विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
४४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
अनन्या प्रमदा लोके रूपेण यशसा श्रिया।
रुक्मिणी रूपिणी देवी पाण्डुरक्षौमवासिनी ॥ ४१ ॥
रूप, यश और शोभाकी दृष्टिसे संसारमें दूसरी कोई युवती उसके समान नहीं थी। उज्ज्वल रेशमी साड़ी पहने हुए राजकुमारी रुक्मिणी रूपवती देवी-सी जान पड़ती थी ॥ ४१ ॥
तां दृष्ट्वा ववृधे कामः कृष्णस्य प्रियदर्शनाम्।
हविषेवानलस्यार्चिर्मनस्तस्यां समादधत् ॥ ४२ ॥
जैसे घीकी आहुति डालनेसे अग्निकी ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार उस प्रियदर्शना राजकन्याको देखकर श्रीकृष्णकी उसे पानेके लिये कामना बहुत बढ़ गयी। उन्होंने अपना हृदय उसीपर निछावर कर दिया ॥ ४२ ॥
रामेण सह निश्चित्य केशवस्तु महाबलः।
तत्प्रमाथेऽकरोद् बुद्धिं वृष्णिभिः प्रणिधाय च ॥ ४३ ॥
तदनन्तर महाबली श्रीकृष्णने वृष्णिवंशियोंके साथ सलाह और बलरामजीके साथ कर्तव्यका निश्चय करके रुक्मिणीको हर लेनेका विचार किया ॥ ४३ ॥
कृते तु देवताकार्ये निष्क्रामन्तीं सुरालयात्।
उन्मथ्य सहसा कृष्णः स्वनिनाय रथोत्तमम् ॥ ४४ ॥
इतनेमें ही देवपूजाका कार्य सम्पन्न करके रुक्मिणी देवालयसे निकलने लगी। उसी समय श्रीकृष्णने सहसा पहुँचकर उसे गोदमें उठा लिया और अपने उत्तम रथपर पहुँचा दिया ॥ ४४ ॥
वृक्षमुत्पाट्य रामोऽपि जघानापततः परान्।
समनह्यन्त दाशार्हास्तदाज्ञाप्ताश्च सर्वशः ॥ ४५ ॥
इधर बलरामने भी एक पेड़ उखाड़कर आक्रमण करनेवाले शत्रुओंका उसीसे संहार कर डाला। उस समय बलरामकी आज्ञा पाकर समस्त यदुवंशी वीर युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गये ॥ ४५ ॥
ते रथैर्विविधाकारैः समुच्छ्रितमहाध्वजैः।
वाजिभिर्वारणैश्चैव परिवव्रुर्हलायुधम् ॥ ४६ ॥
वे ऊँचे एवं विशाल ध्वजोंसे युक्त भाँति-भाँतिके रथों, घोड़ों और हाथियोंद्वारा बलरामजीको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ४६ ॥
आदाय रुक्मिणीं कृष्णो जगामाशु पुरीं प्रति।
रामे भारं समासज्य युयुधाने च वीर्यवान् ॥ ४७ ॥
बलवान् श्रीकृष्ण युद्धका सारा भार बलराम तथा सात्यकिपर छोड़कर रुक्मिणीको साथ ले शीघ्र ही द्वारकापुरीको चल दिये ॥ ४७ ॥
अक्रूरे विपृथौ चैव गदे च कृतवर्मणि।
चक्रदेवे सुदेवे च सारणे च महाबले ॥ ४८ ॥
निवृत्तशत्रौ विक्रान्ते भङ्गकारे विदूरथे।
उग्रसेनात्मजे कङ्के शतद्युम्ने च केशवः ॥ ४९ ॥
राजाधिदेवे सुदुरे प्रसेने चित्रके तथा।
अतिदान्ते बृहद्दुर्गे श्वफल्के सत्यके पृथौ ॥ ५० ॥
वृष्ण्यन्धकेषु चान्येषु मुख्येषु मधुसूदनः।
गुरुमासज्य तं भारं ययौ द्वारवतीं प्रति ॥ ५१ ॥
मधुसूदन श्रीकृष्णने युद्धका वह गुरुतर भार (बलराम और सात्यकिके सिवा) अक्रूर; विपृथु, गद, कृतवर्मा, चक्रदेव; सुदेव, महाबली सारण, निवृत्तशत्रु, पराक्रमी भङ्गकार; विदूरथ, उग्रसेनकुमार कङ्क, शतद्युम्न, राजाधिदेव; मुदुर, प्रसेन, चित्रक, अतिदान्त, बृहद्दुर्ग, श्वफल्क, सत्यक, पृथु तथा अन्यान्य वृष्णि और अन्धकवंशके प्रमुख वीरोंपर रखकर द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४८-५१ ॥
दन्तवक्त्रो जरासंधः शिशुपालश्च वीर्यवान्।
संनद्धा निर्ययुः क्रुद्धा जिघांसन्तो जनार्दनम् ॥ ५२ ॥
उधर दन्तवक्त्र, जरासंध और पराक्रमी शिशुपाल कवच बाँधकर श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरे हुए निकले ॥ ५२ ॥
अङ्गवङ्गकलिङ्गैश्च सार्धं पौण्ड्रैश्च वीर्यवान्।
निर्ययौ चेदिराजस्तु भ्रातृभिः स महारथैः ॥ ५३ ॥
पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग तथा पुण्ड्रदेशीय योद्धाओं और अपने महारथी भाइयोंके साथ युद्धके लिये निकला ॥ ५३ ॥
तान् प्रत्यगृह्णन् संरब्धा वृष्णिवीरा महारथाः।
संकर्षणं पुरस्कृत्य वासवं मरुतो यथा ॥ ५४ ॥
उस समय रोषमें भरे हुए वृष्णिवंशके महारथी वीरोंने जैसे देवता इन्द्रको आगे रखते हैं, उसी प्रकार बलरामजीको आगे करके उन समस्त शत्रुओंको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ५४ ॥
आपतन्तं हि वेगेन जरासंधं महाबलम्।
षड्भिर्विच्याध नाराचैर्युयुधानो महामृधे ॥ ५५ ॥
उस महासमरमें वेगसे आगे बढ़ते हुए महाबली जरासंधको सात्यकिने छः नाराचोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५५ ॥
अक्रूरो दन्तवक्त्रं तु विव्याध नवभिः शरैः।
तं प्रत्यविद्ध्यत् कारूषो वाणैर्दशभिराशुगैः ॥ ५६ ॥
अक्रूरने दन्तवक्त्रको नौ बाणोंसे वेध दिया, तब करूपराज दन्तवक्त्रने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अक्रूरको भी बींधकर बदला चुकाया ॥ ५६ ॥
विपृथुः शिशुपालं तु शरैर्विन्ध्याध सप्तभिः।
अष्टभिः प्रत्यविद्ध्यत् तं शिशुपालः प्रतापवान् ॥ ५७ ॥
| [ विष्णुपर्व ] | एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ४४७ |
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विपृथुने सात बाणोंसे शिशुपालको घायल कर दिया, तब प्रतापी शिशुपालने आठ बाणोंसे विपृथुको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५७ ॥
गवेषणस्तु चैद्यं तु षड्भिर्विद्व्याध मार्गणैः ।
अतिदान्तस्तथाष्टाभिर्बृहद्दुर्गंश्च पञ्चभिः ॥ ५८ ॥
तब गवेषणने छः, अतिदान्तने आठ और बृहद्दुर्गने पाँच बाणोंसे चेदिराज शिशुपालको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५८ ॥
प्रतिविव्याध तांश्चैद्यः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।
जघानाश्वांश्च चतुरश्चतुर्भिर्विपृथोः शरैः ॥ ५९ ॥
शिशुपालने भी उन सबको पाँच-पाँच बाण मारकर बदला चुकाया और चार बाणोंसे विपृथुके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ५९ ॥
बृहद्दुर्गस्य भल्लेन शिरश्चिच्छेद चारिहा ।
गवेषणस्य सूतं तु प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ६० ॥
हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा विपृथुस्तु महाबलः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं बृहद्दुर्गस्य वीर्यवान् ॥ ६१ ॥
इतना ही नहीं, शत्रुसूदन शिशुपालने एक भल्लसे बृहद्दुर्गका सिर काट लिया और गवेषणके सारथिको यमलोक पहुँचा दिया। तब महाबली एवं पराक्रमी विपृथु अपने अश्व-हीन रथको त्यागकर शीघ्र ही बृहद्दुर्गके रथपर जा चढ़े ॥ ६०-६१ ॥
विपृथोः सारथिश्चापि गवेषणरथं द्रुतम् ।
आरुह्य जवनानश्वान् नियन्तुमुपचक्रमे ॥ ६२ ॥
विपृथुका सारथि भी तुरंत ही गवेषणके रथपर जा बैठा और उसके वेगशाली घोड़ोंको काबूमे रखनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६२ ॥
ते क्रुद्धाः शरवर्षेण सुनीथं समवाकिरन् ।
नृत्यन्तं रथमार्गेषु चापहस्ताः कलापिनः ॥ ६३ ॥
फिर तो वे कुपित हो धनुष और बाण हाथमे लेकर रथ-मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए सुनीथपुत्र शिशुपालपर बाणोंकी बौछार करने लगे ॥ ६३ ॥
चक्रदेवो दन्तवक्त्रं विभेदोरसि पत्रिणा ।
पड्रथं पञ्चभिश्चैव विव्याध युधि मार्गणैः ॥ ६४ ॥
चक्रदेवने पंखवाले बाणसे मारकर दन्तवक्त्रकी छाती छेद डाली। फिर पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धमें पड्रथको भी घायल कर दिया ॥ ६४ ॥
ताभ्यां स विद्धो दशभिर्बाणैर्मर्मातिगैः शितैः ।
ततो बली चक्रदेवं विभेद दशभिः शरैः ॥ ६५ ॥
तब उन दोनोंने भी पैनी धारवाले दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा चक्रदेवको गहरी चोट पहुँचाया । फिर शिशुपालके भाई बलीने भी चक्रदेवको दस बाण मारे ॥ ६५ ॥
पञ्चभिश्चापि विव्याध सोऽपि दूराद् विदूरथम् ।
विदूरथोऽपि तं षड्भिर्विन्ध्याधाजौ शितैः शरैः ॥ ६६ ॥
तत्पश्चात् उसने दूरसे ही पाँच बाण मारकर विदूरथको भी घायल कर दिया। विदूरथने भी छः पैने बाण मारकर युद्धमें बलीको आहत कर दिया ॥ ६६ ॥
त्रिंशता प्रत्यविध्यत् तं बली बाणैर्महाबलम् ।
कृतवर्मा विभेदाजौ राजपुत्रं त्रिभिः शरैः ॥ ६७ ॥
न्यहनत् सारथिं चास्य ध्वजं चिच्छेद सोच्छ्रितम् ।
तब बलीने महाबली विदूरथको बदलेमें तीस बाण मारे। दूसरी ओर कृतवर्माने युद्धमे पौण्ड्रक वासुदेवके पुत्रको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। साथ ही उसके सारथिको भी मार डाला और ऊँचे ध्वजको काट गिराया ॥ ६७½ ॥
प्रतिविव्याध तं क्रुद्धः पौण्ड्रः षड्भिः शिलीमुखैः ॥ ६८ ॥
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य भल्लेन कृतवर्मणः ।
तब क्रोधमें भरे हुए पौण्ड्रने छः बाण मारकर बदला चुकाया और एक भल्लसे कृतवर्माका धनुष भी काट दिया ॥
निवृत्तशत्रुः कालिङ्गं विभेद निशितैः शरैः ।
तोमरेणांसदेशे तं निर्विभेद कलिङ्गराट् ॥ ६९ ॥
निवृत्तशत्रुने बहुत-से पैने बाण मारकर कलिङ्गराजको बींध डाला। तब कलिङ्गराजने एक तोमरका प्रहार करके उसके कंधेपर घाव कर दिया ॥ ६९ ॥
गजेनासाद्य कङ्कस्तु गजमङ्गस्य वीर्यवान् ।
तोमरेण विभेदाङ्गं विभेदाङ्गञ्च तं शरैः ॥ ७० ॥
पराक्रमी कङ्कने हाथीके द्वारा आक्रमण करके अङ्गराजके हाथी और अङ्गराजको भी तोमरसे घायल कर दिया। तब अङ्गराजने भी अनेक बाणोंद्वारा कङ्कको चोट पहुँचायी ॥ ७० ॥
चित्रकश्च श्वफल्कश्च सत्यकश्च महारथः ।
कलिङ्गस्य तथानीकं नाराचैर्बिभिदुः शतैः ॥ ७१ ॥
उधर चित्रक, श्वफल्क और महारथी सत्यकने कलिङ्ग-राजकी सेनाको सौ नाराचोंसे मारकर विदीर्ण कर डाला ॥
तं निस्पृष्टद्रुमेणाजौ वङ्गराजस्य कुञ्जरम् ।
जघान रामः संक्रुद्धो वङ्गराजं च संयुगे ॥ ७२ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए बलरामने एक पत्रहीन वृक्षके द्वारा युद्धस्थलमें वङ्गराजके हाथी और वङ्गराजको भी कालके गालमें भेज दिया ॥ ७२ ॥
तं हत्वा रथमारुह्य धनुरुदाय वीर्यवान् ।
संकर्षणो जघानोग्रैर्नाराचैः कैशिकान् बहून् ॥ ७३ ॥
वङ्गराजका वध करके पराक्रमी संकर्षणने धनुष हाथमें ले रथपर आरूढ़ हो भयंकर नाराचोंद्वारा बहुत-से कैशिकों-का संहार कर डाला ॥ ७३ ॥
| ४४८ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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षड्भिर्निहत्य कारूषान् महेष्वासान् स वीर्यवान् ।
शतं जघान संक्रुद्धो मागधानां महाबले ॥ ७४ ॥
अत्यन्त कुपित हुए पराक्रमी बलरामने छः बाणोंसे करुष देशके अनेक महाधनुर्धरोंका वध करके मागधोंकी विशाल सेनामेंसे सौ चुने हुए वीरोंको यमलोक पहुँचा दिया॥ ७४ ॥
निहत्य तान् महाबाहुर्जरासंधं ततोऽभ्ययात् ।
तमापतन्तं विव्याध नाराचैर्मागधस्त्रिभिः ॥ ७५ ॥
उन सबका संहार करके महाबाहु बलरामने जरासंधपर धावा किया। अपनी ओर आते हुए बलरामको मगधराजने तीन नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ ७५ ॥
तं बिभेदाष्टभिः क्रुद्धो नाराचैर्मुसलायुधः ।
चिच्छेद चास्य भल्लेन ध्वजं हेमपरिष्कृतम् ॥ ७६ ॥
तब मूसलधारी बलदेवने कुपित हो आठ नाराचोंसे जरासंधको क्षत-विक्षत कर दिया और उसके सुवर्ण-भूषित ध्वजको एक भल्लसे काट गिराया ॥ ७६ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
सृजतां शरवर्षाणि निघ्नतामितरेतरम् ॥ ७७ ॥
बाणोंकी वृष्टि करते और एक-दूसरेको मारते हुए उन वीरोंमें देवासुरसंग्रामके समान घोर युद्ध होने लगा ॥ ७७ ॥
गजैर्गजा हि संक्रुद्धाः संनिपेतुः सहस्रशः ।
रथै रथाश्च संरब्धाः सादिनश्चापि सादिभिः ॥ ७८ ॥
क्रोधमें भरे हुए सहस्रों हाथी हाथियोंसे, रथ रथोंसे और रोषावेशसे युक्त घुड़सवार घुड़सवारोंसे भिड़ गये ॥ ७८ ॥
पदातयः पदातींश्च शक्तिचर्मासिपाणयः ।
छिन्दन्तश्चोत्तमाङ्गानि विचेरुर्युधि ते पृथक् ॥ ७९ ॥
हाथोंमें शक्ति, ढाल और तलवार लिये हुए पैदल वीर पैदलोंसे जूझते और उनके मस्तक काटते हुए युद्धमें पृथक्-पृथक् विचरने लगे ॥ ७९ ॥
असीनां पात्यमानानां कवचेषु महास्वनः ।
शराणां पततां शब्दः पक्षिणामिव शुश्रुवे ॥ ८० ॥
कवचोंपर गिरायी जाती हुई तलवारों और गिरते हुए बाणोंका महान् शब्द पक्षियोंके चहचहानेके समान सुनायी पड़ता था ॥ ८० ॥
भेरीशङ्खमृदङ्गानां वेणूनां च मृधे ध्वनिम् ।
जुगूह घोषः शस्त्राणां ज्याघोषश्च महात्मनाम् ॥ ८१ ॥
युद्धस्थलमें महामनस्वी वीरोंकी प्रत्यञ्चाके खींचने और शस्त्रोंके टकरानेका शब्द भेरी, शङ्ख, मृदङ्ग और वेणुओंकी ध्वनिको आच्छादित कर देता था ॥ ८१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीहरणे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीहरणविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
षष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा रुक्मीकी पराजय तथा रुक्मिणी आदिके साथ श्रीकृष्णका विवाह एवं उनसे उत्पन्न हुई संतानोंका संक्षिप्त परिचय
वैशम्पायन उवाच
कृष्णेन ह्रियमाणां तां रुक्मी श्रुत्वा तु रुक्मिणीम् ।
प्रतिज्ञामकरोत् क्रुद्धः समक्षं भीष्मकस्य ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! रुक्मीने जब सुना कि श्रीकृष्ण रुक्मिणीको हरकर लिये जा रहे हैं, उसने कुपित होकर भीष्मकके सामने ही यह प्रतिज्ञा की ॥ १ ॥
रुक्म्युवाच
अहत्वा युधि गोविन्दमनानीय च रुक्मिणीम् ।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ २ ॥
रुक्मी बोला— मैं युद्धमें श्रीकृष्णका वध किये बिना तथा रुक्मिणीको वापस लाये बिना कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा; यह मैं सत्य कहता हूँ ॥ २ ॥
आस्थाय स रथं वीरः समुद्ग्रायुधध्वजम् ।
जवेन प्रययौ क्रुद्धो बलेन महता वृतः ॥ ३ ॥
ऐसी प्रतिज्ञा करके क्रोधमें भरा हुआ वीर रुक्मी प्रचण्ड आयुध और ऊँचे ध्वजसे सुशोभित रथपर आरूढ़ हो विशाल सेनाके साथ बड़े वेगसे आगे बढ़ा ॥ ३ ॥
तमन्वयुर्नृपाश्चैव दक्षिणापथवर्तिनः ।
क्राथोऽंशुमान् श्रुतर्वा च वेणुदारिश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
भीष्मकस्य सुताश्चान्ये रथेन रथिनां वराः ।
क्रथकैशिकमुख्याश्च सर्व एव महारथाः ॥ ५ ॥
उसके पीछे दक्षिण भारतके बहुत-से नरेश, क्रथपुत्र अंशुमान्, श्रुतर्वा तथा पराक्रमी वेणुदारि भी चले। भीष्मकके अन्य पुत्र भी, जो रथियोंमें श्रेष्ठ थे, रथके द्वारा रुक्मीके साथ गये। क्रथकैशिकदेशके सभी मुख्य महारथियोंने भी रुक्मीका साथ दिया ॥ ४-५ ॥
ते गत्वा दूरमध्वानं सरितं नर्मदांमनु ।
गोविन्दं ददृशुः क्रुद्धाः सहैव प्रियया स्थितम् ॥ ६ ॥
विष्णुपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ४४९
उन सबने दूरतक रास्ता तय करके नर्मदा नदीके किनारे अपनी प्रियतमा रुक्मिणीके साथ रथपर बैठे हुए श्रीकृष्णको क्रोधपूर्वक देखा ॥ ६ ॥
अवस्थाप्य च तत्सैन्यं रुक्मी मदबलान्वितः ।
चिकीर्षुर्द्वैरथं युद्धमभ्ययान्मधुसूदनम् ॥ ७ ॥
रुक्मीको अपने बलका बड़ा घमंड था। उसने अपने साथ आयी हुई सारी सेनाको एक जगह खड़ी करके द्वैरथ युद्ध करनेकी इच्छासे स्वयं ही भगवान् मधुसूदनपर आक्रमण किया ॥ ७ ॥
स विव्याध चतुःषष्ट्या गोविन्दं निशितैः शरैः ।
तं प्रत्यविध्यत् सप्तत्या बाणैर्युधि जनार्दनः ॥ ८ ॥
उसने चौंसठ पैने बाणोंसे श्रीकृष्णको बींध डाला। तब जनार्दनने भी समरमें सत्तर बाण मारकर रुक्मीसे बदला चुका लिया ॥ ८ ॥
यतमानस्य चिच्छेद ध्वजं चास्य महाबलः ।
जहार च शिरः कायात् सारथेस्तस्य वीर्यवान् ॥ ९ ॥
महाबली और पराक्रमी श्रीकृष्णने विजयके लिये प्रयत्न-शील रुक्मीके ध्वजको काट डाला तथा उसके सारथिके सिरको धड़से काट लिया ॥ ९ ॥
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय परिवव्रुर्जनार्दनम् ।
दाक्षिणात्या जिघांसन्तो राजानः सर्व एव हि ॥ १० ॥
उसे संकटमें पड़ा जान दक्षिण दिशाके समस्त राजाओंने श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छा रखते हुए उन्हे चारों ओर-से घेर लिया ॥ १० ॥
तमंशुमान् महाबाहुर्विंव्याध दशभिः शरैः ।
श्रुतर्वा पञ्चभिः क्रुद्धो वेणुदारिश्च सप्तभिः ॥ ११ ॥
महाबाहु अंशुमान्ने दस, श्रुतर्वाने पाँच और क्रोधमें भरे हुए वेणुदारिने सात बाणोंसे उन्हे घायल कर दिया ॥
ततोऽंशुमन्तं गोविन्दो विभेदोरसि वीर्यवान् ।
निपसाद रथोपस्थे व्यथितः स नराधिपः ॥ १२ ॥
तब पराक्रमी गोविन्दने एक बाणसे अंशुमान्की छाती छेद डाली। इससे व्यथित होकर राजा अंशुमान् रथके पिछले भागमे जा बैठा ॥ १२ ॥
श्रुतर्वणो जघानाश्वांश्चतुर्भिंश्चतुरः शरैः ।
वेणुदारेर्ध्वजं छित्त्वा भुजं विव्याध दक्षिणम् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने चार बाणोंसे श्रुतर्वाके चारों घोड़ोंको मार डाला और वेणुदारिकी ध्वजा काटकर उसकी दाहिनी बाँहमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १३ ॥
तथैव च श्रुतर्वाणं शरैर्विंव्याध पञ्चभिः ।
शिश्रिये स ध्वजं शान्तो न्यषीदच्च व्यथान्वितः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार श्रुतर्वाको भी पाँच बाणोंसे घायल कर दिया। श्रुतर्वा व्यथासे पीड़ित हो ध्वजका सहारा ले शान्त हो-कर बैठ गया ॥ १४ ॥
मुञ्चन्तः शरवर्षाणि वासुदेवं ततोऽभ्ययुः ।
क्रथकैशिकमुख्याश्च सर्व एव महारथाः ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् क्रथकैशिक देशके सभी मुख्य महारथी बाणों-की वर्षा करते हुए भगवान् श्रीकृष्णपर चढ़ आये ॥ १५ ॥
बाणैर्बाणांश्च चिच्छेद तेषां युधि जनार्दनः ।
जघान चैषां संरब्धः पतमानांश्च ताञ्छरान् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा उन सबके बाण काट डाले तथा रोषावेशमें भरकर उन्होंने शत्रुओंके उन गिरते हुए बाणोंको नष्ट कर दिया ॥ १६ ॥
पुनरन्यांश्चतुःषष्ट्या जघान निशितैः शरैः ।
क्रुद्धानापततो वीरानद्विवत् स महाबलः ॥ १७ ॥
पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए उन महाबली श्रीकृष्णने पुनः चौंसठ पैने बाणोंद्वारा क्रोधमें भरकर अपने-पर आक्रमण करनेवाले शत्रुपक्षके अन्य वीरोंको मार गिराया ॥ १७ ॥
विद्रुतं स्वबलं दृष्ट्वा रुक्मी क्रोधवशंगतः ।
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैर्विंव्याधोरसि केशवम् ॥ १८ ॥
अपनी सेनाको भागती देख रुक्मी क्रोधके वशीभूत हो गया। उसने पाँच तीखे बाणोंसे श्रीकृष्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १८ ॥
सारथिं चास्य विव्याध सायकैर्निशितैस्त्रिभिः ।
आजघान शरेणास्य ध्वजं च नतपर्वणा ॥ १९ ॥
साथ ही तीन पैने सायकोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया और झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उनके ध्वज-पर भी आघात किया ॥ १९ ॥
केशवस्त्वरितं दृष्ट्वा क्रुद्धो विव्याध मार्गणैः ।
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य यतमानस्य रुक्मिणः ॥ २० ॥
रुक्मीको शीघ्रतापूर्वक बाण मारते देख श्रीकृष्ण कुपित हो उठे। उन्होंने अपने बाणोंसे रुक्मीको घायल कर दिया और विजयके लिये प्रयत्नशील हुए रुक्मीके धनुषको भी काट डाला ॥ २० ॥
अथान्यद् धनुरादाय रुक्मी कृष्णजिघांसया ।
प्रादुश्चकार चान्यानि दिव्यान्धस्त्राणि वीर्यवान् ॥ २१ ॥
फिर तो पराक्रमी रुक्मी दूसरा धनुष हाथमें लेकर श्री-कृष्णको मार डालनेकी इच्छासे दूसरे-दूसरे दिव्यास्त्र प्रकट करने लगा ॥ २१ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तस्य कृष्णो महाबलः ।
पुनश्चिच्छेद तच्चापं रथेषां च त्रिभिः शरैः ॥ २२ ॥
म० ह० १५ —
४५० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
महाबली श्रीकृष्णने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके अस्त्रोंका निवारण करके पुनः तीन बाणोंद्वारा उसके धनुष और रथके हरसेको काट डाला॥ २२॥
स च्छिन्नधन्वा विरथः खड्गमादाय चर्म च।
उत्पपात रथाद् वीरो गरुत्मानिव वीर्यवान्॥ २३॥
धनुष कट जानेपर रथहीन हुआ पराक्रमी वीर रुक्मी हाथमें ढाल और तलवार लेकर उस टूटे रथसे गरुड़की भाँति कूद पड़ा॥ २३॥
तस्याभिपतनः खड्गं चिच्छेद युधि केशवः।
नाराचैश्च त्रिभिः क्रुद्धो विभेदेनमयोरसि॥ २४॥
युद्धमें अपने सामने आते हुए रुक्मीकी तलवारको श्रीकृष्णने काट डाला और कुपित होकर तीन नाराचोंसे उसकी छाती छेद डाली॥ २४॥
स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन्।
विसंज्ञो मूर्च्छितो राजा वज्रेणेव महासुरः॥ २५॥
तब संज्ञाशून्य हुआ महाबाहु राजा रुक्मी पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ मूर्च्छित होकर गिर पड़ा, मानो कोई महान् असुर वज्रसे मारा गया हो॥ २५॥
तांश्च राज्ञः शरैः सर्वान् पुनर्विव्याध माधवः।
रुक्मिणं पतितं दृष्ट्वा व्यद्रवन्त नराधिपाः॥ २६॥
तदनन्तर माधवने पुनः अपने बाणोंद्वारा उन सब नरेशोंको घायल करना आरम्भ किया। रुक्मीको धराशायी हुआ देख सब नरेश भाग खड़े हुए॥ २६॥
विचेष्टमानं तं भूमौ भ्रातरं वीक्ष्य रुक्मिणी।
पादयोर्न्यपतद् विष्णोर्भ्रातुर्जीवितकाङ्क्षिणी॥ २७॥
अपने भाईको भूमिपर छटपटाते देख उसके जीवनकी इच्छा रखनेवाली रुक्मिणी भगवान् श्रीकृष्णके पैरोंपर गिर पड़ी॥ २७॥
तामुत्थाप्य परिष्वज्य सान्त्वयामास केशवः।
अभयं रुक्मिणे दत्त्वा प्रययौ स्वपुरीं ततः॥ २८॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और भलीभाँति सान्त्वना दी। फिर रुक्मीको अभय देकर वे अपनी पुरीको चले गये॥ २८॥
वृष्णयोऽपि जरासंधं भङ्क्त्वा तांश्चैव पार्थिवान्।
प्रययुर्द्वारकां हृष्टाः पुरस्कृत्य हलायुधम्॥ २९॥
वृष्णिवंशी भी जरासंध तथा उन राजाओंको पीछे हटाकर हर्षसे उल्लसित हो बलरामजीको आगे करके द्वारकापुरीकी ओर चल दिये॥ २९॥
प्रयाते पुण्डरीकाक्षे श्रुतवीर्येत्य संगरे।
रुक्मिणं रथमारोप्य प्रययौ स्वां पुरीं प्रति॥ ३०॥
कमलनयन श्रीकृष्णके चले जानेपर श्रुतर्वा रणभूमिमें आया और रुक्मीको रथपर बिठाकर अपनी पुरीकी ओर ले चला॥ ३०॥
अनानीय स्वसारं तु रुक्मी मानमदान्वितः।
हीनप्रतिज्ञो नैच्छत् स प्रवेष्टुं कुण्डिनं पुरम्॥ ३१॥
अभिमान और मदसे उन्मत्त रहनेवाला रुक्मी अपनी बहिनको लौटाकर न ला सका, इसलिये उसकी प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसीसे उसने कुण्डिनपुरमें प्रवेश करनेकी इच्छा नहीं की॥ ३१॥
विदर्भेषु निवासार्थं निर्ममेऽन्यत् पुरं महत्।
तद् भोजकटमित्येव बभूव भुवि विश्रुतम्॥ ३२॥
उसने विदर्भ देशमें अपने रहनेके लिये दूसरे विशाल नगरका निर्माण किया, जो इस भूतलपर भोजकटके नामसे विख्यात हुआ॥ ३२॥
तत्रौजसा महातेजा दक्षिणां दिशमन्वगात्।
भीष्मकः कुण्डिने चैव राजोवास महाभुजः॥ ३३॥
उस महातेजस्वी वीरने वहाँ बलपूर्वक रहकर दक्षिण दिशाका शासन किया और महाबाहु राजा भीष्मक कुण्डिनपुरमें रहने लगे॥ ३३॥
द्वारकां चापि सम्प्राप्ते रामे वृष्णिबलान्विते।
रुक्मिण्याः केशवः पाणिं जग्राह विधिवत् प्रभुः॥ ३४॥
वृष्णिवंशियोंकी सेनाके साथ जब बलरामजी द्वारकामे पहुँचे, तब भगवान् श्रीकृष्णने विधिपूर्वक रुक्मिणीका पाणिग्रहण किया॥ ३४॥
ततः सह तया रेमे प्रियया प्रीयमाणया।
सीतयेव पुरा रामः पौलोम्येव पुरंदरः॥ ३५॥
पूर्वकालमें जैसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और देवराज इन्द्र पुलोमकुमारी शचीके साथ सानन्द रमण करते थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न हुई प्रिय पत्नी रुक्मिणीके साथ रमण करने लगे॥ ३५॥
सा हि तस्याभवज्ज्येष्ठा पत्नी कृष्णस्य भामिनी।
पतिव्रता गुणोपेता रूपशीलगुणान्विता॥ ३६॥
वह श्रीकृष्णकी ज्येष्ठ पत्नी थी। भामिनी रुक्मिणी पतिव्रता, सद्गुणवती, रूपवती, सुशीला तथा अन्यान्य उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ३६॥
तस्यामुत्पादयामास पुत्रान् दश महारथान्।
चारुदेष्णं सुदेष्णं च प्रद्युम्नं च महाबलम्॥ ३७॥
सुषेणं चारुगुप्तं च चारुबाहुं च वीर्यवान्।
चारुविन्दं सुचारुं च भद्रचारुं तथैव च॥ ३८॥
चारुं च वलिनां श्रेष्ठं सुतां चारुमतीं तथा।
धर्मार्थकुशलास्ते तु कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः॥ ३९॥
विष्णुपर्व ] एकषष्टितमोऽध्यायः [ ४५१
बल और पराक्रमसे युक्त श्रीकृष्णने रुक्मिणीके गर्भसे दस पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम इस प्रकार हैं—चारुदेष्ण, सुदेष्ण, महाबली प्रद्युम्न, सुषेण, चारुगुप्त, चारुबाहु, चारुविन्द, सुचारु, भद्रचारु तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ चारु। इनके सिवा एक कन्याको भी उन्होंने जन्म दिया, जिसका नाम चारुमती था। ये सभी पुत्र धर्म और अर्थमें कुशल, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले वीर थे॥ ३७-३९॥
महिषीरष्ट कल्याणीस्ततोऽन्या मधुसूदनः।
उपयेमे महाबाहुर्गुणोपेताः कुलोद्भवाः॥ ४०॥
कालिन्दीं मित्रविन्दां च सत्यां नाग्नजितीमपि।
सुतां जाम्बवतश्चापि रोहिणीं कामरूपिणीम्॥ ४१॥
मद्रराजसुतां चापि सुशीलां शुभलोचनाम्।
सत्राजितीं सत्यभामां लक्ष्मणां चारुहासिनीम्॥ ४२॥
शैब्यस्य च सुतां तन्वीं रूपेणाप्सरसोपमाम्।
स्त्रीसहस्राणि चान्यानि षोडशातुलविक्रमः॥ ४३॥
उपयेमे हृषीकेशः सर्वा भेजे स ताः समम्।
तदनन्तर महाबाहु मधुसूदनने कल्याणस्वरूपा सद्गुणवती तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई अन्य आठ पटरानियोंके साथ विवाह किया, जिनके नाम इस प्रकार हैं—१. (सूर्य-पुत्री) कालिन्दी, २. (श्रीकृष्णकी बुआ राजाधिदेवीके गर्भसे अवन्ती देशमें उत्पन्न हुई) मित्रविन्दा, ३. (अयोध्यानरेश) नग्नजित्की पुत्री सत्या, ४. जाम्बवान्की पुत्री जाम्बवती, ५. इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली रोहिणी (जिसका दूसरा नाम मद्रा था। केकयनरेशकी पुत्री होनेसे यही कैकेयी कहलाती थी। यह श्रीकृष्णकी बुआ श्रुतकीर्तिकी कन्या थी।), ६. मद्रराजकी सुशीला एवं शुभलोचना पुत्री मनोहर मुसकानवाली लक्ष्मणा, ७. सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा, ८. राजा शैब्यकी तन्वङ्गी पुत्री (गान्धारी), जो रूपमें अप्सराके समान थी। इनके सिवा सोलह हजार और स्त्रियाँ थीं। उन सबके साथ अतुल पराक्रमी श्रीकृष्णने एक ही समय उतने ही रूप धारण करके विवाह किया था॥ ४०-४३½॥
परार्घ्यवस्त्राभरणाः कामैः सर्वैः सुखोचिताः।
जज्ञिरे तासु पुत्राश्च तस्य वीराः सहस्रशः॥ ४४॥
उन सबके वस्त्र और आभूषण बहुमूल्य थे। वे सब-के-सब सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा सुख भोगनेके योग्य थीं। उन सबके गर्भसे श्रीकृष्णके सहस्रों वीर पुत्र उत्पन्न हुए थे॥ ४४॥
शास्त्रार्थकुशलाः सर्वे बलवन्तो महारथाः।
यज्वानः पुण्यकर्माणो महाभागा महाबलाः॥ ४५॥
वे सभी पुत्र शास्त्रार्थकुशल, बलवान्, महारथी, यज्ञकर्ता, पुण्यकर्मा, महान् भाग्यशाली तथा महाबली थे॥ ४५॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीहरणं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीहरणविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥
एकषष्टितमोऽध्यायः
रुक्मीकी पुत्री शुभाङ्गीद्वारा स्वयंवरमें प्रद्युम्नका वरण, प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धका रुक्मीकी पौत्री रुक्मवतीके साथ विवाह तथा बलरामद्वारा रुक्मीका वध
वैशम्पायन उवाच
ततः काले व्यतीते तु रुक्मी महति वीर्यवान्।
दुहितुः कारयामास स्वयंवरमरिंदमः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत हो जानेके पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले पराक्रमी वीर रुक्मीने अपनी पुत्रीका स्वयंवर रचाया॥ १॥
तत्राहूता हि राजानो राजपुत्राश्च रुक्मिणा।
समाजग्मुर्महावीर्या नानादिग्भ्यः श्रियान्विताः॥ २॥
उसमें रुक्मीका बुलावा पाकर विभिन्न दिशाओंसे बहुतेरे महापराक्रमी श्रीसम्पन्न राजा और राजकुमार आये॥ २॥
तत्राजगाम प्रद्युम्नः कुमारैरपरैर्वृतः।
सा हि तं चकमे कन्या स च तां शुभलोचनाम्॥ ३॥
वहाँ बहुत-से अन्य यदुकुमारोंके साथ प्रद्युम्न भी आये थे। रुक्मीकी कन्या उन्हें चाहती थी और प्रद्युम्न भी उस शुभलोचना राजकुमारीको पानेकी इच्छा रखते थे॥ ३॥
शुभाङ्गी नाम वैदर्भी कान्तिद्युतिसमन्विता।
पृथिव्यामभवत् ख्याता रुक्मिणस्तनया तदा॥ ४॥
उस विदर्भ-राजकुमारीका नाम था शुभाङ्गी। वह कान्ति और शोभासे सम्पन्न थी। रुक्मीकी वह कन्या उन दिनों अपने रूप-सौन्दर्यके लिये समस्त भूमण्डलमें विख्यात थी॥ ४॥
उपविष्टेषु सर्वेषु पार्थिवेषु महात्मसु।
वैदर्भी वरयामास प्रद्युम्नमरिसूदनम्॥ ५॥
जब सभी महामनस्वी भूपाल स्वयंवरसभामें बैठ गये,
| ४५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तब उस विदर्भराजकुमारीने आकर शत्रुसूदन प्रद्युम्नका वरण कर लिया ॥ ५ ॥
स हि सर्वास्त्रकुशलः सिंहसंहननो युवा ।
रूपेणाप्रतिमो लोके केशवस्यात्मजोऽभवत् ॥ ६ ॥
प्रद्युम्न सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञान एवं प्रयोगमें कुशल थे । उनका शरीर सिंहके समान सुदृढ़ था । वे नवयुवक थे । रूपमें श्रीकृष्णके उस पुत्रकी समानता करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं था ॥ ६ ॥
वयोरूपगुणोपेता राजपुत्री च साभवत् ।
नारायणीवेन्द्रसेना जातकामा च तं प्रति ॥ ७ ॥
वह राजकुमारी भी नयी अवस्था, सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी । जैसे नारायणी इन्द्रसेना अपने पति महर्षि मुद्गलके प्रति प्रेम करती थी, उसी प्रकार शुभाङ्गी भी प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त थी ॥ ७ ॥
वृत्ते स्वयंवरे जग्मू राजानः स्वपुराणि ते ।
उपादाय च वैदर्भीं प्रद्युम्नो द्वारकां ययौ ॥ ८ ॥
स्वयंवर समाप्त हो जानेपर सब राजा अपने-अपने नगरको चले गये और प्रद्युम्न उस विदर्भराजकुमारीको साथ लेकर द्वारका चले आये ॥ ८ ॥
रेमे सह तया वीरो दमयन्त्या नलो यथा ।
स तस्यां जनयामास देवगर्भोपमं सुतम् ॥ ९ ॥
वीर प्रद्युम्न उसके साथ उसी प्रकार रमण करने लगे, जैसे राजा नल दमयन्तीके साथ करते थे । उन्होंने वैदर्भीके गर्भसे देवकुमारके समान तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया ॥ ९ ॥
अनिरुद्धमिति ख्यातं कर्मणाप्रतिमं भुवि ।
धनुर्वेदे च वेदे च नीतिशास्त्रे च पारगम् ॥ १० ॥
उसका नाम था अनिरुद्ध । वह अपने पराक्रमपूर्ण कार्यद्वारा भूमण्डलमें अनुपम वीर माना जाता था । वह धनुर्वेद, वेद तथा नीतिशास्त्रका पारंगत विद्वान् था ॥ १० ॥
अभवत् स यदा राजन्ननिरुद्धो वयोऽन्वितः ।
तदास्य रुक्मिणः पौत्रीं रुक्मिणी रुक्मसंनिभाम् ।
पत्न्यर्थे वरयामास नाम्ना रुक्मवतीति सा ॥ ११ ॥
राजन् ! जब अनिरुद्ध युवावस्थासे सम्पन्न हुए, तब रुक्मिणीने उनकी पत्नी बनानेके लिये रुक्मीकी पौत्रीको, जो सुवर्णके समान गौर वर्णवाली थी, उससे माँगा । उसका नाम था रुक्मवती ॥ ११ ॥
अनिरुद्धगुणैर्दातुं कृतबुद्धिर्नृपस्ततः ।
प्रीत्या हि रौक्मिणेयस्य रुक्मिण्याश्चाप्युपग्रहात् ॥ १२ ॥
विस्पर्द्धन्नपि कृष्णेन वैरं त्यज्य महायशाः ।
ददामीत्यब्रवीद् राजा प्रीतिमाञ्जनमेजय ॥ १३ ॥
जनमेजय ! राजा रुक्मी अनिरुद्धके गुणोंसे ही आकृष्ट होकर अपनी पौत्रीका विवाह उनके साथ करना चाहता था, अतः रुक्मिणीके आग्रहसे उसे राजी रखनेके लिये तथा प्रद्युम्नकी प्रसन्नताके निमित्त उस महायशस्वी राजाने श्रीकृष्णके साथ स्पर्धा रखते हुए भी वैर त्यागकर प्रसन्नतापूर्वक कहा कि 'मैं अपनी पौत्री अनिरुद्धके लिये दे रहा हूँ' ॥ १२-१३ ॥
केशवः सह रुक्मिण्या पुत्रैः संकर्षणेन च ।
अन्यैश्च वृष्णिभिः सार्द्धं विदर्भान् सयलो ययौ ॥ १४ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी, प्रद्युम्न आदि पुत्रगण, भैया बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशी योद्धाओंके साथ सेनासहित विदर्भदेशमें गये ॥ १४ ॥
संयुक्ता भ्रातयश्चैव रुक्मिणः सुहृदश्च ये ।
आहूता रुक्मिणा तेऽपि तत्राजग्मुर्नर्राधिपाः ॥ १५ ॥
उस विवाहोत्सवमें रुक्मीके भाई-बन्धु और सुहृद् नरेश भी उसका निमन्त्रण पाकर वहाँ आये थे ॥ १५ ॥
शुभे तिथौ महाराज नक्षत्रे चाभिपूजिते ।
विवाहः सोऽनिरुद्धस्य बभूव परमोत्सवः ॥ १६ ॥
महाराज ! शुभ तिथि तथा उत्तम नक्षत्रमें अनिरुद्धका वह परम उत्सवमय विवाह-कार्य सम्पन्न हुआ ॥ १६ ॥
पाणौ गृहीते वैदर्भ्यास्त्वनिरुद्धेन तत्र वै ।
वैदर्भायादवानां च बभूव परमोत्सवः ॥ १७ ॥
जब अनिरुद्धने विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीका पाणिग्रहण किया, उस समय विदर्भनिवासियों तथा यादवोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ ॥ १७ ॥
रेमिरे वृष्णयस्तत्र पूज्यमाना यथामराः ।
अथाश्मकानामधिपो वेणुदारिरुदारधीः ॥ १८ ॥
अक्षः श्रुतर्वा चाणूरः क्राथदन्तैर्वांशुमानपि ।
जयत्सेनः कलिङ्गानामधिपश्च महाबलः ॥ १९ ॥
पाण्ड्यश्च नृपतिः श्रीमान्नृपीकाधिपतिस्तथा ।
एते सम्बन्धय राजानो दाक्षिणात्या महर्द्धयः ॥ २० ॥
अभिगम्याब्रुवन् सर्वे रुक्मिणं रहसि प्रभुम् ।
वैदर्भोद्वारा पूजित हुए यदुवंशी वहाँ देवताओंके समान आनन्दपूर्वक रम रहे थे । इसी समय अश्मक देशका अधिपति उदारबुद्धि वेणुदारि, अक्ष, श्रुतर्वा, चाणूर, क्रथपुत्र अंशुमान्, कलिङ्गदेशका अधिपति जयत्सेन, राजा पाण्ड्य तथा श्रीमान् ऋषीकनरेश—ये सब अत्यन्त समृद्धिशाली दाक्षिणात्य नरेश एकान्तमे सामर्थ्यशाली रुक्मीके पास जाकर बोले—॥ १८-२०३ ॥
भवानक्षेषु कुशलो वयं चापि रिरंसवः ॥ २१ ॥
प्रियद्यूतश्च रामोऽसावक्षेप्वनिपुणोऽपि च ।
'आप अक्षविद्या (द्यूत) में कुशल हैं और हमलोग भी द्यूतक्रीड़ाकी इच्छा रखते हैं । उधर बलराम द्यूतक्रीड़ामें निपुण न होनेपर भी उससे प्रेम रखते हैं ॥ २१३ ॥
विष्णुपर्व ] एकषष्टितमोऽध्यायः [ ४५३
ते भवन्तं पुरस्कृत्य जेतुमिच्छाम तं वयम् ।
इत्युक्तो रोचयामास रुक्मी द्यूतं महारथः ॥ २२ ॥
'अतः हम चाहते हैं कि आपको आगे करके बलरामको द्यूतक्रीड़ाद्वारा जीत लें।' उनके ऐसा कहनेपर महारथी रुक्मीको जुआ खेलनेकी बात पसंद आ गयी ॥ २२ ॥
ते शुभां काञ्चनस्तम्भां कुसुमैर्धूपिताजिराम् ।
सभामाविविशुर्हृष्टाः सिक्तां चन्दनवारिणा ॥ २३ ॥
तदनन्तर वे समस्त भूपाल बड़े हर्षके साथ सुन्दर द्यूत-सभामें प्रविष्ट हुए, जिसमें सोनेके खम्भे लगे थे और जिसके आँगनको फूलोंसे सजाया गया था। उस सभामें चन्दनके जलसे छिड़काव किया गया था ॥ २३ ॥
तां प्रविश्य ततः सर्वे शुभ्रस्रगनुलेपनाः ।
सौवर्णेष्वासनेष्वासांचक्रिरे विजिगीषवः ॥ २४ ॥
सुन्दर माला और चन्दनसे अलंकृत हो उस सभामें प्रवेश करके वे सभी राजा सोनेके सिंहासनोंपर बैठ गये। उन सबकी यही इच्छा थी कि हम बलभद्रको जीत लें ॥ २४ ॥
आहूतो बलदेवस्तु कितवैरक्षकौविदैः ।
बाढमित्यब्रवीद्धृष्टः सह दीव्याम पण्यताम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर द्यूतक्रीड़ामें निपुण जुआरियोंद्वारा बलदेवजीको आमन्त्रित किया गया। वे 'बहुत अच्छा' कहकर प्रसन्नतापूर्वक बोले—'अच्छा, हमलोग साथ-साथ खेलें। आपलोग दाँव लगाइये' ॥ २५ ॥
निकृत्या विजिगीषन्तो दाक्षिणात्या नराधिपाः ।
मणिमुक्ताः सुवर्णं च तत्रानिन्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥
छलसे जीतनेकी इच्छा रखनेवाले दाक्षिणात्य नरेश वहाँ सहस्रों मणि, मोती एवं सुवर्ण ले आये ॥ २६ ॥
ततः प्रावर्तत द्यूतं तेषां रतिविनाशनम् ।
कलहस्यास्पदं घोरं दुर्मतीनां क्षयावहम् ॥ २७ ॥
फिर तो उनमें द्यूत आरम्भ हुआ, जो पारस्परिक प्रेमका नाश करनेवाला एवं कलहका घोर स्थान है तथा दुर्बुद्धि पुरुषोंका संहार करनेवाला है ॥ २७ ॥
निष्काणां च सहस्राणि सुवर्णस्य दशादितः ।
रुक्मिणा सह सम्पाते बलदेवो ग्लहं ददौ ॥ २८ ॥
बलदेवजीने रुक्मीके साथ जुआ खेलते समय पहले दस हजार सोनेकी मोहरें दाँवपर रखीं ॥ २८ ॥
तं जिगाय ततो रुक्मी यतमानं महाबलम् ।
तावदेवापरं भूयो बलदेवं जिगाय सः ॥ २९ ॥
महाबली बलदेव जीतनेका प्रयत्न करते ही रह गये, परंतु रुक्मीने उस दाँवको जीत लिया। तत्पश्चात् उसने पुनः बलदेवका उतना ही सुवर्ण जीता ॥ २९ ॥
असकृज्जीयमानस्तु रुक्मिणा केशवाग्रजः ।
सुवर्णकोटीर्जग्राह ग्लहं तस्य महात्मनः ॥ ३० ॥
रुक्मीके द्वारा वारंवार जीते जानेपर श्रीकृष्णके बड़े भाई बलरामने उस महामनस्वी रुक्मीके दाँवपर एक करोड़ सुवर्णमुद्राएँ लेकर रक्खीं ॥ ३० ॥
जितमित्येव हृष्टोऽथ तमाहूतिरभाषत ।
श्लाघ्यमानश्च चिक्षेप प्रहसन् मुसलायुधम् ॥ ३१ ॥
रुक्मी अत्यन्त कुटिल था। वह हर्षमें भरकर बोल उठा—'मैंने ही जीता।' सब राजा उसकी प्रशंसा करने लगे। उसने हँसते हुए वहाँ मुसलधारी बलरामजीपर आक्षेप किया—॥ ३१ ॥
अविद्यो दुर्बलः श्रीमान् हिरण्यममितं मया ।
अजेयो बलदेवोऽयमक्षद्यूते पराजितः ॥ ३२ ॥
'ये श्रीमान् बलदेव विद्याहीन एवं दुर्बल हैं। ये अजेय बनते थे; परंतु आज इस अक्षद्यूतमें मुझसे पराजित हो गये। मैंने इनसे असंख्य सुवर्ण जीता है' ॥ ३२ ॥
कलिङ्गराजस्तच्छ्रुत्वा प्रजहास भृशं तदा ।
दन्तान् संदर्शयन् हृष्टस्तत्राक्रुद्ध्यद्धलायुधः ॥ ३३ ॥
रुक्मीकी वह बात सुनकर कलिङ्गराज हर्षसे उल्लसित हो उठा। वह अपने दाँत दिखा-दिखाकर जोर-जोरसे हँसने लगा। तब वहाँ बलरामजी कुपित हो उठे ॥ ३३ ॥
रुक्मिणस्तद् वचः श्रुत्वा पराजयनिमित्तजम् ।
निगृह्यमाणस्तीक्ष्णाभिर्वाग्भिर्भीष्मकसूनुना ॥ ३४ ॥
रोषमाहारयामास जितरोषोऽपि धर्मवित् ।
संक्रुद्धो घर्षणं प्राप्य रौहिणेयो महाबलः ॥ ३५ ॥
रुक्मीके उस वचनको, जो बलदेवजीकी पराजयको निमित्त बनाकर कहा गया था, जब उन्होंने सुना और जब भीष्मकपुत्र रुक्मी अपने तीखे वचनोंसे उन्हें निगृहीत करने लगा, तब महाबली रोहिणीकुमार बलरामजी उस तिरस्कारको पाकर अत्यन्त कुपित हो उठे। यद्यपि वे धर्मज्ञ थे, उन्होंने रोषपर विजय भी पायी थी, तो भी उस समय उनके मनमें बड़ा भारी रोष हुआ ॥ ३४-३५ ॥
धैर्यान्मनः संनिधाय ततो वचनमब्रवीत् ।
दशकोटिसहस्राणि ग्लह एको ममापरः ॥ ३६ ॥
एनं सम्परिगृह्णीष्व पातयाक्षान् नराधिप ।
कृष्णाक्षांल्लोहिताक्षांश्च देशेऽस्मिंस्त्वधिपांसुले ॥ ३७ ॥
इत्येवमाह्वयामास रुक्मिणं रोहिणीसुतः ।
इतनेपर भी उन्होंने धैर्यपूर्वक मनको काबूमें किया और इस प्रकार कहा—'विदर्भनरेश्वर ! दस सहस्र कोटि स्वर्ण मुद्राओंका यह मेरा एक दूसरा दाँव है। इसे ग्रहण करो और इस अधिक रजोगुणी देश-कालमें तुम काले और लाल पासे
| ४५४ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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फेंको।' ऐसा कहकर रोहिणीकुमार बलरामने पुनः जुआ खेलनेके लिये ललकारा ॥ ३६-३७½ ॥
अनुक्त्वा वचनं किंचिद् वाढमित्यब्रवीत् पुनः ॥ ३८ ॥
अक्षान् रुक्मी ततो हृष्टः पातयामास पार्थिवः ।
इसके उत्तरमें राजा रुक्मीने कोई दूसरी बात न कहकर फिर इतना ही कहा कि 'बहुत अच्छा।' इसके बाद उसने हर्षपूर्वक पासे फेंके ॥ ३८½ ॥
चातुरक्षे तु निर्वृत्ते निर्जितस्य नराधिपः ॥ ३९ ॥
बलदेवेन धर्मेण नेत्युवाच ततो बलम् ।
उस समय चार अंकवाला पासा गिरा। उसके अनुसार बलदेवजीने धर्मतः उसे हरा दिया था, तो भी उस नरेशने बलदेवजीसे यही कहा कि 'आपकी विजय नहीं हुई है' ३९½
धैर्येणमनः समाधाय स न किंचिदुवाच ह ॥ ४० ॥
बलदेवं ततो रुक्मी मया जितमिति स्मयन् ।
बलरामजीने पुनः अपने मनको धैर्यपूर्वक काबूमें करके कोई बात नहीं कही। तब रुक्मीने मुसकराते हुए बलरामजीसे कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता है' ॥ ४०½ ॥
बलदेवस्तु तच्छ्रुत्वा जिह्मं वाक्यं नराधिप ॥ ४१ ॥
भूयः क्रोधसमाविष्टो नोत्तरं व्याजहार ह ।
नरेश्वर ! उसकी यह कुटिलतापूर्ण बात सुनकर बलदेवजीको पुनः बड़ा क्रोध हुआ, तथापि उन्होंने उसे कोई उत्तर नहीं दिया ॥ ४१½ ॥
ततो गम्भीरनिर्घोषा वागुवाचाशरीरिणी ॥ ४२ ॥
बलदेवस्य तं क्रोधं वर्धयन्ती महात्मनः ।
तब गम्भीर घोषके साथ वहाँ आकाशवाणी हुई, जो महात्मा बलदेवके क्रोधको बढ़ानेवाली थी ॥ ४२½ ॥
सत्यमाह बलः श्रीमान् धर्मेणैष पराजितः ॥ ४३ ॥
अनुक्त्वा वचनं किंचित् प्राप्तो भवति कर्मणा ।
मनसा समनुज्ञातं तत् स्यादित्यवगम्यताम् ॥ ४४ ॥
'श्रीमान् बलदेवजी सत्य कहते हैं। यह रुक्मी धर्मतः पराजित हो चुका है ! यद्यपि इसने दाँव लगाते समय कोई बात नहीं कही थी तो भी इसने जो पासा फेंकने आदिका कर्म किया, उससे उस दाँवमें इसका सहयोग स्वतः सिद्ध हो जाता है। इसने मनसे उस दाँवको स्वीकार कर लिया था, ऐसा समझना चाहिये' ॥ ४३-४४ ॥
इति श्रुत्वा वचस्तथ्यमन्तरिक्षात् सुभाषितम् ।
संकर्षणस्तथोत्थाय सौवर्णेनोरुणा बली ॥ ४५ ॥
रुक्मिण्या भ्रातरं ज्येष्ठं निजघान महीतले ।
आकाशसे सुन्दर ढंगसे कहा गया यह यथार्थ वचन सुनकर बलवान् संकर्षण उठकर खड़े हो गये और उन्होंने सोनेके बने हुए विशाल अष्टापदके द्वारा रुक्मिणीके बड़े भाई रुक्मीको पृथ्वीपर मार गिराया ॥ ४५½ ॥
विवादे कुपितो रामः क्षेप्तारं किल रुक्मिणम् ।
अघानाष्टापदेनैव प्रमथ्य यदुनन्दनः ॥ ४६ ॥
विवादमें कुपित हुए यदुनन्दन बलरामने अपने ऊपर आक्षेप करनेवाले रुक्मीको पटककर अष्टापदसे ही मार डाला।
ततोऽपसृत्य संक्रुद्धः कलिङ्गाधिपतेरपि ।
दन्तान् बभञ्ज संरम्भादुन्ननाद च सिंहवत् ॥ ४७ ॥
वहाँसे हटकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए संकर्षणने कलिङ्गराज जयत्सेनके सारे दाँत तोड़ डाले तथा रोषसे वे सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ४७ ॥
खड्गमुद्यम्य तान्सर्वालासयामास पार्थिवान् ।
स्तम्भं सभायाः सौवर्णमुत्पाट्य बलिनां वरः ॥ ४८ ॥
इसके बाद उन्होंने तलवार उठाकर समस्त राजाओंको भयभीत कर दिया। फिर द्यूतसभाके सुवर्णमय खम्भको उखाड़कर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजी आगे बढ़े ॥ ४८ ॥
गजेन्द्र इव तं स्तम्भं कर्षन् संकर्षणस्ततः ।
निर्जगाम सभाद्वारात् त्रासयामास कैशिकान् ॥ ४९ ॥
गजराजके समान उस खंभेको खींचकर लिये जाते हुए संकर्षण जब सभाद्वारसे बाहर निकले, तब उन्होंने समस्त कैशिकोंको भयभीत कर दिया ॥ ४९ ॥
रुक्मिणं निकृतिप्रज्ञं स हत्वा यादवर्षभः ।
वित्रास्य विक्षिपः सर्वान् सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ५० ॥
इस प्रकार छल-कपटमे चतुर रुक्मीको मारकर यादवप्रवर बलरामने समस्त शत्रुओंको उसी तरह भयमें डाल दिया, जैसे सिंह छोटे पशुओंको भयभीत कर देता है ॥ ५० ॥
जगाम शिविरं रामः स्वयमेव जनावृतः ।
न्यवेदयत् स कृष्णाय तत्र सर्वं यथाभवत् ॥ ५१ ॥
तदनन्तर स्वजनोंसे घिरे हुए बलराम अपने शिविरमें गये और द्यूतसभा में जो कुछ हुआ था, वह सब स्वयं ही उन्होंने श्रीकृष्णको बता दिया ॥ ५१ ॥
नोवाच स तदा कृष्णः किंचिद् रामं महाद्युतिः ।
निगृह्य च तदाऽऽत्मानं कृच्छ्रादश्रूण्यवर्तयत् ॥ ५२ ॥
उस समय महातेजस्वी श्रीकृष्णने बलरामजीसे कुछ नहीं कहा; वे अपने आपको किसी तरह सँभालकर बड़े कष्टसे आँसू बहाने लगे ॥ ५२ ॥
न हतो वासुदेवेन यः पूर्वं परवीरहा ।
ज्येष्ठो भ्राताथ रुक्मिण्या रुक्मिणीस्नेहकारणात् ५३
१. अमरकोषके अनुसार शारिफल (शतरंज या चौसरकी बिछौत अथवा बिसात) को अष्टापद कहते हैं।
विष्णुपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः ४५५
स रामकरमुक्तेन निहतो द्यूतमण्डले।
अष्टापदेन बलवान् राजा वज्रधरोपमः ॥ ५४ ॥
भगवान् वासुदेवने पहले रुक्मिणीके प्रति स्नेहके कारण उसके जिस बड़े भाईको नहीं मारा था, वही वज्रधारी इन्द्रके समान बलवान् एवं शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला राजा रुक्मी बलरामजीके हाथसे छूटे हुए अष्टापदके द्वारा मार डाला गया ॥
तस्मिन् हते महावीर्ये नृपतौ भीष्मकात्मजे।
द्रुमभार्गवतुल्ये वै द्रुमभार्गवशिक्षिते ॥ ५५ ॥
कृतौ च युद्धकुशले नित्ययाजिनि पातिते।
वृष्ण्यन्धकाश्चैव सर्वे विमनसोऽभवन् ॥ ५६ ॥
भीष्मकपुत्र राजा रुक्मी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। वह द्रुम और परशुरामजीसे अस्त्र-शिक्षा पाकर उन्हीं दोनोंके समान पराक्रमी हो गया था। रुक्मी विद्वान्, युद्ध-कुशल और नित्य यज्ञ करनेवाला था। उसके मारे जानेपर वृष्णि और अन्धकवंशके सभी वीर उदास हो गये ॥ ५५-५६ ॥
वैशम्पायन उवाच
रुक्मिणी च महाभागा विलपन्त्यार्तया गिरा।
विलपन्तीं तथा दृष्ट्वा सान्त्वयामास केशवः ॥ ५७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! (भाईके मारे जानेसे) महाभागा रुक्मिणी आर्तवाणीमें विलाप करने लगीं। उन्हें रोती-बिलखती देख भगवान् कृष्णने सान्त्वना दी॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं रुक्मिणो निधनं यथा।
वैरस्य च समुत्थानं वृष्णिभिर्भरतर्षभ ॥ ५८ ॥
भरतश्रेष्ठ ! यह मैंने तुम्हे रुक्मीके वधका यथावत् वृत्तान्त बताया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उसका वृष्णिवंशियोंके साथ किस प्रकार वैर हुआ था ? ॥
वृष्णयोऽपि महाराज धनान्यादाय सर्वशः।
रामकृष्णौ समाश्रित्य ययुर्द्वारवतीं प्रति ॥ ५९ ॥
महाराज ! वृष्णिवंशी भी वहाँसे सब प्रकारके धन लेकर बलराम और श्रीकृष्णका आश्रय ले द्वारकापुरीको चले गये ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिवधो नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मीका वधविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
द्विषष्टितमोऽध्यायः
बलदेवजीका माहात्म्य, उनके द्वारा हस्तिनापुरको गङ्गामें गिरानेका अद्भुत प्रयत्न
राजोवाच
भूय एव तु विप्रर्षे बलदेवस्य धीमतः।
माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि शेषस्य धरणीभृतः ॥ १ ॥
राजाने कहा—ब्रह्मर्षे ! धरतीको धारण करनेवाले शेषके अवतार बुद्धिमान् बलरामके माहात्म्यको मैं पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
अतीव बलदेवं तं तेजोराशिनिर्जितम्।
कथयन्ति महात्मानं ये पुराणविदो जनाः ॥ २ ॥
जो पुराणवेत्ता पुरुष हैं, वे महात्मा बलदेवको अत्यन्त तेजकी राशि और अपराजित बताते हैं ॥ २ ॥
तस्य कर्माण्यहं विप्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
अनन्तं यं विदुर्नागमादिदेवं महौजसम् ॥ ३ ॥
विप्रवर ! मैं उनके कर्मोंको पुनः यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ, जिन्हें विद्वान् पुरुष महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न आदिदेव अनन्त नागके रूपमे जानते हैं ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुराणे नागराजोऽसौ पठ्यते धरणीधरः।
शेषस्तेजोनिधिः श्रीमानकम्प्यः पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
योगाचार्यो महावीर्यो देवमन्त्रमुखो बली।
जरासंधं गदायुद्धे जितवान् यो न चावधीत् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुराणमें बलभद्रजीको साक्षात् नागराज धरणीधर शेष बताया जाता है। वे तेजकी निधि, दिव्य शोभासे सम्पन्न, कभी कम्पित न होनेवाले और पुरुषोत्तम हैं। वे योगके आचार्य, महापराक्रमी, बलवान् तथा देवताओंकी गुप्त मन्त्रणाको सुनने और उसपर विचार करनेवालोंमें प्रधान हैं। उन्होंने गदा-युद्धमे जरासंधको जीत लिया, परंतु उसका वध नहीं किया ॥
बहवश्चैव राजानः प्रथिताः पृथिवीतले।
अन्वयुर्मागधं सर्वे ते चापि विजिता रणे ॥ ६ ॥
भूतलके बहुत-से विख्यात राजा, जो सबके सब मगध-राज जरासंधका अनुसरण करते थे, युद्धमे बलदेवजीके द्वारा परास्त कर दिये गये ॥ ६ ॥
नागायुतबलप्राणो भीमो भीमपराक्रमः।
असकृद् बलदेवेन बाहुयुद्धे पराजितः ॥ ७ ॥
जिनमें दस हजार हाथियोंका बल था, वे भयानक पराक्रमी भीमसेन बाहुयुद्धमें बलदेवजीके द्वारा अनेक बार पराजित हो चुके थे ॥ ७ ॥
दुर्योधनस्य कन्यां तु हरमाणो न्यगृह्यत।
साम्बो जाम्बवतीपुत्रो नगरे नागसाह्वये ॥ ८ ॥
राजभिः सर्वतो रुद्धे हरमाणे बलात् किल।
४५६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
एक समय दुर्योधनकी पुत्री लक्ष्मणाका अपहरण करते हुए जाम्बवतीकुमार साम्बको कौरवोंने हस्तिनापुरमे कैद कर लिया। यह नगर सब ओरसे राजाओंद्वारा घिरा हुआ था। कहते हैं, साम्ब बलपूर्वक उस कन्याको ले जा रहे थे, इसलिये उन्हें बंदी बनाया गया ॥ ८½ ॥
तदुपश्रुत्य संरुद्धमाजगाम महाबलः ॥ ९ ॥
रामस्तस्य तु मोक्षार्थमागतो नालभच्च तम्।
साम्बको कैद कर लिया गया है, यह सुनकर महाबली बलराम उन्हें छुड़ानेके लिये आये; परंतु वे शान्तिपूर्वक माँगनेपर साम्बको न पा सके ॥ ९½ ॥
ततश्चुक्रोध बलवानद्भुतं चाकरोन्महत् ॥ १० ॥
अनिवार्यमभेद्यं च दिव्यमप्रतिमं बले।
लाङ्गलास्त्रं समुद्यम्य ब्रह्ममन्त्राभिमन्त्रितम् ॥ ११ ॥
प्राकारवप्रे विन्यस्य पुरस्य च महाद्युतिः।
प्रक्षेप्तुमैच्छद् गङ्गायां नगरं कौरवस्य तत् ॥ १२ ॥
तब बलवान् बलराम कुपित हो उठे और उन्होंने वहाँ एक महान् अद्भुत कार्य कर दिखाया। महातेजस्वी बलरामजीने, जो किसीके द्वारा भी निवारण या भेदन करनेयोग्य नहीं है, उस अप्रतिम शक्तिशाली दिव्य हल नामक अस्त्रको उठाकर उसे ब्रह्ममन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और कौरवनगर हस्तिनापुरके परकोटेकी नींवमे धँसाकर समूचे नगरको गङ्गाजीमें उलट देनेकी इच्छा की ॥ १०–१२ ॥
तद् विघूर्णितमालक्ष्य पुरं दुर्योधनो नृपः।
साम्बं निर्यांतयामास सभार्यं तस्य धीमतः ॥ १३ ॥
अपने नगरको चक्कर काटता देख राजा दुर्योधनने तुरंत आकर बुद्धिमान् बलदेवजीकी सेवामे पत्नीसहित साम्बको लौटा दिया ॥ १३ ॥
ददौ शिष्यं तदाऽऽत्मानं रामस्य सुमहात्मनः।
गदायुद्धे कुरुपतिं शिष्यं जग्राह तं च सः ॥ १४ ॥
उस समय उसने अपने-आपको महात्मा बलरामजीके हाथमे शिष्य-भावसे सौंप दिया। तब उन्होंने कुरुराज दुर्योधनको गदायुद्धकी शिक्षा देनेके लिये अपना शिष्य बना लिया ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र पुरमेतद् विघूर्णितम्।
आवर्जितमिवाभाति गङ्गामभिमुखं नृप ॥ १५ ॥
राजेन्द्र ! तभीसे यह नगर कुछ घुमा और गङ्गाकी ओर झुकाया हुआ-सा प्रतीत होता है ॥ १५ ॥
इदमप्यद्भुतं कर्म रामस्य कथितं भुवि।
भाण्डीरे कथितं राजन् यत् कृतं शौरिणा पुरा ॥ १६ ॥
राजन् ! यह भूतलपर बलरामजीका अत्यन्त अद्भुत कर्म कहा गया है। पहले भाण्डीरवटके निकट उन्होंने जो कुछ किया था, उसका वर्णन तो कर ही दिया गया है ॥ १६ ॥
प्रलम्बं मुष्टिनैकेन यज्जघान हलायुधः।
धेनुकं तु महावीर्यं विक्षेप नगमूर्द्धनि।
स गतायुः पपातोर्व्यां दैत्यो गर्दभरूपधृक् ॥ १७ ॥
उस समय हलधरने प्रलम्बको एक ही मुक्केसे मारकर कालके गालमें डाल दिया था और महापराक्रमी धेनुकासुरको ताड़की चोटीपर फेंक दिया था। वह गर्दभरूपधारी दैत्य वहींसे गतायु होकर पृथ्वीपर गिरा था ॥ १७ ॥
लवणजलगामा महानदी द्रुतजलवेगतराङ्गमालिनी।
नगरमभिमुखं यदा हृता हलविधृता यमुना यमस्वसा ॥ १८ ॥
खारे पानीके समुद्रमें मिलनेवाली यमकी बहिन महानदी यमुनाको, जो बहते हुए जलके वेग और तरंगोंसे अलंकृत थी, उन्होंने हलके द्वारा नगरकी ओर खींच लिया था ॥
बलदेवस्य माहात्म्यमेतत् ते कथितं मया।
अनन्तस्याप्रमेयस्य शेषस्य धरणीभृतः ॥ १९ ॥
जो अनन्त, अप्रमेय, धरणीधर शेषके अवतार हैं, उन बलदेवजीका माहात्म्य मैंने तुम्हे बता दिया ॥ १९ ॥
इति पुरुषवरस्य लाङ्गले-
र्बहुविधमुत्तममन्यदेव च।
यदकथितमिहाद्य कर्म ते
तदुपलभस्व पुराणविस्तरात् ॥ २० ॥
इस प्रकार पुरुषोत्तम हलधरके दूसरे-दूसरे भी उत्तम चरित्र हैं, उनके जिस कर्मकी यहाँ चर्चा नहीं की गयी है, उसे तुम विस्तृत पुराणोंसे जान लो ॥ २० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बलदेवमाहात्म्ये द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलदेवका माहात्म्यविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
नरकासुरका परिचय, द्वारकामें इन्द्रका आगमन और श्रीकृष्णसे नरकवधके लिये अनुरोध, सत्यभामासहित श्रीकृष्णका प्राग्ज्योतिषपुरमें गमन तथा उनके द्वारा मुरु, निसुन्द, हयग्रीव, विरूपाक्ष, पञ्चनाद, अन्यान्य असुर तथा नरकासुरका वध
जनमेजय उवाच
प्रस्थेत्य द्वारकां विष्णुर्हते रुक्मिणि वीर्यवान् । अकरोद् यन्महाबाहुस्तन्मे वद महामुने ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—महामुने ! रुक्मीके मारे जानेपर
भगवान् श्रीकृष्णका इन्द्रके साथ प्राग्ज्योतिषपुरके लिये अभियान (पृष्ठ-संख्या ४५६)
विष्णुपर्व ] त्रिषष्टितमोऽध्यायः ४५७
जब परम पराक्रमी महाबाहु श्रीकृष्ण द्वारकाको लौट आये, तब उन्होंने क्या किया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच स तैः परिवृतः श्रीमान् पुरीं यादवनन्दनः । द्वारकां भगवान् विष्णुः प्रत्यवैक्षत वीर्यवान् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीमान् यादव-नन्दन पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण उन यादवोंसे घिरे हुए जब द्वारकाको आये, तब उन्होंने उस पुरीका भलीभाँति निरीक्षण किया ॥ २ ॥
प्रत्यपद्यत रत्नानि विविधानि वसूनि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रत्यवारयत् ॥ ३ ॥
कमलनयन श्रीकृष्णने जो नाना प्रकारके धन और रत्न प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे और उन्हें हड़पनेकी इच्छावाले राक्षसोंको उन्होंने मार भगाया था ॥ ३ ॥
तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः । ताञ्जघान महाबाहुर्वरदृप्तान् महासुरान् ॥ ४ ॥
वहाँ उनके मार्गमें दैत्य और दानव विघ्न डाला करते थे । महाबाहु श्रीकृष्णने वर पाकर उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला ॥ ४ ॥
विघ्नं चास्याकरोत् तत्र नरको नाम दानवः । त्रासनः सर्वदेवानां देवराजरिपुर्महान् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् नरक नामक दानवने भगवान्के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया । वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला तथा देवराज इन्द्रका महान् शत्रु था ॥ ५ ॥
स भूमौ मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवाधिबाधितः । देवतानामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥ ६ ॥
समस्त देवताओंको बाधा देनेवाला नरकासुर भूमिके भीतर मूर्तिलिङ्गमें स्थित होकर देवताओं और ऋषियोंके प्रति-कूल आचरण किया करता था ॥ ६ ॥
त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥ ७ ॥
भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं । उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके, जो चौदह वर्षकी अवस्थावाली तथा सुन्दर अङ्गोंसे सुशोभित थी, समीप जाकर उसे पकड़ लिया ॥ ७ ॥
१ १. मूर्ति या शिवलिङ्गके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो । शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था ।
प्रमथ्य तां वरारोहां नरको वाक्यमब्रवीत् । नष्टशोकभयो मोहात् प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥ ८ ॥
नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था । उसके शोक और भय नष्ट हो गये थे । वह मोहवश सुन्दरी कशेरुको अपनी दोनों भुजाओंमें दबाकर हर ले गया और उससे इस प्रकार बोला—॥ ८ ॥
यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च । बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥ ९ ॥ अद्यप्रभृति तानीह सहिताः सर्वनेर्ऋताः । तवैवोपाहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥ १० ॥
'देवि ! देवता और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस, दैत्य और दानव भी तुम्हें ही लाकर दिया करेंगे' ॥ ९-१०॥
एवमुत्तमरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । स जहार तदा भौमस्तच्च नाधिचकार सः ॥ ११ ॥
इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके उत्तम रत्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंका उस समय अपहरण किया था । अप-हरण करके भी उसने उनपर अधिकार नहीं किया (उन्हें अपने उपभोगमें नहीं लाया ) ॥ ११ ॥
गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बली । याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥ १२ ॥
गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी बलवान् नरकासुर हर लाया था । देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया ॥ १२ ॥
चतुर्दश सहस्राणि एकविंशच्छतानि च । एकवेणीधराः सर्वाः सतीमार्गमनुव्रताः ॥ १३ ॥
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी स्त्रियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं । वे सब-की-सब सतियोंके मार्गका अनु-सरण करके व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच तासां पुरवरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वतम् । अलकायामदीनात्मा मुरोः स्वविषयं प्रति ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उदार हृदय-वाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर एक श्रेष्ठ पुरका निर्माण कराया था । जिस स्थानपर वह पुर बना था, वह अलका नामसे प्रसिद्ध था । वह स्थान मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें था ॥ १४ ॥
४५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
ताश्च प्राग्ज्योतिषपतिं मुरोश्चैव दशात्मजाः।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत॥ १५॥
स एष तपसः पारे वरदृप्तो महासुरः ॥ १५॥
मुर या मुरु नामक दैत्यके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उन कुमारियों तथा प्राग्ज्योतिषपति भौमकी रक्षा करते हुए उसकी उपासना करते थे। यह महान् असुर नरक तपस्याके अन्तमें वर पाकर उन्मत्त हो गया था॥ १५॥
न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा।
कृतपूर्वं तदा घोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥ १६॥
पूर्वकालमें समस्त महादैत्यों ने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पापकर्म नहीं किया था, जो उस महान् असुरने अकेले ही कर डाला था॥ १६॥
अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थे महासुरः।
यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम्॥ १७॥
द्वारपालाश्च चत्वारस्तस्यासन् युद्धदुर्मदाः।
उस महादैत्यने कुण्डलोंके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया था। पृथ्वी देवीने जिसे जन्म दिया था और प्राग्ज्योतिषपुरपर जिसका अधिकार था, उस नरकासुरके चार युद्धोन्मत्त दैत्य द्वारपाल थे॥ १७३॥
हयग्रीवो निसुन्दश्च वीरः पञ्चनदस्तथा ॥ १८॥
मुरुः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तोऽसुरो महान्।
उनके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निसुन्द, वीर पञ्चनद तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुरु, जो कि वरदान प्राप्त कर चुका था॥ १८३॥
आदेवयानमावृत्य पन्थानं समुपस्थितः।
वित्रासनः सुकृतिनां विरूपै राक्षसैः सह ॥ १९॥
वह नरकासुर समूचे देवयान मार्गको घेरकर वहाँ उपस्थित हो जाता और भयंकर रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर उधरसे जानेवाले पुण्यात्माओंको डराया करता था॥
तद्वधार्थं महाबाहुः शङ्खचक्रगदासिभृत्।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वसुदेवाज्जनार्दनः ॥ २०॥
उसके वधके लिये शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भ और वसुदेवके संयोगसे प्रकट हुए॥ २०॥
तस्याथ पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः।
निवासो द्वारका देवैरुपायैरुपपादिता ॥ २१॥
उनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। उन पुरुषप्रवर श्रीकृष्णका निवासस्थान द्वारका है, जिसे देवताओंने उपयुक्त उपायसे उपलब्ध कराया था॥ २१॥
अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात्।
महार्णवपरिक्षिप्ता पञ्चपर्वतशोभिता ॥ २२॥
द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावतीपुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। वह महासागरसे घिरी हुई तथा पाँच पर्वतोंसे सुशोभित है॥ २२॥
तस्यां देवपुराभायां सभा काञ्चनतोरणा।
सा दाशार्हीति विख्याता योजनायामविस्तृता ॥ २३॥
देवपुरीके समान सुशोभित होनेवाली द्वारकामें एक सभा है, जिसमें सोनेकी वन्दनवारें लगी हैं। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है तथा वह दाशार्हीसभाके नामसे विख्यात है॥ २३॥
तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः।
लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥ २४॥
उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धक-वंशके सभी लोग बैठते थे और सम्पूर्ण लोकजीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते थे॥ २४॥
तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ।
दिव्यगन्धो ववौ वायुः पुष्पवर्षं पपात ह ॥ २५॥
भरतश्रेष्ठ ! एक दिनकी बात है, सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी॥
ततः किलिकिलाशब्दः प्रभाजालाभिसंवृतः।
मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥ २६॥
तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें किलिकिलाहट-का शब्द हुआ और तेजोराशिसे घिरी हुई दिव्य आकृति प्रकट हुई, जो धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी ।२६।
मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डुरं गजमास्थितः।
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः समदृश्यत ॥ २७॥
उस तेजपुञ्जके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ दिखायी दिये॥ २७॥
रामकृष्णौ च राजा स वृष्ण्यन्धकगणैः सह।
प्रत्युद्ययुर्महात्मानं पूजयन्तः सुरेश्वरम् ॥ २८॥
उस समय महात्मा देवराज इन्द्रका स्वागत करनेके लिये बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंश-के अन्य लोगोंके साथ उठकर उनकी अगवानीमें गये ॥२८॥
सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम्।
सस्वजे बलदेवं च तं च राजानमाहुकम् ॥ २९॥
इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया; फिर बलदेव तथा राजा उग्रसेनसे भी वे उसी प्रकार मिले॥ २९॥
वृष्णीनन्यान् सस्वजे च यथाकालं यथावयः।
पूजितो रामकृष्णभ्यामाविवेश स तां सभाम् ॥ ३०॥
| विष्णुपर्व ] | त्रिषष्टितमोऽध्यायः | ४५९ |
|---|
तत्पश्चात् उन्होंने यथासमय अवस्थाके अनुसार सभी वृष्णिवंशी वीरोंको हृदयसे लगाया। इसके बाद बलराम और श्रीकृष्णसे पूजित हो वे उस दाशार्ही सभामें गये ॥ ३० ॥
तत्रासीनोऽभ्यलंकृत्य सभां ताममरेश्वरः ।
अर्घ्यादिसमुदाचारं प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ३१ ॥
वहाँ बैठकर उस सभाकी शोभा बढ़ाते हुए देवेश्वर इन्द्रने विधिपूर्वक अर्घ्य आदि उपचार ग्रहण किया ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथोवाच महातेजा वासवो वासवानुजम् ।
सान्त्वपूर्वं करेणास्य संस्पृश्य वदनं शुभम् ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर महातेजस्वी इन्द्रने अपने अनुज श्रीकृष्णको सान्त्वना देकर उनके सुन्दर मुखारविन्दपर हाथ फेरते हुए कहा—॥ ३२ ॥
देवकीनन्दन वचः शृणु मे मधुसूदन ।
येन त्वाभिगतोऽस्म्यद्य कार्येणामित्रकर्शन ॥ ३३ ॥
'देवकीनन्दन ! मधुसूदन ! शत्रुनाशन ! आज मैं जिस कार्यसे तुम्हारे पास आया हूँ, उसके विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३३ ॥
नैर्ऋतो नरको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अदित्याः कुण्डले मोहाज्जहार दितिनन्दनः ॥ ३४ ॥
'नरक नामवाला एक राक्षस है, जो ब्रह्माजीका वरदान पाकर घमंडसे भर गया है। उस दैत्यने मोहवश देवमाता अदितिके दोनों कुण्डल हर लिये हैं ॥ ३४ ॥
देवानां विप्रिये नित्यमृषीणां च स वर्तते ।
तं च देवान्तरं प्रेक्ष्य जहि त्वं पापपूरुषम् ॥ ३५ ॥
'देव ! वह प्रतिदिन देवताओं तथा ऋषियोंके विरोधमें ही लगा रहता है। अतः तुम अवसर देखकर उस पापात्मा पुरुषको मार डालो ॥ ३५ ॥
अयं त्वां गरुडस्तत्र प्रापयिष्यति कामगः ।
कामवीर्योऽतितेजस्वी वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ ३६ ॥
'ये इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले गरुड़ तुम्हे वहाँ पहुँचा देंगे; क्योंकि इनमें यथेष्ट बल है। ये अन्तरिक्षचारी विनतानन्दन गरुड़ अत्यन्त तेजस्वी हैं ॥ ३६ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां भौमः स नरकोऽसुरः ।
निषूद्यित्वा तं पापं क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ॥ ३७ ॥
'भूमिपुत्र नरकासुर समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है, अतः तुम उस पापीका शीघ्र ही संहार करके लौट आओ' ॥ ३७॥
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो देवराजेन केशवः ।
प्रतिजज्ञे महाबाहुर्नर्रकस्य निवर्हणे ॥ ३८ ॥
देवराजके ऐसा कहनेपर महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने उनके सामने नरकासुरके संहारकी प्रतिज्ञा की ॥ ३८ ॥
ततः सहैव शक्रेण शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
प्रतस्थे गरुडेनाथ सत्यभामासहायवान् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामासहित गरुड़पर बैठकर इन्द्रके साथ ही चल दिये ॥ ३९ ॥
क्रमेण सप्तस्कन्धान् स मरुतां सहवासवः ।
पश्यतां यदुसिंहानाम्पूर्ध्वमाचक्रमे बली ॥ ४० ॥
यदुकुलके सिंह-सदृश पराक्रमी वीरोंके देखते-देखते इन्द्रसहित बलवान् श्रीकृष्ण क्रमशः वायुके सातों स्कन्धोंको लाँघकर ऊपर चले गये ॥ ४० ॥
वारणेन्द्रगतः शक्रो गरुडस्थो जनार्दनः ।
विदूरत्वात् प्रकाशेते सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ४१ ॥
गजराज ऐरावतपर चढ़े हुए इन्द्र और गरुड़पर बैठे हुए भगवान् जनार्दन अधिक दूर चले जानेके कारण सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४१ ॥
अन्तरिक्षे च गन्धर्वरैरप्सरोभिश्च केशवः ।
स्तूयमानोऽथ शक्रश्च क्रमेणान्तरधीयत ॥ ४२ ॥
अन्तरिक्षमें गन्धर्व और अप्सराओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए श्रीकृष्ण और इन्द्र बारी-बारीसे अदृश्य हो गये ॥ ४२ ॥
समाधायेतिकर्तव्यं वासवो विबुधाधिपः ।
स्वमेव भवनं प्रायात् कृष्णः प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ ४३ ॥
अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उपयुक्त व्यवस्था करके देवराज इन्द्र अपने भवनको चले गये और श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरकी राह ली ॥ ४३ ॥
पक्षानिलहतो वायुः प्रतिलोमं ववौ तदा ।
ततो भीमरवा मेघा वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥
गरुड़के पंखोंसे आहत होकर वायु उलटी दिशाको बहने लगी। फिर तो आकाशमें विचरनेवाले बादल भयानक आवाजके साथ वहीं चक्कर काटने लगे ॥ ४४ ॥
क्षणेन समनुप्राप्तो द्विजेनाकाशगेन वै ।
दूरादेव च तान् दृष्ट्वा प्रययौ यत्र ते स्थिताः ॥ ४५ ॥
आकाशचारी पक्षी गरुड़के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण क्षणभरमें प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। उन्होंने दूरसे ही उन राक्षसोंको देखकर जहाँ वे खड़े थे, उधर ही यात्रा की ॥४५॥
अपश्यद् द्वारि तत्रस्थां हस्त्यश्वरथवाहिनीम् ।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रान् ददर्श ह ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्णने देखा, प्राग्ज्योतिषपुरके द्वारपर हाथी, घोड़े और रथोंकी विशाल वाहिनी खड़ी है। उन्होंने मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाश देखे, जिनके किनारेके भागोंमें छुरे लगे हुए थे ॥ ४६ ॥
| ४६० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वैशम्पायन उवाच
गरुडस्योपरि श्रीमाञ्छङ्खचक्रगदाधरः।
विभ्रन्नीलाम्बुदाकारं पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण श्याम मेघके समान सुन्दर विग्रह धारण किये गरुड़पर बैठे थे । उनके अङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे चार भुजाओंसे विभूषित थे ॥ ४७॥
घनमालाकुलोरस्कः श्रीवत्साङ्कितभूषणः।
किरीटमूर्द्धा सूर्याभः सविद्युदिव चन्द्रमाः॥ ४८॥
उनका वक्षःस्थल वनमालासे व्याप्त था । वे श्रीवत्सचिह्नसे अलंकृत थे । उनके मस्तकपर किरीट शोभा पाता था, जिससे वे सूर्यके समान प्रकाशमान और विद्युतसहित चन्द्रमाके सदृश शोभायमान दिखायी देते थे ॥ ४८ ॥
ज्यां विक्षूजन्महाशब्दः श्रूयतेऽशनिनिःस्वनः।
ज्ञात्वा च दानवः सर्वं स्वयं विष्णुरिहागतः॥ ४९॥
उन्होंने धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर जब उसकी टंकारध्वनि फैलायी, उस समय वज्रपातके समान महाभयंकर शब्द सुनायी दिया। तब दानव मुरने वह सब जानकर यह समझ लिया कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही यहाँ पधारे हैं ॥ ४९ ॥
क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो मुरुः कालान्तकोपमः।
अभ्यधावत वेगेन शक्तिं गृह्य महासुरः॥ ५०॥
इससे मुरुको बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोषसे दुगुनी लाल हो गयीं। काल और अन्तकके समान भयंकर वह महान् असुर हाथमें शक्ति लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़ा ॥ ५० ॥
चिक्षेप सुमहाशक्तिं वज्रकाञ्चनभूषिताम्।
तामापतन्तीं शक्तिं तु महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ५१॥
समाधत्त शरं चैकं रुक्मपुङ्खं जनार्दनः।
द्विधाच्छिनत् क्षुरप्रेण वासुदेवः स वीर्यवान् ॥ ५२॥
उसने हीरे और सुवर्णसे भूषित वह महाशक्ति भगवान् श्रीकृष्णपर चलायी । जलती हुई बड़ी भारी उल्काके समान उस शक्तिको अपनी ओर आती देख पराक्रमी वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णने एक सोनेके पंखवाले बाणको धनुषपर रक्खा । उस क्षुरप्रके द्वारा उन्होंने मुरुकी शक्तिके दो टुकड़े कर डाले॥
शक्तिं विच्छेद्य तत्रासौ विद्युत्पुञ्ज इव ज्वलन्।
पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो मुरुर्जग्राह महागदाम् ॥ ५३॥
जब उन्होंने शक्ति काट डाली, तब वहाँ खड़ा हुआ मुरु, जो विद्युत्-पुञ्जके समान प्रज्वलित हो रहा था, पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके एक विशाल गदा हाथमें ले ली ॥
इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विक्षिप्त इव निःस्वनः।
आकर्णमुक्तं चिक्षेप अर्धचन्द्रं सुरोत्तमः॥ ५४॥
मध्यदेशे तु चिच्छेद गदां तां रुक्मभूषिताम्।
पुनश्चिच्छेद भल्लेन दानवस्य शिरो रणे॥ ५५॥
इतनेहीमें सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने अर्धचन्द्रनामक बाण हाथमें लिया, मानो इन्द्रने वज्र उठा लिया हो । उस समय धनुषको खींचनेसे वज्र गिरनेके समान ही शब्द हुआ । भगवान्ने उस अर्धचन्द्रको कानतक खींचकर चलाया । उसने उस सुवर्णभूषित गदाको बीचसे ही काट गिराया । फिर श्रीकृष्णने एक भल्लद्वारा रणभूमिमें उस दानवका सिर उड़ा दिया ॥
संछिद्य पाशान् सर्वांस्तान् मुरुं हत्वा सबान्धवम्।
सोऽग्र्यान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महाबलान्॥५६॥
शिलासंधानतिक्रम्य भगवान् देवकीसुतः।
अपश्यद् दानवं सैन्यं निसुन्दं च महाबलम् ॥ ५७॥
हयग्रीवं च दितिजं तथान्यांश्चित्रयोधिनः।
मुरुके समस्त पाशोंका छेदन करके उसे भाई-बन्धुओंसहित मारकर नरकासुरके महाबली अग्रगामी राक्षसोंका संहार करनेके अनन्तर शिलासमूहोंको लाँघकर भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णने दानवोंकी विशाल सेनाको और महाबली निसुन्द दैत्य, हयग्रीव तथा विचित्र युद्ध करनेवाले अन्यान्य दैत्योंको भी देखा ॥ ५६-५७३॥
रोधयामास तन्मार्गं स्वसैन्येन महाबलः॥ ५८॥
निसुन्दो बलिनां श्रेष्ठो रथमारुह्य सत्वरम्।
जग्राह कार्मुकं दिव्यं हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥ ५९॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली निसुन्दने अपनी सेनाके द्वारा श्रीकृष्णका मार्ग रोक दिया और तुरंत रथपर आरूढ़ हो सोनेकी पीठवाले दिव्य दुर्जय धनुषको हाथमें ले लिया ॥
विव्याध दशभिर्बाणैर्निसुन्दो मधुसूदनम्।
केशवश्चापि सप्तत्या विव्याध निशितैः शरैः ॥ ६०॥
इसके बाद निसुन्दने दस बाणोंसे मधुसूदनको वेध दिया । तब श्रीकृष्णने भी उसपर सत्तर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ ६० ॥
अप्राप्तांश्चान्तरिक्षे ताञ्छरांश्चिच्छेद माधवः।
ते सर्वे सैनिकाः कृष्णं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ६१ ॥
शरजालेन महता छाद्यमानः सुरोत्तमः।
दृष्ट्वा तान् दानवान् सर्वान् सक्रोधो मधुसूदनः ॥ ६२॥
उन दानवके बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले आकाशमें ही श्रीकृष्णने काट डाला । तब उसके सैनिकोने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और बाणोंके विशाल जालसे ढकना आरम्भ किया । तब उन समस्त दानवोंको देखकर भगवान् मधुसूदन कुपित हो उठे ॥ ६१-६२ ॥
विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ ततो दिव्येन चास्त्रेण पार्जन्येन जनार्दनः । महता शरवर्षेण धारयामास तद्बलम् ॥ ६३ ॥ जनार्दनने पार्जन्यनामक दिव्य अस्त्रसे बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उसकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ पञ्चपञ्चशरैस्तेषु एकैकेन च तान् बहून् । पार्जन्यस्य प्रभावेण सर्वान् मर्मस्वताडयत् ॥ ६४ ॥ उन्होंने पार्जन्य अस्त्रके प्रभावसे एक-एक करके उन सब बहुसंख्यक दानवोंके मर्मस्थानोंमें पाँच-पाँच बाणोंका प्रहार किया ॥ ६४ ॥ दुद्रुवुर्भयसंत्रस्ता भग्नास्ते दानवा रणे । स्वसैन्यं विद्रुतं दृष्ट्वा निष्क्राम पुनर्मृधे ॥ ६५ ॥ वे सभी दानव भयसे संत्रस्त होकर रणभूमिसे भाग खड़े हुए। अपनी सेनाको भागती देख निसुन्द पुनः युद्धके लिये निकला ॥ ६५ ॥ विसृजञ्छरवर्षाणि छादयामास केशवम् । न विभाति रणे सूर्यो नापि व्योम दिशो दश ॥ ६६ ॥ वह बाणोंकी वर्षा करता हुआ श्रीकृष्णको आच्छादित करने लगा। उस समय युद्धमें न तो सूर्यका पता चलता था और न आकाश तथा दसों दिशाओंका ही ॥ ६६ ॥ शरैः संछादयामास निसुन्दो गरुडध्वजम् । सावित्रं नाम दिव्यास्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥ ६७ ॥ निसुन्दने अपने बाणोंसे गरुड़-ध्वजको ढक दिया। तब पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सावित्र नामक दिव्यास्त्रको ग्रहण किया॥ तेन बाणेन तान् बाणांश्चिच्छेद समरे हरिः । बाणैर्बाणांश्च संछिद्य तस्य कृष्णो महाबलः ॥ ६८ ॥ छत्रमेकेन बाणेन रथेषां च त्रिभिः शरैः । पुनश्चिच्छेद तानश्वांश्चतुर्भिः शरैः ॥ ६९ ॥ सारथिं पञ्चभिर्बाणैर्ध्वजमेकेन चिच्छिदे । उस अस्त्रद्वारा छोड़े हुए बाणसे समराङ्गणमें श्रीहरिने निसुन्दके उन सभी बाणोंको काट डाला। महाबली श्रीकृष्णने अपने बाणोंद्वारा उसके सायकोंके टुकड़े-टुकड़े करके एक बाणसे उसका छत्र और तीन बाणोंसे उसके रथका हरसा काट डाला; फिर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको और पाँच बाणोंसे सारथिको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजा काट डाली॥ शरैकेन वपुः कृष्णः सुतीक्ष्णेन शितेन वै ॥ ७० ॥ शिरश्चिच्छेद भल्लेन निसुन्दस्य सुरोत्तमः । फिर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने एक अत्यन्त तीखे बाणसे उसके शरीरको और एक भल्लके द्वारा निसुन्दके मस्तकको भी काट गिराया ॥ ७०३ ॥ यः सहस्रसमास्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ॥ ७१ ॥ निसुन्दं पतितं दृष्ट्वा हयग्रीवः प्रतापवान् । शिलां प्रगृह्य महतीं तोलयामास दानवः ॥ ७२ ॥ जिसने अकेले ही लगातार एक सहस्र वर्षोंतक सम्पूर्ण देवताओंके साथ युद्ध किया था, उसी निसुन्दको धराशायी हुआ देख प्रतापी दानव हयग्रीवने एक बहुत बड़ी चट्टान लेकर उसे हाथोंपर तोला ॥ ७१-७२ ॥ आविध्य सहसामुच्छ्रितां शैलसमां प्रभुः । गृहीत्वा दिव्यपार्जन्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ७३ ॥ दिव्यास्त्रेण शिलां विष्णुः सप्तधाकृत तेजसा । तद् विदार्य महद्द्याश्म पातयामास भूतले ॥ ७४ ॥ फिर सहसा घुमाकर वह पहाड़-जैसी शिला उसने श्रीकृष्णपर दे मारी, परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णु- ने दिव्य पार्जन्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने तेजसे उस शिलाके सात टुकड़े कर डाले। उस बहुत बड़ी चट्टानको विदीर्ण करके उन्होंने पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ७३-७४ ॥ ततस्तैः शार्ङ्गनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । यथा देवासुरं युद्धमभवद् भरतर्षभ । नानाप्रहरणाकीर्णं तथा घोरमवर्तत ॥ ७५ ॥ भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर शार्ङ्गधनुषसे छोड़े गये नाना प्रकारके महान् बाणोंद्वारा देवासुर-संग्रामके समान घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र छोड़े जाने लगे, जिससे सारा युद्धस्थल व्याप्त हो गया ॥ ७५ ॥ ततः शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । गरुडस्थो महाबाहुर्निजघान महासुरान् ॥ ७६ ॥ तत्पश्चात् गरुड़पर बैठे हुए महाबाहु श्रीकृष्णने शार्ङ्ग- धनुषसे छोड़े गये भाँति-भाँतिके रंगवाले विशाल बाणोंद्वारा बड़े-बड़े असुरोंका संहार करना आरम्भ किया ॥ ७६ ॥ महासाङ्गलनिर्भिन्नाः शङ्खशक्तिनिपातिताः । विनेशुर्दानवाः सर्वे समासाद्य जनार्दनम् ॥ ७७ ॥ वे समस्त दानव भगवान् श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर उनके द्वारा चलाये गये महान् हलसे विदीर्ण तथा उनके शङ्खकी शक्तिसे धराशायी होकर नष्ट हो गये ॥ ७७ ॥ केचिच्चक्राग्निनिर्दग्धा दानवाः पेतुरम्बरात् । संनिकर्षगताः केचिद् गतासुविकृताननाः ॥ ७८ ॥ कितने ही दानव उनके निकट आकर चक्राग्निसे दग्ध हो आकाशमे पृथ्वीपर गिर पड़े। प्राणशून्य होनेपर उनके मुख विकराल हो गये थे ॥ ७८ ॥ असृजञ्छरवर्षाणि वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः । विकृताङ्गासुराः सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ ७९ ॥ शोणिताक्ताः स्म दृश्यन्ते पुष्पिता इव किंशुकाः व्यद्रवन्त सुवित्रस्ता भग्नास्त्राश्चित्रयोधिनः ॥ ८० ॥
४६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे वे असुर वर्षा करनेवाले बादलोंकी भाँति श्रीकृष्णपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे; परंतु श्रीकृष्णके सायकोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर उन सबके अंग-भंग हो गये और वे खूनसे रँग जानेके कारण फूले हुए पलाशके समान दिखायी देते थे। विचित्र युद्ध करनेवाले वे दानव अपने अस्त्र-शस्त्रोंके भंग हो जानेसे अत्यन्त भयभीत हो भाग खड़े हुए ॥ ७९-८० ॥ पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो वायुवेगेन दानवः । दशव्यामोच्छ्रितं वृक्षं समारुह्य वनस्पतिम् ॥ ८१ ॥ वृक्षमुत्पाट्य वेगेन प्रतिगृह्याभ्यधावत । तब पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके दानव हयग्रीव वायु- के समान वेगसे चढ़ आया। उसने दस व्याम¹ ऊँचे एक वनस्पतिको उखाड़ा और उखाड़कर उस वृक्षको हाथोंमें लिये हुए वह बड़े वेगसे श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ८१½ ॥ चिक्षेप स महावृक्षं शिक्षया सुघनाकृतिः ॥ ८२ ॥ वृक्षवेगानिलोद्भूतः शुश्रुवे सुमहान्स्वनः । काले बादलके समान आकारवाले हयग्रीवने उस विशाल वृक्षको शिक्षाके अनुसार कुशलतापूर्वक श्रीकृष्णपर दे मारा। उस वृक्षके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा बड़े जोरका शब्द सुनायी पड़ा ॥ ८२½ ॥ ततः शरसहस्रेण यतमानो जनार्दनः ॥ ८३ ॥ नैकधा तं प्रचिच्छेद चित्रभानुनिभाकृतिम् । तब विजयके लिये प्रयत्न करते हुए भगवान् श्रीकृष्णने एक सहस्र बाण मारकर उस वृक्षके बहुतेरे टुकड़े कर डाले। उस समय उसकी आकृति चित्रलिखित सूर्यके समान जान पड़ती थी ॥ ८३½ ॥ पुनश्चैकेन बाणेन हयग्रीवस्य चोरसि ॥ ८४ ॥ विव्याध स्तनयोर्मध्ये सायको ज्वलनप्रभः । विवेश सोऽपि वेगेन हृदं भित्त्वा विनिर्गतः ॥ ८५ ॥ फिर उन्होंने एक बाणसे हयग्रीवकी छाती छेद डाली। अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला वह बाण उसके दोनों स्तनोंके बीचमें गहरा आघात करता हुआ वेगपूर्वक भीतर घुस गया और हृदय विदीर्ण करके बाहर निकल गया ॥ तं जघान महाघोरं हयग्रीवं महाबलम् । अपारतेजा दुर्धर्षः स वै यादवनन्दनः ॥ ८६ ॥ मध्ये लोहितगङ्गस्य भगवान् देवकीसुतः । औदकायां विरूपाक्षं पाप्मानं पुरुषोत्तमः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार अपार तेजस्वी दुर्धर्ष वीर यादवनन्दन भगवान् देवकीपुत्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने लोहितगङ्गा* नामक प्रदेशके मध्यभागमें औदका ( या अलका ) के समीप कुरूप नेत्रोंवाले महाभयंकर और महाबली पापी हयग्रीवको कालके गालमें डाल दिया ॥ ८६-८७ ॥ अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतपः । निहत्य पुरुषव्याघ्रः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ॥ ८८ ॥ तत्पश्चात् आठ लाख दानवोंका संहार करके शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ॥ ८८ ॥ हत्वा पञ्चनदं नाम नरकस्य महासुरम् । ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥ ८९ ॥ पुरमासादयामास युद्धं तत्राभवन्महत् । नरकासुरके प्रमुख योद्धा महान् असुर पंचनद ( या पञ्चजन ) को मारकर वे प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे, जो अपनी शोभासे देदीप्यमान-सा हो रहा था। वहाँ असुरोंके साथ उनका महान् युद्ध हुआ ॥ ८९½ ॥ ततः प्राध्मापयच्छङ्खं पाञ्चजन्यं महाबलः ॥ ९० ॥ शुश्रुवे सुमहाशब्दः संवर्तकनिनदो यथा । श्रूयते त्रिषु लोकेषु भीमगम्भीरनिःस्वनः । तं श्रुत्वा नरकश्चासीत् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ९१ ॥ तत्पश्चात् महाबली श्रीकृष्णने अपना पाञ्चजन्यनामक शङ्ख बजाया। उसका महान् शब्द उसी प्रकार सुनायी दिया, जैसे प्रलयकालीन संवर्तक मेघकी भयानक गम्भीर गर्जना तीनों लोकोंमें सुनायी पड़ती है। उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर नरकासुरकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥ ९०-९१ ॥ लोहचक्राष्टसंयुक्तं त्रिनलप्रतिमं रथम् । रक्तकाञ्चनचित्राढ्यं वेदिकाभोगविस्तरम् ॥ ९२ ॥ वज्रध्वजेन महता काञ्चनेन विराजितम् । हेमदण्डपताकाढ्यं वैदूर्यमणिकूवरम् ॥ ९३ ॥ युक्तमश्वसहस्रेण रथं पररथारुजम् । लोहजालैश्च संछन्नं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ९४ ॥ वह एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें लोहेके आठ १. दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियों- के सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे व्याम कहते हैं।
- यह सिन्धुका ही प्रदेशविशेष था। २. वहाँ जलकी अधिकता थी या जलसे भरी हुई खाई थी, इसलिये उस पुर या स्थानका नाम 'औदका' रक्खा गया था। महाभारत सभापर्व पृष्ठ ८०५ में भी इसका वर्णन आया है। हरिवंशके इसी अध्यायमें १४ वें श्लोकमें इसका नाम अलका आया है।
विष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ४६३
पहिये लगे थे । उसकी लंबाई तीन नलवेके बराबर थी १। वह रत्न और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न था । उसकी बैठक बहुत विस्तृत थी। वह रथ सुवर्ण-निर्मित तथा हीरकजटित विशाल ध्वजसे सुशोभित था। उसकी पताकामें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उस रथका कूबर वैदूर्य मणिका बना हुआ था। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे और वह शत्रुक्षके रथोंको तोड़ डालनेमें समर्थ था। उसे ऊपरसे लोहेकी जालीद्वारा ढक दिया गया था और वह रथ विचित्र बेल-बूटोंसे सुशोभित था ॥ ९२-९४ ॥
रथमध्यगतो वीरः ससंध्य इव भास्करः।
नानाप्रहरणाकीर्णं रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ ९५ ॥
उस रथके मध्यभागमें बैठा हुआ नरकासुर संध्या-कालसे युक्त सूर्यके समान जान पड़ता था । उसका वह सुवर्णभूषित रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ था ॥
वज्रं तथोरश्छदमिन्दुवर्णं व्यनन्दमुक्तानलतुल्यतेजाः ।
किरीटमूर्द्धार्कहुताशनाभः कर्णौ तथा कुण्डलयोज्ज्वलन्तौ ॥ ९६ ॥
हीरेका बना हुआ वक्षःस्थलको ढकनेवाला उसका कवच चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था । मुक्ताकी माला धारण करके वह अग्निके तुल्य तेजस्वी प्रतीत होता था । मस्तकपर उद्दीप्त किरीट धारण करके वह सूर्य एवं अग्निकी-सी प्रभासे प्रकाशित होता था तथा उसके दोनों कान सुन्दर कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे ॥ ९६ ॥
धूम्रवर्णा महाकाया रक्ताक्षा विकृताननाः ।
नानाकवचिनः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ९७ ॥
उसके साथ धुएँके समान रंगवाले विशालकाय लाल नेत्र और विकराल मुखवाले जो दैत्य, दानव और राक्षस आये थे, वे सब-के-सब नाना प्रकारके कवच धारण किये हुए थे ॥ ९७ ॥
खड्गचर्मधराः केचित् केचित् तूणधनुर्भृतः ।
शक्तिहस्तास्तथा केचिच्छूलहस्तास्तथापरे ॥ ९८ ॥
कोई ढाल और तलवार लिये हुए थे तो कोई धनुष, बाण और तरकस । किन्हींके हाथमें शक्ति थी तो किन्हींके हाथमें शूल ॥ ९८ ॥
गजवाजिरथौघैश्च चालयन्तश्च मेदिनीम् ।
निर्ययुर्नगरात् सर्वे सुसंनद्धाः प्रहारिणः ॥ ९९ ॥
वे सब भलीभाँति कवच आदिसे सुसज्जित एवं प्रहार करनेके लिये उद्यत हो हाथी, घोड़े तथा रथसमूहोंद्वारा पृथ्वीको कम्पित करते हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ९९ ॥
वृतो दैत्यगणैः सार्द्धं नरकः कालसंनिभः ।
भेरीशङ्खमृदङ्गानां पणवानां सहस्रशः ॥ १०० ॥
शुश्राव वाद्यमानानां जीमूतनिनदोपमम् ।
दैत्य-समूहोंसे घिरे हुए कालसदृश नरकासुरने बजते हुए शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग तथा पणव आदि सहस्रों वाद्योंका मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द सुना ॥ १०० $\frac{१}{२}$ ॥
यतः कृष्णस्ततो गत्वा सर्वे ते विकृताननाः ॥ १०१ ॥
परिवार्य गरुत्मन्तं सर्वेऽयुध्यन्त संगताः ।
वे सभी विकराल मुखवाले निशाचर जहाँ कृष्ण थे, उधर ही जाकर गरुड़को घेरकर खड़े हो गये और सब-के-सब संगठित होकर युद्ध करने लगे ॥ १०१ $\frac{१}{२}$ ॥
महता छादयामासुः शरवर्षेण सैनिकाः ॥ १०२ ॥
शक्तिशूलगदाप्रासस्तोमरान् सायकान् बहून् ।
आकाशं छादयामासुर्विमुञ्चन्तः सहस्रशः ॥ १०३ ॥
उन समस्त सैनिकोंने बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके भगवान्को ढक दिया । उन्होंने कई सहस्र शक्ति, शूल, गदा, प्रास, तोमर और सायकोंका प्रहार करके आकाशको आच्छादित कर दिया ॥ १०२-१०३ ॥
कृष्णः कृष्णाम्बुदाकारः शार्ङ्गं गृह्य धनुस्ततः ।
विस्फार्य सुमहच्चापं धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ १०४ ॥
व्यसृजच्छरवर्षाणि दानवानां जनार्दनः ।
शरवर्षेण तत्सैन्यं व्यद्रवत् तु महाहवात् ॥ १०५ ॥
काले मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले जनार्दन श्रीकृष्णने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले शार्ङ्गनामक सुविशाल धनुषको हाथमें लेकर उसे खींचा और दानवोंपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । उस बाण-वृष्टिसे भयभीत हो असुरोंकी वह सेना उस महासमरसे भाग खड़ी हुई ॥ १०४-१०५ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ।
भग्नव्यूहाश्च ते सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ १०६ ॥
उस भयंकर रूपधारी राक्षसके साथ श्रीकृष्णका घोर युद्ध हुआ । वे सभी दानव श्रीकृष्णके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी सेनाका व्यूह भंग करके भाग गये ॥ १०६ ॥
केचिच्छिन्नभुजाश्चैव च्छिन्नग्रीवाशिराननाः ।
केचिच्चक्रद्विधाच्छिन्नाः केचिद् बाणार्दितोरसः ॥ १०७ ॥
किन्हींकी भुजाएँ कट गयी थीं, किन्हींके कण्ठ, मस्तक और मुख छिन्न-भिन्न हो गये थे । किन्हींके चक्रद्वारा दो टुकड़े हो गये थे और किन्हींके वक्षःस्थल बाणोंके आघातसे पीड़ित हो रहे थे ॥ १०७ ॥
१. प्राचीन कालकी मान्यताके अनुसार भूमिकी एक प्रकारकी नाप या परिमाण, जो किसीके मतसे सौ हाथका और किसीके मतसे चार सौ हाथका होता था ।
४६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
केचिद् द्विधाकृताः शक्त्या गजाश्वरथवाहनाः।
केचित् कौमोदकीभिन्नाः केचिच्चक्रविदारिताः ॥१०८॥
कोई हाथी, घोड़े और रथोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले योद्धा शक्तिके प्रहारसे दो टूक हो गये थे। कोई कौमोदकी गदाके आघातसे पिस गये थे तथा कितने ही चक्रद्वारा विदीर्ण कर दिये गये थे ॥ १०८ ॥
एवं विमथिता सर्वा नराश्वरथवाहिनी।
तत्रासीन्नरकेणास्य युद्धं परमदारुणम् ॥१०९॥
इस प्रकार मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंसे युक्त वह सारी सेना मथ डाली गयी थी। वहाँ नरकासुरके साथ भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त दारुण युद्ध हुआ था ॥
यत् समासेन वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु।
त्रासनः सुरसंघानां नरकः पुरुषोत्तमम् ॥११०॥
योधयामास तेजस्वी मधुवन्मधुसूदनम्।
क्रोधरक्तातनयनो नरको घनसंनिभः ॥१११॥
यहाँ मैं संक्षेपसे जो कुछ बता रहा हूँ, वह मेरे मुखसे सुनो। देवसमूहको त्रास देनेवाला तेजस्वी नरकासुर मधुकी भाँति मधुसूदन भगवान् पुरुषोत्तमके साथ युद्ध करने लगा। उसके नेत्रप्रान्त क्रोधसे लाल हो रहे थे और उसकी आकृति मेघके समान काली थी ॥ ११०-१११ ॥
जग्राह कार्मुकं वीरः शक्रचापमिवोच्छ्रितम्।
तथार्ककिरणप्रख्यं बाणं जग्राह केशवः ॥११२॥
वीर श्रीकृष्णने इन्द्रधनुषके समान ऊँचा शरासन उठाया और सूर्यकिरणोंके समान चमचमाता हुआ बाण हाथमें लिया॥
दिव्येनास्त्रेण समरे पूरयामास तं रथम्।
उत्तमास्त्रं महापातं मुमोच नरको बली ॥११३॥
उन्होंने समराङ्गणमे अपने दिव्यास्त्रद्वारा नरकासुरके उस रथको भर दिया, तत्र बलवान् नरकासुरने भी बड़े वेगसे आघात करनेवाले उत्तम अस्त्रका प्रहार किया ॥ ११३ ॥
वज्रविस्फूर्जिताकारमायान्तं वीक्ष्य केशवः।
विच्छेदास्त्रं महाभागश्चक्रेण मधुसूदनः ॥११४॥
वज्रके समान गड़गड़ाहट पैदा करते हुए उस अस्त्रको आते देख महाभाग मधुसूदन केशवने चक्रके द्वारा उसका उच्छेद कर डाला ॥ ११४ ॥
व्यहनत् सारथिं चास्य शरेकेण जनार्दनः।
स रथं सध्वजं साश्वं जघान दशभिः शरैः ॥११५॥
भगवान् श्रीकृष्णने एक बाणसे उसके सारथिको मार डाला और दस बाणोंसे ध्वज और घोड़ोंसहित उस रथका संहार कर डाला ॥ ११५ ॥
तनुत्रं चैव चिच्छेद शरेण मधुसूदनः।
ततो विमुक्तकवचः सर्पस्येव तनूर्यथा ॥११६॥
इसके बाद मधुसूदनने एक बाणसे उसके कवचको काट गिराया। कवच कट जानेपर उसका शरीर केंचुलीसे निकले हुए सर्पके समान प्रतीत होने लगा ॥ ११६ ॥
हताश्वोऽपि रणे वीरो वितनुत्रश्च दानवः।
जग्राह विमलज्वालं लोहभारार्पितं दृढम् ॥११७॥
आविध्य सहसा मुक्तं शूलमिन्द्राशनिप्रभम्।
घोड़ोंके मारे जाने तथा कवचके कट जानेपर भी रणभूमिमें खड़े हुए उस दानव वीरने एक निर्मल ज्वालासे युक्त, लोहभारसे सम्पन्न और सुदृढ़ शूल हाथमें लिया, जो इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। उसने उस शूलको सहसा घुमाकर छोड़ दिया ॥ ११७१/२ ॥
तदापतत् स सम्प्रेक्ष्य शूलं हेमपरिष्कृतम् ॥११८॥
द्विधा छिन्नं क्षुरेण कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।
उस सुवर्णभूषित शूलको अपनी ओर आता देख अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने एक क्षुरप्रके द्वारा उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ११८१/२ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ॥११९॥
शस्त्रपातमहाघातं नरकेण महात्मना।
उस समय उनका उस भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस नरकके साथ शस्त्रोंके सम्पात एवं महाघातसे युक्त घोर युद्ध हुआ ॥ ११९१/२ ॥
मुहूर्तं योधयामास नरकं मधुसूदनः ॥१२०॥
अथोग्रचक्रश्चक्रेण प्रदीप्तेनाकरोद् द्विधा।
उग्र चक्रधारी मधुसूदनने दो घड़ीतक नरकासुरके साथ युद्ध किया। तत्पश्चात् प्रज्वलित चक्रद्वारा उसके शरीरके दो टुकड़े कर डाले ॥ १२०१/२ ॥
चक्रद्विधाकृतं तस्य शरीरमपतद् भुवि ॥१२१॥
विभक्तं कुलिशेनेव गिरेः शृङ्गं द्विधाकृतम्।
चक्रसे दो टूक हुआ नरकासुरका शरीर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो किसी पर्वतका शिखर वज्रके आघातसे दो भागोंमें विभक्त होकर धराशायी हो गया हो ॥ १२११/२ ॥
कृष्णमासाद्य देवेशं जगामास्तमिवांशुमान् ॥१२२॥
चक्रोत्कृन्तितगात्रोऽसौ दानवः पतितो रणे।
वज्रप्रहारनिर्भिन्नं यथा गैरिकपर्वतम् ॥१२३॥
देवेश्वर श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर वह सूर्यकी भाँति अस्ताचलको चला गया। चक्रसे शरीरके टूक-टूक हो जानेपर वह दानव रणभूमिमें गिर पड़ा। उस समय वह वज्रके प्रहारसे विदीर्ण हुए गेरूके पहाड़-जैसा जान पड़ता था ॥ १२२-१२३
भूमिस्तु पतितं पुत्रं निरीक्ष्यादाय कुण्डले।
उपातिष्ठत गोविन्दं वचनं चेदमब्रवीत् ॥१२४॥
अपने पुत्रको गिरा हुआ देख मूर्तिमती भूमिदेवी