विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३७
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु कृष्णेन निर्जगाम गुहामुखात् ।
अन्वीयमानः कृष्णेन कृतकार्येण धीमता ॥ ६४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर राजा मुचुकुन्द गुफाके द्वारसे बाहर निकले । उनके पीछे कृतकृत्य हुए बुद्धिमान् श्रीकृष्ण भी थे ॥ ६४ ॥
ततो ददर्श पृथिवीमावृतां ह्रस्वकैर्नरैः ।
स्वल्पोत्साहैरल्पबलैरल्पवीर्यपराक्रमैः ।
परेणाधिष्ठितं चैव राज्यं केवलमात्मनः ॥ ६५ ॥
उन्होंने देखा, पृथ्वीपर छोटे-छोटे मनुष्य भरे हुए हैं । उन सबके उत्साह, बल, वीर्य और पराक्रम बहुत थोड़े हैं । अब अपना केवल राज्य बच गया है, जिसपर दूसरेका प्रभुत्व स्थापित हो चुका है ॥ ६५ ॥
प्रीत्या विसृज्य गोविन्दं प्रविवेश महद् वनम् ।
हिमवन्तमगाद् राजा तपसे धृतमानसः ॥ ६६ ॥
तब राजाने बड़े प्रेमसे भगवान् श्रीकृष्णको विदा किया और स्वयं अपने मनमे तपस्याका निश्चय करके हिमालयपर्वतपर वहाँके विशाल वनमें चले गये ॥ ६६ ॥
ततः स तप आस्थाय विनिर्मुच्य कलेवरम् ।
आरुरोह दिवं राजा कर्मभिः स्वैर्जिताञ्शुभैः ॥ ६७ ॥
वहाँ तपस्या करके शरीरको त्यागकर राजा मुचुकुन्द अपने अशुभनिवारक पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकमे जा पहुँचे ॥ ६७ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा उपायेन महामनाः।
घातयित्वाऽऽत्मनः शत्रुं तत्सैन्यं प्रत्यपद्यत ॥ ६८ ॥
इधर महामनस्वी धर्मात्मा भगवान् वासुदेवने भी अपने शत्रुको पूर्वोक्त रूपसे मरवाकर उसकी सारी सेनापर अधिकार कर लिया ॥ ६८ ॥
प्रभूतरथहस्त्यश्ववर्मशस्त्रालायुधध्वजम् ।
आदायोपययौ धीमान् स सैन्यं निहतेश्वरम् ॥ ६९ ॥
बुद्धिमान् श्रीकृष्ण बहुसंख्यक रथ, हाथी, घोड़े, कवच, अस्त्र, शस्त्र और ध्वजाओंसे युक्त सेनाको, जिसका राजा मारा गया था, अपने साथ ले गये ॥ ६९ ॥
निवेदयामास ततो नराधिपे
तदुग्रसेने प्रतिपूर्णमानसः ।
जनार्दनो द्वारवतीं च तां पुरी-
मशोभयत् तेन धनेन भूरिणा ॥ ७० ॥
उनका मनोरथ पूर्ण हो चुका था। जनार्दनने वह सारी सेना राजा उग्रसेनको समर्पित कर दी और उस प्रचुर धनराशिसे उन्होंने द्वारकापुरीकी शोभा बढ़ायी ॥ ७० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कालयवनवधे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कालयवनका वधविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
द्वारकापुरीका विश्वकर्माद्वारा निर्माण, निधिपति शङ्ख और सुधर्मासभाका आनयन, श्रीकृष्णद्वारा सुव्यवस्थापूर्वक वहाँ यादवोंको बसाना तथा बलरामजीका रेवतीके साथ विवाह
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रभाते विमले भास्करे उदिते तदा ।
कृतजाप्यो हृषीकेशो वनान्ते न्यवसाद ह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर, निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर भगवान् श्रीकृष्ण नैत्यिक जप एवं स्वाध्याय आदि पूर्ण करके वनके भीतर बैठे ॥ १ ॥
परिचक्राम तं देशं दुर्गस्थानदिदृक्षया ।
उपतस्थुः कुलश्लाघ्या यादवा यदुनन्दनम् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् दुर्गके लिये उपयुक्त स्थान देखनेकी इच्छासे वे उस प्रदेशमें घूमने लगे । उस समय कुलके बड़े-बूढ़े यदुवंशी भी यदुनन्दन श्रीकृष्णके पास आ गये थे ॥ २ ॥
रोहिण्यामहनि श्रेष्ठे स्वस्ति वाच्य द्विजोत्तमान् ।
पुण्याहघोषैर्विपुलैर्दुर्गस्यारब्धवान् क्रियाम् ॥ ३ ॥
श्रीकृष्णने रोहिणी नक्षत्रमें श्रेष्ठ शनिवारको उत्तम ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर, विपुल पुण्याहघोषके साथ दुर्गनिर्माणका कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ३ ॥
ततः पङ्कजपत्राक्षो यादवान् केशिसूदनः ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो देवान् वृत्ररिपुर्यथा ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ केशिहन्ता कमलनयन श्रीकृष्णने जैसे वृत्रासुरके वैरी इन्द्र देवताओंसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार यादवोंसे कहा—॥ ४ ॥
कल्पितेयं मया भूमिः पश्यध्वं देवसद्मवत् ।
नाम चास्याः कृतं पुर्याः ख्यातिं यदुपयास्यति ॥ ५ ॥
'यादवो ! मैंने देवसदनके समान इस भूमिका निर्माण कर लिया है । आप सब लोग देखें । मैंने इसका नाम भी निश्चित कर लिया है, जिससे इसकी ख्याति होगी ॥ ५ ॥