विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
ताश्च प्राग्ज्योतिषपतिं मुरोश्चैव दशात्मजाः।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत॥ १५॥
स एष तपसः पारे वरदृप्तो महासुरः ॥ १५॥
मुर या मुरु नामक दैत्यके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उन कुमारियों तथा प्राग्ज्योतिषपति भौमकी रक्षा करते हुए उसकी उपासना करते थे। यह महान् असुर नरक तपस्याके अन्तमें वर पाकर उन्मत्त हो गया था॥ १५॥
न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा।
कृतपूर्वं तदा घोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥ १६॥
पूर्वकालमें समस्त महादैत्यों ने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पापकर्म नहीं किया था, जो उस महान् असुरने अकेले ही कर डाला था॥ १६॥
अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थे महासुरः।
यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम्॥ १७॥
द्वारपालाश्च चत्वारस्तस्यासन् युद्धदुर्मदाः।
उस महादैत्यने कुण्डलोंके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया था। पृथ्वी देवीने जिसे जन्म दिया था और प्राग्ज्योतिषपुरपर जिसका अधिकार था, उस नरकासुरके चार युद्धोन्मत्त दैत्य द्वारपाल थे॥ १७३॥
हयग्रीवो निसुन्दश्च वीरः पञ्चनदस्तथा ॥ १८॥
मुरुः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तोऽसुरो महान्।
उनके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निसुन्द, वीर पञ्चनद तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुरु, जो कि वरदान प्राप्त कर चुका था॥ १८३॥
आदेवयानमावृत्य पन्थानं समुपस्थितः।
वित्रासनः सुकृतिनां विरूपै राक्षसैः सह ॥ १९॥
वह नरकासुर समूचे देवयान मार्गको घेरकर वहाँ उपस्थित हो जाता और भयंकर रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर उधरसे जानेवाले पुण्यात्माओंको डराया करता था॥
तद्वधार्थं महाबाहुः शङ्खचक्रगदासिभृत्।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वसुदेवाज्जनार्दनः ॥ २०॥
उसके वधके लिये शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भ और वसुदेवके संयोगसे प्रकट हुए॥ २०॥
तस्याथ पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः।
निवासो द्वारका देवैरुपायैरुपपादिता ॥ २१॥
उनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। उन पुरुषप्रवर श्रीकृष्णका निवासस्थान द्वारका है, जिसे देवताओंने उपयुक्त उपायसे उपलब्ध कराया था॥ २१॥
अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात्।
महार्णवपरिक्षिप्ता पञ्चपर्वतशोभिता ॥ २२॥
द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावतीपुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। वह महासागरसे घिरी हुई तथा पाँच पर्वतोंसे सुशोभित है॥ २२॥
तस्यां देवपुराभायां सभा काञ्चनतोरणा।
सा दाशार्हीति विख्याता योजनायामविस्तृता ॥ २३॥
देवपुरीके समान सुशोभित होनेवाली द्वारकामें एक सभा है, जिसमें सोनेकी वन्दनवारें लगी हैं। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है तथा वह दाशार्हीसभाके नामसे विख्यात है॥ २३॥
तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः।
लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥ २४॥
उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धक-वंशके सभी लोग बैठते थे और सम्पूर्ण लोकजीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते थे॥ २४॥
तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ।
दिव्यगन्धो ववौ वायुः पुष्पवर्षं पपात ह ॥ २५॥
भरतश्रेष्ठ ! एक दिनकी बात है, सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी॥
ततः किलिकिलाशब्दः प्रभाजालाभिसंवृतः।
मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥ २६॥
तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें किलिकिलाहट-का शब्द हुआ और तेजोराशिसे घिरी हुई दिव्य आकृति प्रकट हुई, जो धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी ।२६।
मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डुरं गजमास्थितः।
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः समदृश्यत ॥ २७॥
उस तेजपुञ्जके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ दिखायी दिये॥ २७॥
रामकृष्णौ च राजा स वृष्ण्यन्धकगणैः सह।
प्रत्युद्ययुर्महात्मानं पूजयन्तः सुरेश्वरम् ॥ २८॥
उस समय महात्मा देवराज इन्द्रका स्वागत करनेके लिये बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंश-के अन्य लोगोंके साथ उठकर उनकी अगवानीमें गये ॥२८॥
सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम्।
सस्वजे बलदेवं च तं च राजानमाहुकम् ॥ २९॥
इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया; फिर बलदेव तथा राजा उग्रसेनसे भी वे उसी प्रकार मिले॥ २९॥
वृष्णीनन्यान् सस्वजे च यथाकालं यथावयः।
पूजितो रामकृष्णभ्यामाविवेश स तां सभाम् ॥ ३०॥