विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ४६३
पहिये लगे थे । उसकी लंबाई तीन नलवेके बराबर थी १। वह रत्न और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न था । उसकी बैठक बहुत विस्तृत थी। वह रथ सुवर्ण-निर्मित तथा हीरकजटित विशाल ध्वजसे सुशोभित था। उसकी पताकामें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उस रथका कूबर वैदूर्य मणिका बना हुआ था। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे और वह शत्रुक्षके रथोंको तोड़ डालनेमें समर्थ था। उसे ऊपरसे लोहेकी जालीद्वारा ढक दिया गया था और वह रथ विचित्र बेल-बूटोंसे सुशोभित था ॥ ९२-९४ ॥
रथमध्यगतो वीरः ससंध्य इव भास्करः।
नानाप्रहरणाकीर्णं रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ ९५ ॥
उस रथके मध्यभागमें बैठा हुआ नरकासुर संध्या-कालसे युक्त सूर्यके समान जान पड़ता था । उसका वह सुवर्णभूषित रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ था ॥
वज्रं तथोरश्छदमिन्दुवर्णं व्यनन्दमुक्तानलतुल्यतेजाः ।
किरीटमूर्द्धार्कहुताशनाभः कर्णौ तथा कुण्डलयोज्ज्वलन्तौ ॥ ९६ ॥
हीरेका बना हुआ वक्षःस्थलको ढकनेवाला उसका कवच चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था । मुक्ताकी माला धारण करके वह अग्निके तुल्य तेजस्वी प्रतीत होता था । मस्तकपर उद्दीप्त किरीट धारण करके वह सूर्य एवं अग्निकी-सी प्रभासे प्रकाशित होता था तथा उसके दोनों कान सुन्दर कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे ॥ ९६ ॥
धूम्रवर्णा महाकाया रक्ताक्षा विकृताननाः ।
नानाकवचिनः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ९७ ॥
उसके साथ धुएँके समान रंगवाले विशालकाय लाल नेत्र और विकराल मुखवाले जो दैत्य, दानव और राक्षस आये थे, वे सब-के-सब नाना प्रकारके कवच धारण किये हुए थे ॥ ९७ ॥
खड्गचर्मधराः केचित् केचित् तूणधनुर्भृतः ।
शक्तिहस्तास्तथा केचिच्छूलहस्तास्तथापरे ॥ ९८ ॥
कोई ढाल और तलवार लिये हुए थे तो कोई धनुष, बाण और तरकस । किन्हींके हाथमें शक्ति थी तो किन्हींके हाथमें शूल ॥ ९८ ॥
गजवाजिरथौघैश्च चालयन्तश्च मेदिनीम् ।
निर्ययुर्नगरात् सर्वे सुसंनद्धाः प्रहारिणः ॥ ९९ ॥
वे सब भलीभाँति कवच आदिसे सुसज्जित एवं प्रहार करनेके लिये उद्यत हो हाथी, घोड़े तथा रथसमूहोंद्वारा पृथ्वीको कम्पित करते हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ९९ ॥
वृतो दैत्यगणैः सार्द्धं नरकः कालसंनिभः ।
भेरीशङ्खमृदङ्गानां पणवानां सहस्रशः ॥ १०० ॥
शुश्राव वाद्यमानानां जीमूतनिनदोपमम् ।
दैत्य-समूहोंसे घिरे हुए कालसदृश नरकासुरने बजते हुए शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग तथा पणव आदि सहस्रों वाद्योंका मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द सुना ॥ १०० $\frac{१}{२}$ ॥
यतः कृष्णस्ततो गत्वा सर्वे ते विकृताननाः ॥ १०१ ॥
परिवार्य गरुत्मन्तं सर्वेऽयुध्यन्त संगताः ।
वे सभी विकराल मुखवाले निशाचर जहाँ कृष्ण थे, उधर ही जाकर गरुड़को घेरकर खड़े हो गये और सब-के-सब संगठित होकर युद्ध करने लगे ॥ १०१ $\frac{१}{२}$ ॥
महता छादयामासुः शरवर्षेण सैनिकाः ॥ १०२ ॥
शक्तिशूलगदाप्रासस्तोमरान् सायकान् बहून् ।
आकाशं छादयामासुर्विमुञ्चन्तः सहस्रशः ॥ १०३ ॥
उन समस्त सैनिकोंने बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके भगवान्को ढक दिया । उन्होंने कई सहस्र शक्ति, शूल, गदा, प्रास, तोमर और सायकोंका प्रहार करके आकाशको आच्छादित कर दिया ॥ १०२-१०३ ॥
कृष्णः कृष्णाम्बुदाकारः शार्ङ्गं गृह्य धनुस्ततः ।
विस्फार्य सुमहच्चापं धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ १०४ ॥
व्यसृजच्छरवर्षाणि दानवानां जनार्दनः ।
शरवर्षेण तत्सैन्यं व्यद्रवत् तु महाहवात् ॥ १०५ ॥
काले मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले जनार्दन श्रीकृष्णने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले शार्ङ्गनामक सुविशाल धनुषको हाथमें लेकर उसे खींचा और दानवोंपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । उस बाण-वृष्टिसे भयभीत हो असुरोंकी वह सेना उस महासमरसे भाग खड़ी हुई ॥ १०४-१०५ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ।
भग्नव्यूहाश्च ते सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ १०६ ॥
उस भयंकर रूपधारी राक्षसके साथ श्रीकृष्णका घोर युद्ध हुआ । वे सभी दानव श्रीकृष्णके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी सेनाका व्यूह भंग करके भाग गये ॥ १०६ ॥
केचिच्छिन्नभुजाश्चैव च्छिन्नग्रीवाशिराननाः ।
केचिच्चक्रद्विधाच्छिन्नाः केचिद् बाणार्दितोरसः ॥ १०७ ॥
किन्हींकी भुजाएँ कट गयी थीं, किन्हींके कण्ठ, मस्तक और मुख छिन्न-भिन्न हो गये थे । किन्हींके चक्रद्वारा दो टुकड़े हो गये थे और किन्हींके वक्षःस्थल बाणोंके आघातसे पीड़ित हो रहे थे ॥ १०७ ॥
१. प्राचीन कालकी मान्यताके अनुसार भूमिकी एक प्रकारकी नाप या परिमाण, जो किसीके मतसे सौ हाथका और किसीके मतसे चार सौ हाथका होता था ।