विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे वे असुर वर्षा करनेवाले बादलोंकी भाँति श्रीकृष्णपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे; परंतु श्रीकृष्णके सायकोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर उन सबके अंग-भंग हो गये और वे खूनसे रँग जानेके कारण फूले हुए पलाशके समान दिखायी देते थे। विचित्र युद्ध करनेवाले वे दानव अपने अस्त्र-शस्त्रोंके भंग हो जानेसे अत्यन्त भयभीत हो भाग खड़े हुए ॥ ७९-८० ॥ पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो वायुवेगेन दानवः । दशव्यामोच्छ्रितं वृक्षं समारुह्य वनस्पतिम् ॥ ८१ ॥ वृक्षमुत्पाट्य वेगेन प्रतिगृह्याभ्यधावत । तब पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके दानव हयग्रीव वायु- के समान वेगसे चढ़ आया। उसने दस व्याम¹ ऊँचे एक वनस्पतिको उखाड़ा और उखाड़कर उस वृक्षको हाथोंमें लिये हुए वह बड़े वेगसे श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ८१½ ॥ चिक्षेप स महावृक्षं शिक्षया सुघनाकृतिः ॥ ८२ ॥ वृक्षवेगानिलोद्भूतः शुश्रुवे सुमहान्स्वनः । काले बादलके समान आकारवाले हयग्रीवने उस विशाल वृक्षको शिक्षाके अनुसार कुशलतापूर्वक श्रीकृष्णपर दे मारा। उस वृक्षके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा बड़े जोरका शब्द सुनायी पड़ा ॥ ८२½ ॥ ततः शरसहस्रेण यतमानो जनार्दनः ॥ ८३ ॥ नैकधा तं प्रचिच्छेद चित्रभानुनिभाकृतिम् । तब विजयके लिये प्रयत्न करते हुए भगवान् श्रीकृष्णने एक सहस्र बाण मारकर उस वृक्षके बहुतेरे टुकड़े कर डाले। उस समय उसकी आकृति चित्रलिखित सूर्यके समान जान पड़ती थी ॥ ८३½ ॥ पुनश्चैकेन बाणेन हयग्रीवस्य चोरसि ॥ ८४ ॥ विव्याध स्तनयोर्मध्ये सायको ज्वलनप्रभः । विवेश सोऽपि वेगेन हृदं भित्त्वा विनिर्गतः ॥ ८५ ॥ फिर उन्होंने एक बाणसे हयग्रीवकी छाती छेद डाली। अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला वह बाण उसके दोनों स्तनोंके बीचमें गहरा आघात करता हुआ वेगपूर्वक भीतर घुस गया और हृदय विदीर्ण करके बाहर निकल गया ॥ तं जघान महाघोरं हयग्रीवं महाबलम् । अपारतेजा दुर्धर्षः स वै यादवनन्दनः ॥ ८६ ॥ मध्ये लोहितगङ्गस्य भगवान् देवकीसुतः । औदकायां विरूपाक्षं पाप्मानं पुरुषोत्तमः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार अपार तेजस्वी दुर्धर्ष वीर यादवनन्दन भगवान् देवकीपुत्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने लोहितगङ्गा* नामक प्रदेशके मध्यभागमें औदका ( या अलका ) के समीप कुरूप नेत्रोंवाले महाभयंकर और महाबली पापी हयग्रीवको कालके गालमें डाल दिया ॥ ८६-८७ ॥ अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतपः । निहत्य पुरुषव्याघ्रः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ॥ ८८ ॥ तत्पश्चात् आठ लाख दानवोंका संहार करके शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ॥ ८८ ॥ हत्वा पञ्चनदं नाम नरकस्य महासुरम् । ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥ ८९ ॥ पुरमासादयामास युद्धं तत्राभवन्महत् । नरकासुरके प्रमुख योद्धा महान् असुर पंचनद ( या पञ्चजन ) को मारकर वे प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे, जो अपनी शोभासे देदीप्यमान-सा हो रहा था। वहाँ असुरोंके साथ उनका महान् युद्ध हुआ ॥ ८९½ ॥ ततः प्राध्मापयच्छङ्खं पाञ्चजन्यं महाबलः ॥ ९० ॥ शुश्रुवे सुमहाशब्दः संवर्तकनिनदो यथा । श्रूयते त्रिषु लोकेषु भीमगम्भीरनिःस्वनः । तं श्रुत्वा नरकश्चासीत् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ९१ ॥ तत्पश्चात् महाबली श्रीकृष्णने अपना पाञ्चजन्यनामक शङ्ख बजाया। उसका महान् शब्द उसी प्रकार सुनायी दिया, जैसे प्रलयकालीन संवर्तक मेघकी भयानक गम्भीर गर्जना तीनों लोकोंमें सुनायी पड़ती है। उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर नरकासुरकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥ ९०-९१ ॥ लोहचक्राष्टसंयुक्तं त्रिनलप्रतिमं रथम् । रक्तकाञ्चनचित्राढ्यं वेदिकाभोगविस्तरम् ॥ ९२ ॥ वज्रध्वजेन महता काञ्चनेन विराजितम् । हेमदण्डपताकाढ्यं वैदूर्यमणिकूवरम् ॥ ९३ ॥ युक्तमश्वसहस्रेण रथं पररथारुजम् । लोहजालैश्च संछन्नं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ९४ ॥ वह एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें लोहेके आठ १. दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियों- के सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे व्याम कहते हैं।
- यह सिन्धुका ही प्रदेशविशेष था। २. वहाँ जलकी अधिकता थी या जलसे भरी हुई खाई थी, इसलिये उस पुर या स्थानका नाम 'औदका' रक्खा गया था। महाभारत सभापर्व पृष्ठ ८०५ में भी इसका वर्णन आया है। हरिवंशके इसी अध्यायमें १४ वें श्लोकमें इसका नाम अलका आया है।