भी असम्भव होगा ॥ १०४ १/२ ॥

सर्वरत्नाकरवतीं सर्वकामफलद्रुमाम् ॥१०५॥
सर्वर्तुकुसुमाकीर्णां सर्वतः सुमनोहराम् ।
वहाँ जो पुरी बनेगी, वह सब प्रकारके रत्नोंकी खान होगी । वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको फलके रूपमें प्रदान करनेवाले होंगे । सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उस पुरीकी शोभा बढ़ायेंगे। वह सब ओरसे अत्यन्त मनोहर होगी ॥ १०५ १/२ ॥

सर्वाश्रमाधिवासां च सर्वकामगुणैर्युताम् ॥१०६॥
नरनारीसमाकीर्णां नित्यामोदविवर्द्धिनीम् ।
वहाँ सभी आश्रमोंके लोग निवास करेंगे । वह पुरी समस्त कमनीय गुणोंसे अलंकृत होगी । असंख्य नर-नारियोंसे भरी रहकर सदा ही आमोद-प्रमोदको बढ़ानेवाली होगी ॥ १०६ १/२ ॥