भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 483
४६०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वैशम्पायन उवाच

गरुडस्योपरि श्रीमाञ्छङ्खचक्रगदाधरः।
विभ्रन्नीलाम्बुदाकारं पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण श्याम मेघके समान सुन्दर विग्रह धारण किये गरुड़पर बैठे थे । उनके अङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे चार भुजाओंसे विभूषित थे ॥ ४७॥

घनमालाकुलोरस्कः श्रीवत्साङ्कितभूषणः।
किरीटमूर्द्धा सूर्याभः सविद्युदिव चन्द्रमाः॥ ४८॥

उनका वक्षःस्थल वनमालासे व्याप्त था । वे श्रीवत्सचिह्नसे अलंकृत थे । उनके मस्तकपर किरीट शोभा पाता था, जिससे वे सूर्यके समान प्रकाशमान और विद्युतसहित चन्द्रमाके सदृश शोभायमान दिखायी देते थे ॥ ४८ ॥

ज्यां विक्षूजन्महाशब्दः श्रूयतेऽशनिनिःस्वनः।
ज्ञात्वा च दानवः सर्वं स्वयं विष्णुरिहागतः॥ ४९॥

उन्होंने धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर जब उसकी टंकारध्वनि फैलायी, उस समय वज्रपातके समान महाभयंकर शब्द सुनायी दिया। तब दानव मुरने वह सब जानकर यह समझ लिया कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही यहाँ पधारे हैं ॥ ४९ ॥

क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो मुरुः कालान्तकोपमः।
अभ्यधावत वेगेन शक्तिं गृह्य महासुरः॥ ५०॥

इससे मुरुको बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोषसे दुगुनी लाल हो गयीं। काल और अन्तकके समान भयंकर वह महान् असुर हाथमें शक्ति लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़ा ॥ ५० ॥

चिक्षेप सुमहाशक्तिं वज्रकाञ्चनभूषिताम्।
तामापतन्तीं शक्तिं तु महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ५१॥
समाधत्त शरं चैकं रुक्मपुङ्खं जनार्दनः।
द्विधाच्छिनत् क्षुरप्रेण वासुदेवः स वीर्यवान् ॥ ५२॥

उसने हीरे और सुवर्णसे भूषित वह महाशक्ति भगवान् श्रीकृष्णपर चलायी । जलती हुई बड़ी भारी उल्काके समान उस शक्तिको अपनी ओर आती देख पराक्रमी वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णने एक सोनेके पंखवाले बाणको धनुषपर रक्खा । उस क्षुरप्रके द्वारा उन्होंने मुरुकी शक्तिके दो टुकड़े कर डाले॥

शक्तिं विच्छेद्य तत्रासौ विद्युत्पुञ्ज इव ज्वलन्।
पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो मुरुर्जग्राह महागदाम् ॥ ५३॥

जब उन्होंने शक्ति काट डाली, तब वहाँ खड़ा हुआ मुरु, जो विद्युत्-पुञ्जके समान प्रज्वलित हो रहा था, पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके एक विशाल गदा हाथमें ले ली ॥


इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विक्षिप्त इव निःस्वनः।
आकर्णमुक्तं चिक्षेप अर्धचन्द्रं सुरोत्तमः॥ ५४॥
मध्यदेशे तु चिच्छेद गदां तां रुक्मभूषिताम्।
पुनश्चिच्छेद भल्लेन दानवस्य शिरो रणे॥ ५५॥

इतनेहीमें सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने अर्धचन्द्रनामक बाण हाथमें लिया, मानो इन्द्रने वज्र उठा लिया हो । उस समय धनुषको खींचनेसे वज्र गिरनेके समान ही शब्द हुआ । भगवान्ने उस अर्धचन्द्रको कानतक खींचकर चलाया । उसने उस सुवर्णभूषित गदाको बीचसे ही काट गिराया । फिर श्रीकृष्णने एक भल्लद्वारा रणभूमिमें उस दानवका सिर उड़ा दिया ॥

संछिद्य पाशान् सर्वांस्तान् मुरुं हत्वा सबान्धवम्।
सोऽग्र्यान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महाबलान्॥५६॥
शिलासंधानतिक्रम्य भगवान् देवकीसुतः।
अपश्यद् दानवं सैन्यं निसुन्दं च महाबलम् ॥ ५७॥
हयग्रीवं च दितिजं तथान्यांश्चित्रयोधिनः।

मुरुके समस्त पाशोंका छेदन करके उसे भाई-बन्धुओंसहित मारकर नरकासुरके महाबली अग्रगामी राक्षसोंका संहार करनेके अनन्तर शिलासमूहोंको लाँघकर भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णने दानवोंकी विशाल सेनाको और महाबली निसुन्द दैत्य, हयग्रीव तथा विचित्र युद्ध करनेवाले अन्यान्य दैत्योंको भी देखा ॥ ५६-५७३॥

रोधयामास तन्मार्गं स्वसैन्येन महाबलः॥ ५८॥
निसुन्दो बलिनां श्रेष्ठो रथमारुह्य सत्वरम्।
जग्राह कार्मुकं दिव्यं हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥ ५९॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली निसुन्दने अपनी सेनाके द्वारा श्रीकृष्णका मार्ग रोक दिया और तुरंत रथपर आरूढ़ हो सोनेकी पीठवाले दिव्य दुर्जय धनुषको हाथमें ले लिया ॥

विव्याध दशभिर्बाणैर्निसुन्दो मधुसूदनम्।
केशवश्चापि सप्तत्या विव्याध निशितैः शरैः ॥ ६०॥

इसके बाद निसुन्दने दस बाणोंसे मधुसूदनको वेध दिया । तब श्रीकृष्णने भी उसपर सत्तर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ ६० ॥

अप्राप्तांश्चान्तरिक्षे ताञ्छरांश्चिच्छेद माधवः।
ते सर्वे सैनिकाः कृष्णं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ६१ ॥
शरजालेन महता छाद्यमानः सुरोत्तमः।
दृष्ट्वा तान् दानवान् सर्वान् सक्रोधो मधुसूदनः ॥ ६२॥

उन दानवके बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले आकाशमें ही श्रीकृष्णने काट डाला । तब उसके सैनिकोने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और बाणोंके विशाल जालसे ढकना आरम्भ किया । तब उन समस्त दानवोंको देखकर भगवान् मधुसूदन कुपित हो उठे ॥ ६१-६२ ॥