विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४३५
ततः कुम्भे महासर्पं भिन्नाञ्जनचयोपमम् ॥ ३२ ॥
घोरमाशीविषं कृष्णं कृष्णः प्राक्षेपयत् तदा ।
ततस्तं मुद्रयित्वा तु स्वेन दूतेन हारयत् ॥ ३३ ॥
'श्रीकृष्णने उस समय खानसे काटकर निकाले गये कोयलेके ढेरके समान काले, भयंकर, विषधर महासर्पको एक घड़ेमें रखवाया और उसका मुँह बंद करके उस घड़ेको अपने दूतके द्वारा उसके पास पहुँचावा दिया ॥ ३२-३३ ॥
निदर्शनार्थं गोविन्दो भीषयामास तं नृपम् ।
स दूतः कालयवने दर्शयामास तं घटम् ॥ ३४ ॥
कालसर्पोपमः कृष्ण इत्युक्त्वा भरतर्षभ ।
'गोविन्दने दृष्टान्तके लिये वह सर्प भेजकर उस राजाको डरानेकी चेष्टा की थी। भरतश्रेष्ठ ! उस दूतने कालयवनसे यह कहकर कि श्रीकृष्ण काले सर्पके समान भयंकर हैं, उसे वह घड़ा दिखलाया ॥ ३४ १/२ ॥
तत्कालयवनो बुद्ध्वा त्रासनं यादवैः कृतम् ॥ ३५ ॥
पिपीलिकानां चण्डानां पूरयामास तं घटम् ।
'कालयवनने यह समझकर कि यादवोंने मुझे डरानेका प्रयत्न किया है, उस घड़ेमें बहुत-से रोषभरे चींटोंको भर दिया ॥ ३५ १/२ ॥
स सर्पो बहुभिस्तीक्ष्णैः सर्वतस्तैः पिपीलिकैः ।
भक्ष्यमाणः किलाङ्गेषु भस्मीभूतोऽभवत् तदा ॥ ३६ ॥
'उन बहुसंख्यक तीखे चींटोंने सब ओरसे उस सर्पके शरीरको काटना शुरू किया, जिससे वह काला सर्प तत्काल कालके गालमें चला गया ॥ ३६ ॥
तं मुद्रयित्वा तु घटं तथैव यवनाधिपः ।
प्रेषयामास कृष्णाय बाहुल्यमुपवर्णयन् ॥ ३७ ॥
'फिर उस घड़ेको उसी तरह बंद करके यवनराजने अपनी सैनिक-शक्तिकी बहुलताका वर्णन करते हुए श्रीकृष्णके पास भेज दिया ॥ ३७ ॥
वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा योगं विहतमात्मनः ।
उत्सृज्य मथुरामाशु द्वारकामभिजग्मिवान् ॥ ३८ ॥
'भगवान् श्रीकृष्णने अपने उस प्रयोगको विफल हुआ देख तुरंत ही मथुरा छोड़कर द्वारकाको प्रस्थान कर दिया' ॥
वैरस्यान्तं विधित्संस्तु वासुदेवो महायशाः ।
निवेश्य द्वारकां राजन् वृष्णीनाश्वास्य चैव ह ॥ ३९ ॥
राजन् ! महायशस्वी वासुदेवने उस वैरका अन्त कर डालनेकी इच्छासे द्वारकापुरी बसाकर वृष्णिवंशियोंको आश्वासन दे ( पुनः वहाँसे मथुराको प्रस्थान किया ) ॥ ३९ ॥
पदातिः पुरुषव्याघ्रो बाहुप्रहरणस्तदा ।
आजगाम महावीर्यो मथुरां मधुसूदनः ॥ ४० ॥
महापराक्रमी पुरुषसिंह मधुसूदन केवल भुजाओंको ही आयुधरूपमें साथ ले पैदल ही मथुरामें आये ॥ ४० ॥
तं दृष्ट्वा निर्ययौ हृष्टः स कालयवनो रुषा ।
प्रेक्षापूर्वं च कृष्णोऽपि निष्प्रकर्ष महाबलः ॥ ४१ ॥
उन्हें देखकर हर्ष और रोषसे भरा हुआ कालयवन निकला । इधर महाबली श्रीकृष्ण भी अपने-आपको दिखाकर भागते हुए उसे भी अपने पीछे खींच ले चले ॥ ४१ ॥
अथान्वगच्छद् गोविन्दं जिघृक्षुर्यवनेश्वरः ।
न चैनमशकद् राजा ग्रहीतुं योगधर्मिणम् ॥ ४२ ॥
यवनेश्वर राजा कालयवन गोविन्दको पकड़ लेनेकी इच्छासे उनके पीछे-पीछे चला; परंतु इन योगधर्मी श्रीकृष्णको वह पकड़ न सका !। ४२ ॥
मान्धातुस्तु सुतो राजा मुचुकुन्दो महायशाः ।
पुरा देवासुरे युद्धे कृतकर्मा महाबलः ॥ ४३ ॥
प्राचीन कालमें जब देवासुर-संग्राम हुआ था, उस समय मान्धाताके पुत्र महायशस्वी, महाबली राजा मुचुकुन्दने देवताओंकी ओरसे युद्ध करके उसमें सफलता प्राप्त की थी ॥
वरेण च्छन्दितो देवैर्निद्रामेव गृहीतवान् ।
श्रान्तस्य तस्य वागेवं तदा प्रादुरभूत् किल ॥ ४४ ॥
देवताओंग्रने उनसे वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उन्होंने निद्राको ही वरके रूपमें ग्रहण किया । युद्धसे थके होनेके कारण उस समय उनके मुँहसे निम्नाङ्कित वाणी प्रकट हुई -॥ ४४ ॥
प्रसुप्तं बोधयेद् यो मां तं दहेयमहं सुराः ।
चक्षुषा क्रोधदीप्तेन एवमाह पुनः पुनः ॥ ४५ ॥
'देवताओ ! जो मुझे सोतेसे जगा दे, उसे मैं क्रोधसे प्रज्वलित हुई दृष्टिके द्वारा जलाकर भस्म कर दूँ' ऐसा उन्होंने बारंबार कहा ॥ ४५ ॥
एवमस्त्विति तं शक्र उवाच त्रिदशैः सह ।
स सुरैरभ्यनुज्ञातो ह्यद्रिराजमुपागमत् ॥ ४६ ॥
तब देवताओं सहित इन्द्रने उनसे कहा 'एवमस्तु' ( ऐसा ही हो )। इस प्रकार देवताओंसे आज्ञा लेकर वे गिरिराजके पास आये ॥ ४६ ॥
स पर्वतगुहां कांचिन् प्रविश्य श्रमकर्शितः ।
सुष्वाप कालमेतं वै यावत्कृष्णस्य दर्शनम् ॥ ४७ ॥
श्रमसे थके हुए राजाने पर्वतकी किसी गुफामें प्रवेश करके उस समयतक शयन किया, जबतक कि उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन नहीं हुआ था ॥ ४७ ॥
तत्सर्वं वासुदेवाय नारदेन निवेदितम् ।
वरदानं च देवेभ्यस्तेजस्तस्य च भूपतेः ॥ ४८ ॥