विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ ततो दिव्येन चास्त्रेण पार्जन्येन जनार्दनः । महता शरवर्षेण धारयामास तद्बलम् ॥ ६३ ॥ जनार्दनने पार्जन्यनामक दिव्य अस्त्रसे बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उसकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ पञ्चपञ्चशरैस्तेषु एकैकेन च तान् बहून् । पार्जन्यस्य प्रभावेण सर्वान् मर्मस्वताडयत् ॥ ६४ ॥ उन्होंने पार्जन्य अस्त्रके प्रभावसे एक-एक करके उन सब बहुसंख्यक दानवोंके मर्मस्थानोंमें पाँच-पाँच बाणोंका प्रहार किया ॥ ६४ ॥ दुद्रुवुर्भयसंत्रस्ता भग्नास्ते दानवा रणे । स्वसैन्यं विद्रुतं दृष्ट्वा निष्क्राम पुनर्मृधे ॥ ६५ ॥ वे सभी दानव भयसे संत्रस्त होकर रणभूमिसे भाग खड़े हुए। अपनी सेनाको भागती देख निसुन्द पुनः युद्धके लिये निकला ॥ ६५ ॥ विसृजञ्छरवर्षाणि छादयामास केशवम् । न विभाति रणे सूर्यो नापि व्योम दिशो दश ॥ ६६ ॥ वह बाणोंकी वर्षा करता हुआ श्रीकृष्णको आच्छादित करने लगा। उस समय युद्धमें न तो सूर्यका पता चलता था और न आकाश तथा दसों दिशाओंका ही ॥ ६६ ॥ शरैः संछादयामास निसुन्दो गरुडध्वजम् । सावित्रं नाम दिव्यास्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥ ६७ ॥ निसुन्दने अपने बाणोंसे गरुड़-ध्वजको ढक दिया। तब पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सावित्र नामक दिव्यास्त्रको ग्रहण किया॥ तेन बाणेन तान् बाणांश्चिच्छेद समरे हरिः । बाणैर्बाणांश्च संछिद्य तस्य कृष्णो महाबलः ॥ ६८ ॥ छत्रमेकेन बाणेन रथेषां च त्रिभिः शरैः । पुनश्चिच्छेद तानश्वांश्चतुर्भिः शरैः ॥ ६९ ॥ सारथिं पञ्चभिर्बाणैर्ध्वजमेकेन चिच्छिदे । उस अस्त्रद्वारा छोड़े हुए बाणसे समराङ्गणमें श्रीहरिने निसुन्दके उन सभी बाणोंको काट डाला। महाबली श्रीकृष्णने अपने बाणोंद्वारा उसके सायकोंके टुकड़े-टुकड़े करके एक बाणसे उसका छत्र और तीन बाणोंसे उसके रथका हरसा काट डाला; फिर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको और पाँच बाणोंसे सारथिको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजा काट डाली॥ शरैकेन वपुः कृष्णः सुतीक्ष्णेन शितेन वै ॥ ७० ॥ शिरश्चिच्छेद भल्लेन निसुन्दस्य सुरोत्तमः । फिर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने एक अत्यन्त तीखे बाणसे उसके शरीरको और एक भल्लके द्वारा निसुन्दके मस्तकको भी काट गिराया ॥ ७०३ ॥ यः सहस्रसमास्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ॥ ७१ ॥ निसुन्दं पतितं दृष्ट्वा हयग्रीवः प्रतापवान् । शिलां प्रगृह्य महतीं तोलयामास दानवः ॥ ७२ ॥ जिसने अकेले ही लगातार एक सहस्र वर्षोंतक सम्पूर्ण देवताओंके साथ युद्ध किया था, उसी निसुन्दको धराशायी हुआ देख प्रतापी दानव हयग्रीवने एक बहुत बड़ी चट्टान लेकर उसे हाथोंपर तोला ॥ ७१-७२ ॥ आविध्य सहसामुच्छ्रितां शैलसमां प्रभुः । गृहीत्वा दिव्यपार्जन्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ७३ ॥ दिव्यास्त्रेण शिलां विष्णुः सप्तधाकृत तेजसा । तद् विदार्य महद्द्याश्म पातयामास भूतले ॥ ७४ ॥ फिर सहसा घुमाकर वह पहाड़-जैसी शिला उसने श्रीकृष्णपर दे मारी, परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णु- ने दिव्य पार्जन्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने तेजसे उस शिलाके सात टुकड़े कर डाले। उस बहुत बड़ी चट्टानको विदीर्ण करके उन्होंने पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ७३-७४ ॥ ततस्तैः शार्ङ्गनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । यथा देवासुरं युद्धमभवद् भरतर्षभ । नानाप्रहरणाकीर्णं तथा घोरमवर्तत ॥ ७५ ॥ भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर शार्ङ्गधनुषसे छोड़े गये नाना प्रकारके महान् बाणोंद्वारा देवासुर-संग्रामके समान घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र छोड़े जाने लगे, जिससे सारा युद्धस्थल व्याप्त हो गया ॥ ७५ ॥ ततः शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । गरुडस्थो महाबाहुर्निजघान महासुरान् ॥ ७६ ॥ तत्पश्चात् गरुड़पर बैठे हुए महाबाहु श्रीकृष्णने शार्ङ्ग- धनुषसे छोड़े गये भाँति-भाँतिके रंगवाले विशाल बाणोंद्वारा बड़े-बड़े असुरोंका संहार करना आरम्भ किया ॥ ७६ ॥ महासाङ्गलनिर्भिन्नाः शङ्खशक्तिनिपातिताः । विनेशुर्दानवाः सर्वे समासाद्य जनार्दनम् ॥ ७७ ॥ वे समस्त दानव भगवान् श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर उनके द्वारा चलाये गये महान् हलसे विदीर्ण तथा उनके शङ्खकी शक्तिसे धराशायी होकर नष्ट हो गये ॥ ७७ ॥ केचिच्चक्राग्निनिर्दग्धा दानवाः पेतुरम्बरात् । संनिकर्षगताः केचिद् गतासुविकृताननाः ॥ ७८ ॥ कितने ही दानव उनके निकट आकर चक्राग्निसे दग्ध हो आकाशमे पृथ्वीपर गिर पड़े। प्राणशून्य होनेपर उनके मुख विकराल हो गये थे ॥ ७८ ॥ असृजञ्छरवर्षाणि वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः । विकृताङ्गासुराः सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ ७९ ॥ शोणिताक्ताः स्म दृश्यन्ते पुष्पिता इव किंशुकाः व्यद्रवन्त सुवित्रस्ता भग्नास्त्राश्चित्रयोधिनः ॥ ८० ॥