भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

[विष्णुपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१


सैनिक हैं तथा ये जो पैदलोंके बहुत-से दल हैं, इनके भी यहीं रहनेसे यहाँ बड़ी भीड़-भाड़ दिखायी देती है ॥ ६ ॥

अत्र नो रोचते मह्यं निवासो यदुपुङ्गवाः ।
पुरीं निवेशयिष्यामि मम तत् क्षन्तुमर्हथ ॥ ७ ॥

'अतः यदुपुङ्गवो ! अब यहाँ निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता है; इसलिये मैं दूसरी पुरी बसाऊँगा । मेरी इस धृष्टताको आपलोग क्षमा करेंगे ॥ ७ ॥

एतद् यदनुरूपं वो ममाभिप्रायजं वचः ।
भवाय भवतां काले यदुक्तं यदुसंसदि ॥ ८ ॥

'इस यादवसभामें मेरे हार्दिक अभिप्रायके अनुसार जो बात कही गयी है, वह समयानुसार आपलोगोंके उद्भवके लिये ही है। यदि आपलोगोंको अनुकूल जँचती हो तो कहिये' ॥ ८ ॥

तमूचुर्यादवाः सर्वे हृष्टेन मनसा तदा ।
साध्यतां यदभिप्रेतं जनस्यास्य भवाय वै ॥ ९ ॥

तब समस्त यादव प्रसन्न मनसे बोल उठे—'प्रभो ! इस यादव समाजके उद्भवके लिये आपको जो अभीष्ट हो, वह कार्य कीजिये' ॥ ९ ॥

ततः सम्मन्त्रयामासुर्वृष्णयो मन्त्रमुत्तमम् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ १० ॥

तब समस्त वृष्णिवंशी मिलकर उत्तम मन्त्रणा करने लगे—'यह जरासंध ( या कालयवन ) हमलोगोंके लिये अवध्य कर दिया गया है। हमारे उस शत्रु का सैनिक बल बहुत बड़ा है ॥ १० ॥

कृतः सैन्यक्षयश्चापि महानिह नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ।
न शक्ष्यामो ह्यतस्तेषामपयानेऽभवन्मतिः ॥ ११ ॥

'हमारे पक्षके नरेशोंने शत्रु की उस सेनाका बड़ा भारी विनाश किया है तो भी उसके पास अभी बहुत-सी सेनाएँ हैं, जिन्हें हमलोग सौ वर्षोंमें भी नहीं मार सकते । अतः हमारा विचार उनसे हट जानेके लिये हो गया है' ॥ ११ ॥

तस्मिंश्चैवान्तरे राजा सकालयवनस्तदा ।
सैन्येन तद्विधेनैव मथुरामभ्युपागमत् ॥ १२ ॥

इसी बीचमें कालयवनसहित राजा जरासंध फिर वैसी ही सेना साथ लेकर मथुरापर चढ़ आया ॥ १२ ॥

ततो जरासंधबलं दुर्निवार्यमभूत् तदा ।
ते कालयवनं चैव श्रुत्वेदं प्रतिपेदिरे ॥ १३ ॥

उस समय मथुराके सैनिकोंके लिये जरासंधकी सेनाको ही रोकना अत्यन्त कठिन कार्य था । फिर जब यादवोंने कालयवनका भी आगमन सुना, तब तो उन्होंने मथुरासे हट जाना ही अपने लिये श्रेयस्कर समझा ॥ १३ ॥

केशवः पुनरेवाह यादवान् सत्यसंगरः ।
अद्यैव दिवसः पुण्यो निर्यामः स्वबलानुगाः ॥ १४ ॥

सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णने वहाँ यादवोंसे फिर कहा—'आज ही वह पुण्य दिवस है, जब कि अपनी सेनाके साथ हमें यहाँ-से निकल चलना है' ॥ १४ ॥

ततो निष्क्रममुः सर्वे यादवाः कृष्णशासनात् ।
ओघा इव समुद्रस्य बलौघप्रतिनादिताः ॥ १५ ॥

यह सुनकर समस्त यादव श्रीकृष्णकी आज्ञासे उस पुरीको छोड़कर निकल गये । उस समय सैन्यसमूहोंके कोलाहलसे भरे हुए यादवोंके दल समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति जान पड़ते थे ॥ १५ ॥

संगृह्य ते कलत्राणि वसुदेवपुरोगमाः ।
सुसन्नद्धैर्गजैर्मत्तै रथैरश्वैश्च दंशितैः ॥ १६ ॥
आहत्य दुन्दुभीन् सर्वे स्वजनज्ञातिबान्धवाः ।
निर्ययुर्यादवाः सर्वे मथुरामपहाय वै ॥ १७ ॥

वसुदेव आदि सभी यादव अपनी स्त्रियोंको साथ ले कसे-कसाये मतवाले हाथियों, रथों और सुसज्जित अश्वोंके द्वारा मथुरा छोड़कर चल दिये । उन सबने डंके पीटकर स्वजनों तथा जाति-भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया था ॥ १६-१७ ॥

स्यन्दनैः काञ्चनापीडैर्मत्तैश्च वरवारणैः ।
सूतैः प्लुतैश्च तुरगैः कशापाणिप्रणोदितैः ॥ १८ ॥
स्वानि स्वानि बलाग्राणि शोभयन्तः प्रकर्षिणः ।
प्रत्यङ्मुखा ययुर्हृष्टा वृष्णयो भरतर्षभ ॥ १९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! सुवर्णभूषित रथों, मतवाले गजराजों और सारथीकी आज्ञामात्रसे उछलकर चलनेवालेतथा हाथमें चाबुक लिये सवारोंद्वारा हाँके जानेवाले घोड़ोंसे अपनी-अपनी श्रेष्ठ सेनाओंकी शोभा बढ़ाते तथा उन्हे खींचकर अपने साथ लिये जाते हुए वृष्णिवंशी बड़े हर्षके साथ पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १८-१९ ॥

ततो मुख्यतमाः सर्वे यादवा रणकोविदाः ।
अनीकाग्राणि कर्षन्तो वासुदेवपुरोगमाः ॥ २० ॥

तदनन्तर, युद्धकुशल श्रीकृष्ण आदि सभी मुख्य-मुख्य यादव अपनी सेनाओंको साथ लेकर चले ॥ २० ॥

ते स्म नानालताचित्रं नारिकेलवनायुतम् ।
कीर्णं नागवलैः कान्तं केतकीखण्डमण्डितम् ॥ २१ ॥
तालपुन्नागवकुलद्राक्षाबनघनं क्वचित् ।
अनूपं सिन्धुराजस्य प्रपेदुर्यदुपुङ्गवाः ॥ २२ ॥