भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

विष्णुपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ४४५


जामातातभवत् तस्य कंसस्तस्मिन् हते युधि ।
कृष्णार्थं वैरमभवज्जरासंधस्य वृष्णिभिः ॥ २६ ॥

कंस जरासंधका जामाता था। जब वह युद्धमे श्रीकृष्णके हाथसे मारा गया, तब श्रीकृष्णके ही लिये समस्त वृष्णिवंशियोंके साथ जरासंधका वैर हो गया ॥ २६ ॥

भीष्मकं वरयामास सुनीथार्थे च रुक्मिणीम् ।
तां ददौ भीष्मकश्चापि शिशुपालाय वीर्यवान् ॥ २७ ॥

जरासंधने सुनीथपुत्र शिशुपालके लिये ही भीष्मकसे रुक्मिणीको माँगा था और पराक्रमी भीष्मकने उसका शिशुपालके लिये वाग्दान कर दिया ॥ २७ ॥

ततश्चैद्यमुपादाय जरासंधो नराधिपः ।
ययौ विदर्भान् सहितो दन्तवक्रेण यायिना ॥ २८ ॥

तब राजा जरासंध अपने सहायक दन्तवक्रके साथ शिशुपालको लेकर विदर्भ देशको गया ॥ २८ ॥

अनुज्ञातश्च पौण्ड्रेण वासुदेवेन धीमता ।
अङ्गवङ्गकलिङ्गानामीश्वरः स महाबलः ॥ २९ ॥

बुद्धिमान् पौण्ड्रक वासुदेवने भी इस कार्यमें जरासंधका अनुमोदन किया था। महाबली जरासंध अङ्ग-वङ्ग और कलिङ्ग देशोंका भी सम्राट् था ॥ २९ ॥

मानयिष्यंश्च तान् रुक्मी प्रत्युद्गम्य नराधिपान् ।
परया पूजयोपेतांस्तान् निनाय पुरीं प्रति ॥ ३० ॥

रुक्मीने उन नरेशोंका सम्मान करनेके लिये उनकी अगवानी की और अच्छे ढंगसे उनका स्वागत-सत्कार करके वह उन्हें अपनी पुरीमें ले गया ॥ ३० ॥

पितृष्वसुः प्रियार्थं च रामकृष्णानुभावपि ।
प्रययुर्वृष्णयश्चान्ये रथैस्तत्र बलान्विताः ॥ ३१ ॥

बलराम और श्रीकृष्ण ये दोनों भाई भी अपनी बुआकी प्रसन्नताके लिये वहाँ गये। साथ ही दूसरे बलशाली वृष्णिवंशी वीर भी रथोंद्वारा वहाँ पधारे ॥ ३१ ॥

क्रथकैशिकभर्ता तान् प्रतिगृह्य यथाविधि ।
पूजयामास पूजार्हान् बहिश्चैव न्यवेशयत् ॥ ३२ ॥

क्रथकैशिक देशके स्वामी भीष्मकने उन पूजनीय पुरुषोंका विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें बाहर ही ठहराया ॥

श्वोभाविनि विवाहे च रुक्मिणी निर्ययौ बहिः ।
चतुर्युजा रथेनैन्द्रे देवतायतने शुभे ॥ ३३ ॥
इन्द्राणीमर्चयिष्यन्ती कृतकौतुकमङ्गला ।
दीप्यमानेन वपुषा बलेन महता वृता ॥ ३४ ॥

जब विवाह कल होनेवाला था अर्थात् जब उसके होनेमें एक ही दिन शेष रह गया था, उस समय राजकुमारी रुक्मिणी तत्कालोचित मङ्गलाचारसे सम्पन्न हो अपने दीप्तिमान् शरीरसे सुशोभित होती हुई सुन्दर देवालयमें इन्द्राणीकी पूजा करनेके लिये चार घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर ज्येष्ठा नक्षत्रमें राजमहलसे बाहर निकली। उस समय वह विशाल सेनासे घिरी हुई थी ॥ ३३-३४ ॥

तां ददर्श तदा कृष्णो लक्ष्मीं साक्षादिव स्थिताम् ।
रूपेणाग्र्येण सम्पन्नां देवतायतनान्तिके ॥ ३५ ॥

उस यात्राके समय देवमन्दिरके निकट परम सुन्दर रूपसे सम्पन्न साक्षात् लक्ष्मी-सी खड़ी हुई रुक्मिणीको भगवान् श्रीकृष्णने देखा ॥ ३५ ॥

वह्नेरिव शिखां दीप्तां मायां भूमिगतामिव ।
पृथिवीमिव गम्भीरामुत्थितां पृथिवीतलात् ॥ ३६ ॥

वह प्रज्वलित हुई अग्निकी शिखा, पृथ्वीपर उतरी हुई देवमाया तथा भूतलसे उठी हुई गम्भीर स्वभाववाली मूर्तिमती भूदेवीके समान जान पड़ती थी ॥ ३६ ॥

मरीचिमिव सोमस्य सौम्यां स्त्रीविग्रहां भुवि ।
श्रीमिवाग्र्यां विना पद्मं भविष्यां स्त्रीसहायिनीम् ।
कृष्णेन मनसा दृष्टां दुर्निरीक्ष्यां सुरैरपि ॥ ३७ ॥

उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो चन्द्रमाकी सौम्य किरण सुन्दरी नारीका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरी हो, बिना कमलकी श्रेष्ठ लक्ष्मी हो अथवा भविष्यमें होनेवाली लक्ष्मीकी सहायिका हो। देवताओंके लिये भी जिसका दर्शन होना अत्यन्त कठिन था, उस रुक्मिणीको श्रीकृष्णने जी भरकर देखा ॥ ३७ ॥

श्यामावदाता सा ह्यासीत् पृथुचार्यायतेक्षणा ।
ताम्रोष्ठनयनापाङ्गी पीनोरूजघनस्तनी ॥ ३८ ॥

उसकी सोलह वर्षकी अवस्था थी। अङ्गोंकी कान्ति गौरवर्णकी थी। उसके नेत्र बहुत ही मनोहर एवं विशाल थे। ओष्ठ तथा नयनोंके प्रान्तभाग ताँबेके समान लाल थे। जाँघ, नितम्ब और स्तन मोटे एवं मांसल थे ॥ ३८ ॥

बृहती चारुसर्वाङ्गी तन्वी शशिसितानना ।
ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूर्नीलकुञ्चितमूर्धजा ॥ ३९ ॥

वह पतले और लंबे कदकी स्त्री थी। उसके सारे अङ्ग बड़े ही मनोहर थे। उसका मुख चन्द्रमाके समान गौर कान्तिसे सुशोभित था। नख लाल और ऊँचे थे। भौंहें सुन्दर तथा सिरके बाल काले और घुँघराले थे ॥ ३९ ॥

अत्यर्थं रूपतः कान्ता पीनश्रोणिपयोधरा ।
तीक्ष्णशुक्लैः समैर्दन्तैः प्रभासद्भिरलंकृता ॥ ४० ॥

वह रूपकी दृष्टिसे अत्यन्त कमनीया थी। उसके नितम्ब और उरोज पीन (उभरे हुए) थे। वह तीक्ष्ण, श्वेत, बराबर जमे हुए और चमकीले दाँतोंसे सुशोभित होती थी ॥ ४० ॥