विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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इयं द्वारवती नाम पृथिव्यां निर्मिता मया ।
भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ॥ ६ ॥
'मेरे द्वारा इस भूतलपर निर्मित हुई यह पुरी द्वारवतीके नामसे प्रसिद्ध होगी तथा इन्द्रकी अमरावतीके समान रमणीय दिखायी देगी ॥ ६ ॥
तान्येवास्याः कारयिष्ये चिह्नान्यायतनानि च ।
चत्वरान् राजमार्गांश्च सम्यगन्तःपुराणि च ॥ ७ ॥
'मैं इस पुरीके वे ही चिह्न, वे ही मन्दिर, वैसे ही चौराहे, उसी तरहकी सड़कें और वैसे ही उत्तम अन्तःपुर बनवाऊँगा, जैसे कि अमरावतीमें है ॥ ७ ॥
देवा इवात्र मोदन्तु भवन्तो विगतज्वराः ।
बाधमाना रिपूनुग्रानुग्रसेनपुरोगमाः ॥ ८ ॥
'जैसे देवता अमरावतीमें आनन्द भोगते हैं, उसी प्रकार उग्रसेन आदि आपलोग भी निश्चिन्त हो अपने शत्रुओंको पीड़ा देते हुए इस पुरीमें सानन्द निवास करें ॥ ८ ॥
गृह्यन्तां वेश्मवास्तूनि कल्प्यन्तां त्रिकचत्वराः ।
मीयन्तां राजमार्गाश्च प्रासादस्य च या गतिः ॥ ९ ॥
'घरोंके शिलान्यासकी सामग्रियाँ संग्रह करके लायी जायँ। तिराहों और चौराहोंकी कल्पना की जाय। सड़कोंके लिये भूमका माप किया जाय तथा राजमहलमें जानेका जो मार्ग है, उसके लिये भी भूमि नापी जाय ॥ ९ ॥
प्रेष्यन्तां शिल्पिमुख्या वै नियुक्ता वेश्मकर्मसु ।
नियुज्यन्तां च देशेषु प्रेष्यकर्मकरा जनाः ॥ १० ॥
'गृहनिर्माणके कार्यमें लगे रहनेवाले जो सुयोग्य एवं श्रेष्ठ शिल्पी हों, उन्हें यहाँ भेजा जाय और जगह-जगह मजदूरीका काम करनेवाले मजदूरोंको (कारीगरोंके साथ) काम करनेके लिये लगा दिया जाय' ॥ १० ॥
एवमुक्ते तु यदवो गृहसंग्रहतत्पराः ।
यथानिवेशं संग्रहाश्चकुर्वास्तुपरिग्रहमू ॥ ११ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर सब यादव हर्षसे उल्लसित हो गृहनिर्माणके लिये उपयोगी सामग्रीका संग्रह करनेमें लग गये। उन्होंने सभी घरोंके लिये उनकी स्थितिके अनुसार शिलान्यासके निमित्त आवश्यक वस्तुओंका संग्रह किया ॥ ११ ॥
सूत्रहस्तास्ततो मानं चक्रुर्यादवसत्तमाः ।
पुण्येऽहनि महाराज द्विजातीनभिपूज्य च ॥ १२ ॥
महाराज ! तदनन्तर श्रेष्ठ यादवोंने एक पवित्र दिनको ब्राह्मणोंका पूजन करके हाथोंमें सूत्र लेकर भूमिको नापना आरम्भ किया ॥ १२ ॥
वास्तुदैवतकर्माणि विधिना कारयन्ति च ।
स्थपतीनाथ गोविन्दस्तत्रोवाच महामतिः ॥ १३ ॥
वे वास्तु देवताके पूजन आदि कर्म भी विधिपूर्वक सम्पन्न कराने लगे। ततस्तान् परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ थवदयोंसे कहा—॥ १३ ॥
अस्मदर्थे सुविहितं क्रियतामत्र मन्दिरम् ।
विविक्तचत्वरपथं सुनिविष्टेष्टदैवतम् ॥ १४ ॥
'कारीगरो ! तुमलोग यहाँ हम यादवोंके लिये सुन्दर ढंगसे एक मन्दिरका निर्माण करो, जिसमें इष्टदेवताकी उत्तम विधिसे स्थापना की जाय। यहाँका मार्ग और चौराहा पृथक् रहना चाहिये' ॥ १४ ॥
ते तथेति महाबाहुमुक्त्वा स्थपतयस्तदा ।
दुर्गकर्माणि संस्कारानुपकल्प्य यथाविधि ॥ १५ ॥
यथान्यायं विर्निमिरे दुर्गाण्यायतनानि च ।
स्थानानि निदधुश्चात्र ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥ १६ ॥
तब उन थवदयोंने महाबाहु श्रीकृष्णमे 'बहुत अच्छा' कहकर विधिपूर्वक दुर्ग-कर्म (दुर्गनिर्माण-सम्बन्धी प्रारम्भिक कार्य—नींव खोदना आदि) और संस्कार (भूमिशोधन—कण्टकनिवारण आदि) करके यथोचित रीतिमे विभिन्न दुगों और मन्दिरोंका निर्माण किया तथा उनमें क्रमशः ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये स्थान बनाये ॥ १५-१६ ॥
अपामग्नेः सुरेशस्य दृषदोलूखलस्य च ।
चातुर्दिशानि चत्वारि द्वाराणि निदधुश्च ते ॥ १७ ॥
उन्होंने जल, अग्नि, इन्द्र तथा सिल-ओखली—इन चार देवताओंके लिये चार द्वार बनाये (अथवा युद्धास्त्र आदि चार देवताओंके लिये द्वारोंका निर्माण किया) ॥ १७ ॥
शुद्धाक्षमैन्द्रं भल्लाटं पुष्पवन्तं तथैव च ।
तेषु वेश्मसु युक्तेषु यादवेषु महात्मसु ॥ १८ ॥
पुर्याः क्षिप्रं निवेशार्थं चिन्तयामास माधवः ।
उन कारीगरोंने शुद्धाक्ष, ऐन्द्र, भल्लाट और पुष्पवन्त-की भी मूर्तियाँ बनायीं और उनके लिये उपयुक्त स्थानका निर्माण किया। जब महामनस्वी यादव उन भवनोंके निर्माण कार्यमें जुट गये, तब माधव श्रीकृष्ण इस चिन्तामें पड़े कि किस तरह इस पुरीका शीघ्र निर्माण हो जाय ॥ १८½ ॥
तस्य दैवोत्थिता बुद्धिविमला क्षिप्रकारिणी ॥ १९ ॥
पुर्याः प्रियकरी सा वै यदूनामभिवर्द्धिनी ।
दैववश उनके भीतर पुरीका शीघ्र निर्माण करानेवाली निर्मल बुद्धिका उदय हुआ, जो यादवोंका प्रिय एवं अभ्युदय करनेवाली थी ॥ १९½ ॥
शिल्पिमुख्यस्तु देवानां प्रजापतिसुतः प्रभुः ॥ २० ॥
विश्वकर्मा स्वमत्या वै पुरीं संस्थापयिष्यति ।
उन्होंने सोचा, 'देवताओंके प्रधान शिल्पी प्रजापतिपुत्र विश्वकर्मा इस कार्यमें समर्थ हैं। वे अपनी बुद्धिके अनुसार इस पुरीकी स्थापना करेंगे' ॥ २०½ ॥