विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४३० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ॥१२२॥
श्रूयतां वचनं त्वाद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ।
‘श्रीकृष्ण ! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! शत्रुसूदन ! आज मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो ॥ १२२॥
त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ॥१२३॥
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ।
‘जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं सुखसे नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार तुमसे बिछुड़कर हम समस्त यादव इस नगर या राज्य-में सुखसे नहीं रह सकते हैं ॥ १२३½ ॥
त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ॥१२४॥
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ।
‘दूसरोंको मान देनेवाले तात ! हम तुमसे सनाथ होकर तुम्हारे बाहुबलका आश्रय ले नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ १२४½ ॥
विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ॥१२५॥
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ।
‘यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ जाओ, वहाँ हम सबको साथ लिये चलो’ ॥ १२५½ ॥
तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ॥१२६॥
यथैवं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥१२७॥
राजा उग्रसेनकी यह बात सुनकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर बोले—‘राजन् ! आज आपकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥१२६-१२७॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णस्य मधुरागमनमहोत्सवो
द्वारवतीप्रयाणसंकेतो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका मथुरा-गमनमहोत्सव तथा उनके द्वारका जानेका संकेतनामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी आज्ञासे यादवोंका द्वारकापुरीको प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य सभ्यांस्तान् यदुसंसदि ।
बभाषे पुण्डरीकाक्षो हेतुमद्वाक्यमुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, किसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंकी सभामें बैठे हुए समस्त सभासदोंसे यह हेतुयुक्त उत्तम वचन कहा—॥ १ ॥
यादवानामिदं भूमेर्मथुरा राष्ट्रमालिनी ।
वयं चैवेह सम्भूता व्रजे च परिवर्द्धिताः ॥ २ ॥
‘यह राष्ट्रकी मालासे अलंकृत (समूचे राष्ट्रको मालाकी भाँति धारण करनेवाली राजधानी) मथुरापुरी यादवोंकी भूमि है। हम भी यहीं पैदा हुए हैं और इसीके व्रजमें पलकर बड़े हुए हैं ॥ २ ॥
तदिदानीं गतं दुःखं शत्रवश्च पराजिताः ।
नृपेषु जनितं वैरं जरासंधेन विग्रहः ॥ ३ ॥
‘इस समय हमारा सारा दुःख दूर हो गया है। हमारे शत्रु भी हमसे हार मान चुके हैं। हमने राजाओंसे वैर मोल ले लिया और जरासंधसे लड़ाई छेड़ दी है ॥ ३ ॥
वाहनानि च नः सन्ति पादातं चाप्यनन्तरम् ।
रत्नानि च विचित्राणि मित्राणि च बहूनि च ॥ ४ ॥
‘हमारे पास पर्याप्त वाहन हैं। पैदलोंकी संख्या भी अनन्त है। हमारे खजानेमें विचित्र रत्न हैं तथा हमारे मित्रोंकी संख्या भी बहुत है ॥ ४ ॥
इयं च माथुरी भूमिरल्पा गम्या परस्य तु ।
वृद्धिश्चैव परास्माकं बलतो मित्रतस्तथा ॥ ५ ॥
‘परंतु यह मथुराकी भूमि बहुत छोटी है और शत्रुको सुगमतापूर्वक इसमें प्रवेश हो जाता है। इधर हमारे सैनिकों और मित्रोंकी बहुत अधिक वृद्धि हुई है ॥ ५ ॥
कुमारकोट्यो याश्चेमाः पदातीनां गणाश्च ये ।
एषामपीह वसतां सम्मर्दमुपलक्षये ॥ ६ ॥
‘हमारे पास जो ये एक करोड़ कुमार (अविवाहित)