विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | त्रिषष्टितमोऽध्यायः | ४५९ |
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तत्पश्चात् उन्होंने यथासमय अवस्थाके अनुसार सभी वृष्णिवंशी वीरोंको हृदयसे लगाया। इसके बाद बलराम और श्रीकृष्णसे पूजित हो वे उस दाशार्ही सभामें गये ॥ ३० ॥
तत्रासीनोऽभ्यलंकृत्य सभां ताममरेश्वरः ।
अर्घ्यादिसमुदाचारं प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ३१ ॥
वहाँ बैठकर उस सभाकी शोभा बढ़ाते हुए देवेश्वर इन्द्रने विधिपूर्वक अर्घ्य आदि उपचार ग्रहण किया ॥ ३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथोवाच महातेजा वासवो वासवानुजम् ।
सान्त्वपूर्वं करेणास्य संस्पृश्य वदनं शुभम् ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर महातेजस्वी इन्द्रने अपने अनुज श्रीकृष्णको सान्त्वना देकर उनके सुन्दर मुखारविन्दपर हाथ फेरते हुए कहा—॥ ३२ ॥
देवकीनन्दन वचः शृणु मे मधुसूदन ।
येन त्वाभिगतोऽस्म्यद्य कार्येणामित्रकर्शन ॥ ३३ ॥
'देवकीनन्दन ! मधुसूदन ! शत्रुनाशन ! आज मैं जिस कार्यसे तुम्हारे पास आया हूँ, उसके विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३३ ॥
नैर्ऋतो नरको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अदित्याः कुण्डले मोहाज्जहार दितिनन्दनः ॥ ३४ ॥
'नरक नामवाला एक राक्षस है, जो ब्रह्माजीका वरदान पाकर घमंडसे भर गया है। उस दैत्यने मोहवश देवमाता अदितिके दोनों कुण्डल हर लिये हैं ॥ ३४ ॥
देवानां विप्रिये नित्यमृषीणां च स वर्तते ।
तं च देवान्तरं प्रेक्ष्य जहि त्वं पापपूरुषम् ॥ ३५ ॥
'देव ! वह प्रतिदिन देवताओं तथा ऋषियोंके विरोधमें ही लगा रहता है। अतः तुम अवसर देखकर उस पापात्मा पुरुषको मार डालो ॥ ३५ ॥
अयं त्वां गरुडस्तत्र प्रापयिष्यति कामगः ।
कामवीर्योऽतितेजस्वी वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ ३६ ॥
'ये इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले गरुड़ तुम्हे वहाँ पहुँचा देंगे; क्योंकि इनमें यथेष्ट बल है। ये अन्तरिक्षचारी विनतानन्दन गरुड़ अत्यन्त तेजस्वी हैं ॥ ३६ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां भौमः स नरकोऽसुरः ।
निषूद्यित्वा तं पापं क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ॥ ३७ ॥
'भूमिपुत्र नरकासुर समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है, अतः तुम उस पापीका शीघ्र ही संहार करके लौट आओ' ॥ ३७॥
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो देवराजेन केशवः ।
प्रतिजज्ञे महाबाहुर्नर्रकस्य निवर्हणे ॥ ३८ ॥
देवराजके ऐसा कहनेपर महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने उनके सामने नरकासुरके संहारकी प्रतिज्ञा की ॥ ३८ ॥
ततः सहैव शक्रेण शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
प्रतस्थे गरुडेनाथ सत्यभामासहायवान् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामासहित गरुड़पर बैठकर इन्द्रके साथ ही चल दिये ॥ ३९ ॥
क्रमेण सप्तस्कन्धान् स मरुतां सहवासवः ।
पश्यतां यदुसिंहानाम्पूर्ध्वमाचक्रमे बली ॥ ४० ॥
यदुकुलके सिंह-सदृश पराक्रमी वीरोंके देखते-देखते इन्द्रसहित बलवान् श्रीकृष्ण क्रमशः वायुके सातों स्कन्धोंको लाँघकर ऊपर चले गये ॥ ४० ॥
वारणेन्द्रगतः शक्रो गरुडस्थो जनार्दनः ।
विदूरत्वात् प्रकाशेते सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ४१ ॥
गजराज ऐरावतपर चढ़े हुए इन्द्र और गरुड़पर बैठे हुए भगवान् जनार्दन अधिक दूर चले जानेके कारण सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४१ ॥
अन्तरिक्षे च गन्धर्वरैरप्सरोभिश्च केशवः ।
स्तूयमानोऽथ शक्रश्च क्रमेणान्तरधीयत ॥ ४२ ॥
अन्तरिक्षमें गन्धर्व और अप्सराओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए श्रीकृष्ण और इन्द्र बारी-बारीसे अदृश्य हो गये ॥ ४२ ॥
समाधायेतिकर्तव्यं वासवो विबुधाधिपः ।
स्वमेव भवनं प्रायात् कृष्णः प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ ४३ ॥
अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उपयुक्त व्यवस्था करके देवराज इन्द्र अपने भवनको चले गये और श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरकी राह ली ॥ ४३ ॥
पक्षानिलहतो वायुः प्रतिलोमं ववौ तदा ।
ततो भीमरवा मेघा वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥
गरुड़के पंखोंसे आहत होकर वायु उलटी दिशाको बहने लगी। फिर तो आकाशमें विचरनेवाले बादल भयानक आवाजके साथ वहीं चक्कर काटने लगे ॥ ४४ ॥
क्षणेन समनुप्राप्तो द्विजेनाकाशगेन वै ।
दूरादेव च तान् दृष्ट्वा प्रययौ यत्र ते स्थिताः ॥ ४५ ॥
आकाशचारी पक्षी गरुड़के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण क्षणभरमें प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। उन्होंने दूरसे ही उन राक्षसोंको देखकर जहाँ वे खड़े थे, उधर ही यात्रा की ॥४५॥
अपश्यद् द्वारि तत्रस्थां हस्त्यश्वरथवाहिनीम् ।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रान् ददर्श ह ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्णने देखा, प्राग्ज्योतिषपुरके द्वारपर हाथी, घोड़े और रथोंकी विशाल वाहिनी खड़ी है। उन्होंने मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाश देखे, जिनके किनारेके भागोंमें छुरे लगे हुए थे ॥ ४६ ॥