विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३९
मनसा समुन्ध्याय तस्यागमनकारणात् ।
त्रिदशाभिमुखः कृष्णो विविक्ते समपद्यत ॥ २१ ॥
मन-ही-मन यह बात सोचकर भगवान् श्रीकृष्ण एकान्त स्थानमें विश्वकर्माके आगमनके लिये देवताओंकी ओर उन्मुख हुए ॥ २१ ॥
तस्मिन्नेव ततः काले शिल्पाचार्यो महामतिः ।
विश्वकर्मा सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य प्रमुखे स्थितः ॥ २२ ॥
इसी समय परम बुद्धिमान् शिल्पाचार्य सुरश्रेष्ठ विश्वकर्मा श्रीकृष्णके सामने आकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
विश्वकर्मोवाच
शक्रेण प्रेषितः क्षिप्रं तव विष्णो धृतव्रत ।
किङ्करः समनुप्राप्तः शाधि मां किं करोमि ते ॥ २३ ॥
विश्वकर्मा बोले— उत्तम व्रतको धारण करनेवाले विष्णुदेव ! मुझे इन्द्रने आपके पास शीघ्र भेजा है। मैं सेवक आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? ॥ २३ ॥
यथासौ देवदेवो मे शङ्करश्च यथान्वयः ।
तथा त्वं देव मान्यो मे विशेषो नास्ति वः प्रभो ॥ २४ ॥
देव ! प्रभो ! मेरे लिये जैसे देवाधिदेव ब्रह्माजी तथा अविनाशी भगवान् शङ्कर माननीय हैं, उसी प्रकार आप भी मेरे लिये सम्माननीय हैं। मेरी धारणाके अनुसार आप तीनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ २४ ॥
त्रैलोक्यज्ञापिकां वाचमुत्सृजस्व महाभुज ।
एषोऽस्मि परिवेष्टार्थः किं करोमि प्रशाधि माम् ॥ २५ ॥
महाबाहो ! आपकी वाणी तीनों लोकोंका ज्ञान करानेवाली है (अथवा तीनों लोकोंको आज्ञा देनेमें समर्थ है)। आप मेरे प्रति उसीका प्रयोग कीजिये। मैं शिल्पशास्त्रका पारदर्शी आपके सामने खड़ा हूँ। आज्ञा दीजिये, कौन-सा कार्य करूँ ॥ २५ ॥
श्रुत्वा विनीतं वचनं केशवो विश्वकर्मणः ।
प्रत्युवाच यदुश्रेष्ठः कंसारिरतुलं वचः ॥ २६ ॥
विश्वकर्माका यह विनययुक्त वचन सुनकर कंसविध्वंसी यदुश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण उनसे यह अनुपम वचन बोले—॥
श्रुतार्थो देवगुह्यस्य भवान् यत्र वयं स्थिताः ।
अवश्यं त्विह कर्तव्यं सदनं मे सुरोत्तम ॥ २७ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें देवताओंकी जो गुप्त सभा बैठी थी, जहाँ हमलोग उपस्थित थे, वहाँ तुम भी थे, अतः देवताओंका जो गूढ़ प्रयोजन है, उसे तुमने भी सुना ही है। अतः यहाँ मेरे रहनेके लिये अवश्य ही सुन्दर सदनका निर्माण करना होगा ॥ २७ ॥
तदियं पूः प्रकाशार्थे निवेश्या मयि सुव्रत ।
मत्प्रभावानुरूपैश्च गृहैश्चेयं समन्ततः ॥ २८ ॥
'उत्तमव्रतधारी देव ! मेरे निमित्त अपने शिल्पकौशलका प्रदर्शन करनेके लिये तुम्हे इस नगरीको बसाना और इसके भवनोंका निर्माण करना है। यह पुरी सब ओरसे मेरे प्रभावके अनुरूप गृहोंद्वारा सुशोभित हो ॥ २८ ॥
उत्तमा च पृथिव्यां वै यथा स्वर्गेऽमरावती ।
तथ्येयं हि त्वया कार्या शक्तो ह्यसि महामते ॥ २९ ॥
'महामते ! जैसे स्वर्गमें अमरावतीपुरी सबसे श्रेष्ठ है, उसी तरह इस पृथ्वीपर यह पुरी जैसे भी सर्वोत्तम हो सके, वैसा ही प्रयत्न करके तुम्हे इसका निर्माण करना है। तुम इस कार्यमें समर्थ हो ॥ २९ ॥
मम स्थानमिदं कार्यं यथा वै त्रिदिवे तथा ।
मर्त्याः पश्यन्तु मे लक्ष्मीं पुर्या यदुकुलस्य च ॥ ३० ॥
'मेरा यह स्थान तुम्हे वैसा ही बनाना है, जैसा कि वैकुण्ठधाममें है। जिससे यहाँके सब मनुष्य मेरा, इस पुरीका तथा यदुकुलका वैभव देख सकें ॥ ३० ॥
एवमुक्तस्ततः प्राह विश्वकर्मा मतीश्वरः ।
कृष्णमक्लिष्टकर्माणं देवामित्रविनाशनम् ॥ ३१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर बुद्धिके स्वामी प्रजापति विश्वकर्माने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले देवशत्रुविनाशक श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ३१ ॥
सर्वमेतत् करिष्यामि यत् त्वयाभिहितं प्रभो ।
पुरी त्वियं जनस्यास्य न पर्याप्ता भविष्यति ॥ ३२ ॥
'प्रभो ! आपने जो कुछ कहा है, वह सब मैं करूँगा; परंतु पुरीके लिये जो भूमि है, यह इस विशाल जनसमुदायके लिये पर्याप्त नहीं होगी ॥ ३२ ॥
भविष्यति च विस्तीर्णा बुद्धिर्यस्यास्तु शोभना ।
चत्वारः सागरा ह्यस्यां विचरिष्यन्ति रूपिणः ॥ ३३ ॥
यदीच्छेत् सागरः किंचिदुत्स्रष्टुमपि तोयराट् ।
ततः स्वायतलक्षण्या पुरी स्यात् पुरुषोत्तम ॥ ३४ ॥
'पुरुषोत्तम ! आप चाहे तो यह विस्तृत हो सकेगी। मेरी इच्छा है, इसका सुन्दर विस्तार हो। इसमें चारों समुद्र मूर्तिमान् होकर विचरेंगे। यदि जलके स्वामी समुद्र कुछ भूमि छोड़ सकें तो यह पुरी भलीभाँति विस्तृत एवं उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हो सकेगी' ॥ ३३-३४ ॥
एवमुक्तस्ततः कृष्णः प्रागेव कृतनिश्चयः ।
सागरं सरितां नाथमुवाच वदतां वरः ॥ ३५ ॥
विश्वकर्माके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण, जो पहलेसे ही समुद्रसे भूमि लेनेका निश्चय कर चुके थे, सरिताओंके स्वामी सागरसे बोले— ॥ ३५ ॥
समुद्र दश च द्वे च योजनानि जलाशये ।
प्रतिसंह्रियतामात्मा यद्यस्ति मयि मान्यता ॥ ३६ ॥