विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 451, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२९
प्राकारपरिखोपेतां गोपुराट्टालमालिनीम् ॥ १०७॥
विचित्रचत्वरपथां विपुलद्वारतोरणाम् ।
यन्त्रार्गलविचित्राढ्यां हेमप्राकारशोभिताम् ॥ १०८॥
वह नगरी परकोटों, खाइयों, गोपुरों और अट्टालिकाओंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होगी। इसकी सड़कें और चौराहे अद्भुत शोभासे सम्पन्न होंगे। उस पुरीके द्वार एवं फाटक बहुत बड़े-बड़े होंगे। विचित्र-विचित्र यन्त्रों और अर्गलाओंसे वह सम्पन्न होगी। सोनेकी चहारदीवारी उसकी शोभा बढ़ायेगी॥
नरनागाश्वकलिलां रथसैन्यसमाकुलाम् ।
नानादिग्देशजाकीर्णां दिव्यपुष्पफलद्रुमाम् ॥ १०९॥
हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथोंकी सेनासे वह पुरी व्याप्त रहेगी। विभिन्न दिशाओं और देशोंके लोगों तथा वहाँ उत्पन्न हुए पदार्थोंसे वह भरी होगी। दिव्य पुष्प और फल देनेवाले देववृक्ष उसकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १०९ ॥
पताकाध्वजमालाढ्यां महाभवनशालिनीम् ।
भीषणीं रिपुसंघानां मित्राणां हर्षवर्द्धनीम् ॥ ११०॥
वह नगरी ध्वजा-पताकाओंकी पङ्क्तियोंसे अलंकृत तथा बड़े-बड़े भवनोंसे सुशोभित होगी। शत्रु-समूहोंका भय और मित्रोंका हर्ष बढ़ाती रहेगी ॥ ११० ॥
मनुजेन्द्राधिवासेभ्यो विशिष्टां नगरोत्तमाम् ।
रैवतं च गिरिश्रेष्ठं कुरु देव सुरालयम् ॥ १११॥
नन्दनप्रतिमं दिव्यं पुरद्वारस्य भूषणम् ।
कारयस्वाधिवासं च तत्र गत्वा सुरोत्तम ॥ ११२॥
देव ! अबतक नरेन्द्रके जितने अधिवास हैं, उन सबसे वह पुरी विशिष्ट होगी। देवताओंका निवासस्थान जो गिरिश्रेष्ठ रैवतक है, उसको और वहाँके नन्दनवन-सदृश दिव्य वनको अपने नगरद्वारका भूषण बनाइये। सुरश्रेष्ठ ! वहीं चलकर आप निवास कीजिये ॥ १११-११२ ॥
कुमारीणां प्रचारश्च सुरमण्यो भविष्यति ।
नाम्ना द्वारवती ज्ञेया त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ११३॥
भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ।
वहाँ कुमारियोंका अत्यन्त मनोहर ढंगसे घूमना-फिरना हो सकेगा। उस पुरीका नाम होगा द्वारवती या द्वारका, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी। वह पुरी इन्द्रकी अमरावतीके समान परम रमणीय होगी ॥ ११३½ ॥
यदि स्यात् संवृतां भूमिं प्रदास्यति महोदधिः ॥ ११४॥
यथेष्टं विविधं कर्म विश्वकर्मा करिष्यति ।
दे देगा, तो वहाँ उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न पुरीका निर्माण हो सकेगा। साक्षात् विश्वकर्मा पधारकर वहाँ आपकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके शिल्प-कर्म करेंगे ॥ ११४½ ॥
मणिमुक्ताप्रवालाभिर्वज्रवैडूर्यसप्रभैः ॥ ११५॥
दिव्यैरभिप्राययुतैर्दिव्यैरत्नौघैस्त्रिलोकजैः ।
दिव्यस्तम्भशताकीर्णान् स्वर्गे देवसभोपमान् ॥ ११६॥
जाम्बूनदमयाञ्छुभ्रान् सर्वरत्नविभूषितान् ।
दिव्यध्वजपताकाढ्यान् देवगन्धर्वपालितान् ॥ ११७॥
चन्द्रसूर्यप्रतीकाशान् प्रासादान् कारय प्रभो ।
प्रभो ! आप मणि, मोती, मूँगा, हीरा, वैदूर्य तथा दिव्य भावोंसे युक्त त्रिलोकीके अन्यान्य दिव्य रत्नोंद्वारा ऐसे महल बनवाइये, जो स्वर्गलोककी देव-सभाओंके समान शोभा पा रहे हों। उनमें सैकड़ों दिव्य खम्भे लगे हों। वे महल सोनेकी ईंटोंसे बने हों और उन्हें सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित किया गया हो। वे शुभ्र प्रासाद दिव्य ध्वजा और पताकाओंसे अलंकृत हों। चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते हों और देव-गन्धर्व उनकी रक्षामें तत्पर रहें ॥ ११५-११७½ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं कृत्वा तु संकल्पं वैनतेयोऽथ केशवम् ॥ ११८॥
प्रणम्य शिरसा ताभ्यां निषसाद कृतासनः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति अपना मनोभाव प्रकट करके विनतानन्दन गरुड़ने सिर झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया। फिर वे अपने आसनपर बैठ गये ॥ ११८½ ॥
कृष्णोऽपि रामसहितो विचिन्त्य हितमीरितम् ॥ ११९॥
प्रकाशकर्तुकामो तौ विसृज्य विनतात्मजम् ।
सत्कृत्य विधिवद् राजन् महार्हवरभूषणैः ॥ १२०॥
मोदेते सुखिनौ तत्र सुरलोके यथामरौ ।
राजन् ! फिर बलरामसहित श्रीकृष्णने भी गरुड़की कही हुई हितकर बातपर विचार करके उसे प्रकाशित करनेकी इच्छा की और बहुमूल्य सुन्दर आभूषणोंद्वारा विनतानन्दन गरुड़़का विधिवत् सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। तत्पश्चात् देवलोकमें विहार करनेवाले दो अमरोंकी भाँति वे दोनों भाई मथुरामें सुख और आनन्दके साथ रहने लगे ॥ ११९-१२०½ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ॥ १२१ ॥
कृष्णं स्नेहेन विस्रब्धं वभाषे वचनामृतम् ।
गरुड़का वह वचन सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन श्रीकृष्णसे स्नेह और विश्वासपूर्वक यह अमृतके समान मधुर वचन बोले—॥ १२१½ ॥