विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 469, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| [ विष्णुपर्व ] | एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ४४७ |
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विपृथुने सात बाणोंसे शिशुपालको घायल कर दिया, तब प्रतापी शिशुपालने आठ बाणोंसे विपृथुको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५७ ॥
गवेषणस्तु चैद्यं तु षड्भिर्विद्व्याध मार्गणैः ।
अतिदान्तस्तथाष्टाभिर्बृहद्दुर्गंश्च पञ्चभिः ॥ ५८ ॥
तब गवेषणने छः, अतिदान्तने आठ और बृहद्दुर्गने पाँच बाणोंसे चेदिराज शिशुपालको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५८ ॥
प्रतिविव्याध तांश्चैद्यः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।
जघानाश्वांश्च चतुरश्चतुर्भिर्विपृथोः शरैः ॥ ५९ ॥
शिशुपालने भी उन सबको पाँच-पाँच बाण मारकर बदला चुकाया और चार बाणोंसे विपृथुके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ५९ ॥
बृहद्दुर्गस्य भल्लेन शिरश्चिच्छेद चारिहा ।
गवेषणस्य सूतं तु प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ६० ॥
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा विपृथुस्तु महाबलः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं बृहद्दुर्गस्य वीर्यवान् ॥ ६१ ॥
इतना ही नहीं, शत्रुसूदन शिशुपालने एक भल्लसे बृहद्दुर्गका सिर काट लिया और गवेषणके सारथिको यमलोक पहुँचा दिया। तब महाबली एवं पराक्रमी विपृथु अपने अश्व-हीन रथको त्यागकर शीघ्र ही बृहद्दुर्गके रथपर जा चढ़े ॥ ६०-६१ ॥
विपृथोः सारथिश्चापि गवेषणरथं द्रुतम् ।
आरुह्य जवनानश्वान् नियन्तुमुपचक्रमे ॥ ६२ ॥
विपृथुका सारथि भी तुरंत ही गवेषणके रथपर जा बैठा और उसके वेगशाली घोड़ोंको काबूमे रखनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६२ ॥
ते क्रुद्धाः शरवर्षेण सुनीथं समवाकिरन् ।
नृत्यन्तं रथमार्गेषु चापहस्ताः कलापिनः ॥ ६३ ॥
फिर तो वे कुपित हो धनुष और बाण हाथमे लेकर रथ-मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए सुनीथपुत्र शिशुपालपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ६३ ॥
चक्रदेवो दन्तवक्त्रं विभेदोरसि पत्रिणा ।
पड्रथं पञ्चभिश्चैव विव्याध युधि मार्गणैः ॥ ६४ ॥
चक्रदेवने पंखवाले बाणसे मारकर दन्तवक्त्रकी छाती छेद डाली। फिर पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धमें पड्रथको भी घायल कर दिया ॥ ६४ ॥
ताभ्यां स विद्धो दशभिर्बाणैर्मर्मातिगैः शितैः ।
ततो बली चक्रदेवं विभेद दशभिः शरैः ॥ ६५ ॥
तब उन दोनोंने भी पैनी धारवाले दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा चक्रदेवको गहरी चोट पहुँचाया । फिर शिशुपालके भाई बलीने भी चक्रदेवको दस बाण मारे ॥ ६५ ॥
पञ्चभिश्चापि विव्याध सोऽपि दूराद् विदूरथम् ।
विदूरथोऽपि तं षड्भिर्विन्ध्याधाजौ शितैः शरैः ॥ ६६ ॥
तत्पश्चात् उसने दूरसे ही पाँच बाण मारकर विदूरथको भी घायल कर दिया। विदूरथने भी छः पैने बाण मारकर युद्धमें बलीको आहत कर दिया ॥ ६६ ॥
त्रिंशता प्रत्यविध्यत् तं बली बाणैर्महाबलम् ।
कृतवर्मा विभेदाजौ राजपुत्रं त्रिभिः शरैः ॥ ६७ ॥
न्यहनत् सारथिं चास्य ध्वजं चिच्छेद सोच्छ्रितम् ।
तब बलीने महाबली विदूरथको बदलेमें तीस बाण मारे। दूसरी ओर कृतवर्माने युद्धमे पौण्ड्रक वासुदेवके पुत्रको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। साथ ही उसके सारथिको भी मार डाला और ऊँचे ध्वजको काट गिराया ॥ ६७½ ॥
प्रतिविव्याध तं क्रुद्धः पौण्ड्रः षड्भिः शिलीमुखैः ॥ ६८ ॥
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य भल्लेन कृतवर्मणः ।
तब क्रोधमें भरे हुए पौण्ड्रने छः बाण मारकर बदला चुकाया और एक भल्लसे कृतवर्माका धनुष भी काट दिया ॥
निवृत्तशत्रुः कालिङ्गं विभेद निशितैः शरैः ।
तोमरेणांसदेशे तं निर्विभेद कलिङ्गराट् ॥ ६९ ॥
निवृत्तशत्रुने बहुत-से पैने बाण मारकर कलिङ्गराजको बींध डाला। तब कलिङ्गराजने एक तोमरका प्रहार करके उसके कंधेपर घाव कर दिया ॥ ६९ ॥
गजेनासाद्य कङ्कस्तु गजमङ्गस्य वीर्यवान् ।
तोमरेण विभेदाङ्गं विभेदाङ्गञ्च तं शरैः ॥ ७० ॥
पराक्रमी कङ्कने हाथीके द्वारा आक्रमण करके अङ्गराजके हाथी और अङ्गराजको भी तोमरसे घायल कर दिया। तब अङ्गराजने भी अनेक बाणोंद्वारा कङ्कको चोट पहुँचायी ॥ ७० ॥
चित्रकश्च श्वफल्कश्च सत्यकश्च महारथः ।
कलिङ्गस्य तथानीकं नाराचैर्बिभिदुः शतैः ॥ ७१ ॥
उधर चित्रक, श्वफल्क और महारथी सत्यकने कलिङ्ग-राजकी सेनाको सौ नाराचोंसे मारकर विदीर्ण कर डाला ॥
तं निस्पृष्टद्रुमेणाजौ वङ्गराजस्य कुञ्जरम् ।
जघान रामः संक्रुद्धो वङ्गराजं च संयुगे ॥ ७२ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए बलरामने एक पत्रहीन वृक्षके द्वारा युद्धस्थलमें वङ्गराजके हाथी और वङ्गराजको भी कालके गालमें भेज दिया ॥ ७२ ॥
तं हत्वा रथमारुह्य धनुरुदाय वीर्यवान् ।
संकर्षणो जघानोग्रैर्नाराचैः कैशिकान् बहून् ॥ ७३ ॥
वङ्गराजका वध करके पराक्रमी संकर्षणने धनुष हाथमें ले रथपर आरूढ़ हो भयंकर नाराचोंद्वारा बहुत-से कैशिकों-का संहार कर डाला ॥ ७३ ॥