विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४१
पृथिव्यां पृथुराष्ट्रायां जनौघप्रतिनादिता।
ओघैश्च वारिराजस्य शिशिरीकृतमारुता ॥ ५१ ॥
बहुत-से राष्ट्रोंवाली इस पृथ्वीपर बसी हुई द्वारकापुरी जनसमुदायके कोलाहलसे गूंजती रहती थी और जलके स्वामी समुद्रके प्रवाह एवं उत्ताल तरङ्गोंके कारण वहाँकी वायु सदा शीतल बनी रहती थी ॥ ५१ ॥
अनूपोपवनैः कान्तैः कान्त्या जनमनोहरा।
सतारका द्यौरिव सा द्वारका प्रत्यराजत ॥ ५२ ॥
समुद्रके जलप्राय तटपर लहराते हुए कमनीय उपवनोंके द्वारा बढ़ी हुई अपनी अनुपम कान्तिसे वह द्वारकापुरी मनुष्योंके मनको मोहे लेती थी और नक्षत्रोंसे युक्त आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ ५२ ॥
प्राकारेणार्कवर्णेन शातकौम्भेन संवृता।
हिरण्यप्रतिवर्णैश्च गृहैर्गम्भीरनिःस्वनैः ॥ ५३ ॥
शुभ्रमेघप्रतीकाशैर्द्वारैः सौधैश्च शोभिता।
सूर्यके समान वर्णवाले सुवर्णमय परकोटेसे घिरी हुई वह नगरी गम्भीर घोषवाले स्वर्णनिर्मित भवनों तथा श्वेत बादलोंके सदृश उज्ज्वल द्वारों और अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी ॥ ५३ १/२ ॥
क्वचित् क्वचिदुदग्राग्रैरुपवृत्तमहापथा ॥ ५४ ॥
तामावसत् पुरीं कृष्णः सर्वै यादवनन्दनाः।
अभिप्रेतजनाकीर्णां सोमः खमिव भासयन् ॥ ५५ ॥
कहीं-कहीं बहुत ऊँचे महलोंकी छायासे उसकी विशाल सड़कें आच्छादित हो रही थीं। ऐसी द्वारकापुरीमें श्रीकृष्ण तथा समस्त यादवनन्दन निवास करने लगे। वह पुरी अभीष्टजनोंसे ही भरी-पूरी थी। जैसे चन्द्रमा आकाशको प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५४-५५ ॥
विश्वकर्मा च तां कृत्वा पुरीं शक्रपुरीमिव।
जगाम त्रिदिवं देवो गोविन्देनाभिपूजितः ॥ ५६ ॥
इन्द्रपुरीके समान द्वारकापुरीका निर्माण करके देव विश्वकर्मा भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सम्मानित हो स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ५६ ॥
भूयश्च बुद्धिरभवत् कृष्णस्य विदितात्मनः।
जनानिमान् धनौघैश्च तर्पयेयमहं यदि ॥ ५७ ॥
तत्पश्चात् आत्मज्ञानी भगवान् श्रीकृष्णके मनमें यह विचार उठा कि 'यहाँके लोगोंको यदि मैं धनसे तृप्त कर सकता तो बहुत अच्छा होता' ॥ ५७ ॥
स वैश्रवणसंस्पृष्टं निधीनामुत्तमं निधिम्।
शङ्खमाह्वयतोपेन्द्रो निशि स्वे भवने प्रभुः ॥ ५८ ॥
तब उन भगवान् उपेन्द्रने कुबेरके सम्पर्कमें रहनेवाले निधियोंमें उत्तम निधि शङ्खका रात्रिके समय अपने भवनमें आवाहन किया ॥ ५८ ॥
स शङ्खः केशवाह्नानं ज्ञात्वा हि निधिराट् स्वयम्।
आजगाम समीपं वै तस्य द्वारवतीपतेः ॥ ५९ ॥
'भगवान् श्रीकृष्णने मेरा आह्वान किया है' यह जानकर निधियोंका राजा शङ्ख स्वयं ही द्वारकानाथके समीप आ गया ॥ ५९ ॥
स शङ्खः प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयादवनिं गतः।
कृष्णं विज्ञापयामास यथा वैश्रवणं तथा ॥ ६० ॥
उस शङ्खने विनयपूर्वक हाथ जोड़ धरतीपर माथा टेककर कुबेरके ही समान भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ ६० ॥
भगवन् किं मया कार्यं सुराणां वित्तरक्षिणा।
नियोजय महाबाहो यत् कार्यं यदुनन्दन ॥ ६१ ॥
'भगवन् ! मैं देवताओंका वित्तरक्षक हूँ। महाबाहु यदुनन्दन ! मुझे क्या करना होगा? जो कार्य हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये' ॥ ६१ ॥
तमुवाच हृषीकेशः शङ्खं गुह्यकमुत्तमम्।
जनाः कृशधना येऽस्मिंस्तान् धनेनाभिपूरय ॥ ६२ ॥
तब श्रीकृष्णने उस शङ्ख नामक उत्तम गुह्यकसे कहा— 'इस नगरमें जो निर्धन या अल्प धनवाले मनुष्य हैं, उनको धनसे परिपूर्ण कर दो ॥ ६२ ॥
नेच्छाम्यनशितं द्रष्टुं कृशं मलिनमेव च।
देहीति चैव याचन्तं नगर्यां निर्धनं नरम् ॥ ६३ ॥
'मैं इस नगरीमें किसी भी ऐसे निर्धन मनुष्यको नहीं देखना चाहता, जिसे भोजन न मिलनेके कारण उपवास करना पड़ता हो, जो दुर्बल और मलिन हो तथा 'दीजिये' कहकर किसीके सामने हाथ फैलाता या भीख माँगता हो' ॥ ६३ ॥
वैशम्पायन उवाच
गृहीत्वा शासनं मूर्ध्ना निधिराट् केशवस्य ह।
निधीनाज्ञापयामास द्वारवत्यां गृहे गृहे ॥ ६४ ॥
धनौघैरभिवर्षध्वं चक्रुः सर्वे तथा च ते।
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा शिरोधार्य करके निधियोंके राजा शङ्खने समस्त निधियोंको आदेश दिया--'तुमलोग द्वारकामें घर-घर जाकर धनराशिकी वर्षा करो।' उन सब निधियोंने वैसा ही किया॥ ६४ १/२ ॥
नाधनो विद्यते तत्र क्षीणभाग्योऽपि वा नरः ॥ ६५ ॥
कुणी वा मलिनो वापि द्वारवत्यां कथञ्चन।
द्वारवत्यां पुरि पुरा केशवस्य महात्मनः ॥ ६६ ॥