भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 466
४४४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

विदर्भनामक एक पुत्र था, जो विन्ध्यगिरिके दक्षिण पार्श्वमें विदर्भनगरीमें निवास करता था ॥ १० ॥

क्रथकैशिकमुख्यास्तु पुत्रास्तस्य महाबलाः।
बभूवुर्वीर्यसम्पन्नाः पृथग्वंशकरा नृपाः॥ ११॥

विदर्भके क्रथ, कैशिक आदि बहुत-से महाबली पुत्र हुए, जो पराक्रमसम्पन्न तथा पृथक्-पृथक् वंशोंके प्रवर्तक नरेश थे।

तस्यान्ववाये भीमस्य जज्ञिरे वृष्णयो नृपाः।
क्रथस्य त्वंशुमान् वंशे भीष्मकः कैशिकस्य तु ॥ १२ ॥

राजर्षि यादवके ही वंशमें भीमसे वृष्णिवंशी राजाओंकी उत्पत्ति हुई थी। क्रथके वंशमें अंशुमान् और कैशिकके वंशज भीष्मक हुए ॥ १२ ॥

हिरण्योरोमेत्याहुर्यं दाक्षिणात्येश्वरं नृपाः।
अगस्त्यगुप्तामाशां यः कुण्डिनस्थोऽन्वशात्नृपः॥ १३ ॥

भीष्मकको ही राजा लोग हिरण्योरोमा तथा दाक्षिणात्येश्वर कहते हैं, जिन्होंने कुण्डिनपुरमें रहकर अगस्त्य मुनिके द्वारा सुरक्षित दिशा दक्षिणका शासन किया था॥ १३ ॥

रुक्मी तस्याभवत् पुत्रो रुक्मिणी च विशाम्पते।
रुक्मी चास्त्राणि दिव्यानि द्रुमात् प्राप महाबलः ॥१४॥
जामदग्न्यात् तथा रामाद् ब्राह्ममस्त्रमवासवान् ।
प्रास्पर्द्धत स कृष्णेन नित्यमद्भुतकर्मणा ॥ १५ ॥

प्रजानाथ ! उन्हीं राजा भीष्मकका पुत्र रुक्मी था तथा रुक्मिणी भी उन्हींकी कन्या थी। महाबली रुक्मीने (किम्पुरुषराज) द्रुमसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये थे। साथ ही जमदग्निनन्दन परशुरामसे उसको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति हुई थी। रुक्मी अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके साथ सदा ही स्पर्धा रखता था ॥ १४-१५ ॥

रुक्मिणी त्वभवद् राजन् रूपेणासदृशी भुवि।
चकमे वासुदेवस्तां श्रवादेव महाद्युतिः ॥ १६ ॥

राजन् ! रुक्मिणीके रूपकी समानता करनेवाली इस पृथ्वीपर दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। महातेजस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उसका परिचय सुनकर ही उसे चाहने लगे थे ॥ १६ ॥

स तया चाभिलषितः श्रवादेव जनार्दनः।
तेजोवीर्यबलोपेतः स मे भर्ता भवेदिति ॥ १७ ॥

इसी प्रकार रुक्मिणी भी श्रीकृष्णकी प्रशंसा सुनकर ही उन्हें चाहने लगी थी। उसकी इच्छा थी कि तेज, वीर्य और बलसे सम्पन्न श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों ॥ १७ ॥

तां ददौ न च कृष्णाय द्वेषाद् रुक्मी महाबलः।
कंसस्य वधसंतापात् कृष्णायामिततेजसे ॥ १८ ॥
याचमानाय कंसस्य द्वेष्योऽयमिति चिन्तयन् ।

महाबली रुक्मी श्रीकृष्णसे द्वेष रखता था, इसलिये उसने श्रीकृष्णको अपनी बहिन नहीं दी। कंसका वध सुनकर उसे बड़ा संताप हुआ था। वह सदा यही सोचता था कि कृष्ण कंसद्रोही है, इसलिये उनके याचना करनेपर भी रुक्मीने अमित तेजस्वी श्रीकृष्णको रुक्मिणी नहीं दी ॥ १८ ½ ॥

चैद्यस्यार्थे सुनीथस्य जरासंधस्तु भूमिपः।
वरयामास तां राजा भीष्मकं भीमविक्रमम् ॥ १९ ॥

पृथ्वीपति राजा जरासंधने चेदिराज सुनीथके पुत्र शिशुपालके लिये भयानक पराक्रमी भीष्मकसे उनकी कन्या रुक्मिणीको माँगा था ॥ १९ ॥

चेदिराजस्य तु वसोरासीत् पुत्रो बृहद्रथः।
मगधेषु पुरा येन निर्मितोऽसौ गिरिव्रजः ॥ २० ॥

चेदिराज उपरिचर वसुके एक पुत्रका नाम बृहद्रथ था, जिसने पूर्वकालमें मगधदेशके भीतर गिरिव्रज नामक नगरका निर्माण कराया था ॥ २० ॥

तस्यान्ववाये जज्ञेऽसौ जरासंधो महाबलः।
वसोरेव तदा वंशे दमघोषोऽपि चेदिराट् ॥ २१ ॥

उसीके वंशमें महाबली जरासंध पैदा हुआ। उपरिचर वसुके ही वंशमें उन दिनों दमघोष पैदा हुए थे, जो चेदि-देशके राजा थे ॥ २१ ॥

दमघोषस्य पुत्रास्तु पञ्च भीमपराक्रमाः।
भगिन्यां वसुदेवस्य श्रुतश्रवसि जज्ञिरे ॥ २२ ॥

दमघोषके पाँच भयानक पराक्रमी पुत्र हुए, जो वसुदेवकी बहिन श्रुतश्रवाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ २२ ॥

शिशुपालो दशग्रीवो रैभ्योऽथोपद्दिशो बली।
सर्वास्त्रकुशला वीरा वीर्यवन्तो महाबलाः ॥ २३ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—शिशुपाल, दशग्रीव, रैभ्य, उपदिश और बली। ये सब-के-सब सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, वीर, पराक्रमी और महाबली थे ॥ २३ ॥

ज्ञातेः समानवंशस्य सुनीथः प्रददौ सुतम्।
जरासंधस्तु सुतवद् ददर्शैनं जुगोप च ॥ २४ ॥

जरासंध कुटुम्बी था तथा समान वंशमें उत्पन्न हुआ था, इसलिये सुनीथ (दमघोष) ने अपना पुत्र शिशुपाल उसे सौंप दिया था (शिशुपालको जरासंधका सहयोगी बना दिया था)। जरासंध भी शिशुपालको अपने पुत्रके समान समझता और उसकी रक्षा करता था ॥ २४ ॥

जरासंधं पुरस्कृत्य वृष्णिशन्रुं महाबलम्।
कृतान्यागांसि चैद्येन वृष्णीनां चाप्रियेषिणा ॥ २५ ॥

वृष्णिवंशके शत्रु महाबली जरासंधको आगे करके चेदि-राजने वृष्णियोंका अप्रिय चाहते हुए उनके अनेक अपराध किये थे ॥ २५ ॥