विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंश |
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इस तरह पूर्वकालमें महात्मा केशवकी पुरी द्वारकामें कोई मनुष्य किसी तरह भी निर्धन अथवा भाग्यहीन नहीं रह गया। दुर्बल या मलिन भी नहीं रहा ॥ ६५-६६ ॥
चकार वायोरान्हानं भूयश्च पुरुषोत्तमः ।
तत्रस्थ एव भगवान् यादवानां प्रियंकरः ॥ ६७ ॥
तत्पश्चात् यादवोंका प्रिय करनेवाले पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें स्थित होकर ही वायुदेवका आवाहन किया ॥ ६७ ॥
प्राणयोनिस्तु भूतानामुपतस्थे गदाधरम् ।
एकमासीनमेकान्ते देवगुह्यधरं प्रभुम् ॥ ६८ ॥
समस्त भूतोंके प्राणोंकी योनिरूप वायुदेव एकान्तमें अकेले बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णकी, जो देवताओंके गुप्त प्रयोजनको अपने हृदयमें धारण किये हुए थे, सेवामें उपस्थित हुए ॥
किं मया देव कर्तव्यं सर्वगेनाशुगामिना ।
यथैव दूतो देवानां तथैवास्मि तवानघ ॥ ६९ ॥
और बोले—'देव ! मैं शीघ्रगामी तथा सर्वग (सर्वत्र पहुँचनेमें समर्थ) हूँ। मुझे आपकी कौन-सी सेवा करनी है ? अनघ ! मैं जैसे देवताओंका दूत हूँ, उसी तरह आपका भी हूँ' ॥
तमुवाच ततः कृष्णो रहस्यं पुरुषो हरिः ।
मारुतं जगतः प्राणं रूपिणं समुपस्थितम् ॥ ७० ॥
जगत्के प्राण-स्वरूप वायुदेव मूर्तिमान् होकर सेवामें उपस्थित हैं, यह देख अन्तर्यामी, पापहारी भगवान् श्रीकृष्ण उनसे रहस्यभरी बात बोले—॥ ७० ॥
गच्छ मारुत देवेशमनुमान्य सहामरैः ।
सभां सुधर्मामादाय देवेभ्यस्त्वमिहानय ॥ ७१ ॥
'मारुत ! जाओ, देवताओंसहित देवराज इन्द्रका आदर करके उनकी अनुमति ले देवताओंके यहाँसे सुधर्मानामक सभाको यहाँ उठा ले आओ ॥ ७१ ॥
यादवा धार्मिका ह्येते विक्रान्ताश्च सहस्रशः ।
तस्यां विशेयुरेते वै न तु या कृत्रिमा भवेत् ॥ ७२ ॥
'ये सहस्रों धर्मात्मा तथा पराक्रमी यादव उसी सभामें बैठें, जो कृत्रिम (क्षणभंगुर) न हो ॥ ७२ ॥
या ह्यक्षया सभा रम्या कामगा कामरूपिणी ।
सा यादून् धारयेत् सर्वान् यथैव त्रिदशांस्तथा ॥ ७३ ॥
'जो सभा अक्षय, रमणीय, इच्छानुसार सर्वत्र चल सकनेवाली तथा सभासदोंकी इच्छाके अनुरूप स्वरूप धारण करनेवाली है, वह सुधर्मा सभा अपने भीतर इन समस्त यदुवंशियोंको धारण करे, ठीक उसी तरह जैसे वह देवताओंको धारण करती है' ॥ ७३ ॥
संगृह्य वचनं तस्य कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः ।
वायुरारत्मोपमगतिर्जगाम त्रिदिवहालयम् ॥ ७४ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णका संदेश लेकर अपने ही समान गतिवाले वायुदेव स्वर्गलोकमें गये ॥
सोऽनुमान्य सुरान् सर्वान् कृष्णवाक्यं निवेद्य च ।
सभां सुधर्मामादाय पुनरायान्महीतलंम् ॥ ७५ ॥
उन्होंने समस्त देवताओंको आदरपूर्वक श्रीकृष्णका वचन सुनाया और उनकी अनुमतिसे सुधर्मा सभाको लेकर वे पुनः भूतलपर आये ॥ ७५ ॥
सुधर्माय सुधर्मां तां कृष्णयाक्लिष्टकारिणे ।
देवो देवसभां दत्त्वा वायुरन्तरधीयत ॥ ७६ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले सुधर्मात्मा श्रीकृष्णको वह सुधर्मा नामक देवसभा देकर वायुदेव अन्तर्धान हो गये ॥
द्वारवत्यास्तु सा मध्ये केशवेन निवेशिता ।
सुधर्मा यदुमुख्यानां देवानां त्रिदिवे यथा ॥ ७७ ॥
श्रीकृष्णने द्वारकापुरीके मध्यभागमें उस सुधर्मा सभाको स्थापित किया। जैसे स्वर्गमें देवताओंकी सभा है, उसी प्रकार भूतलपर वह प्रमुख यादवोंकी सभा हुई ॥ ७७ ॥
एवं दिव्यैश्च भोगैश्च जलजैश्चाप्ययो हरिः ।
द्रव्यैरलंकरोति स्म पुरीं तां प्रमदामिव ॥ ७८ ॥
इस प्रकार अविनाशी श्रीहरि दिव्य भोगों तथा समुद्रके जलसे प्रकट हुए द्रव्यों (रत्नों) से अपनी पुरीको युवती स्त्रीकी भाँति अलंकृत करते थे ॥ ७८ ॥
मर्यादाश्चैव संचक्रे श्रेणीश्च प्रकृतीस्तथा ।
बलाध्यक्षांश्च युक्तांश्च प्रकृतीशांस्तथैव च ॥ ७९ ॥
उन्होंने सबके लिये धर्मकी मर्यादाएँ बाँध दीं। व्यापारियों, प्रजाजनों, सेनापतियों तथा प्रजावर्गके शासकोंके लिये भी समुचित मर्यादाएँ स्थापित कर दीं ॥ ७९ ॥
उग्रसेनं नरपतिं काश्यं चापि पुरोहितम् ।
सेनापतिमनाधृष्टिं विकद्रुं मन्त्रिपुङ्गवम् ॥ ८० ॥
उग्रसेनको द्वारकाका राजा बनाया, काशीके विद्वान् सान्दीपनि मुनिको पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित किया। अनाधृष्टिको सेनापति तथा विकद्रुको प्रधान मन्त्री बनाया।
यादवानां कुलकरान् स्थविरान् दश तत्र वै ।
मतिमान् स्थापयामास सर्वकार्येष्वनन्तरान् ॥ ८१ ॥
बुद्धिमान् श्रीकृष्णने यादवोंके वंशधर दस बड़े-बूढ़े पुरुषोंको* सभी कार्योंमें सलाह देनेके लिये अवान्तर मन्त्रीके पदपर स्थापित किया था ॥ ८१ ॥
* दस बड़े-बूढ़े पुरुषोंके नाम ये हैं—
उद्धव, वसुदेव, कङ्क, विपृथु, श्वफल्क, चित्रक, गद, सत्यक, बलभद्र और पृथु।