भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 458

४३६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


राजा मुचुकुन्दके तेज तथा देवताओंसे उन्हें मिले हुए वरदानकी सारी बातें देवर्षि नारदने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बतायी थीं ॥ ४८ ॥

कृष्णोऽनुगम्यमानश्च तेन म्लेच्छेन शत्रुणा ।
तां गुहां मुचुकुन्दस्य प्रविवेश विनीतवत् ॥ ४९ ॥

उस म्लेच्छजातीय शत्रुके द्वारा पीछा किये जाते हुए श्रीकृष्णने मुचुकुन्दकी उस गुफामें एक विनीत-पुरुषकी भाँति प्रवेश किया ॥ ४९ ॥

शिरःस्थाने तु राजर्षेर्मुचुकुन्दस्य केशवः ।
संदर्शनपथं त्यक्त्वा तस्थौ बुद्धिमतां वरः ॥ ५० ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजर्षि मुचुकुन्दके सिरहानेकी ओर उनके दृष्टिपथको त्यागकर (अर्थात् जहाँसे उन्हें दिखायी न दे सकें—ऐसे स्थानपर) खड़े हो गये ॥ ५० ॥

अनुप्रविश्य यवनो ददर्श पृथिवीपतिम् ।
स तं सुप्तं कृतान्ताभमाससाद सुदुर्मतिः ॥ ५१ ॥

उनके पीछे-पीछे उस कालयवनने भी गुफामें प्रवेश करके सोये हुए राजा मुचुकुन्दको देखा। वह दुर्बुद्धि अपने लिये कालके समान उन नरेशके पास स्वयं ही जा पहुँचा ॥ ५१ ॥

वासुदेवं तु तं मत्वा घट्टयामास पार्थिवम् ।
पादेनात्मविनाशाय शलभः पावकं यथा ॥ ५२ ॥

जैसे पतंगा अपने ही विनाशके लिये आगमें कूद पड़ता है, उसी प्रकार कालयवनने मुचुकुन्दको श्रीकृष्ण समझकर उन्हें अपने विनाशके लिये ही लातसे मारा ॥ ५२ ॥

मुचुकुन्दस्तु राजर्षिः पादस्पर्शप्रबोधितः ।
निद्राच्छेदेन चुक्रोध पादस्पर्शेन तेन च ॥ ५३ ॥

राजर्षि मुचुकुन्द उसके पैरोंकी ठोकर लगनेसे जाग उठे। एक तो उनकी निद्रा भङ्ग हुई थी और दूसरे उस यवनने उन्हें पैरसे छू दिया था; इससे वे कुपित हो उठे ॥ ५३ ॥

संस्मृत्य स वरं शक्रादवैक्षत तमग्रतः ।
स दृष्टमात्रः क्रोधेन सम्प्रजज्वाल सर्वशः ॥ ५४ ॥

फिर इन्द्रसे मिले हुए वरका स्मरण करके उन्होंने सामने खड़े हुए कालयवनकी ओर देखा। उनके क्रोधपूर्वक देखते ही वह सब ओरसे आगमें जलने लगा ॥ ५४ ॥

ददाह पावकस्तं तु शुष्कं वृक्षमिवाशनिः ।
क्षणेन कालयवनं नेत्रतेजोविनिर्गतः ॥ ५५ ॥

जैसे वज्र सूखे वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार मुचुकुन्दके नेत्रोंके तेजसे प्रकट हुई उस अग्निने कालयवनको क्षणभरमें ही जलाकर भस्म कर दिया ॥ ५५ ॥

तं वासुदेवः श्रीमन्तं चिरसुप्तं नराधिपम् ।
कृतकार्योऽब्रवीद् धीमानिदं वचनमुत्तमम् ॥ ५६ ॥

बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णका अभीष्ट कार्य सिद्ध हो गया। वे चिरकालसे सोये हुए उन तेजस्वी राजा मुचुकुन्दसे यह उत्तम वचन बोले— ॥ ५६ ॥

गञ्भीरप्रसुप्तोऽसि कथितो नारदेन मे ।
कृतं मे सुमहत्कार्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥ ५७ ॥

'राजन्! आप दीर्घकालसे यहाँ सो रहे थे। मुझे नारदजीने आपके विषयमें बताया था। आपने मेरा महान् कार्य सिद्ध कर दिया। आपका कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥

वासुदेवमुपालक्ष्य राजा ह्रस्वं प्रमाणतः ।
परिपृक्तं युगं मेने कालेन महता तदा ॥ ५८ ॥

राजा मुचुकुन्दने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको कदमें छोटा देखकर यह समझ लिया कि दीर्घकाल व्यतीत होनेसे युग बदल गया ॥ ५८ ॥

उवाच राजा गोविन्दं को भवान् किमिहागतः ।
कश्च कालः प्रसुप्तस्य यदि जानासि कथ्यताम् ॥ ५९ ॥

राजाने गोविन्दसे पूछा—'आप कौन हैं? और किसलिये यहाँ आये हैं? मेरे सोते-सोते कितना समय व्यतीत हो गया? यदि जानते हों तो बताइये' ॥ ५९ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

सोमवंशोद्भवो राजा ययातिर्नाम नाहुषः ।
तस्य पुत्रो यदुर्ज्येष्ठश्चत्वारोऽन्ये यवीयसः ॥ ६० ॥

श्रीकृष्णने कहा—राजन्! चन्द्रवंशमें नहुषके पुत्र राजा ययाति हो गये हैं। उनके ज्येष्ठ पुत्र यदु थे। यदुके चार छोटे भाई और थे ॥ ६० ॥

यदुवंशात् समुत्पन्नं वसुदेवात्मजं विभो ।
वासुदेवं विजानीहि नृपते मामिहागतम् ॥ ६१ ॥

विभो! नरेश्वर! आपको विदित हो कि मैं यदुवंशमें उत्पन्न हुआ हूँ। वसुदेवका पुत्र हूँ, अतएव लोग मुझे वासुदेव कहते हैं। मैं वासुदेव ही यहाँ आया हूँ ॥ ६१ ॥

त्रेतायुगे प्रसुप्तोऽसि विदितो मेऽसि नारदात् ।
इदं कलियुगं विद्धि किमन्यत् करवाणि ते ॥ ६२ ॥

आप त्रेतायुगमें सोये थे। मुझे आपके विषयमें नारदजीसे सब बातें ज्ञात हुई हैं। इस समय द्वापर और कलियुगकी संधिका काल समझिये। इसके सिवा आपकी क्या सेवा करूँ ॥

मम शत्रुस्त्वया दग्धो देवदत्तवरो नृप ।
अवध्यो यो मया संख्ये भवेद् वर्षशतैरपि ॥ ६३ ॥

नरेश्वर! तुमने मेरे उस शत्रुको जलाकर भस्म किया है, जिसे देवताओंसे वरदान प्राप्त था और जो युद्धमें मेरे द्वारा सौ वर्षोंमें भी नहीं मारा जा सकता था ॥ ६३ ॥

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