भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 455

विष्णुपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका वध

जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महात्मनः।
चरितं वासुदेवस्य यदुश्रेष्ठस्य धीमतः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— भगवन्! मैं बुद्धिमान् यदुश्रेष्ठ महात्मा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

किमर्थं च परित्यज्य मथुरां मधुसूदनः।
मध्यदेशस्य ककुदं धाम लक्ष्म्याश्च केवलम् ॥ २ ॥
शृङ्गं पृथिव्याः स्वालक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्।
आर्याह्वयजलभूयिष्ठमधिष्ठानवरोत्तमम् ॥ ३ ॥
अयुद्धेनैव दाशार्हस्त्यक्तवान् द्विजसत्तम।
स कालयवनश्चापि कृष्णे किं प्रत्यपद्यत ॥ ४ ॥

भगवान् मधुसूदन किसलिये मथुरा छोड़कर चले गये? वह तो मध्यदेशका ककुद (सर्वोत्तम स्थान), लक्ष्मीका अद्वितीय धाम, पृथ्वीका शृङ्ग, सुन्दर, दर्शनीय, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, आर्योंका निवासस्थान, जलकी अधिकतासे सुशोभित तथा सभी अधिष्ठानोंमें सबसे उत्तम है। द्विजश्रेष्ठ! दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने बिना युद्धके ही उसे क्यों छोड़ दिया? तथा कालयवनने भी श्रीकृष्णके साथ क्या बर्ताव किया? ॥ २-४ ॥

द्वारकां च समासाद्य वारिदुर्गां जनार्दनः।
किं चकार महाबाहुर्महायोगी महातपाः ॥ ५ ॥

महाबाहु, महायोगी और महातपस्वी भगवान् जनार्दनने जलरूपी दुर्गसे घिरी हुई द्वारकामें जाकर क्या किया? ॥ ५ ॥

किंवीर्यः कालयवनः केन जातश्च वीर्यवान्।
यमसहां समालक्ष्य व्यपयातो जनार्दनः ॥ ६ ॥

कालयवनका पराक्रम कैसा था? किसने उस बलशाली वीरको जन्म दिया था, जिसे असह्य समझकर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकासे हट गये थे? ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच
वृष्णीनामन्धकानां च गुरुर्गार्ग्यो महामनाः।
ब्रह्मचारी पुरा भूत्वान स्म दारान् स विन्दति ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! वृष्णि और अन्धक वंशी यादवोंके गुरु (पुरोहित) महामना गार्ग्यमुनि पहले नियमपूर्वक ब्रह्मचारी रहकर किसी साधनामें लगे हुए थे। वे उन दिनों स्त्री-संसर्गसे दूर रहते थे ॥ ७ ॥

तथा हि वर्तमानं तमूर्ध्वरेतसमव्ययम्।
श्यालोऽभिशस्तवान् गार्ग्यमपुमानिति राजनि ॥ ८ ॥

विकाररहित ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारीके रूपमें रहते हुए उन गार्ग्य-मुनिपर उन्हींके सालेने राजसभामें नपुंसक होनेका कलङ्क लगाया॥

सोऽभिशस्तस्तदा राजन् नगरे त्वजितं जये।
अलिप्संस्तु स्त्रियं चैव तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ ९ ॥

राजन्! जिन्होंने अजित परमात्माको भी जीत लिया था, उस नगरमें इस प्रकार कलङ्कित होनेपर उन्होंने स्त्रीकी इच्छा तो नहीं की, परंतु क्रोधपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ कर दी ॥ ९ ॥

ततो द्वादशवर्षाणि सोऽयश्चूर्णमभक्षयत्।
आराधयन् महादेवमचिन्त्यं शूलपाणिनम् ॥ १० ॥

वे गार्ग्यमुनि अचिन्त्यस्वरूप शूलपाणि महादेवजीकी आराधना करते हुए बारह वर्षोंतक केवल लोहेका चूर्ण खाकर रहे ॥ १० ॥

रुद्रस्तस्मै वरं प्रादात् समर्थं युधि निग्रहे।
वृष्णीनामन्धकानां च सर्वतेजोमयं सुतम् ॥ ११ ॥

तब भगवान् रुद्रने उन्हें वरके रूपमे पूर्ण तेजस्वी पुत्र प्रदान किया, जो युद्धमें वृष्णि और अन्धक-वंशके वीरोंका भी निग्रह करनेमें समर्थ था ॥ ११ ॥

ततः शुश्राव तं राजा यवनाधिपतिर्वरम्।
पुत्रप्रसवजं दैवात्पुत्रः पुत्रकामिता ॥ १२ ॥

इसी समय यवनोंके अधिपति एक राजाने उस पुत्र-प्रदान करनेवाले वरका वृत्तान्त सुना। वह दैवयोगसे पुत्रहीन था और पुत्र पानेकी इच्छा रखता था ॥ १२ ॥

स नृपस्तमुपानाय्य सान्त्वयित्वा द्विजोत्तमम्।
तं घोषमध्ये यवनो गोपस्त्रीषु समासृजत् ॥ १३ ॥

उस यवन-नरेशने द्विजश्रेष्ठ गार्ग्यको सान्त्वनापूर्वक घर लाकर ठहराया और किसी गोष्ठके भीतर उन्हें गोपनारियोंके संसर्गमें रखा ॥ १३ ॥

गोपाली त्वप्सरास्तत्र गोपस्त्रीवेषधारिणी।
धारयामास गार्ग्यस्य गर्भं दुर्धरमच्युतम् ॥ १४ ॥

उसी गोष्ठमे गोपाली नामवाली अप्सरा थी, जो गोप-नारीका वेष धारण करके वहाँ रहती थी। उसीने गार्ग्यमुनिके उस दुर्धर एवं अच्युत गर्भको धारण किया ॥ १४ ॥

मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिनः।
स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ १५ ॥

भगवान् शङ्करके वरके प्रभावसे गार्ग्यमुनिकी उस मानवी-रूपधारिणी अप्सरारूपा भार्याके गर्भसे महाबली शूरवीर कालयवनका जन्म हुआ ॥ १५ ॥