विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अपुत्रस्याथ राज्ञस्तु ववृधेऽन्तःपुरे शिशुः । तस्मिन्नुपरते राजन् स कालयवनो नृपः ॥ १६ ॥
राजन् ! उस शिशुका उस पुत्रहीन राजाके अन्तःपुरमें लालन-पालन एवं संवर्धन होने लगा । उस राजाकी मृत्यु होनेके पश्चात् कालयवन ही उसके राज्यका अधिपति हुआ ॥
युद्धाभिकामो नृपतिः पर्यपृच्छद् द्विजोत्तमान् । वृष्ण्यन्धककुलं तस्य नारदेन निवेदितम् ॥ १७ ॥
राजा कालयवन युद्धकी अभिलाषा रखकर श्रेष्ठ द्विजोंसे पूछने लगा कि ‘सबसे बड़े वीर कौन हैं और कहाँ रहते हैं ?’ तब देवर्षि नारदने उसे वृष्णि और अन्धकवंशका परिचय दिया ॥ १७ ॥
ज्ञात्वा तु वरदानं तन्नारदान्मधुसूदनः । उपप्रैक्षत तेजस्वी वर्द्धन्तं यवनेषु तम् ॥ १८ ॥
नारदजीसे उसको मिले हुए वरदानका समाचार जानकर भी तेजस्वी मधुसूदनने यवनोंके यहाँ पलते हुए उस कालयवनकी उपेक्षा कर दी ॥ १८ ॥
समृद्धो हि यदा राजा यवनानां महाबलः । तत एवं नृपा म्लेच्छाः संश्रित्यानुययुस्तदा ॥ १९ ॥
जब यवनोंका राजा महाबली कालयवन समृद्धिशाली हुआ, तब दूसरे म्लेच्छ नरेश उसकी शरण लेकर उसीका अनुसरण करने लगे ॥ १९ ॥
शकास्तुषारा दरदाः पारदाः शृङ्गलाः खसाः । पह्लवाः शतशश्चान्ये म्लेच्छा हैमवतास्तथा ॥ २० ॥
शक, तुषार, दरद, पारद, शृङ्गल, खस, पह्लव तथा दूसरे-दूसरे सैकड़ों हिमालय-निवासी म्लेच्छ उसके साथ हो गये ॥ २० ॥
स तैः परिवृतो राजा दस्युभिः शलभैरिव । नानावेषायुधैर्भीमैर्मथुराभ्यवर्त्तत ॥ २१ ॥
शलभोंके समान उन अगणित लुटेरोंसे, जो नाना प्रकारके वेश और आयुध धारण करनेके कारण बड़े भयंकर प्रतीत होते थे, घिरा हुआ राजा कालयवन मथुरापर चढ़ आया ॥
गजवाजिखरोष्ट्राणामयुतैरर्बुदैरपि । पृथिवीं कम्पयामास सैन्येन महता वृतः ॥ २२ ॥ रेणुना सूर्यमार्गं तु समवच्छाद्य पार्थिवः । मूत्रेण शकृता चैव सैन्येन ससृजे नदीम् ॥ २३ ॥
उसके साथ हाथी, घोड़े, गदहे और ऊँट हजारों, लाखों तथा करोड़ोंकी संख्यामें विद्यमान थे । वह उस विशाल सेनासे घिरकर इस पृथ्वीको कम्पित कर रहा था । उस राजाने सेनाद्वारा उठी हुई धूलसे सूर्यके मार्गको आच्छादित कर दिया और सैनिकोंके मल-मूत्रसे नूतन नदीकी सृष्टि कर दी ॥
अश्वोष्ट्रशकृतां राशेर्निःस्स्रुतेति जनाधिप । ततोऽश्वशकृदित्येवं नाम नद्या बभूव ह ॥ २४ ॥
जनेश्वर ! घोड़ों और ऊँटोंकी लीदोंके ढेरसे वह नदी प्रकट हुई थी, इसलिये उसका नाम ‘अश्वशकृत्’ हो गया ॥ २४ ॥
तत्सैन्यं महदायाद् वै श्रुत्वा वृष्ण्यन्धकाग्रणीः । वसुदेवः समानाय्य ज्ञातीनिदमुवाच ह ॥ २५ ॥
उसकी विशाल सेनाके आगमनका समाचार सुनकर वृष्णि और अन्धक-कुलके अगुआ वसुदेवजी सब जाति-भाइयोंको एकत्र करके उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २५ ॥
इदं समुत्थितं घोरं वृष्ण्यन्धकभयं महत् । अवध्यश्चापि नः शत्रुर्वरदानात् पिनाकिनः ॥ २६ ॥
‘बन्धुओ ! यह वृष्णि और अन्धक-कुलके लिये महान् एवं घोर संकट उठ खड़ा हुआ है । पिनाकपाणि भगवान् शंकरके वरदानसे हमारा शत्रु अवध्य है ॥ २६ ॥
सामादयोऽभ्युपायाश्च विहितास्तस्य सर्वशः । मत्तो मदबलाभ्यां तु युद्धमेव चिकीर्षति ॥ २७ ॥
‘उसे शान्त करनेके लिये हमने साम आदि उपायोंका भी सर्वथा प्रयोग किया है, परंतु वह मद और बलसे उन्मत्त होनेके कारण केवल युद्ध करनेकी ही इच्छा प्रकट करता है ॥
एतावानिह वासश्च कथितो नारदेन मे । एतावति च वक्तव्यं सामैव परमं मतम् ॥ २८ ॥
‘नारदजीने इतने ही समयतक हमलोगोंका यहाँ निवास बतलाया था । ऐसे शक्ति-साधन सम्पन्न शत्रुके प्रति सान्त्वना-पूर्ण वचन कहना ही परम उत्तम माना गया है ॥ २८ ॥
जरासंधश्च नो राजा नित्यमेव न मृष्यते । तथान्ये पृथिवीपाला वृष्णिचक्रप्रतापिताः ॥ २९ ॥ केचित् कंसवधाच्चापि विरक्तास्तद्गता नृपाः । समाश्रित्य जरासंधमस्मानिच्छन्ति बाधितुम् ॥ ३० ॥
‘राजा जरासंध हमलोगोंको कभी क्षमा नहीं करता है—हमारे प्रति सदा अमर्षसे ही भरा रहता है तथा दूसरे भूपाल जो वृष्णिमण्डलसे सताये गये हैं एवं कुछ नरेश, जो कंस-वधके कारण हमलोगोंसे विरक्त हो गये हैं, वे सब-के-सब जरासंधसे मिल गये हैं और उसीका आश्रय लेकर हमलोगोंको बाधा पहुँचाना चाहते हैं ॥ २९-३० ॥
बहवो ज्ञातयश्चैव यदूनां निहता नृपैः । वर्द्धितुं नैव शक्याम पुरेऽस्मिन्निति केशवः ॥ ३१ ॥ अपयाने मतिं कृत्वा दूतं तस्मै ससर्ज ह ।
‘उन राजाओंने यदुकुलके बहुत-से भाई-बन्धुओंको मार डाला है । हमलोग यहाँ रहकर फल-फूल नहीं सकेंगे, यही सोचकर श्रीकृष्णने यहाँसे हट जानेका विचार करके उसके पास एक दूत भेजा था ॥ ३१ ½ ॥