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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

४२८] श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया । फिर वे सौम्यरूप धारण करके एक आसनपर बैठ गये ॥ ९३॥

तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं सचिवं साम्परायिकम् ॥ ९४ ॥
धृतिमन्तं गरुत्मन्तमुवाच बलिसूदनः।
अपने समरसचिव धैर्यवान् गरुड़को आया देख बलिको बाँधनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—॥ ९४ १/२ ॥

स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ॥ ९५ ॥
विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय।
'पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड ! तुम्हारा स्वागत है। देवसेनाके शत्रुओंको कुचल देनेवाले पक्षिराज ! तुम्हारा स्वागत है। विनताके हृदयको आनन्द देनेवाले केशवप्रिय गरुड़ ! तुम्हारा स्वागत है' ॥ ९५ १/२ ॥

तमुवाच ततः कृष्णः स्थितं देहमिवापरम् ॥ ९६ ॥
तुल्यसामर्थ्यया वाचा आसीनं विनतात्मजम् ।
तदनन्तर, श्रीकृष्ण अपने दूसरे शरीरके समान बैठे हुए विनतानन्दन गरुड़से अपनी शक्तिके अनुरूप वाणी-द्वारा इस प्रकार बोले—॥ ९६ १/२ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
यास्यामः पतगश्रेष्ठ भोजस्यान्तःपुरं महत् ॥ ९७ ॥
तत्र गत्वा सुखासीना मन्त्रयामो मनोगतम् ।
श्रीकृष्णने कहा—पक्षिप्रवर ! हमलोग भोजराजके विशाल अन्तःपुरमें चलेंगे और वहीं सुखपूर्वक बैठकर मनोगत विषयपर गुप्तरूपसे विचार करेंगे ॥ ९७ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
प्रविष्टौ तौ महावीर्यौ बलदेवजनार्दनौ ॥ ९८ ॥
वैनतेयतृतीयौ च गुहां मन्त्रमथाब्रुवन् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ ९९ ॥
वृतः सैन्येन महता महद्भिश्च नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ॥१००॥
न शक्ष्यामः क्षयं कर्तुं जरासंधस्य वाहिनीम् ।
अतोऽर्थे वैनतेय त्वां ब्रवीमि मथुरां पुरीम् ॥१०१॥
वसतोरावयोः श्रेयो न भवेदिति मे मतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसके बाद महापराक्रमी बलराम और श्रीकृष्ण तीसरे गरुड़को साथ लेकर उक्त भवनमें प्रविष्ट हुए और गुप्त विषयपर मन्त्रणा करने लगे । उस समय श्रीकृष्ण बोले—'विनतानन्दन ! जरासंधको हमलोगोंके लिये अवध्य बना दिया गया है (यहाँ दशा कालयवनकी भी है) । परंतु हमारे उस शत्रु‌का सैनिक एवं शारीरिक बल बहुत बढ़ा है। यह बहुत बड़ी सेना तथा महान् नरेशोंसे घिरा रहता है। उसकी सेनाएँ इतनी अधिक हैं कि हमलोग जरासंधकी उस विशालवाहिनीका सौ वर्षोंमें भी संहार नहीं कर सकेंगे। अतः मैं तुमसे कहता हूँ कि अब मथुरापुरीमें रहनेसे हम दोनोंका भला नहीं होगा। मेरा तो ऐसा ही विश्वास है' ॥ ९८—१०१ १/२ ॥

गरुड उवाच
देवदेवं नमस्कृत्य गतोऽहं भवतोऽन्तिकात् ॥१०२॥
वासार्थमीक्षितुं भूमिं तव देव कुशस्थलीम् ।
गरुड़ बोले—देव ! आप देवताओंके भी देवता हैं । आपको नमस्कार करके मैं आपके निकटसे आपकेही रहनेयोग्य निवासभूमिका निरीक्षण करनेके लिये कुशस्थलीकी ओर चला गया था ॥ १०२ १/२ ॥

गत्वाहं खे समास्थाय समन्तादवलोक्य ताम् ॥१०३॥
दृष्ट्वाहं विबुधश्रेष्ठ पुरीं लक्षणपूजिताम् ।
सुरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर आकाशका आश्रय ले सब ओरसे निरीक्षण करके मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि वहाँ सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एवं सम्मानित पुरीका निर्माण हो सकता है ॥ १०३ १/२ ॥

सागरानूपविपुलां प्रागुदक्प्लवशीतलाम् ॥१०४॥
सर्वतोदधिमध्यस्थामभेद्यां त्रिदशैरपि ।
कुशस्थलीके बहुत-से प्रदेश सागरके समीप होनेसे जलप्राय हैं । वहाँकी भूमि पूर्व और उत्तरकी ओरसे कुछ ढालू और शीतल है। वह सब ओरसे समुद्रके बीचमें है, इस कारण वहाँ बसी हुई पुरीका भेदन करना देवताओंके लिये भी असम्भव होगा ॥ १०४ १/२ ॥

सर्वरत्नाकरवतीं सर्वकामफलद्रुमाम् ॥१०५॥
सर्वर्तुकुसुमाकीर्णां सर्वतः सुमनोहराम् ।
वहाँ जो पुरी बनेगी, वह सब प्रकारके रत्नोंकी खान होगी । वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको फलके रूपमें प्रदान करनेवाले होंगे । सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उस पुरीकी शोभा बढ़ायेंगे। वह सब ओरसे अत्यन्त मनोहर होगी ॥ १०५ १/२ ॥

सर्वाश्रमाधिवासां च सर्वकामगुणैर्युताम् ॥१०६॥
नरनारीसमाकीर्णां नित्यामोदविवर्द्धिनीम् ।
वहाँ सभी आश्रमोंके लोग निवास करेंगे । वह पुरी समस्त कमनीय गुणोंसे अलंकृत होगी । असंख्य नर-नारियोंसे भरी रहकर सदा ही आमोद-प्रमोदको बढ़ानेवाली होगी ॥ १०६ १/२ ॥

[ विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२९


प्राकारपरिखोपेतां गोपुराट्टालमालिनीम् ॥ १०७॥
विचित्रचत्वरपथां विपुलद्वारतोरणाम् ।
यन्त्रार्गलविचित्राढ्यां हेमप्राकारशोभिताम् ॥ १०८॥

वह नगरी परकोटों, खाइयों, गोपुरों और अट्टालिकाओंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होगी। इसकी सड़कें और चौराहे अद्भुत शोभासे सम्पन्न होंगे। उस पुरीके द्वार एवं फाटक बहुत बड़े-बड़े होंगे। विचित्र-विचित्र यन्त्रों और अर्गलाओंसे वह सम्पन्न होगी। सोनेकी चहारदीवारी उसकी शोभा बढ़ायेगी॥

नरनागाश्वकलिलां रथसैन्यसमाकुलाम् ।
नानादिग्देशजाकीर्णां दिव्यपुष्पफलद्रुमाम् ॥ १०९॥

हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथोंकी सेनासे वह पुरी व्याप्त रहेगी। विभिन्न दिशाओं और देशोंके लोगों तथा वहाँ उत्पन्न हुए पदार्थोंसे वह भरी होगी। दिव्य पुष्प और फल देनेवाले देववृक्ष उसकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १०९ ॥

पताकाध्वजमालाढ्यां महाभवनशालिनीम् ।
भीषणीं रिपुसंघानां मित्राणां हर्षवर्द्धनीम् ॥ ११०॥

वह नगरी ध्वजा-पताकाओंकी पङ्क्तियोंसे अलंकृत तथा बड़े-बड़े भवनोंसे सुशोभित होगी। शत्रु-समूहोंका भय और मित्रोंका हर्ष बढ़ाती रहेगी ॥ ११० ॥

मनुजेन्द्राधिवासेभ्यो विशिष्टां नगरोत्तमाम् ।
रैवतं च गिरिश्रेष्ठं कुरु देव सुरालयम् ॥ १११॥
नन्दनप्रतिमं दिव्यं पुरद्वारस्य भूषणम् ।
कारयस्वाधिवासं च तत्र गत्वा सुरोत्तम ॥ ११२॥

देव ! अबतक नरेन्द्रके जितने अधिवास हैं, उन सबसे वह पुरी विशिष्ट होगी। देवताओंका निवासस्थान जो गिरिश्रेष्ठ रैवतक है, उसको और वहाँके नन्दनवन-सदृश दिव्य वनको अपने नगरद्वारका भूषण बनाइये। सुरश्रेष्ठ ! वहीं चलकर आप निवास कीजिये ॥ १११-११२ ॥

कुमारीणां प्रचारश्च सुरमण्यो भविष्यति ।
नाम्ना द्वारवती ज्ञेया त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ११३॥
भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ।

वहाँ कुमारियोंका अत्यन्त मनोहर ढंगसे घूमना-फिरना हो सकेगा। उस पुरीका नाम होगा द्वारवती या द्वारका, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी। वह पुरी इन्द्रकी अमरावतीके समान परम रमणीय होगी ॥ ११३½ ॥

यदि स्यात् संवृतां भूमिं प्रदास्यति महोदधिः ॥ ११४॥
यथेष्टं विविधं कर्म विश्वकर्मा करिष्यति ।

दे देगा, तो वहाँ उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न पुरीका निर्माण हो सकेगा। साक्षात् विश्वकर्मा पधारकर वहाँ आपकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके शिल्प-कर्म करेंगे ॥ ११४½ ॥

मणिमुक्ताप्रवालाभिर्वज्रवैडूर्यसप्रभैः ॥ ११५॥
दिव्यैरभिप्राययुतैर्दिव्यैरत्नौघैस्त्रिलोकजैः ।
दिव्यस्तम्भशताकीर्णान् स्वर्गे देवसभोपमान् ॥ ११६॥
जाम्बूनदमयाञ्छुभ्रान् सर्वरत्नविभूषितान् ।
दिव्यध्वजपताकाढ्यान् देवगन्धर्वपालितान् ॥ ११७॥
चन्द्रसूर्यप्रतीकाशान् प्रासादान् कारय प्रभो ।

प्रभो ! आप मणि, मोती, मूँगा, हीरा, वैदूर्य तथा दिव्य भावोंसे युक्त त्रिलोकीके अन्यान्य दिव्य रत्नोंद्वारा ऐसे महल बनवाइये, जो स्वर्गलोककी देव-सभाओंके समान शोभा पा रहे हों। उनमें सैकड़ों दिव्य खम्भे लगे हों। वे महल सोनेकी ईंटोंसे बने हों और उन्हें सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित किया गया हो। वे शुभ्र प्रासाद दिव्य ध्वजा और पताकाओंसे अलंकृत हों। चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते हों और देव-गन्धर्व उनकी रक्षामें तत्पर रहें ॥ ११५-११७½ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं कृत्वा तु संकल्पं वैनतेयोऽथ केशवम् ॥ ११८॥
प्रणम्य शिरसा ताभ्यां निषसाद कृतासनः ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति अपना मनोभाव प्रकट करके विनतानन्दन गरुड़ने सिर झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया। फिर वे अपने आसनपर बैठ गये ॥ ११८½ ॥

कृष्णोऽपि रामसहितो विचिन्त्य हितमीरितम् ॥ ११९॥
प्रकाशकर्तुकामो तौ विसृज्य विनतात्मजम् ।
सत्कृत्य विधिवद् राजन् महार्हवरभूषणैः ॥ १२०॥
मोदेते सुखिनौ तत्र सुरलोके यथामरौ ।

राजन् ! फिर बलरामसहित श्रीकृष्णने भी गरुड़की कही हुई हितकर बातपर विचार करके उसे प्रकाशित करनेकी इच्छा की और बहुमूल्य सुन्दर आभूषणोंद्वारा विनतानन्दन गरुड़़का विधिवत् सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। तत्पश्चात् देवलोकमें विहार करनेवाले दो अमरोंकी भाँति वे दोनों भाई मथुरामें सुख और आनन्दके साथ रहने लगे ॥ ११९-१२०½ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ॥ १२१ ॥
कृष्णं स्नेहेन विस्रब्धं वभाषे वचनामृतम् ।

गरुड़का वह वचन सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन श्रीकृष्णसे स्नेह और विश्वासपूर्वक यह अमृतके समान मधुर वचन बोले—॥ १२१½ ॥

४३०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ॥१२२॥
श्रूयतां वचनं त्वाद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ।

‘श्रीकृष्ण ! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! शत्रुसूदन ! आज मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो ॥ १२२॥

त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ॥१२३॥
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ।

‘जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं सुखसे नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार तुमसे बिछुड़कर हम समस्त यादव इस नगर या राज्य-में सुखसे नहीं रह सकते हैं ॥ १२३½ ॥

त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ॥१२४॥
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ।

‘दूसरोंको मान देनेवाले तात ! हम तुमसे सनाथ होकर तुम्हारे बाहुबलका आश्रय ले नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ १२४½ ॥

विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ॥१२५॥
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ।

‘यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ जाओ, वहाँ हम सबको साथ लिये चलो’ ॥ १२५½ ॥

तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ॥१२६॥
यथैवं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥१२७॥

राजा उग्रसेनकी यह बात सुनकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर बोले—‘राजन् ! आज आपकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥१२६-१२७॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णस्य मधुरागमनमहोत्सवो
द्वारवतीप्रयाणसंकेतो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका मथुरा-गमनमहोत्सव तथा उनके द्वारका जानेका संकेतनामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥


षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी आज्ञासे यादवोंका द्वारकापुरीको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

कस्यचित् त्वथ कालस्य सभ्यांस्तान् यदुसंसदि ।
बभाषे पुण्डरीकाक्षो हेतुमद्वाक्यमुत्तमम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, किसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंकी सभामें बैठे हुए समस्त सभासदोंसे यह हेतुयुक्त उत्तम वचन कहा—॥ १ ॥

यादवानामिदं भूमेर्मथुरा राष्ट्रमालिनी ।
वयं चैवेह सम्भूता व्रजे च परिवर्द्धिताः ॥ २ ॥

‘यह राष्ट्रकी मालासे अलंकृत (समूचे राष्ट्रको मालाकी भाँति धारण करनेवाली राजधानी) मथुरापुरी यादवोंकी भूमि है। हम भी यहीं पैदा हुए हैं और इसीके व्रजमें पलकर बड़े हुए हैं ॥ २ ॥

तदिदानीं गतं दुःखं शत्रवश्च पराजिताः ।
नृपेषु जनितं वैरं जरासंधेन विग्रहः ॥ ३ ॥

‘इस समय हमारा सारा दुःख दूर हो गया है। हमारे शत्रु भी हमसे हार मान चुके हैं। हमने राजाओंसे वैर मोल ले लिया और जरासंधसे लड़ाई छेड़ दी है ॥ ३ ॥

वाहनानि च नः सन्ति पादातं चाप्यनन्तरम् ।
रत्नानि च विचित्राणि मित्राणि च बहूनि च ॥ ४ ॥

‘हमारे पास पर्याप्त वाहन हैं। पैदलोंकी संख्या भी अनन्त है। हमारे खजानेमें विचित्र रत्न हैं तथा हमारे मित्रोंकी संख्या भी बहुत है ॥ ४ ॥

इयं च माथुरी भूमिरल्पा गम्या परस्य तु ।
वृद्धिश्चैव परास्माकं बलतो मित्रतस्तथा ॥ ५ ॥

‘परंतु यह मथुराकी भूमि बहुत छोटी है और शत्रुको सुगमतापूर्वक इसमें प्रवेश हो जाता है। इधर हमारे सैनिकों और मित्रोंकी बहुत अधिक वृद्धि हुई है ॥ ५ ॥

कुमारकोट्यो याश्चेमाः पदातीनां गणाश्च ये ।
एषामपीह वसतां सम्मर्दमुपलक्षये ॥ ६ ॥

‘हमारे पास जो ये एक करोड़ कुमार (अविवाहित)

[विष्णुपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१


सैनिक हैं तथा ये जो पैदलोंके बहुत-से दल हैं, इनके भी यहीं रहनेसे यहाँ बड़ी भीड़-भाड़ दिखायी देती है ॥ ६ ॥

अत्र नो रोचते मह्यं निवासो यदुपुङ्गवाः ।
पुरीं निवेशयिष्यामि मम तत् क्षन्तुमर्हथ ॥ ७ ॥

'अतः यदुपुङ्गवो ! अब यहाँ निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता है; इसलिये मैं दूसरी पुरी बसाऊँगा । मेरी इस धृष्टताको आपलोग क्षमा करेंगे ॥ ७ ॥

एतद् यदनुरूपं वो ममाभिप्रायजं वचः ।
भवाय भवतां काले यदुक्तं यदुसंसदि ॥ ८ ॥

'इस यादवसभामें मेरे हार्दिक अभिप्रायके अनुसार जो बात कही गयी है, वह समयानुसार आपलोगोंके उद्भवके लिये ही है। यदि आपलोगोंको अनुकूल जँचती हो तो कहिये' ॥ ८ ॥

तमूचुर्यादवाः सर्वे हृष्टेन मनसा तदा ।
साध्यतां यदभिप्रेतं जनस्यास्य भवाय वै ॥ ९ ॥

तब समस्त यादव प्रसन्न मनसे बोल उठे—'प्रभो ! इस यादव समाजके उद्भवके लिये आपको जो अभीष्ट हो, वह कार्य कीजिये' ॥ ९ ॥

ततः सम्मन्त्रयामासुर्वृष्णयो मन्त्रमुत्तमम् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ १० ॥

तब समस्त वृष्णिवंशी मिलकर उत्तम मन्त्रणा करने लगे—'यह जरासंध ( या कालयवन ) हमलोगोंके लिये अवध्य कर दिया गया है। हमारे उस शत्रु का सैनिक बल बहुत बड़ा है ॥ १० ॥

कृतः सैन्यक्षयश्चापि महानिह नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ।
न शक्ष्यामो ह्यतस्तेषामपयानेऽभवन्मतिः ॥ ११ ॥

'हमारे पक्षके नरेशोंने शत्रु की उस सेनाका बड़ा भारी विनाश किया है तो भी उसके पास अभी बहुत-सी सेनाएँ हैं, जिन्हें हमलोग सौ वर्षोंमें भी नहीं मार सकते । अतः हमारा विचार उनसे हट जानेके लिये हो गया है' ॥ ११ ॥

तस्मिंश्चैवान्तरे राजा सकालयवनस्तदा ।
सैन्येन तद्विधेनैव मथुरामभ्युपागमत् ॥ १२ ॥

इसी बीचमें कालयवनसहित राजा जरासंध फिर वैसी ही सेना साथ लेकर मथुरापर चढ़ आया ॥ १२ ॥

ततो जरासंधबलं दुर्निवार्यमभूत् तदा ।
ते कालयवनं चैव श्रुत्वेदं प्रतिपेदिरे ॥ १३ ॥

उस समय मथुराके सैनिकोंके लिये जरासंधकी सेनाको ही रोकना अत्यन्त कठिन कार्य था । फिर जब यादवोंने कालयवनका भी आगमन सुना, तब तो उन्होंने मथुरासे हट जाना ही अपने लिये श्रेयस्कर समझा ॥ १३ ॥

केशवः पुनरेवाह यादवान् सत्यसंगरः ।
अद्यैव दिवसः पुण्यो निर्यामः स्वबलानुगाः ॥ १४ ॥

सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णने वहाँ यादवोंसे फिर कहा—'आज ही वह पुण्य दिवस है, जब कि अपनी सेनाके साथ हमें यहाँ-से निकल चलना है' ॥ १४ ॥

ततो निष्क्रममुः सर्वे यादवाः कृष्णशासनात् ।
ओघा इव समुद्रस्य बलौघप्रतिनादिताः ॥ १५ ॥

यह सुनकर समस्त यादव श्रीकृष्णकी आज्ञासे उस पुरीको छोड़कर निकल गये । उस समय सैन्यसमूहोंके कोलाहलसे भरे हुए यादवोंके दल समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति जान पड़ते थे ॥ १५ ॥

संगृह्य ते कलत्राणि वसुदेवपुरोगमाः ।
सुसन्नद्धैर्गजैर्मत्तै रथैरश्वैश्च दंशितैः ॥ १६ ॥
आहत्य दुन्दुभीन् सर्वे स्वजनज्ञातिबान्धवाः ।
निर्ययुर्यादवाः सर्वे मथुरामपहाय वै ॥ १७ ॥

वसुदेव आदि सभी यादव अपनी स्त्रियोंको साथ ले कसे-कसाये मतवाले हाथियों, रथों और सुसज्जित अश्वोंके द्वारा मथुरा छोड़कर चल दिये । उन सबने डंके पीटकर स्वजनों तथा जाति-भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया था ॥ १६-१७ ॥

स्यन्दनैः काञ्चनापीडैर्मत्तैश्च वरवारणैः ।
सूतैः प्लुतैश्च तुरगैः कशापाणिप्रणोदितैः ॥ १८ ॥
स्वानि स्वानि बलाग्राणि शोभयन्तः प्रकर्षिणः ।
प्रत्यङ्मुखा ययुर्हृष्टा वृष्णयो भरतर्षभ ॥ १९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! सुवर्णभूषित रथों, मतवाले गजराजों और सारथीकी आज्ञामात्रसे उछलकर चलनेवालेतथा हाथमें चाबुक लिये सवारोंद्वारा हाँके जानेवाले घोड़ोंसे अपनी-अपनी श्रेष्ठ सेनाओंकी शोभा बढ़ाते तथा उन्हे खींचकर अपने साथ लिये जाते हुए वृष्णिवंशी बड़े हर्षके साथ पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १८-१९ ॥

ततो मुख्यतमाः सर्वे यादवा रणकोविदाः ।
अनीकाग्राणि कर्षन्तो वासुदेवपुरोगमाः ॥ २० ॥

तदनन्तर, युद्धकुशल श्रीकृष्ण आदि सभी मुख्य-मुख्य यादव अपनी सेनाओंको साथ लेकर चले ॥ २० ॥

ते स्म नानालताचित्रं नारिकेलवनायुतम् ।
कीर्णं नागवलैः कान्तं केतकीखण्डमण्डितम् ॥ २१ ॥
तालपुन्नागवकुलद्राक्षाबनघनं क्वचित् ।
अनूपं सिन्धुराजस्य प्रपेदुर्यदुपुङ्गवाः ॥ २२ ॥

४३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वे यदुपुङ्गव वीर सिंधुराजके जलप्राय देशमें जा पहुँचे, जो नाना प्रकारकी लताओंसे विचित्र शोभा पा रहा था। नारियलके बहुत-से वन वहाँ सुशोभित होते थे। नागकेसरोंके झुंड इधर-उधर सब ओर फैले थे, जिनसे वहाँकी कमनीयता और भी बढ़ गयी थी। केवड़ोंकी झाड़ियोंसे वह प्रदेश अलंकृत हो रहा था। कहीं-कहीं ताड़, पुन्नाग, बकुल और अंगूरके वन उस भूभागको और घना बना रहे थे ॥ २१-२२ ॥

ते तत्र रमणीयेषु विषयेषु सुखप्रियाः।
मुमुदुर्यादवाः सर्वे देवाः स्वर्गगता इव ॥ २३ ॥

जिन्हें सुख ही प्रिय है, वे सब यादव वहाँके रमणीय स्थानोंमें स्वर्गमें रहनेवाले देवताओंके समान आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ २३ ॥

पुरवास्तु विचिन्वन् स कृष्णस्तु परवीरहा।
ददर्श विपुलं देशं सागरेणोपशोभितम् ॥ २४ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने नगरके वास्तुस्थानकी खोज करते हुए समुद्रसे सुशोभित होनेवाले एक विशाल प्रदेशको देखा ॥ २४ ॥

वाहनानां हितं चैव सिकताताम्रमृत्तिकम्।

विष्णुपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका वध

जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महात्मनः।
चरितं वासुदेवस्य यदुश्रेष्ठस्य धीमतः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— भगवन्! मैं बुद्धिमान् यदुश्रेष्ठ महात्मा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

किमर्थं च परित्यज्य मथुरां मधुसूदनः।
मध्यदेशस्य ककुदं धाम लक्ष्म्याश्च केवलम् ॥ २ ॥
शृङ्गं पृथिव्याः स्वालक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्।
आर्याह्वयजलभूयिष्ठमधिष्ठानवरोत्तमम् ॥ ३ ॥
अयुद्धेनैव दाशार्हस्त्यक्तवान् द्विजसत्तम।
स कालयवनश्चापि कृष्णे किं प्रत्यपद्यत ॥ ४ ॥

भगवान् मधुसूदन किसलिये मथुरा छोड़कर चले गये? वह तो मध्यदेशका ककुद (सर्वोत्तम स्थान), लक्ष्मीका अद्वितीय धाम, पृथ्वीका शृङ्ग, सुन्दर, दर्शनीय, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, आर्योंका निवासस्थान, जलकी अधिकतासे सुशोभित तथा सभी अधिष्ठानोंमें सबसे उत्तम है। द्विजश्रेष्ठ! दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने बिना युद्धके ही उसे क्यों छोड़ दिया? तथा कालयवनने भी श्रीकृष्णके साथ क्या बर्ताव किया? ॥ २-४ ॥

द्वारकां च समासाद्य वारिदुर्गां जनार्दनः।
किं चकार महाबाहुर्महायोगी महातपाः ॥ ५ ॥

महाबाहु, महायोगी और महातपस्वी भगवान् जनार्दनने जलरूपी दुर्गसे घिरी हुई द्वारकामें जाकर क्या किया? ॥ ५ ॥

किंवीर्यः कालयवनः केन जातश्च वीर्यवान्।
यमसहां समालक्ष्य व्यपयातो जनार्दनः ॥ ६ ॥

कालयवनका पराक्रम कैसा था? किसने उस बलशाली वीरको जन्म दिया था, जिसे असह्य समझकर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकासे हट गये थे? ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच
वृष्णीनामन्धकानां च गुरुर्गार्ग्यो महामनाः।
ब्रह्मचारी पुरा भूत्वान स्म दारान् स विन्दति ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! वृष्णि और अन्धक वंशी यादवोंके गुरु (पुरोहित) महामना गार्ग्यमुनि पहले नियमपूर्वक ब्रह्मचारी रहकर किसी साधनामें लगे हुए थे। वे उन दिनों स्त्री-संसर्गसे दूर रहते थे ॥ ७ ॥

तथा हि वर्तमानं तमूर्ध्वरेतसमव्ययम्।
श्यालोऽभिशस्तवान् गार्ग्यमपुमानिति राजनि ॥ ८ ॥

विकाररहित ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारीके रूपमें रहते हुए उन गार्ग्य-मुनिपर उन्हींके सालेने राजसभामें नपुंसक होनेका कलङ्क लगाया॥

सोऽभिशस्तस्तदा राजन् नगरे त्वजितं जये।
अलिप्संस्तु स्त्रियं चैव तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ ९ ॥

राजन्! जिन्होंने अजित परमात्माको भी जीत लिया था, उस नगरमें इस प्रकार कलङ्कित होनेपर उन्होंने स्त्रीकी इच्छा तो नहीं की, परंतु क्रोधपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ कर दी ॥ ९ ॥

ततो द्वादशवर्षाणि सोऽयश्चूर्णमभक्षयत्।
आराधयन् महादेवमचिन्त्यं शूलपाणिनम् ॥ १० ॥

वे गार्ग्यमुनि अचिन्त्यस्वरूप शूलपाणि महादेवजीकी आराधना करते हुए बारह वर्षोंतक केवल लोहेका चूर्ण खाकर रहे ॥ १० ॥

रुद्रस्तस्मै वरं प्रादात् समर्थं युधि निग्रहे।
वृष्णीनामन्धकानां च सर्वतेजोमयं सुतम् ॥ ११ ॥

तब भगवान् रुद्रने उन्हें वरके रूपमे पूर्ण तेजस्वी पुत्र प्रदान किया, जो युद्धमें वृष्णि और अन्धक-वंशके वीरोंका भी निग्रह करनेमें समर्थ था ॥ ११ ॥

ततः शुश्राव तं राजा यवनाधिपतिर्वरम्।
पुत्रप्रसवजं दैवात्पुत्रः पुत्रकामिता ॥ १२ ॥

इसी समय यवनोंके अधिपति एक राजाने उस पुत्र-प्रदान करनेवाले वरका वृत्तान्त सुना। वह दैवयोगसे पुत्रहीन था और पुत्र पानेकी इच्छा रखता था ॥ १२ ॥

स नृपस्तमुपानाय्य सान्त्वयित्वा द्विजोत्तमम्।
तं घोषमध्ये यवनो गोपस्त्रीषु समासृजत् ॥ १३ ॥

उस यवन-नरेशने द्विजश्रेष्ठ गार्ग्यको सान्त्वनापूर्वक घर लाकर ठहराया और किसी गोष्ठके भीतर उन्हें गोपनारियोंके संसर्गमें रखा ॥ १३ ॥

गोपाली त्वप्सरास्तत्र गोपस्त्रीवेषधारिणी।
धारयामास गार्ग्यस्य गर्भं दुर्धरमच्युतम् ॥ १४ ॥

उसी गोष्ठमे गोपाली नामवाली अप्सरा थी, जो गोप-नारीका वेष धारण करके वहाँ रहती थी। उसीने गार्ग्यमुनिके उस दुर्धर एवं अच्युत गर्भको धारण किया ॥ १४ ॥

मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिनः।
स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ १५ ॥

भगवान् शङ्करके वरके प्रभावसे गार्ग्यमुनिकी उस मानवी-रूपधारिणी अप्सरारूपा भार्याके गर्भसे महाबली शूरवीर कालयवनका जन्म हुआ ॥ १५ ॥

४३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

अपुत्रस्याथ राज्ञस्तु ववृधेऽन्तःपुरे शिशुः । तस्मिन्नुपरते राजन् स कालयवनो नृपः ॥ १६ ॥

राजन् ! उस शिशुका उस पुत्रहीन राजाके अन्तःपुरमें लालन-पालन एवं संवर्धन होने लगा । उस राजाकी मृत्यु होनेके पश्चात् कालयवन ही उसके राज्यका अधिपति हुआ ॥

युद्धाभिकामो नृपतिः पर्यपृच्छद् द्विजोत्तमान् । वृष्ण्यन्धककुलं तस्य नारदेन निवेदितम् ॥ १७ ॥

राजा कालयवन युद्धकी अभिलाषा रखकर श्रेष्ठ द्विजोंसे पूछने लगा कि ‘सबसे बड़े वीर कौन हैं और कहाँ रहते हैं ?’ तब देवर्षि नारदने उसे वृष्णि और अन्धकवंशका परिचय दिया ॥ १७ ॥

ज्ञात्वा तु वरदानं तन्नारदान्मधुसूदनः । उपप्रैक्षत तेजस्वी वर्द्धन्तं यवनेषु तम् ॥ १८ ॥

नारदजीसे उसको मिले हुए वरदानका समाचार जानकर भी तेजस्वी मधुसूदनने यवनोंके यहाँ पलते हुए उस कालयवनकी उपेक्षा कर दी ॥ १८ ॥

समृद्धो हि यदा राजा यवनानां महाबलः । तत एवं नृपा म्लेच्छाः संश्रित्यानुययुस्तदा ॥ १९ ॥

जब यवनोंका राजा महाबली कालयवन समृद्धिशाली हुआ, तब दूसरे म्लेच्छ नरेश उसकी शरण लेकर उसीका अनुसरण करने लगे ॥ १९ ॥

शकास्तुषारा दरदाः पारदाः शृङ्गलाः खसाः । पह्लवाः शतशश्चान्ये म्लेच्छा हैमवतास्तथा ॥ २० ॥

शक, तुषार, दरद, पारद, शृङ्गल, खस, पह्लव तथा दूसरे-दूसरे सैकड़ों हिमालय-निवासी म्लेच्छ उसके साथ हो गये ॥ २० ॥

स तैः परिवृतो राजा दस्युभिः शलभैरिव । नानावेषायुधैर्भीमैर्मथुराभ्यवर्त्तत ॥ २१ ॥

शलभोंके समान उन अगणित लुटेरोंसे, जो नाना प्रकारके वेश और आयुध धारण करनेके कारण बड़े भयंकर प्रतीत होते थे, घिरा हुआ राजा कालयवन मथुरापर चढ़ आया ॥

गजवाजिखरोष्ट्राणामयुतैरर्बुदैरपि । पृथिवीं कम्पयामास सैन्येन महता वृतः ॥ २२ ॥ रेणुना सूर्यमार्गं तु समवच्छाद्य पार्थिवः । मूत्रेण शकृता चैव सैन्येन ससृजे नदीम् ॥ २३ ॥

उसके साथ हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट हजारों, लाखों तथा करोड़ोंकी संख्यामें विद्यमान थे । वह उस विशाल सेनासे घिरकर इस पृथ्वीको कम्पित कर रहा था । उस राजाने सेनाद्वारा उठी हुई धूलसे सूर्यके मार्गको आच्छादित कर दिया और सैनिकोंके मल-मूत्रसे नूतन नदीकी सृष्टि कर दी ॥

अश्वोष्ट्रशकृतां राशेर्निःस्स्रुतेति जनाधिप । ततोऽश्वशकृदित्येवं नाम नद्या बभूव ह ॥ २४ ॥

जनेश्वर ! घोड़ों और ऊँटोंकी लीदोंके ढेरसे वह नदी प्रकट हुई थी, इसलिये उसका नाम ‘अश्वशकृत्’ हो गया ॥ २४ ॥

तत्सैन्यं महदायाद् वै श्रुत्वा वृष्ण्यन्धकाग्रणीः । वसुदेवः समानाय्य ज्ञातीनिदमुवाच ह ॥ २५ ॥

उसकी विशाल सेनाके आगमनका समाचार सुनकर वृष्णि और अन्धक-कुलके अगुआ वसुदेवजी सब जाति-भाइयोंको एकत्र करके उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २५ ॥

इदं समुत्थितं घोरं वृष्ण्यन्धकभयं महत् । अवध्यश्चापि नः शत्रुर्वरदानात् पिनाकिनः ॥ २६ ॥

‘बन्धुओ ! यह वृष्णि और अन्धक-कुलके लिये महान् एवं घोर संकट उठ खड़ा हुआ है । पिनाकपाणि भगवान् शंकरके वरदानसे हमारा शत्रु अवध्य है ॥ २६ ॥

सामादयोऽभ्युपायाश्च विहितास्तस्य सर्वशः । मत्तो मदबलाभ्यां तु युद्धमेव चिकीर्षति ॥ २७ ॥

‘उसे शान्त करनेके लिये हमने साम आदि उपायोंका भी सर्वथा प्रयोग किया है, परंतु वह मद और बलसे उन्मत्त होनेके कारण केवल युद्ध करनेकी ही इच्छा प्रकट करता है ॥

एतावानिह वासश्च कथितो नारदेन मे । एतावति च वक्तव्यं सामैव परमं मतम् ॥ २८ ॥

‘नारदजीने इतने ही समयतक हमलोगोंका यहाँ निवास बतलाया था । ऐसे शक्ति-साधन सम्पन्न शत्रुके प्रति सान्त्वना-पूर्ण वचन कहना ही परम उत्तम माना गया है ॥ २८ ॥

जरासंधश्च नो राजा नित्यमेव न मृष्यते । तथान्ये पृथिवीपाला वृष्णिचक्रप्रतापिताः ॥ २९ ॥ केचित् कंसवधाच्चापि विरक्तास्तद्गता नृपाः । समाश्रित्य जरासंधमस्मानिच्छन्ति बाधितुम् ॥ ३० ॥

‘राजा जरासंध हमलोगोंको कभी क्षमा नहीं करता है—हमारे प्रति सदा अमर्षसे ही भरा रहता है तथा दूसरे भूपाल जो वृष्णिमण्डलसे सताये गये हैं एवं कुछ नरेश, जो कंस-वधके कारण हमलोगोंसे विरक्त हो गये हैं, वे सब-के-सब जरासंधसे मिल गये हैं और उसीका आश्रय लेकर हमलोगोंको बाधा पहुँचाना चाहते हैं ॥ २९-३० ॥

बहवो ज्ञातयश्चैव यदूनां निहता नृपैः । वर्द्धितुं नैव शक्याम पुरेऽस्मिन्निति केशवः ॥ ३१ ॥ अपयाने मतिं कृत्वा दूतं तस्मै ससर्ज ह ।

‘उन राजाओंने यदुकुलके बहुत-से भाई-बन्धुओंको मार डाला है । हमलोग यहाँ रहकर फल-फूल नहीं सकेंगे, यही सोचकर श्रीकृष्णने यहाँसे हट जानेका विचार करके उसके पास एक दूत भेजा था ॥ ३१ ½ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४३५


ततः कुम्भे महासर्पं भिन्नाञ्जनचयोपमम् ॥ ३२ ॥
घोरमाशीविषं कृष्णं कृष्णः प्राक्षेपयत् तदा ।
ततस्तं मुद्रयित्वा तु स्वेन दूतेन हारयत् ॥ ३३ ॥
'श्रीकृष्णने उस समय खानसे काटकर निकाले गये कोयलेके ढेरके समान काले, भयंकर, विषधर महासर्पको एक घड़ेमें रखवाया और उसका मुँह बंद करके उस घड़ेको अपने दूतके द्वारा उसके पास पहुँचावा दिया ॥ ३२-३३ ॥

निदर्शनार्थं गोविन्दो भीषयामास तं नृपम् ।
स दूतः कालयवने दर्शयामास तं घटम् ॥ ३४ ॥
कालसर्पोपमः कृष्ण इत्युक्त्वा भरतर्षभ ।
'गोविन्दने दृष्टान्तके लिये वह सर्प भेजकर उस राजाको डरानेकी चेष्टा की थी। भरतश्रेष्ठ ! उस दूतने कालयवनसे यह कहकर कि श्रीकृष्ण काले सर्पके समान भयंकर हैं, उसे वह घड़ा दिखलाया ॥ ३४ १/२ ॥

तत्कालयवनो बुद्ध्वा त्रासनं यादवैः कृतम् ॥ ३५ ॥
पिपीलिकानां चण्डानां पूरयामास तं घटम् ।
'कालयवनने यह समझकर कि यादवोंने मुझे डरानेका प्रयत्न किया है, उस घड़ेमें बहुत-से रोषभरे चींटोंको भर दिया ॥ ३५ १/२ ॥

स सर्पो बहुभिस्तीक्ष्णैः सर्वतस्तैः पिपीलिकैः ।
भक्ष्यमाणः किलाङ्गेषु भस्मीभूतोऽभवत् तदा ॥ ३६ ॥
'उन बहुसंख्यक तीखे चींटोंने सब ओरसे उस सर्पके शरीरको काटना शुरू किया, जिससे वह काला सर्प तत्काल कालके गालमें चला गया ॥ ३६ ॥

तं मुद्रयित्वा तु घटं तथैव यवनाधिपः ।
प्रेषयामास कृष्णाय बाहुल्यमुपवर्णयन् ॥ ३७ ॥
'फिर उस घड़ेको उसी तरह बंद करके यवनराजने अपनी सैनिक-शक्तिकी बहुलताका वर्णन करते हुए श्रीकृष्णके पास भेज दिया ॥ ३७ ॥

वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा योगं विहतमात्मनः ।
उत्सृज्य मथुरामाशु द्वारकामभिजग्मिवान् ॥ ३८ ॥
'भगवान् श्रीकृष्णने अपने उस प्रयोगको विफल हुआ देख तुरंत ही मथुरा छोड़कर द्वारकाको प्रस्थान कर दिया' ॥

वैरस्यान्तं विधित्संस्तु वासुदेवो महायशाः ।
निवेश्य द्वारकां राजन् वृष्णीनाश्वास्य चैव ह ॥ ३९ ॥
राजन् ! महायशस्वी वासुदेवने उस वैरका अन्त कर डालनेकी इच्छासे द्वारकापुरी बसाकर वृष्णिवंशियोंको आश्वासन दे ( पुनः वहाँसे मथुराको प्रस्थान किया ) ॥ ३९ ॥

पदातिः पुरुषव्याघ्रो बाहुप्रहरणस्तदा ।
आजगाम महावीर्यो मथुरां मधुसूदनः ॥ ४० ॥
महापराक्रमी पुरुषसिंह मधुसूदन केवल भुजाओंको ही आयुधरूपमें साथ ले पैदल ही मथुरामें आये ॥ ४० ॥

तं दृष्ट्वा निर्ययौ हृष्टः स कालयवनो रुषा ।
प्रेक्षापूर्वं च कृष्णोऽपि निष्प्रकर्ष महाबलः ॥ ४१ ॥
उन्हें देखकर हर्ष और रोषसे भरा हुआ कालयवन निकला । इधर महाबली श्रीकृष्ण भी अपने-आपको दिखाकर भागते हुए उसे भी अपने पीछे खींच ले चले ॥ ४१ ॥

अथान्वगच्छद् गोविन्दं जिघृक्षुर्यवनेश्वरः ।
न चैनमशकद् राजा ग्रहीतुं योगधर्मिणम् ॥ ४२ ॥
यवनेश्वर राजा कालयवन गोविन्दको पकड़ लेनेकी इच्छासे उनके पीछे-पीछे चला; परंतु इन योगधर्मी श्रीकृष्णको वह पकड़ न सका !। ४२ ॥

मान्धातुस्तु सुतो राजा मुचुकुन्दो महायशाः ।
पुरा देवासुरे युद्धे कृतकर्मा महाबलः ॥ ४३ ॥
प्राचीन कालमें जब देवासुर-संग्राम हुआ था, उस समय मान्धाताके पुत्र महायशस्वी, महाबली राजा मुचुकुन्दने देवताओंकी ओरसे युद्ध करके उसमें सफलता प्राप्त की थी ॥

वरेण च्छन्दितो देवैर्निद्रामेव गृहीतवान् ।
श्रान्तस्य तस्य वागेवं तदा प्रादुरभूत् किल ॥ ४४ ॥
देवताओंग्रने उनसे वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उन्होंने निद्राको ही वरके रूपमें ग्रहण किया । युद्धसे थके होनेके कारण उस समय उनके मुँहसे निम्नाङ्कित वाणी प्रकट हुई -॥ ४४ ॥

प्रसुप्तं बोधयेद् यो मां तं दहेयमहं सुराः ।
चक्षुषा क्रोधदीप्तेन एवमाह पुनः पुनः ॥ ४५ ॥
'देवताओ ! जो मुझे सोतेसे जगा दे, उसे मैं क्रोधसे प्रज्वलित हुई दृष्टिके द्वारा जलाकर भस्म कर दूँ' ऐसा उन्होंने बारंबार कहा ॥ ४५ ॥

एवमस्त्विति तं शक्र उवाच त्रिदशैः सह ।
स सुरैरभ्यनुज्ञातो ह्यद्रिराजमुपागमत् ॥ ४६ ॥
तब देवताओं सहित इन्द्रने उनसे कहा 'एवमस्तु' ( ऐसा ही हो )। इस प्रकार देवताओंसे आज्ञा लेकर वे गिरिराजके पास आये ॥ ४६ ॥

स पर्वतगुहां कांचिन् प्रविश्य श्रमकर्शितः ।
सुष्वाप कालमेतं वै यावत्कृष्णस्य दर्शनम् ॥ ४७ ॥
श्रमसे थके हुए राजाने पर्वतकी किसी गुफामें प्रवेश करके उस समयतक शयन किया, जबतक कि उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन नहीं हुआ था ॥ ४७ ॥

तत्सर्वं वासुदेवाय नारदेन निवेदितम् ।
वरदानं च देवेभ्यस्तेजस्तस्य च भूपतेः ॥ ४८ ॥

४३६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


राजा मुचुकुन्दके तेज तथा देवताओंसे उन्हें मिले हुए वरदानकी सारी बातें देवर्षि नारदने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बतायी थीं ॥ ४८ ॥

कृष्णोऽनुगम्यमानश्च तेन म्लेच्छेन शत्रुणा ।
तां गुहां मुचुकुन्दस्य प्रविवेश विनीतवत् ॥ ४९ ॥

उस म्लेच्छजातीय शत्रुके द्वारा पीछा किये जाते हुए श्रीकृष्णने मुचुकुन्दकी उस गुफामें एक विनीत-पुरुषकी भाँति प्रवेश किया ॥ ४९ ॥

शिरःस्थाने तु राजर्षेर्मुचुकुन्दस्य केशवः ।
संदर्शनपथं त्यक्त्वा तस्थौ बुद्धिमतां वरः ॥ ५० ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजर्षि मुचुकुन्दके सिरहानेकी ओर उनके दृष्टिपथको त्यागकर (अर्थात् जहाँसे उन्हें दिखायी न दे सकें—ऐसे स्थानपर) खड़े हो गये ॥ ५० ॥

अनुप्रविश्य यवनो ददर्श पृथिवीपतिम् ।
स तं सुप्तं कृतान्ताभमाससाद सुदुर्मतिः ॥ ५१ ॥

उनके पीछे-पीछे उस कालयवनने भी गुफामें प्रवेश करके सोये हुए राजा मुचुकुन्दको देखा। वह दुर्बुद्धि अपने लिये कालके समान उन नरेशके पास स्वयं ही जा पहुँचा ॥ ५१ ॥

वासुदेवं तु तं मत्वा घट्टयामास पार्थिवम् ।
पादेनात्मविनाशाय शलभः पावकं यथा ॥ ५२ ॥

जैसे पतंगा अपने ही विनाशके लिये आगमें कूद पड़ता है, उसी प्रकार कालयवनने मुचुकुन्दको श्रीकृष्ण समझकर उन्हें अपने विनाशके लिये ही लातसे मारा ॥ ५२ ॥

मुचुकुन्दस्तु राजर्षिः पादस्पर्शप्रबोधितः ।
निद्राच्छेदेन चुक्रोध पादस्पर्शेन तेन च ॥ ५३ ॥

राजर्षि मुचुकुन्द उसके पैरोंकी ठोकर लगनेसे जाग उठे। एक तो उनकी निद्रा भङ्ग हुई थी और दूसरे उस यवनने उन्हें पैरसे छू दिया था; इससे वे कुपित हो उठे ॥ ५३ ॥

संस्मृत्य स वरं शक्रादवैक्षत तमग्रतः ।
स दृष्टमात्रः क्रोधेन सम्प्रजज्वाल सर्वशः ॥ ५४ ॥

फिर इन्द्रसे मिले हुए वरका स्मरण करके उन्होंने सामने खड़े हुए कालयवनकी ओर देखा। उनके क्रोधपूर्वक देखते ही वह सब ओरसे आगमें जलने लगा ॥ ५४ ॥

ददाह पावकस्तं तु शुष्कं वृक्षमिवाशनिः ।
क्षणेन कालयवनं नेत्रतेजोविनिर्गतः ॥ ५५ ॥

जैसे वज्र सूखे वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार मुचुकुन्दके नेत्रोंके तेजसे प्रकट हुई उस अग्निने कालयवनको क्षणभरमें ही जलाकर भस्म कर दिया ॥ ५५ ॥

तं वासुदेवः श्रीमन्तं चिरसुप्तं नराधिपम् ।
कृतकार्योऽब्रवीद् धीमानिदं वचनमुत्तमम् ॥ ५६ ॥

बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णका अभीष्ट कार्य सिद्ध हो गया। वे चिरकालसे सोये हुए उन तेजस्वी राजा मुचुकुन्दसे यह उत्तम वचन बोले— ॥ ५६ ॥

गञ्भीरप्रसुप्तोऽसि कथितो नारदेन मे ।
कृतं मे सुमहत्कार्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ ५७ ॥

'राजन्! आप दीर्घकालसे यहाँ सो रहे थे। मुझे नारदजीने आपके विषयमें बताया था। आपने मेरा महान् कार्य सिद्ध कर दिया। आपका कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥

वासुदेवमुपालक्ष्य राजा ह्रस्वं प्रमाणतः ।
परिपृक्तं युगं मेने कालेन महता तदा ॥ ५८ ॥

राजा मुचुकुन्दने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको कदमें छोटा देखकर यह समझ लिया कि दीर्घकाल व्यतीत होनेसे युग बदल गया ॥ ५८ ॥

उवाच राजा गोविन्दं को भवान् किमिहागतः ।
कश्च कालः प्रसुप्तस्य यदि जानासि कथ्यताम् ॥ ५९ ॥

राजाने गोविन्दसे पूछा—'आप कौन हैं? और किसलिये यहाँ आये हैं? मेरे सोते-सोते कितना समय व्यतीत हो गया? यदि जानते हों तो बताइये' ॥ ५९ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

सोमवंशोद्भवो राजा ययातिर्नाम नाहुषः ।
तस्य पुत्रो यदुर्ज्येष्ठश्चत्वारोऽन्ये यवीयसः ॥ ६० ॥

श्रीकृष्णने कहा—राजन्! चन्द्रवंशमें नहुषके पुत्र राजा ययाति हो गये हैं। उनके ज्येष्ठ पुत्र यदु थे। यदुके चार छोटे भाई और थे ॥ ६० ॥

यदुवंशात् समुत्पन्नं वसुदेवात्मजं विभो ।
वासुदेवं विजानीहि नृपते मामिहागतम् ॥ ६१ ॥

विभो! नरेश्वर! आपको विदित हो कि मैं यदुवंशमें उत्पन्न हुआ हूँ। वसुदेवका पुत्र हूँ, अतएव लोग मुझे वासुदेव कहते हैं। मैं वासुदेव ही यहाँ आया हूँ ॥ ६१ ॥

त्रेतायुगे प्रसुप्तोऽसि विदितो मेऽसि नारदात् ।
इदं कलियुगं विद्धि किमन्यत् करवाणि ते ॥ ६२ ॥

आप त्रेतायुगमें सोये थे। मुझे आपके विषयमें नारदजीसे सब बातें ज्ञात हुई हैं। इस समय द्वापर और कलियुगकी संधिका काल समझिये। इसके सिवा आपकी क्या सेवा करूँ ॥

मम शत्रुस्त्वया दग्धो देवदत्तवरो नृप ।
अवध्यो यो मया संख्ये भवेद् वर्षशतैरपि ॥ ६३ ॥

नरेश्वर! तुमने मेरे उस शत्रुको जलाकर भस्म किया है, जिसे देवताओंसे वरदान प्राप्त था और जो युद्धमें मेरे द्वारा सौ वर्षोंमें भी नहीं मारा जा सकता था ॥ ६३ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३७


वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तु कृष्णेन निर्जगाम गुहामुखात् ।
अन्वीयमानः कृष्णेन कृतकार्येण धीमता ॥ ६४ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर राजा मुचुकुन्द गुफाके द्वारसे बाहर निकले । उनके पीछे कृतकृत्य हुए बुद्धिमान् श्रीकृष्ण भी थे ॥ ६४ ॥

ततो ददर्श पृथिवीमावृतां ह्रस्वकैर्नरैः ।
स्वल्पोत्साहैरल्पबलैरल्पवीर्यपराक्रमैः ।
परेणाधिष्ठितं चैव राज्यं केवलमात्मनः ॥ ६५ ॥

उन्होंने देखा, पृथ्वीपर छोटे-छोटे मनुष्य भरे हुए हैं । उन सबके उत्साह, बल, वीर्य और पराक्रम बहुत थोड़े हैं । अब अपना केवल राज्य बच गया है, जिसपर दूसरेका प्रभुत्व स्थापित हो चुका है ॥ ६५ ॥

प्रीत्या विसृज्य गोविन्दं प्रविवेश महद् वनम् ।
हिमवन्तमगाद् राजा तपसे धृतमानसः ॥ ६६ ॥

तब राजाने बड़े प्रेमसे भगवान् श्रीकृष्णको विदा किया और स्वयं अपने मनमे तपस्याका निश्चय करके हिमालयपर्वतपर वहाँके विशाल वनमें चले गये ॥ ६६ ॥

ततः स तप आस्थाय विनिर्मुच्य कलेवरम् ।
आरुरोह दिवं राजा कर्मभिः स्वैर्जिताञ्शुभैः ॥ ६७ ॥

वहाँ तपस्या करके शरीरको त्यागकर राजा मुचुकुन्द अपने अशुभनिवारक पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकमे जा पहुँचे ॥ ६७ ॥

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा उपायेन महामनाः।
घातयित्वाऽऽत्मनः शत्रुं तत्सैन्यं प्रत्यपद्यत ॥ ६८ ॥

इधर महामनस्वी धर्मात्मा भगवान् वासुदेवने भी अपने शत्रुको पूर्वोक्त रूपसे मरवाकर उसकी सारी सेनापर अधिकार कर लिया ॥ ६८ ॥

प्रभूतरथहस्त्यश्ववर्मशस्त्रालायुधध्वजम् ।
आदायोपययौ धीमान् स सैन्यं निहतेश्वरम् ॥ ६९ ॥

बुद्धिमान् श्रीकृष्ण बहुसंख्यक रथ, हाथी, घोड़े, कवच, अस्त्र, शस्त्र और ध्वजाओंसे युक्त सेनाको, जिसका राजा मारा गया था, अपने साथ ले गये ॥ ६९ ॥

निवेदयामास ततो नराधिपे
तदुग्रसेने प्रतिपूर्णमानसः ।
जनार्दनो द्वारवतीं च तां पुरी-
मशोभयत् तेन धनेन भूरिणा ॥ ७० ॥

उनका मनोरथ पूर्ण हो चुका था। जनार्दनने वह सारी सेना राजा उग्रसेनको समर्पित कर दी और उस प्रचुर धनराशिसे उन्होंने द्वारकापुरीकी शोभा बढ़ायी ॥ ७० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कालयवनवधे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कालयवनका वधविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥


अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

द्वारकापुरीका विश्वकर्माद्वारा निर्माण, निधिपति शङ्ख और सुधर्मासभाका आनयन, श्रीकृष्णद्वारा सुव्यवस्थापूर्वक वहाँ यादवोंको बसाना तथा बलरामजीका रेवतीके साथ विवाह

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रभाते विमले भास्करे उदिते तदा ।
कृतजाप्यो हृषीकेशो वनान्ते न्यवसाद ह ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर, निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर भगवान् श्रीकृष्ण नैत्यिक जप एवं स्वाध्याय आदि पूर्ण करके वनके भीतर बैठे ॥ १ ॥

परिचक्राम तं देशं दुर्गस्थानदिदृक्षया ।
उपतस्थुः कुलश्लाघ्या यादवा यदुनन्दनम् ॥ २ ॥

तत्पश्चात् दुर्गके लिये उपयुक्त स्थान देखनेकी इच्छासे वे उस प्रदेशमें घूमने लगे । उस समय कुलके बड़े-बूढ़े यदुवंशी भी यदुनन्दन श्रीकृष्णके पास आ गये थे ॥ २ ॥

रोहिण्यामहनि श्रेष्ठे स्वस्ति वाच्य द्विजोत्तमान् ।
पुण्याहघोषैर्विपुलैर्दुर्गस्यारब्धवान् क्रियाम् ॥ ३ ॥

श्रीकृष्णने रोहिणी नक्षत्रमें श्रेष्ठ शनिवारको उत्तम ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर, विपुल पुण्याहघोषके साथ दुर्गनिर्माणका कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ३ ॥

ततः पङ्कजपत्राक्षो यादवान् केशिसूदनः ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो देवान् वृत्ररिपुर्यथा ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ केशिहन्ता कमलनयन श्रीकृष्णने जैसे वृत्रासुरके वैरी इन्द्र देवताओंसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार यादवोंसे कहा—॥ ४ ॥

कल्पितेयं मया भूमिः पश्यध्वं देवसद्मवत् ।
नाम चास्याः कृतं पुर्याः ख्यातिं यदुपयास्यति ॥ ५ ॥

'यादवो ! मैंने देवसदनके समान इस भूमिका निर्माण कर लिया है । आप सब लोग देखें । मैंने इसका नाम भी निश्चित कर लिया है, जिससे इसकी ख्याति होगी ॥ ५ ॥

४३८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

इयं द्वारवती नाम पृथिव्यां निर्मिता मया ।
भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ॥ ६ ॥

'मेरे द्वारा इस भूतलपर निर्मित हुई यह पुरी द्वारवतीके नामसे प्रसिद्ध होगी तथा इन्द्रकी अमरावतीके समान रमणीय दिखायी देगी ॥ ६ ॥

तान्येवास्याः कारयिष्ये चिह्नान्यायतनानि च ।
चत्वरान् राजमार्गांश्च सम्यगन्तःपुराणि च ॥ ७ ॥

'मैं इस पुरीके वे ही चिह्न, वे ही मन्दिर, वैसे ही चौराहे, उसी तरहकी सड़कें और वैसे ही उत्तम अन्तःपुर बनवाऊँगा, जैसे कि अमरावतीमें है ॥ ७ ॥

देवा इवात्र मोदन्तु भवन्तो विगतज्वराः ।
बाधमाना रिपूनुग्रानुग्रसेनपुरोगमाः ॥ ८ ॥

'जैसे देवता अमरावतीमें आनन्द भोगते हैं, उसी प्रकार उग्रसेन आदि आपलोग भी निश्चिन्त हो अपने शत्रुओंको पीड़ा देते हुए इस पुरीमें सानन्द निवास करें ॥ ८ ॥

गृह्यन्तां वेश्मवास्तूनि कल्प्यन्तां त्रिकचत्वराः ।
मीयन्तां राजमार्गाश्च प्रासादस्य च या गतिः ॥ ९ ॥

'घरोंके शिलान्यासकी सामग्रियाँ संग्रह करके लायी जायँ। तिराहों और चौराहोंकी कल्पना की जाय। सड़कोंके लिये भूमका माप किया जाय तथा राजमहलमें जानेका जो मार्ग है, उसके लिये भी भूमि नापी जाय ॥ ९ ॥

प्रेष्यन्तां शिल्पिमुख्या वै नियुक्ता वेश्मकर्मसु ।
नियुज्यन्तां च देशेषु प्रेष्यकर्मकरा जनाः ॥ १० ॥

'गृहनिर्माणके कार्यमें लगे रहनेवाले जो सुयोग्य एवं श्रेष्ठ शिल्पी हों, उन्हें यहाँ भेजा जाय और जगह-जगह मजदूरीका काम करनेवाले मजदूरोंको (कारीगरोंके साथ) काम करनेके लिये लगा दिया जाय' ॥ १० ॥

एवमुक्ते तु यदवो गृहसंग्रहतत्पराः ।
यथानिवेशं संग्रहाश्चकुर्वास्तुपरिग्रहमू ॥ ११ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सब यादव हर्षसे उल्लसित हो गृहनिर्माणके लिये उपयोगी सामग्रीका संग्रह करनेमें लग गये। उन्होंने सभी घरोंके लिये उनकी स्थितिके अनुसार शिलान्यासके निमित्त आवश्यक वस्तुओंका संग्रह किया ॥ ११ ॥

सूत्रहस्तास्ततो मानं चक्रुर्यादवसत्तमाः ।
पुण्येऽहनि महाराज द्विजातीनभिपूज्य च ॥ १२ ॥

महाराज ! तदनन्तर श्रेष्ठ यादवोंने एक पवित्र दिनको ब्राह्मणोंका पूजन करके हाथोंमें सूत्र लेकर भूमिको नापना आरम्भ किया ॥ १२ ॥

वास्तुदैवतकर्माणि विधिना कारयन्ति च ।
स्थपतीनाथ गोविन्दस्तत्रोवाच महामतिः ॥ १३ ॥

वे वास्तु देवताके पूजन आदि कर्म भी विधिपूर्वक सम्पन्न कराने लगे। ततस्तान् परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ थवदयोंसे कहा—॥ १३ ॥

अस्मदर्थे सुविहितं क्रियतामत्र मन्दिरम् ।
विविक्तचत्वरपथं सुनिविष्टेष्टदैवतम् ॥ १४ ॥

'कारीगरो ! तुमलोग यहाँ हम यादवोंके लिये सुन्दर ढंगसे एक मन्दिरका निर्माण करो, जिसमें इष्टदेवताकी उत्तम विधिसे स्थापना की जाय। यहाँका मार्ग और चौराहा पृथक् रहना चाहिये' ॥ १४ ॥

ते तथेति महाबाहुमुक्त्वा स्थपतयस्तदा ।
दुर्गकर्माणि संस्कारानुपकल्प्य यथाविधि ॥ १५ ॥
यथान्यायं विर्निमिरे दुर्गाण्यायतनानि च ।
स्थानानि निदधुश्चात्र ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥ १६ ॥

तब उन थवदयोंने महाबाहु श्रीकृष्णमे 'बहुत अच्छा' कहकर विधिपूर्वक दुर्ग-कर्म (दुर्गनिर्माण-सम्बन्धी प्रारम्भिक कार्य—नींव खोदना आदि) और संस्कार (भूमिशोधन—कण्टकनिवारण आदि) करके यथोचित रीतिमे विभिन्न दुगों और मन्दिरोंका निर्माण किया तथा उनमें क्रमशः ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये स्थान बनाये ॥ १५-१६ ॥

अपामग्नेः सुरेशस्य दृषदोलूखलस्य च ।
चातुर्दिशानि चत्वारि द्वाराणि निदधुश्च ते ॥ १७ ॥

उन्होंने जल, अग्नि, इन्द्र तथा सिल-ओखली—इन चार देवताओंके लिये चार द्वार बनाये (अथवा युद्धास्त्र आदि चार देवताओंके लिये द्वारोंका निर्माण किया) ॥ १७ ॥

शुद्धाक्षमैन्द्रं भल्लाटं पुष्पवन्तं तथैव च ।
तेषु वेश्मसु युक्तेषु यादवेषु महात्मसु ॥ १८ ॥
पुर्याः क्षिप्रं निवेशार्थं चिन्तयामास माधवः ।

उन कारीगरोंने शुद्धाक्ष, ऐन्द्र, भल्लाट और पुष्पवन्त-की भी मूर्तियाँ बनायीं और उनके लिये उपयुक्त स्थानका निर्माण किया। जब महामनस्वी यादव उन भवनोंके निर्माण कार्यमें जुट गये, तब माधव श्रीकृष्ण इस चिन्तामें पड़े कि किस तरह इस पुरीका शीघ्र निर्माण हो जाय ॥ १८½ ॥

तस्य दैवोत्थिता बुद्धिविमला क्षिप्रकारिणी ॥ १९ ॥
पुर्याः प्रियकरी सा वै यदूनामभिवर्द्धिनी ।

दैववश उनके भीतर पुरीका शीघ्र निर्माण करानेवाली निर्मल बुद्धिका उदय हुआ, जो यादवोंका प्रिय एवं अभ्युदय करनेवाली थी ॥ १९½ ॥

शिल्पिमुख्यस्तु देवानां प्रजापतिसुतः प्रभुः ॥ २० ॥
विश्वकर्मा स्वमत्या वै पुरीं संस्थापयिष्यति ।

उन्होंने सोचा, 'देवताओंके प्रधान शिल्पी प्रजापतिपुत्र विश्वकर्मा इस कार्यमें समर्थ हैं। वे अपनी बुद्धिके अनुसार इस पुरीकी स्थापना करेंगे' ॥ २०½ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३९


मनसा समुन्ध्याय तस्यागमनकारणात् ।
त्रिदशाभिमुखः कृष्णो विविक्ते समपद्यत ॥ २१ ॥
मन-ही-मन यह बात सोचकर भगवान् श्रीकृष्ण एकान्त स्थानमें विश्वकर्माके आगमनके लिये देवताओंकी ओर उन्मुख हुए ॥ २१ ॥

तस्मिन्नेव ततः काले शिल्पाचार्यो महामतिः ।
विश्वकर्मा सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य प्रमुखे स्थितः ॥ २२ ॥
इसी समय परम बुद्धिमान् शिल्पाचार्य सुरश्रेष्ठ विश्वकर्मा श्रीकृष्णके सामने आकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥

विश्वकर्मोवाच
शक्रेण प्रेषितः क्षिप्रं तव विष्णो धृतव्रत ।
किङ्करः समनुप्राप्तः शाधि मां किं करोमि ते ॥ २३ ॥
विश्वकर्मा बोले— उत्तम व्रतको धारण करनेवाले विष्णुदेव ! मुझे इन्द्रने आपके पास शीघ्र भेजा है। मैं सेवक आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? ॥ २३ ॥

यथासौ देवदेवो मे शङ्करश्च यथान्वयः ।
तथा त्वं देव मान्यो मे विशेषो नास्ति वः प्रभो ॥ २४ ॥
देव ! प्रभो ! मेरे लिये जैसे देवाधिदेव ब्रह्माजी तथा अविनाशी भगवान् शङ्कर माननीय हैं, उसी प्रकार आप भी मेरे लिये सम्माननीय हैं। मेरी धारणाके अनुसार आप तीनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ २४ ॥

त्रैलोक्यज्ञापिकां वाचमुत्सृजस्व महाभुज ।
एषोऽस्मि परिवेष्टार्थः किं करोमि प्रशाधि माम् ॥ २५ ॥
महाबाहो ! आपकी वाणी तीनों लोकोंका ज्ञान करानेवाली है (अथवा तीनों लोकोंको आज्ञा देनेमें समर्थ है)। आप मेरे प्रति उसीका प्रयोग कीजिये। मैं शिल्पशास्त्रका पारदर्शी आपके सामने खड़ा हूँ। आज्ञा दीजिये, कौन-सा कार्य करूँ ॥ २५ ॥

श्रुत्वा विनीतं वचनं केशवो विश्वकर्मणः ।
प्रत्युवाच यदुश्रेष्ठः कंसारिरतुलं वचः ॥ २६ ॥
विश्वकर्माका यह विनययुक्त वचन सुनकर कंसविध्वंसी यदुश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण उनसे यह अनुपम वचन बोले—॥

श्रुतार्थो देवगुह्यस्य भवान् यत्र वयं स्थिताः ।
अवश्यं त्विह कर्तव्यं सदनं मे सुरोत्तम ॥ २७ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें देवताओंकी जो गुप्त सभा बैठी थी, जहाँ हमलोग उपस्थित थे, वहाँ तुम भी थे, अतः देवताओंका जो गूढ़ प्रयोजन है, उसे तुमने भी सुना ही है। अतः यहाँ मेरे रहनेके लिये अवश्य ही सुन्दर सदनका निर्माण करना होगा ॥ २७ ॥

तदियं पूः प्रकाशार्थे निवेश्या मयि सुव्रत ।
मत्प्रभावानुरूपैश्च गृहैश्चेयं समन्ततः ॥ २८ ॥
'उत्तमव्रतधारी देव ! मेरे निमित्त अपने शिल्पकौशलका प्रदर्शन करनेके लिये तुम्हे इस नगरीको बसाना और इसके भवनोंका निर्माण करना है। यह पुरी सब ओरसे मेरे प्रभावके अनुरूप गृहोंद्वारा सुशोभित हो ॥ २८ ॥

उत्तमा च पृथिव्यां वै यथा स्वर्गेऽमरावती ।
तथ्येयं हि त्वया कार्या शक्तो ह्यसि महामते ॥ २९ ॥
'महामते ! जैसे स्वर्गमें अमरावतीपुरी सबसे श्रेष्ठ है, उसी तरह इस पृथ्वीपर यह पुरी जैसे भी सर्वोत्तम हो सके, वैसा ही प्रयत्न करके तुम्हे इसका निर्माण करना है। तुम इस कार्यमें समर्थ हो ॥ २९ ॥

मम स्थानमिदं कार्यं यथा वै त्रिदिवे तथा ।
मर्त्याः पश्यन्तु मे लक्ष्मीं पुर्या यदुकुलस्य च ॥ ३० ॥
'मेरा यह स्थान तुम्हे वैसा ही बनाना है, जैसा कि वैकुण्ठधाममें है। जिससे यहाँके सब मनुष्य मेरा, इस पुरीका तथा यदुकुलका वैभव देख सकें ॥ ३० ॥

एवमुक्तस्ततः प्राह विश्वकर्मा मतीश्वरः ।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणं देवामित्रविनाशनम् ॥ ३१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर बुद्धिके स्वामी प्रजापति विश्वकर्माने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले देवशत्रुविनाशक श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ३१ ॥

सर्वमेतत् करिष्यामि यत् त्वयाभिहितं प्रभो ।
पुरी त्वियं जनस्यास्य न पर्याप्ता भविष्यति ॥ ३२ ॥
'प्रभो ! आपने जो कुछ कहा है, वह सब मैं करूँगा; परंतु पुरीके लिये जो भूमि है, यह इस विशाल जनसमुदायके लिये पर्याप्त नहीं होगी ॥ ३२ ॥

भविष्यति च विस्तीर्णा बुद्धिर्यस्यास्तु शोभना ।
चत्वारः सागरा ह्यस्यां विचरिष्यन्ति रूपिणः ॥ ३३ ॥
यदीच्छेत् सागरः किंचिदुत्स्रष्टुमपि तोयराट् ।
ततः स्वायतलक्षण्या पुरी स्यात् पुरुषोत्तम ॥ ३४ ॥
'पुरुषोत्तम ! आप चाहे तो यह विस्तृत हो सकेगी। मेरी इच्छा है, इसका सुन्दर विस्तार हो। इसमें चारों समुद्र मूर्तिमान् होकर विचरेंगे। यदि जलके स्वामी समुद्र कुछ भूमि छोड़ सकें तो यह पुरी भलीभाँति विस्तृत एवं उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हो सकेगी' ॥ ३३-३४ ॥

एवमुक्तस्ततः कृष्णः प्रागेव कृतनिश्चयः ।
सागरं सरितां नाथमुवाच वदतां वरः ॥ ३५ ॥
विश्वकर्माके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण, जो पहलेसे ही समुद्रसे भूमि लेनेका निश्चय कर चुके थे, सरिताओंके स्वामी सागरसे बोले— ॥ ३५ ॥

समुद्र दश च द्वे च योजनानि जलाशये ।
प्रतिसंह्रियतामात्मा यद्यस्ति मयि मान्यता ॥ ३६ ॥

४५०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'समुद्र ! यदि मेरे प्रति तुम्हारी आदरबुद्धि है तो तुम मेरे कहनेसे बारह योजनतक जलाशयमेंसे अपने स्वरूप (जल) को समेट लो ॥ ३६ ॥

अवकाशे त्वया दत्ते पुरीयं मामकं बलम्।
पर्याप्तविषया रम्या समग्रं विसहिष्यति ॥ ३७॥

'तुम्हारे जगह दे देनेपर यहाँ बननेवाली इस पुरीका प्रदेश पर्याप्त विस्तारको प्राप्त हो जायगा तथा यह रमणीय पुरी मेरे समस्त सैन्यसमूहका भार सहन कर सकेगी' ॥३७॥

ततः कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा नदनदीपतिः ।
स मारुतेन योगेन उत्ससर्ज जलाशयम् ॥ ३८ ॥

उस समय श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर नदों और नदियोंके अधिपति समुद्रने मारुतयोग (वायुके संकोच) द्वारा अपने जलाशयके जलका उपसंहार करके उतनी भूमि छोड़ दी ॥ ३८ ॥

विश्वकर्मा ततः प्रीतः पुर्याः संलक्ष्य वास्तु तत् ।
गोविन्दे चैव सम्मानं कृतवान् सागरस्तदा ॥ ३९ ॥

पुरीका वह विशाल वास्तु देखकर विश्वकर्माको बड़ी प्रसन्नता हुई। समुद्रने उस समय भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया ॥ ३९ ॥

विश्वकर्मा ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् ।
अद्यप्रभृति गोविन्द सर्वे समधिरोहत ॥ ४० ॥

तत्पश्चात् विश्वकर्माने यदुनन्दन श्रीकृष्णसे कहा—'गोविन्द ! आप सब लोग आजसे ही इस पुरीमें निवास करनेके लिये तैयार हो जाइये ॥ ४० ॥

मनसा निर्मिता चेयं मया पूः प्रवरा विभो ।
अचिरेणैव कालेन गृहसम्बाधमालिनी ॥ ४१ ॥
भविष्यति पुरी रम्या सुद्वारा प्राप्त्यतोरणा ।
चयाट्टालककेयूरा पृथिव्यां ककुदोपमा ॥ ४२ ॥

'प्रभो ! मैंने मनसे इस श्रेष्ठ पुरीका निर्माण कर लिया है। अब थोड़े ही समयमें यह गृहोंकी पङ्क्तियोंसे अलंकृत रमणीय पुरीके रूपमें प्रकट हो जायगी। इसके दरवाजे बहुत ही सुन्दर होंगे। इसमें सब ओर सुन्दर वन्दनवारें लगी होंगी। टीले, परकोटे और अट्टालिकाएँ इस पुरीको केयूर (भुजबन्द) के समान सुशोभित करेंगे। यह पुरी भूतलपर पृथ्वीकी चोटीके समान मानी जायगी' ॥ ४१-४२ ॥

अन्तःपुरं च कृष्णस्य परिचर्याक्षयं महत् ।
चकार तस्यां पुर्यां वै देशे त्रिदशपूजिते ॥ ४३ ॥

विश्वकर्माने इस पुरीके देवपूजित प्रदेशमें श्रीकृष्णके लिये विशाल अन्तःपुरका निर्माण किया, जिसमें परिचर्या (स्नान आदि) के लिये अलग-अलग घर बने हुए थे ॥

ततः सा निर्मिता कान्ता पुरी द्वारावती तदा ।
मानसेन प्रयत्नेन वैष्णवी विश्वकर्मणा ॥ ४४ ॥

इस प्रकार उस समय विश्वकर्माने मानसिक प्रयत्न (संकल्प) के द्वारा उस कमनीय वैष्णवीपुरी द्वारावतीका निर्माणकार्य सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥

विधानविहितद्वारा प्राकारवरशोभिता ।
परिखाचयसंवृत्ता साट्टप्राकारतोरणा ॥ ४५ ॥

उसके द्वार शिल्पशास्त्रकी विधिके अनुसार बनाये गये थे। श्रेष्ठ परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे। खाइयों और टीलोंसे वह पुरी सुरक्षित थी तथा उसमें अट्टालिका, चहारदीवारी और तोरण यथास्थान बने हुए थे ॥ ४५ ॥

कान्तनारीनरगणा वणिग्भिरुपशोभिता ।
नानापण्यगणाकीर्णा खेचरीव च गां गता ॥ ४६ ॥

सुन्दर नर-नारियोंके समुदाय वहाँ बसे हुए थे। व्यापारी वर्गके लोग उसकी शोभा बढ़ाते थे। नाना प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओं और दूकानोंसे वह भरी हुई थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें विचरनेवाली पुरी पृथ्वीपर उतर आयी हो ॥ ४६ ॥

प्रपावापीप्रसन्नोदा उद्यानैरुपशोभिता ।
समन्ततः संवृताङ्गी वनितेवायतेक्षणा ॥ ४७ ॥

उस पुरीके पौंसले और बावड़ियोंमें स्वच्छ जल भरा हुआ था तथा नाना प्रकारके उद्यान उसे सब ओरसे सुशोभित कर रहे थे। इस अवस्थामें वह ढँकी हुई अङ्गोंवाली विशाललोचना वनिताके समान जान पड़ती थी ॥ ४७ ॥

समृद्धचत्वरवत्ती वेश्मोत्तमघनाचिता ।
रथ्याकोटिसहस्राढ्या शुभ्रराजपथोत्तरा ॥ ४८ ॥

उसके चौराहे बड़े समृद्धिशाली थे। उसके ऊँचे-ऊँचे महल बादलोंसे व्याप्त हो रहे थे। उस पुरीमें कोटि सहस्र गलियाँ थीं और उज्ज्वल राजमार्गसे उसकी उत्कृष्ट शोभा हो रही थी ॥ ४८ ॥

भूषयन्ती समुद्रं सा स्वर्गमिन्द्रपुरी यथा ।
पृथिव्यां सर्वरत्नानामेका निचयशालिनी ॥ ४९ ॥

जैसे इन्द्रपुरी स्वर्गकी शोभा बढ़ाती है, उसी प्रकार वह समुद्रकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूतलपर सम्पूर्ण रत्नोंके सञ्चयसे सुशोभित होनेवाली एकमात्र नगरी थी ॥ ४९ ॥

सुराणामपि सुक्षेत्रा सामन्तक्षोभकारिणी ।
अप्रकाशं तदाकाशं प्रासादैरुपकुर्वती ॥ ५० ॥

द्वारकापुरी देवताओंके लिये भी पुण्यक्षेत्र थी। सीमावर्ती नरेशोंके मनमे क्षोभ उत्पन्न करनेवाली थी तथा वह अपने ऊँचे-ऊँचे महलोंके द्वारा आकाशको भी आच्छादित किये देती थी ॥ ५० ॥

[विष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४१


पृथिव्यां पृथुराष्ट्रायां जनौघप्रतिनादिता।
ओघैश्च वारिराजस्य शिशिरीकृतमारुता ॥ ५१ ॥

बहुत-से राष्ट्रोंवाली इस पृथ्वीपर बसी हुई द्वारकापुरी जनसमुदायके कोलाहलसे गूंजती रहती थी और जलके स्वामी समुद्रके प्रवाह एवं उत्ताल तरङ्गोंके कारण वहाँकी वायु सदा शीतल बनी रहती थी ॥ ५१ ॥

अनूपोपवनैः कान्तैः कान्त्या जनमनोहरा।
सतारका द्यौरिव सा द्वारका प्रत्यराजत ॥ ५२ ॥

समुद्रके जलप्राय तटपर लहराते हुए कमनीय उपवनोंके द्वारा बढ़ी हुई अपनी अनुपम कान्तिसे वह द्वारकापुरी मनुष्योंके मनको मोहे लेती थी और नक्षत्रोंसे युक्त आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ ५२ ॥

प्राकारेणार्कवर्णेन शातकौम्भेन संवृता।
हिरण्यप्रतिवर्णैश्च गृहैर्गम्भीरनिःस्वनैः ॥ ५३ ॥
शुभ्रमेघप्रतीकाशैर्द्वारैः सौधैश्च शोभिता।

सूर्यके समान वर्णवाले सुवर्णमय परकोटेसे घिरी हुई वह नगरी गम्भीर घोषवाले स्वर्णनिर्मित भवनों तथा श्वेत बादलोंके सदृश उज्ज्वल द्वारों और अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी ॥ ५३ १/२ ॥

क्वचित् क्वचिदुदग्राग्रैरुपवृत्तमहापथा ॥ ५४ ॥
तामावसत् पुरीं कृष्णः सर्वै यादवनन्दनाः।
अभिप्रेतजनाकीर्णां सोमः खमिव भासयन् ॥ ५५ ॥

कहीं-कहीं बहुत ऊँचे महलोंकी छायासे उसकी विशाल सड़कें आच्छादित हो रही थीं। ऐसी द्वारकापुरीमें श्रीकृष्ण तथा समस्त यादवनन्दन निवास करने लगे। वह पुरी अभीष्टजनोंसे ही भरी-पूरी थी। जैसे चन्द्रमा आकाशको प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५४-५५ ॥

विश्वकर्मा च तां कृत्वा पुरीं शक्रपुरीमिव।
जगाम त्रिदिवं देवो गोविन्देनाभिपूजितः ॥ ५६ ॥

इन्द्रपुरीके समान द्वारकापुरीका निर्माण करके देव विश्वकर्मा भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सम्मानित हो स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ५६ ॥

भूयश्च बुद्धिरभवत् कृष्णस्य विदितात्मनः।
जनानिमान् धनौघैश्च तर्पयेयमहं यदि ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् आत्मज्ञानी भगवान् श्रीकृष्णके मनमें यह विचार उठा कि 'यहाँके लोगोंको यदि मैं धनसे तृप्त कर सकता तो बहुत अच्छा होता' ॥ ५७ ॥

स वैश्रवणसंस्पृष्टं निधीनामुत्तमं निधिम्।
शङ्खमाह्वयतोपेन्द्रो निशि स्वे भवने प्रभुः ॥ ५८ ॥

तब उन भगवान् उपेन्द्रने कुबेरके सम्पर्कमें रहनेवाले निधियोंमें उत्तम निधि शङ्खका रात्रिके समय अपने भवनमें आवाहन किया ॥ ५८ ॥

स शङ्खः केशवाह्नानं ज्ञात्वा हि निधिराट् स्वयम्।
आजगाम समीपं वै तस्य द्वारवतीपतेः ॥ ५९ ॥

'भगवान् श्रीकृष्णने मेरा आह्वान किया है' यह जानकर निधियोंका राजा शङ्ख स्वयं ही द्वारकानाथके समीप आ गया ॥ ५९ ॥

स शङ्खः प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयादवनिं गतः।
कृष्णं विज्ञापयामास यथा वैश्रवणं तथा ॥ ६० ॥

उस शङ्खने विनयपूर्वक हाथ जोड़ धरतीपर माथा टेककर कुबेरके ही समान भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ ६० ॥

भगवन् किं मया कार्यं सुराणां वित्तरक्षिणा।
नियोजय महाबाहो यत् कार्यं यदुनन्दन ॥ ६१ ॥

'भगवन् ! मैं देवताओंका वित्तरक्षक हूँ। महाबाहु यदुनन्दन ! मुझे क्या करना होगा? जो कार्य हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये' ॥ ६१ ॥

तमुवाच हृषीकेशः शङ्खं गुह्यकमुत्तमम्।
जनाः कृशधना येऽस्मिंस्तान् धनेनाभिपूरय ॥ ६२ ॥

तब श्रीकृष्णने उस शङ्ख नामक उत्तम गुह्यकसे कहा— 'इस नगरमें जो निर्धन या अल्प धनवाले मनुष्य हैं, उनको धनसे परिपूर्ण कर दो ॥ ६२ ॥

नेच्छाम्यनशितं द्रष्टुं कृशं मलिनमेव च।
देहीति चैव याचन्तं नगर्यां निर्धनं नरम् ॥ ६३ ॥

'मैं इस नगरीमें किसी भी ऐसे निर्धन मनुष्यको नहीं देखना चाहता, जिसे भोजन न मिलनेके कारण उपवास करना पड़ता हो, जो दुर्बल और मलिन हो तथा 'दीजिये' कहकर किसीके सामने हाथ फैलाता या भीख माँगता हो' ॥ ६३ ॥

वैशम्पायन उवाच

गृहीत्वा शासनं मूर्ध्ना निधिराट् केशवस्य ह।
निधीनाज्ञापयामास द्वारवत्यां गृहे गृहे ॥ ६४ ॥
धनौघैरभिवर्षध्वं चक्रुः सर्वे तथा च ते।

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा शिरोधार्य करके निधियोंके राजा शङ्खने समस्त निधियोंको आदेश दिया--'तुमलोग द्वारकामें घर-घर जाकर धनराशिकी वर्षा करो।' उन सब निधियोंने वैसा ही किया॥ ६४ १/२ ॥

नाधनो विद्यते तत्र क्षीणभाग्योऽपि वा नरः ॥ ६५ ॥
कुणी वा मलिनो वापि द्वारवत्यां कथञ्चन।
द्वारवत्यां पुरि पुरा केशवस्य महात्मनः ॥ ६६ ॥

४४२श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंश

इस तरह पूर्वकालमें महात्मा केशवकी पुरी द्वारकामें कोई मनुष्य किसी तरह भी निर्धन अथवा भाग्यहीन नहीं रह गया। दुर्बल या मलिन भी नहीं रहा ॥ ६५-६६ ॥

चकार वायोरान्हानं भूयश्च पुरुषोत्तमः ।
तत्रस्थ एव भगवान् यादवानां प्रियंकरः ॥ ६७ ॥
तत्पश्चात् यादवोंका प्रिय करनेवाले पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें स्थित होकर ही वायुदेवका आवाहन किया ॥ ६७ ॥

प्राणयोनिस्तु भूतानामुपतस्थे गदाधरम् ।
एकमासीनमेकान्ते देवगुह्यधरं प्रभुम् ॥ ६८ ॥
समस्त भूतोंके प्राणोंकी योनिरूप वायुदेव एकान्तमें अकेले बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णकी, जो देवताओंके गुप्त प्रयोजनको अपने हृदयमें धारण किये हुए थे, सेवामें उपस्थित हुए ॥

किं मया देव कर्तव्यं सर्वगेनाशुगामिना ।
यथैव दूतो देवानां तथैवास्मि तवानघ ॥ ६९ ॥
और बोले—'देव ! मैं शीघ्रगामी तथा सर्वग (सर्वत्र पहुँचनेमें समर्थ) हूँ। मुझे आपकी कौन-सी सेवा करनी है ? अनघ ! मैं जैसे देवताओंका दूत हूँ, उसी तरह आपका भी हूँ' ॥

तमुवाच ततः कृष्णो रहस्यं पुरुषो हरिः ।
मारुतं जगतः प्राणं रूपिणं समुपस्थितम् ॥ ७० ॥
जगत्‌के प्राण-स्वरूप वायुदेव मूर्तिमान् होकर सेवामें उपस्थित हैं, यह देख अन्तर्यामी, पापहारी भगवान् श्रीकृष्ण उनसे रहस्यभरी बात बोले—॥ ७० ॥

गच्छ मारुत देवेशमनुमान्य सहामरैः ।
सभां सुधर्मामादाय देवेभ्यस्त्वमिहानय ॥ ७१ ॥
'मारुत ! जाओ, देवताओंसहित देवराज इन्द्रका आदर करके उनकी अनुमति ले देवताओंके यहाँसे सुधर्मानामक सभाको यहाँ उठा ले आओ ॥ ७१ ॥

यादवा धार्मिका ह्येते विक्रान्ताश्च सहस्रशः ।
तस्यां विशेयुरेते वै न तु या कृत्रिमा भवेत् ॥ ७२ ॥
'ये सहस्रों धर्मात्मा तथा पराक्रमी यादव उसी सभामें बैठें, जो कृत्रिम (क्षणभंगुर) न हो ॥ ७२ ॥

या ह्यक्षया सभा रम्या कामगा कामरूपिणी ।
सा यादून् धारयेत् सर्वान् यथैव त्रिदशांस्तथा ॥ ७३ ॥
'जो सभा अक्षय, रमणीय, इच्छानुसार सर्वत्र चल सकनेवाली तथा सभासदोंकी इच्छाके अनुरूप स्वरूप धारण करनेवाली है, वह सुधर्मा सभा अपने भीतर इन समस्त यदुवंशियोंको धारण करे, ठीक उसी तरह जैसे वह देवताओंको धारण करती है' ॥ ७३ ॥

संगृह्य वचनं तस्य कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः ।
वायुरारत्मोपमगतिर्जगाम त्रिदिवहालयम् ॥ ७४ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णका संदेश लेकर अपने ही समान गतिवाले वायुदेव स्वर्गलोकमें गये ॥

सोऽनुमान्य सुरान् सर्वान् कृष्णवाक्यं निवेद्य च ।
सभां सुधर्मामादाय पुनरायान्महीतलंम् ॥ ७५ ॥
उन्होंने समस्त देवताओंको आदरपूर्वक श्रीकृष्णका वचन सुनाया और उनकी अनुमतिसे सुधर्मा सभाको लेकर वे पुनः भूतलपर आये ॥ ७५ ॥

सुधर्माय सुधर्मां तां कृष्णयाक्लिष्टकारिणे ।
देवो देवसभां दत्त्वा वायुरन्तरधीयत ॥ ७६ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले सुधर्मात्मा श्रीकृष्णको वह सुधर्मा नामक देवसभा देकर वायुदेव अन्तर्धान हो गये ॥

द्वारवत्यास्तु सा मध्ये केशवेन निवेशिता ।
सुधर्मा यदुमुख्यानां देवानां त्रिदिवे यथा ॥ ७७ ॥
श्रीकृष्णने द्वारकापुरीके मध्यभागमें उस सुधर्मा सभाको स्थापित किया। जैसे स्वर्गमें देवताओंकी सभा है, उसी प्रकार भूतलपर वह प्रमुख यादवोंकी सभा हुई ॥ ७७ ॥

एवं दिव्यैश्च भोगैश्च जलजैश्चाप्ययो हरिः ।
द्रव्यैरलंकरोति स्म पुरीं तां प्रमदामिव ॥ ७८ ॥
इस प्रकार अविनाशी श्रीहरि दिव्य भोगों तथा समुद्रके जलसे प्रकट हुए द्रव्यों (रत्नों) से अपनी पुरीको युवती स्त्रीकी भाँति अलंकृत करते थे ॥ ७८ ॥

मर्यादाश्चैव संचक्रे श्रेणीश्च प्रकृतीस्तथा ।
बलाध्यक्षांश्च युक्तांश्च प्रकृतीशांस्तथैव च ॥ ७९ ॥
उन्होंने सबके लिये धर्मकी मर्यादाएँ बाँध दीं। व्यापारियों, प्रजाजनों, सेनापतियों तथा प्रजावर्गके शासकोंके लिये भी समुचित मर्यादाएँ स्थापित कर दीं ॥ ७९ ॥

उग्रसेनं नरपतिं काश्यं चापि पुरोहितम् ।
सेनापतिमनाधृष्टिं विकद्रुं मन्त्रिपुङ्गवम् ॥ ८० ॥
उग्रसेनको द्वारकाका राजा बनाया, काशीके विद्वान् सान्दीपनि मुनिको पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित किया। अनाधृष्टिको सेनापति तथा विकद्रुको प्रधान मन्त्री बनाया।

यादवानां कुलकरान् स्थविरान् दश तत्र वै ।
मतिमान् स्थापयामास सर्वकार्येष्वनन्तरान् ॥ ८१ ॥
बुद्धिमान् श्रीकृष्णने यादवोंके वंशधर दस बड़े-बूढ़े पुरुषोंको* सभी कार्योंमें सलाह देनेके लिये अवान्तर मन्त्रीके पदपर स्थापित किया था ॥ ८१ ॥


* दस बड़े-बूढ़े पुरुषोंके नाम ये हैं—
उद्धव, वसुदेव, कङ्क, विपृथु, श्वफल्क, चित्रक, गद, सत्यक, बलभद्र और पृथु।

विष्णुपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः [ ४४३


रथेप्यतिरथ्यो यन्ता दारुकः केशवस्य वै।
योद्धृमुख्यश्च योधानां प्रवरः सात्यकिः कृतः ॥ ८२ ॥

रथोंमें अतिरथी दारुक भगवान् श्रीकृष्णका सारथि था। योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यकि ही समस्त योद्धाओंके प्रधान बनाये गये थे ॥ ८२ ॥

समस्त लोकोंके स्रष्टा अनिन्द्य कीर्तिवाले भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार वैधानिक व्यवस्था करके द्वारकापुरीमें यादवोंके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ८३ ॥

विधानमेवं कृत्वाथ कृष्णः पुर्यामनिन्दितः।
मुमुदे यदुभिः सार्द्धं लोकस्रष्टा महीतले ॥ ८३ ॥

रेवतस्याथ कन्यां च रेवतीं शीलसम्मताम्।
प्राप्तवान् बलदेवस्तु कृष्णस्यानुमते तदा ॥ ८४ ॥

उस समय श्रीकृष्णकी अनुमतिसे बलदेवजीने राजा रेवतकी सुशीला कन्या रेवतीको पत्नीरूपमें ग्रहण किया ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारावतीनिर्माणेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें द्वारावतीका निर्माणविषयक अठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥


एकोनषष्टितमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा रुक्मिणीका हरण तथा यादववीरोंका जरासंध एवं शिशुपाल आदिके साथ घोर युद्ध

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नेव काले तु जरासंधः प्रतापवान्।
नृपानुद्योजयामास चेदिराजप्रियेप्सया ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसी समय प्रतापी जरासंध चेदिराजका प्रिय करनेकी इच्छासे राजाओंको एकत्र करनेका उद्योग किया ॥ १ ॥

सुताया भीष्मकस्याथ रुक्मिण्या रुक्मभूषणः।
शिशुपालस्य नृपतेर्विवाहो भविता किल ॥ २ ॥

उसने सर्वत्र यह समाचार भेज दिया कि 'भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी तथा राजा शिशुपालका विवाह होनेवाला है। इसमें केवल सुवर्णके आभूषणोंका उपयोग होगा ॥ २ ॥

दन्तवक्त्रस्य तनयं सुवक्त्रममितौजसम्।
सहस्राक्षसमं युद्धे मायाशतविशारदम् ॥ ३ ॥

दन्तवक्त्रके पुत्र अमिततेजस्वी सुवक्त्रको, जो सैकड़ों मायाओंके ज्ञान एवं प्रयोगमें कुशल तथा युद्धमें सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके तुल्य पराक्रमी था (जरासंधने जोर देकर बुलवाया) ॥ ३ ॥

पौण्ड्रस्य वासुदेवस्य तथा पुत्रं महाबलम्।
सुदेवं वीर्यसम्पन्नं पृथगक्षौहिणीपतिम् ॥ ४ ॥

पौण्ड्रक वासुदेवके महाबली और पराक्रमसम्पन्न पुत्र सुदेवको भी जो पृथक् एक अक्षौहिणी सेनाका अधिपति था (जरासंधने दबाव डालकर ही बुलवाया था) ॥ ४ ॥

एकलव्यस्य पुत्रं च वीर्यवन्तं महाबलम्।
पुत्रं च पाण्ड्यराजस्य कलिङ्गाधिपतिं तथा ॥ ५ ॥
कृताप्रियं च कृष्णेन वेणुदारिं नराधिपम्।
अंशुमन्तं तथा क्राथं श्रुतधर्माणमेव च ॥ ६ ॥
निवृत्तशत्रुं कालिङ्गं गान्धाराधिपतिं तथा।
प्रसह्य च महावीर्यं कौशाम्ब्यधिपमेव च ॥ ७ ॥

एकलव्यके महाबली एवं पराक्रमी पुत्रको, पाण्ड्यराजके पुत्रको, कलिङ्गदेशके अधिपति को, श्रीकृष्णने जिसका अप्रिय किया था, उस राजा वेणुदारिको, क्रथपुत्र अंशुमान् एवं श्रुतधर्माको, शत्रुओंको पराजित करनेवाले कलिङ्गराजको, गान्धार-नरेशको तथा महापराक्रमी कौशाम्बीपतिको भी जरासंधने बलपूर्वक बुलानेकी चेष्टा की थी ॥ ५-७ ॥

भगदत्तो महासेनः शलः शाल्वो महाबलः।
भूरिश्रवा महासेनः कुन्तिवीर्यश्च वीर्यवान्।
स्वयं वरार्थे सम्प्राप्ता भोजराजनिवेशने ॥ ८ ॥

विशाल सेनासे युक्त राजा भगदत्त, शल, महाबली शाल्व, बहुत बड़ी सेनावाले भूरिश्रवा तथा पराक्रमी कुन्तिवीर्य—ये सब लोग स्वयं ही वर शिशुपालकी बारात करनेके लिये भोजराज भीष्मकके भवनमें पधारे थे ॥ ८ ॥

जनमेजय उवाच

कस्मिन् देशे नृपो जज्ञे रुक्मी वेदविदां वरः।
कस्यान्ववाये द्युतिमान् सम्भूतो द्विजसत्तम ॥ ९ ॥

जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्ठ ! वेदवेत्ताओंमें उत्तम कान्तिमान् राजा रुक्मी किस देश और किस कुलमें उत्पन्न हुआ था ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजर्षेर्यादवस्यासीद् विदर्भो नाम वै सुतः।
विन्ध्यस्य दक्षिणे पार्श्वे विदर्भायां न्यवेशयत् ॥ १० ॥

वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! राजर्षि यादवके

४४४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विदर्भनामक एक पुत्र था, जो विन्ध्यगिरिके दक्षिण पार्श्वमें विदर्भनगरीमें निवास करता था ॥ १० ॥

क्रथकैशिकमुख्यास्तु पुत्रास्तस्य महाबलाः।
बभूवुर्वीर्यसम्पन्नाः पृथग्वंशकरा नृपाः॥ ११॥

विदर्भके क्रथ, कैशिक आदि बहुत-से महाबली पुत्र हुए, जो पराक्रमसम्पन्न तथा पृथक्-पृथक् वंशोंके प्रवर्तक नरेश थे।

तस्यान्ववाये भीमस्य जज्ञिरे वृष्णयो नृपाः।
क्रथस्य त्वंशुमान् वंशे भीष्मकः कैशिकस्य तु ॥ १२ ॥

राजर्षि यादवके ही वंशमें भीमसे वृष्णिवंशी राजाओंकी उत्पत्ति हुई थी। क्रथके वंशमें अंशुमान् और कैशिकके वंशज भीष्मक हुए ॥ १२ ॥

हिरण्योरोमेत्याहुर्यं दाक्षिणात्येश्वरं नृपाः।
अगस्त्यगुप्तामाशां यः कुण्डिनस्थोऽन्वशात्नृपः॥ १३ ॥

भीष्मकको ही राजा लोग हिरण्योरोमा तथा दाक्षिणात्येश्वर कहते हैं, जिन्होंने कुण्डिनपुरमें रहकर अगस्त्य मुनिके द्वारा सुरक्षित दिशा दक्षिणका शासन किया था॥ १३ ॥

रुक्मी तस्याभवत् पुत्रो रुक्मिणी च विशाम्पते।
रुक्मी चास्त्राणि दिव्यानि द्रुमात् प्राप महाबलः ॥१४॥
जामदग्न्यात् तथा रामाद् ब्राह्ममस्त्रमवासवान् ।
प्रास्पर्द्धत स कृष्णेन नित्यमद्भुतकर्मणा ॥ १५ ॥

प्रजानाथ ! उन्हीं राजा भीष्मकका पुत्र रुक्मी था तथा रुक्मिणी भी उन्हींकी कन्या थी। महाबली रुक्मीने (किम्पुरुषराज) द्रुमसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये थे। साथ ही जमदग्निनन्दन परशुरामसे उसको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति हुई थी। रुक्मी अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके साथ सदा ही स्पर्धा रखता था ॥ १४-१५ ॥

रुक्मिणी त्वभवद् राजन् रूपेणासदृशी भुवि।
चकमे वासुदेवस्तां श्रवादेव महाद्युतिः ॥ १६ ॥

राजन् ! रुक्मिणीके रूपकी समानता करनेवाली इस पृथ्वीपर दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। महातेजस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उसका परिचय सुनकर ही उसे चाहने लगे थे ॥ १६ ॥

स तया चाभिलषितः श्रवादेव जनार्दनः।
तेजोवीर्यबलोपेतः स मे भर्ता भवेदिति ॥ १७ ॥

इसी प्रकार रुक्मिणी भी श्रीकृष्णकी प्रशंसा सुनकर ही उन्हें चाहने लगी थी। उसकी इच्छा थी कि तेज, वीर्य और बलसे सम्पन्न श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों ॥ १७ ॥

तां ददौ न च कृष्णाय द्वेषाद् रुक्मी महाबलः।
कंसस्य वधसंतापात् कृष्णायामिततेजसे ॥ १८ ॥
याचमानाय कंसस्य द्वेष्योऽयमिति चिन्तयन् ।

महाबली रुक्मी श्रीकृष्णसे द्वेष रखता था, इसलिये उसने श्रीकृष्णको अपनी बहिन नहीं दी। कंसका वध सुनकर उसे बड़ा संताप हुआ था। वह सदा यही सोचता था कि कृष्ण कंसद्रोही है, इसलिये उनके याचना करनेपर भी रुक्मीने अमित तेजस्वी श्रीकृष्णको रुक्मिणी नहीं दी ॥ १८ ½ ॥

चैद्यस्यार्थे सुनीथस्य जरासंधस्तु भूमिपः।
वरयामास तां राजा भीष्मकं भीमविक्रमम् ॥ १९ ॥

पृथ्वीपति राजा जरासंधने चेदिराज सुनीथके पुत्र शिशुपालके लिये भयानक पराक्रमी भीष्मकसे उनकी कन्या रुक्मिणीको माँगा था ॥ १९ ॥

चेदिराजस्य तु वसोरासीत् पुत्रो बृहद्रथः।
मगधेषु पुरा येन निर्मितोऽसौ गिरिव्रजः ॥ २० ॥

चेदिराज उपरिचर वसुके एक पुत्रका नाम बृहद्रथ था, जिसने पूर्वकालमें मगधदेशके भीतर गिरिव्रज नामक नगरका निर्माण कराया था ॥ २० ॥

तस्यान्ववाये जज्ञेऽसौ जरासंधो महाबलः।
वसोरेव तदा वंशे दमघोषोऽपि चेदिराट् ॥ २१ ॥

उसीके वंशमें महाबली जरासंध पैदा हुआ। उपरिचर वसुके ही वंशमें उन दिनों दमघोष पैदा हुए थे, जो चेदि-देशके राजा थे ॥ २१ ॥

दमघोषस्य पुत्रास्तु पञ्च भीमपराक्रमाः।
भगिन्यां वसुदेवस्य श्रुतश्रवसि जज्ञिरे ॥ २२ ॥

दमघोषके पाँच भयानक पराक्रमी पुत्र हुए, जो वसुदेवकी बहिन श्रुतश्रवाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ २२ ॥

शिशुपालो दशग्रीवो रैभ्योऽथोपद्दिशो बली।
सर्वास्त्रकुशला वीरा वीर्यवन्तो महाबलाः ॥ २३ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—शिशुपाल, दशग्रीव, रैभ्य, उपदिश और बली। ये सब-के-सब सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, वीर, पराक्रमी और महाबली थे ॥ २३ ॥

ज्ञातेः समानवंशस्य सुनीथः प्रददौ सुतम्।
जरासंधस्तु सुतवद् ददर्शैनं जुगोप च ॥ २४ ॥

जरासंध कुटुम्बी था तथा समान वंशमें उत्पन्न हुआ था, इसलिये सुनीथ (दमघोष) ने अपना पुत्र शिशुपाल उसे सौंप दिया था (शिशुपालको जरासंधका सहयोगी बना दिया था)। जरासंध भी शिशुपालको अपने पुत्रके समान समझता और उसकी रक्षा करता था ॥ २४ ॥

जरासंधं पुरस्कृत्य वृष्णिशन्रुं महाबलम्।
कृतान्यागांसि चैद्येन वृष्णीनां चाप्रियेषिणा ॥ २५ ॥

वृष्णिवंशके शत्रु महाबली जरासंधको आगे करके चेदि-राजने वृष्णियोंका अप्रिय चाहते हुए उनके अनेक अपराध किये थे ॥ २५ ॥

विष्णुपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ४४५


जामातातभवत् तस्य कंसस्तस्मिन् हते युधि ।
कृष्णार्थं वैरमभवज्जरासंधस्य वृष्णिभिः ॥ २६ ॥

कंस जरासंधका जामाता था। जब वह युद्धमे श्रीकृष्णके हाथसे मारा गया, तब श्रीकृष्णके ही लिये समस्त वृष्णिवंशियोंके साथ जरासंधका वैर हो गया ॥ २६ ॥

भीष्मकं वरयामास सुनीथार्थे च रुक्मिणीम् ।
तां ददौ भीष्मकश्चापि शिशुपालाय वीर्यवान् ॥ २७ ॥

जरासंधने सुनीथपुत्र शिशुपालके लिये ही भीष्मकसे रुक्मिणीको माँगा था और पराक्रमी भीष्मकने उसका शिशुपालके लिये वाग्दान कर दिया ॥ २७ ॥

ततश्चैद्यमुपादाय जरासंधो नराधिपः ।
ययौ विदर्भान् सहितो दन्तवक्रेण यायिना ॥ २८ ॥

तब राजा जरासंध अपने सहायक दन्तवक्रके साथ शिशुपालको लेकर विदर्भ देशको गया ॥ २८ ॥

अनुज्ञातश्च पौण्ड्रेण वासुदेवेन धीमता ।
अङ्गवङ्गकलिङ्गानामीश्वरः स महाबलः ॥ २९ ॥

बुद्धिमान् पौण्ड्रक वासुदेवने भी इस कार्यमें जरासंधका अनुमोदन किया था। महाबली जरासंध अङ्ग-वङ्ग और कलिङ्ग देशोंका भी सम्राट् था ॥ २९ ॥

मानयिष्यंश्च तान् रुक्मी प्रत्युद्गम्य नराधिपान् ।
परया पूजयोपेतांस्तान् निनाय पुरीं प्रति ॥ ३० ॥

रुक्मीने उन नरेशोंका सम्मान करनेके लिये उनकी अगवानी की और अच्छे ढंगसे उनका स्वागत-सत्कार करके वह उन्हें अपनी पुरीमें ले गया ॥ ३० ॥

पितृष्वसुः प्रियार्थं च रामकृष्णानुभावपि ।
प्रययुर्वृष्णयश्चान्ये रथैस्तत्र बलान्विताः ॥ ३१ ॥

बलराम और श्रीकृष्ण ये दोनों भाई भी अपनी बुआकी प्रसन्नताके लिये वहाँ गये। साथ ही दूसरे बलशाली वृष्णिवंशी वीर भी रथोंद्वारा वहाँ पधारे ॥ ३१ ॥

क्रथकैशिकभर्ता तान् प्रतिगृह्य यथाविधि ।
पूजयामास पूजार्हान् बहिश्चैव न्यवेशयत् ॥ ३२ ॥

क्रथकैशिक देशके स्वामी भीष्मकने उन पूजनीय पुरुषोंका विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें बाहर ही ठहराया ॥

श्वोभाविनि विवाहे च रुक्मिणी निर्ययौ बहिः ।
चतुर्युजा रथेनैन्द्रे देवतायतने शुभे ॥ ३३ ॥
इन्द्राणीमर्चयिष्यन्ती कृतकौतुकमङ्गला ।
दीप्यमानेन वपुषा बलेन महता वृता ॥ ३४ ॥

जब विवाह कल होनेवाला था अर्थात् जब उसके होनेमें एक ही दिन शेष रह गया था, उस समय राजकुमारी रुक्मिणी तत्कालोचित मङ्गलाचारसे सम्पन्न हो अपने दीप्तिमान् शरीरसे सुशोभित होती हुई सुन्दर देवालयमें इन्द्राणीकी पूजा करनेके लिये चार घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर ज्येष्ठा नक्षत्रमें राजमहलसे बाहर निकली। उस समय वह विशाल सेनासे घिरी हुई थी ॥ ३३-३४ ॥

तां ददर्श तदा कृष्णो लक्ष्मीं साक्षादिव स्थिताम् ।
रूपेणाग्र्येण सम्पन्नां देवतायतनान्तिके ॥ ३५ ॥

उस यात्राके समय देवमन्दिरके निकट परम सुन्दर रूपसे सम्पन्न साक्षात् लक्ष्मी-सी खड़ी हुई रुक्मिणीको भगवान् श्रीकृष्णने देखा ॥ ३५ ॥

वह्नेरिव शिखां दीप्तां मायां भूमिगतामिव ।
पृथिवीमिव गम्भीरामुत्थितां पृथिवीतलात् ॥ ३६ ॥

वह प्रज्वलित हुई अग्निकी शिखा, पृथ्वीपर उतरी हुई देवमाया तथा भूतलसे उठी हुई गम्भीर स्वभाववाली मूर्तिमती भूदेवीके समान जान पड़ती थी ॥ ३६ ॥

मरीचिमिव सोमस्य सौम्यां स्त्रीविग्रहां भुवि ।
श्रीमिवाग्र्यां विना पद्मं भविष्यां स्त्रीसहायिनीम् ।
कृष्णेन मनसा दृष्टां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि ॥ ३७ ॥

उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो चन्द्रमाकी सौम्य किरण सुन्दरी नारीका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरी हो, बिना कमलकी श्रेष्ठ लक्ष्मी हो अथवा भविष्यमें होनेवाली लक्ष्मीकी सहायिका हो। देवताओंके लिये भी जिसका दर्शन होना अत्यन्त कठिन था, उस रुक्मिणीको श्रीकृष्णने जी भरकर देखा ॥ ३७ ॥

श्यामावदाता सा ह्यासीत् पृथुचार्यायतेक्षणा ।
ताम्रोष्ठनयनापाङ्गी पीनोरूजघनस्तनी ॥ ३८ ॥

उसकी सोलह वर्षकी अवस्था थी। अङ्गोंकी कान्ति गौरवर्णकी थी। उसके नेत्र बहुत ही मनोहर एवं विशाल थे। ओष्ठ तथा नयनोंके प्रान्तभाग ताँबेके समान लाल थे। जाँघ, नितम्ब और स्तन मोटे एवं मांसल थे ॥ ३८ ॥

बृहती चारुसर्वाङ्गी तन्वी शशिसितानना ।
ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूर्नीलकुञ्चितमूर्धजा ॥ ३९ ॥

वह पतले और लंबे कदकी स्त्री थी। उसके सारे अङ्ग बड़े ही मनोहर थे। उसका मुख चन्द्रमाके समान गौर कान्तिसे सुशोभित था। नख लाल और ऊँचे थे। भौंहें सुन्दर तथा सिरके बाल काले और घुँघराले थे ॥ ३९ ॥

अत्यर्थं रूपतः कान्ता पीनश्रोणिपयोधरा ।
तीक्ष्णशुक्लैः समैर्दन्तैः प्रभासद्भिरलंकृता ॥ ४० ॥

वह रूपकी दृष्टिसे अत्यन्त कमनीया थी। उसके नितम्ब और उरोज पीन (उभरे हुए) थे। वह तीक्ष्ण, श्वेत, बराबर जमे हुए और चमकीले दाँतोंसे सुशोभित होती थी ॥ ४० ॥

४४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


अनन्या प्रमदा लोके रूपेण यशसा श्रिया।
रुक्मिणी रूपिणी देवी पाण्डुरक्षौमवासिनी ॥ ४१ ॥

रूप, यश और शोभाकी दृष्टिसे संसारमें दूसरी कोई युवती उसके समान नहीं थी। उज्ज्वल रेशमी साड़ी पहने हुए राजकुमारी रुक्मिणी रूपवती देवी-सी जान पड़ती थी ॥ ४१ ॥

तां दृष्ट्वा ववृधे कामः कृष्णस्य प्रियदर्शनाम्।
हविषेवानलस्यार्चिर्मनस्तस्यां समादधत् ॥ ४२ ॥

जैसे घीकी आहुति डालनेसे अग्निकी ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस प्रियदर्शना राजकन्याको देखकर श्रीकृष्णकी उसे पानेके लिये कामना बहुत बढ़ गयी। उन्होंने अपना हृदय उसीपर निछावर कर दिया ॥ ४२ ॥

रामेण सह निश्चित्य केशवस्तु महाबलः।
तत्प्रमाथेऽकरोद् बुद्धिं वृष्णिभिः प्रणिधाय च ॥ ४३ ॥

तदनन्तर महाबली श्रीकृष्णने वृष्णिवंशियोंके साथ सलाह और बलरामजीके साथ कर्तव्यका निश्चय करके रुक्मिणीको हर लेनेका विचार किया ॥ ४३ ॥

कृते तु देवताकार्ये निष्क्रामन्तीं सुरालयात्।
उन्मथ्य सहसा कृष्णः स्वनिनाय रथोत्तमम् ॥ ४४ ॥

इतनेमें ही देवपूजाका कार्य सम्पन्न करके रुक्मिणी देवालयसे निकलने लगी। उसी समय श्रीकृष्णने सहसा पहुँचकर उसे गोदमें उठा लिया और अपने उत्तम रथपर पहुँचा दिया ॥ ४४ ॥

वृक्षमुत्पाट्य रामोऽपि जघानापततः परान्।
समनह्यन्त दाशार्हास्तदाज्ञाप्ताश्च सर्वशः ॥ ४५ ॥

इधर बलरामने भी एक पेड़ उखाड़कर आक्रमण करनेवाले शत्रुओंका उसीसे संहार कर डाला। उस समय बलरामकी आज्ञा पाकर समस्त यदुवंशी वीर युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गये ॥ ४५ ॥

ते रथैर्विविधाकारैः समुच्छ्रितमहाध्वजैः।
वाजिभिर्वारणैश्चैव परिवव्रुर्हलायुधम् ॥ ४६ ॥

वे ऊँचे एवं विशाल ध्वजोंसे युक्त भाँति-भाँतिके रथों, घोड़ों और हाथियोंद्वारा बलरामजीको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ४६ ॥

आदाय रुक्मिणीं कृष्णो जगामाशु पुरीं प्रति।
रामे भारं समासज्य युयुधाने च वीर्यवान् ॥ ४७ ॥

बलवान् श्रीकृष्ण युद्धका सारा भार बलराम तथा सात्यकिपर छोड़कर रुक्मिणीको साथ ले शीघ्र ही द्वारकापुरीको चल दिये ॥ ४७ ॥

अक्रूरे विपृथौ चैव गदे च कृतवर्मणि।
चक्रदेवे सुदेवे च सारणे च महाबले ॥ ४८ ॥
निवृत्तशत्रौ विक्रान्ते भङ्गकारे विदूरथे।
उग्रसेनात्मजे कङ्के शतद्युम्ने च केशवः ॥ ४९ ॥
राजाधिदेवे सुदुरे प्रसेने चित्रके तथा।
अतिदान्ते बृहद्दुर्गे श्वफल्के सत्यके पृथौ ॥ ५० ॥
वृष्ण्यन्धकेषु चान्येषु मुख्येषु मधुसूदनः।
गुरुमासज्य तं भारं ययौ द्वारवतीं प्रति ॥ ५१ ॥

मधुसूदन श्रीकृष्णने युद्धका वह गुरुतर भार (बलराम और सात्यकिके सिवा) अक्रूर; विपृथु, गद, कृतवर्मा, चक्रदेव; सुदेव, महाबली सारण, निवृत्तशत्रु, पराक्रमी भङ्गकार; विदूरथ, उग्रसेनकुमार कङ्क, शतद्युम्न, राजाधिदेव; मुदुर, प्रसेन, चित्रक, अतिदान्त, बृहद्दुर्ग, श्वफल्क, सत्यक, पृथु तथा अन्यान्य वृष्णि और अन्धकवंशके प्रमुख वीरोंपर रखकर द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४८-५१ ॥

दन्तवक्त्रो जरासंधः शिशुपालश्च वीर्यवान्।
संनद्धा निर्ययुः क्रुद्धा जिघांसन्तो जनार्दनम् ॥ ५२ ॥

उधर दन्तवक्त्र, जरासंध और पराक्रमी शिशुपाल कवच बाँधकर श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरे हुए निकले ॥ ५२ ॥

अङ्गवङ्गकलिङ्गैश्च सार्धं पौण्ड्रैश्च वीर्यवान्।
निर्ययौ चेदिराजस्तु भ्रातृभिः स महारथैः ॥ ५३ ॥

पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग तथा पुण्ड्रदेशीय योद्धाओं और अपने महारथी भाइयोंके साथ युद्धके लिये निकला ॥ ५३ ॥

तान् प्रत्यगृह्णन् संरब्धा वृष्णिवीरा महारथाः।
संकर्षणं पुरस्कृत्य वासवं मरुतो यथा ॥ ५४ ॥

उस समय रोषमें भरे हुए वृष्णिवंशके महारथी वीरोंने जैसे देवता इन्द्रको आगे रखते हैं, उसी प्रकार बलरामजीको आगे करके उन समस्त शत्रुओंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ५४ ॥

आपतन्तं हि वेगेन जरासंधं महाबलम्।
षड्भिर्विच्याध नाराचैर्युयुधानो महामृधे ॥ ५५ ॥

उस महासमरमें वेगसे आगे बढ़ते हुए महाबली जरासंधको सात्यकिने छः नाराचोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५५ ॥

अक्रूरो दन्तवक्त्रं तु विव्याध नवभिः शरैः।
तं प्रत्यविद्ध्यत् कारूषो वाणैर्दशभिराशुगैः ॥ ५६ ॥

अक्रूरने दन्तवक्त्रको नौ बाणोंसे वेध दिया, तब करूपराज दन्तवक्त्रने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अक्रूरको भी बींधकर बदला चुकाया ॥ ५६ ॥

विपृथुः शिशुपालं तु शरैर्विन्ध्याध सप्तभिः।
अष्टभिः प्रत्यविद्ध्यत् तं शिशुपालः प्रतापवान् ॥ ५७ ॥

[ विष्णुपर्व ]एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः४४७

विपृथुने सात बाणोंसे शिशुपालको घायल कर दिया, तब प्रतापी शिशुपालने आठ बाणोंसे विपृथुको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५७ ॥

गवेषणस्तु चैद्यं तु षड्भिर्विद्व्याध मार्गणैः ।
अतिदान्तस्तथाष्टाभिर्बृहद्दुर्गंश्च पञ्चभिः ॥ ५८ ॥

तब गवेषणने छः, अतिदान्तने आठ और बृहद्दुर्गने पाँच बाणोंसे चेदिराज शिशुपालको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५८ ॥

प्रतिविव्याध तांश्चैद्यः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।
जघानाश्वांश्च चतुरश्चतुर्भिर्विपृथोः शरैः ॥ ५९ ॥

शिशुपालने भी उन सबको पाँच-पाँच बाण मारकर बदला चुकाया और चार बाणोंसे विपृथुके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ५९ ॥

बृहद्दुर्गस्य भल्लेन शिरश्चिच्छेद चारिहा ।
गवेषणस्य सूतं तु प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ६० ॥
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा विपृथुस्तु महाबलः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं बृहद्दुर्गस्य वीर्यवान् ॥ ६१ ॥

इतना ही नहीं, शत्रुसूदन शिशुपालने एक भल्लसे बृहद्दुर्गका सिर काट लिया और गवेषणके सारथिको यमलोक पहुँचा दिया। तब महाबली एवं पराक्रमी विपृथु अपने अश्व-हीन रथको त्यागकर शीघ्र ही बृहद्दुर्गके रथपर जा चढ़े ॥ ६०-६१ ॥

विपृथोः सारथिश्चापि गवेषणरथं द्रुतम् ।
आरुह्य जवनानश्वान् नियन्तुमुपचक्रमे ॥ ६२ ॥

विपृथुका सारथि भी तुरंत ही गवेषणके रथपर जा बैठा और उसके वेगशाली घोड़ोंको काबूमे रखनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६२ ॥

ते क्रुद्धाः शरवर्षेण सुनीथं समवाकिरन् ।
नृत्यन्तं रथमार्गेषु चापहस्ताः कलापिनः ॥ ६३ ॥

फिर तो वे कुपित हो धनुष और बाण हाथमे लेकर रथ-मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए सुनीथपुत्र शिशुपालपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ६३ ॥

चक्रदेवो दन्तवक्त्रं विभेदोरसि पत्रिणा ।
पड्रथं पञ्चभिश्चैव विव्याध युधि मार्गणैः ॥ ६४ ॥

चक्रदेवने पंखवाले बाणसे मारकर दन्तवक्त्रकी छाती छेद डाली। फिर पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धमें पड्रथको भी घायल कर दिया ॥ ६४ ॥

ताभ्यां स विद्धो दशभिर्बाणैर्मर्मातिगैः शितैः ।
ततो बली चक्रदेवं विभेद दशभिः शरैः ॥ ६५ ॥

तब उन दोनोंने भी पैनी धारवाले दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा चक्रदेवको गहरी चोट पहुँचाया । फिर शिशुपालके भाई बलीने भी चक्रदेवको दस बाण मारे ॥ ६५ ॥

पञ्चभिश्चापि विव्याध सोऽपि दूराद् विदूरथम् ।
विदूरथोऽपि तं षड्भिर्विन्ध्याधाजौ शितैः शरैः ॥ ६६ ॥

तत्पश्चात् उसने दूरसे ही पाँच बाण मारकर विदूरथको भी घायल कर दिया। विदूरथने भी छः पैने बाण मारकर युद्धमें बलीको आहत कर दिया ॥ ६६ ॥

त्रिंशता प्रत्यविध्यत् तं बली बाणैर्महाबलम् ।
कृतवर्मा विभेदाजौ राजपुत्रं त्रिभिः शरैः ॥ ६७ ॥
न्यहनत् सारथिं चास्य ध्वजं चिच्छेद सोच्छ्रितम् ।

तब बलीने महाबली विदूरथको बदलेमें तीस बाण मारे। दूसरी ओर कृतवर्माने युद्धमे पौण्ड्रक वासुदेवके पुत्रको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। साथ ही उसके सारथिको भी मार डाला और ऊँचे ध्वजको काट गिराया ॥ ६७½ ॥

प्रतिविव्याध तं क्रुद्धः पौण्ड्रः षड्भिः शिलीमुखैः ॥ ६८ ॥
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य भल्लेन कृतवर्मणः ।

तब क्रोधमें भरे हुए पौण्ड्रने छः बाण मारकर बदला चुकाया और एक भल्लसे कृतवर्माका धनुष भी काट दिया ॥

निवृत्तशत्रुः कालिङ्गं विभेद निशितैः शरैः ।
तोमरेणांसदेशे तं निर्विभेद कलिङ्गराट् ॥ ६९ ॥

निवृत्तशत्रुने बहुत-से पैने बाण मारकर कलिङ्गराजको बींध डाला। तब कलिङ्गराजने एक तोमरका प्रहार करके उसके कंधेपर घाव कर दिया ॥ ६९ ॥

गजेनासाद्य कङ्कस्तु गजमङ्गस्य वीर्यवान् ।
तोमरेण विभेदाङ्गं विभेदाङ्गञ्च तं शरैः ॥ ७० ॥

पराक्रमी कङ्कने हाथीके द्वारा आक्रमण करके अङ्गराजके हाथी और अङ्गराजको भी तोमरसे घायल कर दिया। तब अङ्गराजने भी अनेक बाणोंद्वारा कङ्कको चोट पहुँचायी ॥ ७० ॥

चित्रकश्च श्वफल्कश्च सत्यकश्च महारथः ।
कलिङ्गस्य तथानीकं नाराचैर्बिभिदुः शतैः ॥ ७१ ॥

उधर चित्रक, श्वफल्क और महारथी सत्यकने कलिङ्ग-राजकी सेनाको सौ नाराचोंसे मारकर विदीर्ण कर डाला ॥

तं निस्पृष्टद्रुमेणाजौ वङ्गराजस्य कुञ्जरम् ।
जघान रामः संक्रुद्धो वङ्गराजं च संयुगे ॥ ७२ ॥

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए बलरामने एक पत्रहीन वृक्षके द्वारा युद्धस्थलमें वङ्गराजके हाथी और वङ्गराजको भी कालके गालमें भेज दिया ॥ ७२ ॥

तं हत्वा रथमारुह्य धनुरुदाय वीर्यवान् ।
संकर्षणो जघानोग्रैर्नाराचैः कैशिकान् बहून् ॥ ७३ ॥

वङ्गराजका वध करके पराक्रमी संकर्षणने धनुष हाथमें ले रथपर आरूढ़ हो भयंकर नाराचोंद्वारा बहुत-से कैशिकों-का संहार कर डाला ॥ ७३ ॥