भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 462
४५०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'समुद्र ! यदि मेरे प्रति तुम्हारी आदरबुद्धि है तो तुम मेरे कहनेसे बारह योजनतक जलाशयमेंसे अपने स्वरूप (जल) को समेट लो ॥ ३६ ॥

अवकाशे त्वया दत्ते पुरीयं मामकं बलम्।
पर्याप्तविषया रम्या समग्रं विसहिष्यति ॥ ३७॥

'तुम्हारे जगह दे देनेपर यहाँ बननेवाली इस पुरीका प्रदेश पर्याप्त विस्तारको प्राप्त हो जायगा तथा यह रमणीय पुरी मेरे समस्त सैन्यसमूहका भार सहन कर सकेगी' ॥३७॥

ततः कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा नदनदीपतिः ।
स मारुतेन योगेन उत्ससर्ज जलाशयम् ॥ ३८ ॥

उस समय श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर नदों और नदियोंके अधिपति समुद्रने मारुतयोग (वायुके संकोच) द्वारा अपने जलाशयके जलका उपसंहार करके उतनी भूमि छोड़ दी ॥ ३८ ॥

विश्वकर्मा ततः प्रीतः पुर्याः संलक्ष्य वास्तु तत् ।
गोविन्दे चैव सम्मानं कृतवान् सागरस्तदा ॥ ३९ ॥

पुरीका वह विशाल वास्तु देखकर विश्वकर्माको बड़ी प्रसन्नता हुई। समुद्रने उस समय भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया ॥ ३९ ॥

विश्वकर्मा ततः कृष्णमुवाच यदुनन्दनम् ।
अद्यप्रभृति गोविन्द सर्वे समधिरोहत ॥ ४० ॥

तत्पश्चात् विश्वकर्माने यदुनन्दन श्रीकृष्णसे कहा—'गोविन्द ! आप सब लोग आजसे ही इस पुरीमें निवास करनेके लिये तैयार हो जाइये ॥ ४० ॥

मनसा निर्मिता चेयं मया पूः प्रवरा विभो ।
अचिरेणैव कालेन गृहसम्बाधमालिनी ॥ ४१ ॥
भविष्यति पुरी रम्या सुद्वारा प्राप्त्यतोरणा ।
चयाट्टालककेयूरा पृथिव्यां ककुदोपमा ॥ ४२ ॥

'प्रभो ! मैंने मनसे इस श्रेष्ठ पुरीका निर्माण कर लिया है। अब थोड़े ही समयमें यह गृहोंकी पङ्क्तियोंसे अलंकृत रमणीय पुरीके रूपमें प्रकट हो जायगी। इसके दरवाजे बहुत ही सुन्दर होंगे। इसमें सब ओर सुन्दर वन्दनवारें लगी होंगी। टीले, परकोटे और अट्टालिकाएँ इस पुरीको केयूर (भुजबन्द) के समान सुशोभित करेंगे। यह पुरी भूतलपर पृथ्वीकी चोटीके समान मानी जायगी' ॥ ४१-४२ ॥

अन्तःपुरं च कृष्णस्य परिचर्याक्षयं महत् ।
चकार तस्यां पुर्यां वै देशे त्रिदशपूजिते ॥ ४३ ॥

विश्वकर्माने इस पुरीके देवपूजित प्रदेशमें श्रीकृष्णके लिये विशाल अन्तःपुरका निर्माण किया, जिसमें परिचर्या (स्नान आदि) के लिये अलग-अलग घर बने हुए थे ॥

ततः सा निर्मिता कान्ता पुरी द्वारावती तदा ।
मानसेन प्रयत्नेन वैष्णवी विश्वकर्मणा ॥ ४४ ॥

इस प्रकार उस समय विश्वकर्माने मानसिक प्रयत्न (संकल्प) के द्वारा उस कमनीय वैष्णवीपुरी द्वारावतीका निर्माणकार्य सम्पन्न किया ॥ ४४ ॥

विधानविहितद्वारा प्राकारवरशोभिता ।
परिखाचयसंवृत्ता साट्टप्राकारतोरणा ॥ ४५ ॥

उसके द्वार शिल्पशास्त्रकी विधिके अनुसार बनाये गये थे। श्रेष्ठ परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे। खाइयों और टीलोंसे वह पुरी सुरक्षित थी तथा उसमें अट्टालिका, चहारदीवारी और तोरण यथास्थान बने हुए थे ॥ ४५ ॥

कान्तनारीनरगणा वणिग्भिरुपशोभिता ।
नानापण्यगणाकीर्णा खेचरीव च गां गता ॥ ४६ ॥

सुन्दर नर-नारियोंके समुदाय वहाँ बसे हुए थे। व्यापारी वर्गके लोग उसकी शोभा बढ़ाते थे। नाना प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओं और दूकानोंसे वह भरी हुई थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें विचरनेवाली पुरी पृथ्वीपर उतर आयी हो ॥ ४६ ॥

प्रपावापीप्रसन्नोदा उद्यानैरुपशोभिता ।
समन्ततः संवृताङ्गी वनितेवायतेक्षणा ॥ ४७ ॥

उस पुरीके पौंसले और बावड़ियोंमें स्वच्छ जल भरा हुआ था तथा नाना प्रकारके उद्यान उसे सब ओरसे सुशोभित कर रहे थे। इस अवस्थामें वह ढँकी हुई अङ्गोंवाली विशाललोचना वनिताके समान जान पड़ती थी ॥ ४७ ॥

समृद्धचत्वरवत्ती वेश्मोत्तमघनाचिता ।
रथ्याकोटिसहस्राढ्या शुभ्रराजपथोत्तरा ॥ ४८ ॥

उसके चौराहे बड़े समृद्धिशाली थे। उसके ऊँचे-ऊँचे महल बादलोंसे व्याप्त हो रहे थे। उस पुरीमें कोटि सहस्र गलियाँ थीं और उज्ज्वल राजमार्गसे उसकी उत्कृष्ट शोभा हो रही थी ॥ ४८ ॥

भूषयन्ती समुद्रं सा स्वर्गमिन्द्रपुरी यथा ।
पृथिव्यां सर्वरत्नानामेका निचयशालिनी ॥ ४९ ॥

जैसे इन्द्रपुरी स्वर्गकी शोभा बढ़ाती है, उसी प्रकार वह समुद्रकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूतलपर सम्पूर्ण रत्नोंके सञ्चयसे सुशोभित होनेवाली एकमात्र नगरी थी ॥ ४९ ॥

सुराणामपि सुक्षेत्रा सामन्तक्षोभकारिणी ।
अप्रकाशं तदाकाशं प्रासादैरुपकुर्वती ॥ ५० ॥

द्वारकापुरी देवताओंके लिये भी पुण्यक्षेत्र थी। सीमावर्ती नरेशोंके मनमे क्षोभ उत्पन्न करनेवाली थी तथा वह अपने ऊँचे-ऊँचे महलोंके द्वारा आकाशको भी आच्छादित किये देती थी ॥ ५० ॥

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