भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

४४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


अनन्या प्रमदा लोके रूपेण यशसा श्रिया।
रुक्मिणी रूपिणी देवी पाण्डुरक्षौमवासिनी ॥ ४१ ॥

रूप, यश और शोभाकी दृष्टिसे संसारमें दूसरी कोई युवती उसके समान नहीं थी। उज्ज्वल रेशमी साड़ी पहने हुए राजकुमारी रुक्मिणी रूपवती देवी-सी जान पड़ती थी ॥ ४१ ॥

तां दृष्ट्वा ववृधे कामः कृष्णस्य प्रियदर्शनाम्।
हविषेवानलस्यार्चिर्मनस्तस्यां समादधत् ॥ ४२ ॥

जैसे घीकी आहुति डालनेसे अग्निकी ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस प्रियदर्शना राजकन्याको देखकर श्रीकृष्णकी उसे पानेके लिये कामना बहुत बढ़ गयी। उन्होंने अपना हृदय उसीपर निछावर कर दिया ॥ ४२ ॥

रामेण सह निश्चित्य केशवस्तु महाबलः।
तत्प्रमाथेऽकरोद् बुद्धिं वृष्णिभिः प्रणिधाय च ॥ ४३ ॥

तदनन्तर महाबली श्रीकृष्णने वृष्णिवंशियोंके साथ सलाह और बलरामजीके साथ कर्तव्यका निश्चय करके रुक्मिणीको हर लेनेका विचार किया ॥ ४३ ॥

कृते तु देवताकार्ये निष्क्रामन्तीं सुरालयात्।
उन्मथ्य सहसा कृष्णः स्वनिनाय रथोत्तमम् ॥ ४४ ॥

इतनेमें ही देवपूजाका कार्य सम्पन्न करके रुक्मिणी देवालयसे निकलने लगी। उसी समय श्रीकृष्णने सहसा पहुँचकर उसे गोदमें उठा लिया और अपने उत्तम रथपर पहुँचा दिया ॥ ४४ ॥

वृक्षमुत्पाट्य रामोऽपि जघानापततः परान्।
समनह्यन्त दाशार्हास्तदाज्ञाप्ताश्च सर्वशः ॥ ४५ ॥

इधर बलरामने भी एक पेड़ उखाड़कर आक्रमण करनेवाले शत्रुओंका उसीसे संहार कर डाला। उस समय बलरामकी आज्ञा पाकर समस्त यदुवंशी वीर युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गये ॥ ४५ ॥

ते रथैर्विविधाकारैः समुच्छ्रितमहाध्वजैः।
वाजिभिर्वारणैश्चैव परिवव्रुर्हलायुधम् ॥ ४६ ॥

वे ऊँचे एवं विशाल ध्वजोंसे युक्त भाँति-भाँतिके रथों, घोड़ों और हाथियोंद्वारा बलरामजीको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ४६ ॥

आदाय रुक्मिणीं कृष्णो जगामाशु पुरीं प्रति।
रामे भारं समासज्य युयुधाने च वीर्यवान् ॥ ४७ ॥

बलवान् श्रीकृष्ण युद्धका सारा भार बलराम तथा सात्यकिपर छोड़कर रुक्मिणीको साथ ले शीघ्र ही द्वारकापुरीको चल दिये ॥ ४७ ॥

अक्रूरे विपृथौ चैव गदे च कृतवर्मणि।
चक्रदेवे सुदेवे च सारणे च महाबले ॥ ४८ ॥
निवृत्तशत्रौ विक्रान्ते भङ्गकारे विदूरथे।
उग्रसेनात्मजे कङ्के शतद्युम्ने च केशवः ॥ ४९ ॥
राजाधिदेवे सुदुरे प्रसेने चित्रके तथा।
अतिदान्ते बृहद्दुर्गे श्वफल्के सत्यके पृथौ ॥ ५० ॥
वृष्ण्यन्धकेषु चान्येषु मुख्येषु मधुसूदनः।
गुरुमासज्य तं भारं ययौ द्वारवतीं प्रति ॥ ५१ ॥

मधुसूदन श्रीकृष्णने युद्धका वह गुरुतर भार (बलराम और सात्यकिके सिवा) अक्रूर; विपृथु, गद, कृतवर्मा, चक्रदेव; सुदेव, महाबली सारण, निवृत्तशत्रु, पराक्रमी भङ्गकार; विदूरथ, उग्रसेनकुमार कङ्क, शतद्युम्न, राजाधिदेव; मुदुर, प्रसेन, चित्रक, अतिदान्त, बृहद्दुर्ग, श्वफल्क, सत्यक, पृथु तथा अन्यान्य वृष्णि और अन्धकवंशके प्रमुख वीरोंपर रखकर द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४८-५१ ॥

दन्तवक्त्रो जरासंधः शिशुपालश्च वीर्यवान्।
संनद्धा निर्ययुः क्रुद्धा जिघांसन्तो जनार्दनम् ॥ ५२ ॥

उधर दन्तवक्त्र, जरासंध और पराक्रमी शिशुपाल कवच बाँधकर श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरे हुए निकले ॥ ५२ ॥

अङ्गवङ्गकलिङ्गैश्च सार्धं पौण्ड्रैश्च वीर्यवान्।
निर्ययौ चेदिराजस्तु भ्रातृभिः स महारथैः ॥ ५३ ॥

पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग तथा पुण्ड्रदेशीय योद्धाओं और अपने महारथी भाइयोंके साथ युद्धके लिये निकला ॥ ५३ ॥

तान् प्रत्यगृह्णन् संरब्धा वृष्णिवीरा महारथाः।
संकर्षणं पुरस्कृत्य वासवं मरुतो यथा ॥ ५४ ॥

उस समय रोषमें भरे हुए वृष्णिवंशके महारथी वीरोंने जैसे देवता इन्द्रको आगे रखते हैं, उसी प्रकार बलरामजीको आगे करके उन समस्त शत्रुओंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ५४ ॥

आपतन्तं हि वेगेन जरासंधं महाबलम्।
षड्भिर्विच्याध नाराचैर्युयुधानो महामृधे ॥ ५५ ॥

उस महासमरमें वेगसे आगे बढ़ते हुए महाबली जरासंधको सात्यकिने छः नाराचोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५५ ॥

अक्रूरो दन्तवक्त्रं तु विव्याध नवभिः शरैः।
तं प्रत्यविद्ध्यत् कारूषो वाणैर्दशभिराशुगैः ॥ ५६ ॥

अक्रूरने दन्तवक्त्रको नौ बाणोंसे वेध दिया, तब करूपराज दन्तवक्त्रने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अक्रूरको भी बींधकर बदला चुकाया ॥ ५६ ॥

विपृथुः शिशुपालं तु शरैर्विन्ध्याध सप्तभिः।
अष्टभिः प्रत्यविद्ध्यत् तं शिशुपालः प्रतापवान् ॥ ५७ ॥