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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

४५८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

ताश्च प्राग्ज्योतिषपतिं मुरोश्चैव दशात्मजाः।
नैर्ऋताश्च यथा मुख्याः पालयन्त उपासत॥ १५॥
स एष तपसः पारे वरदृप्तो महासुरः ॥ १५॥

मुर या मुरु नामक दैत्यके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उन कुमारियों तथा प्राग्ज्योतिषपति भौमकी रक्षा करते हुए उसकी उपासना करते थे। यह महान् असुर नरक तपस्याके अन्तमें वर पाकर उन्मत्त हो गया था॥ १५॥

न चासुरगणैः सर्वैः सहितैः कर्म तत् पुरा।
कृतपूर्वं तदा घोरं यदकार्षीन्महासुरः ॥ १६॥

पूर्वकालमें समस्त महादैत्यों ने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पापकर्म नहीं किया था, जो उस महान् असुरने अकेले ही कर डाला था॥ १६॥

अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थे महासुरः।
यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम्॥ १७॥
द्वारपालाश्च चत्वारस्तस्यासन् युद्धदुर्मदाः।

उस महादैत्यने कुण्डलोंके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया था। पृथ्वी देवीने जिसे जन्म दिया था और प्राग्ज्योतिषपुरपर जिसका अधिकार था, उस नरकासुरके चार युद्धोन्मत्त दैत्य द्वारपाल थे॥ १७३॥

हयग्रीवो निसुन्दश्च वीरः पञ्चनदस्तथा ॥ १८॥
मुरुः पुत्रसहस्रैश्च वरदत्तोऽसुरो महान्।

उनके नाम इस प्रकार हैं—हयग्रीव, निसुन्द, वीर पञ्चनद तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान् असुर मुरु, जो कि वरदान प्राप्त कर चुका था॥ १८३॥

आदेवयानमावृत्य पन्थानं समुपस्थितः।
वित्रासनः सुकृतिनां विरूपै राक्षसैः सह ॥ १९॥

वह नरकासुर समूचे देवयान मार्गको घेरकर वहाँ उपस्थित हो जाता और भयंकर रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर उधरसे जानेवाले पुण्यात्माओंको डराया करता था॥

तद्वधार्थं महाबाहुः शङ्खचक्रगदासिभृत्।
जातो वृष्णिषु देवक्यां वसुदेवाज्जनार्दनः ॥ २०॥

उसके वधके लिये शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भ और वसुदेवके संयोगसे प्रकट हुए॥ २०॥

तस्याथ पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजसः।
निवासो द्वारका देवैरुपायैरुपपादिता ॥ २१॥

उनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। उन पुरुषप्रवर श्रीकृष्णका निवासस्थान द्वारका है, जिसे देवताओंने उपयुक्त उपायसे उपलब्ध कराया था॥ २१॥

अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात्।
महार्णवपरिक्षिप्ता पञ्चपर्वतशोभिता ॥ २२॥

द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावतीपुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। वह महासागरसे घिरी हुई तथा पाँच पर्वतोंसे सुशोभित है॥ २२॥

तस्यां देवपुराभायां सभा काञ्चनतोरणा।
सा दाशार्हीति विख्याता योजनायामविस्तृता ॥ २३॥

देवपुरीके समान सुशोभित होनेवाली द्वारकामें एक सभा है, जिसमें सोनेकी वन्दनवारें लगी हैं। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है तथा वह दाशार्हीसभाके नामसे विख्यात है॥ २३॥

तत्र वृष्ण्यन्धकाः सर्वे रामकृष्णपुरोगमाः।
लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ॥ २४॥

उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धक-वंशके सभी लोग बैठते थे और सम्पूर्ण लोकजीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते थे॥ २४॥

तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद् भरतर्षभ।
दिव्यगन्धो ववौ वायुः पुष्पवर्षं पपात ह ॥ २५॥

भरतश्रेष्ठ ! एक दिनकी बात है, सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी॥

ततः किलिकिलाशब्दः प्रभाजालाभिसंवृतः।
मुहूर्तमन्तरिक्षेऽभूत् ततो भूमौ प्रतिष्ठितः ॥ २६॥

तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें किलिकिलाहट-का शब्द हुआ और तेजोराशिसे घिरी हुई दिव्य आकृति प्रकट हुई, जो धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी ।२६।

मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डुरं गजमास्थितः।
वृतो देवगणैः सर्वैर्वासवः समदृश्यत ॥ २७॥

उस तेजपुञ्जके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके साथ दिखायी दिये॥ २७॥

रामकृष्णौ च राजा स वृष्ण्यन्धकगणैः सह।
प्रत्युद्ययुर्महात्मानं पूजयन्तः सुरेश्वरम् ॥ २८॥

उस समय महात्मा देवराज इन्द्रका स्वागत करनेके लिये बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंश-के अन्य लोगोंके साथ उठकर उनकी अगवानीमें गये ॥२८॥

सोऽवतीर्य गजात् तूर्णं परिष्वज्य जनार्दनम्।
सस्वजे बलदेवं च तं च राजानमाहुकम् ॥ २९॥

इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया; फिर बलदेव तथा राजा उग्रसेनसे भी वे उसी प्रकार मिले॥ २९॥

वृष्णीनन्यान् सस्वजे च यथाकालं यथावयः।
पूजितो रामकृष्णभ्यामाविवेश स तां सभाम् ॥ ३०॥

विष्णुपर्व ]त्रिषष्टितमोऽध्यायः४५९

तत्पश्चात् उन्होंने यथासमय अवस्थाके अनुसार सभी वृष्णिवंशी वीरोंको हृदयसे लगाया। इसके बाद बलराम और श्रीकृष्णसे पूजित हो वे उस दाशार्ही सभामें गये ॥ ३० ॥

तत्रासीनोऽभ्यलंकृत्य सभां ताममरेश्वरः ।
अर्घ्यादिसमुदाचारं प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ३१ ॥

वहाँ बैठकर उस सभाकी शोभा बढ़ाते हुए देवेश्वर इन्द्रने विधिपूर्वक अर्घ्य आदि उपचार ग्रहण किया ॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

अथोवाच महातेजा वासवो वासवानुजम् ।
सान्त्वपूर्वं करेणास्य संस्पृश्य वदनं शुभम् ॥ ३२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर महातेजस्वी इन्द्रने अपने अनुज श्रीकृष्णको सान्त्वना देकर उनके सुन्दर मुखारविन्दपर हाथ फेरते हुए कहा—॥ ३२ ॥

देवकीनन्दन वचः शृणु मे मधुसूदन ।
येन त्वाभिगतोऽस्म्यद्य कार्येणामित्रकर्शन ॥ ३३ ॥

'देवकीनन्दन ! मधुसूदन ! शत्रुनाशन ! आज मैं जिस कार्यसे तुम्हारे पास आया हूँ, उसके विषयमें मेरी बात सुनो ॥ ३३ ॥

नैर्ऋतो नरको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अदित्याः कुण्डले मोहाज्जहार दितिनन्दनः ॥ ३४ ॥

'नरक नामवाला एक राक्षस है, जो ब्रह्माजीका वरदान पाकर घमंडसे भर गया है। उस दैत्यने मोहवश देवमाता अदितिके दोनों कुण्डल हर लिये हैं ॥ ३४ ॥

देवानां विप्रिये नित्यमृषीणां च स वर्तते ।
तं च देवान्तरं प्रेक्ष्य जहि त्वं पापपूरुषम् ॥ ३५ ॥

'देव ! वह प्रतिदिन देवताओं तथा ऋषियोंके विरोधमें ही लगा रहता है। अतः तुम अवसर देखकर उस पापात्मा पुरुषको मार डालो ॥ ३५ ॥

अयं त्वां गरुडस्तत्र प्रापयिष्यति कामगः ।
कामवीर्योऽतितेजस्वी वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ ३६ ॥

'ये इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाले गरुड़ तुम्हे वहाँ पहुँचा देंगे; क्योंकि इनमें यथेष्ट बल है। ये अन्तरिक्षचारी विनतानन्दन गरुड़ अत्यन्त तेजस्वी हैं ॥ ३६ ॥

अवध्यः सर्वभूतानां भौमः स नरकोऽसुरः ।
निषूद्यित्वा तं पापं क्षिप्रमागन्तुमर्हसि ॥ ३७ ॥

'भूमिपुत्र नरकासुर समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है, अतः तुम उस पापीका शीघ्र ही संहार करके लौट आओ' ॥ ३७॥

इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो देवराजेन केशवः ।
प्रतिजज्ञे महाबाहुर्नर्रकस्य निवर्हणे ॥ ३८ ॥

देवराजके ऐसा कहनेपर महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने उनके सामने नरकासुरके संहारकी प्रतिज्ञा की ॥ ३८ ॥

ततः सहैव शक्रेण शङ्खचक्रगदासिभृत् ।
प्रतस्थे गरुडेनाथ सत्यभामासहायवान् ॥ ३९ ॥

तदनन्तर शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामासहित गरुड़पर बैठकर इन्द्रके साथ ही चल दिये ॥ ३९ ॥

क्रमेण सप्तस्कन्धान् स मरुतां सहवासवः ।
पश्यतां यदुसिंहानाम्पूर्ध्वमाचक्रमे बली ॥ ४० ॥

यदुकुलके सिंह-सदृश पराक्रमी वीरोंके देखते-देखते इन्द्रसहित बलवान् श्रीकृष्ण क्रमशः वायुके सातों स्कन्धोंको लाँघकर ऊपर चले गये ॥ ४० ॥

वारणेन्द्रगतः शक्रो गरुडस्थो जनार्दनः ।
विदूरत्वात् प्रकाशेते सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ४१ ॥

गजराज ऐरावतपर चढ़े हुए इन्द्र और गरुड़पर बैठे हुए भगवान् जनार्दन अधिक दूर चले जानेके कारण सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४१ ॥

अन्तरिक्षे च गन्धर्वरैरप्सरोभिश्च केशवः ।
स्तूयमानोऽथ शक्रश्च क्रमेणान्तरधीयत ॥ ४२ ॥

अन्तरिक्षमें गन्धर्व और अप्सराओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए श्रीकृष्ण और इन्द्र बारी-बारीसे अदृश्य हो गये ॥ ४२ ॥

समाधायेतिकर्तव्यं वासवो विबुधाधिपः ।
स्वमेव भवनं प्रायात् कृष्णः प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ ४३ ॥

अपने कार्यकी सिद्धिके लिये उपयुक्त व्यवस्था करके देवराज इन्द्र अपने भवनको चले गये और श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरकी राह ली ॥ ४३ ॥

पक्षानिलहतो वायुः प्रतिलोमं ववौ तदा ।
ततो भीमरवा मेघा वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥

गरुड़के पंखोंसे आहत होकर वायु उलटी दिशाको बहने लगी। फिर तो आकाशमें विचरनेवाले बादल भयानक आवाजके साथ वहीं चक्कर काटने लगे ॥ ४४ ॥

क्षणेन समनुप्राप्तो द्विजेनाकाशगेन वै ।
दूरादेव च तान् दृष्ट्वा प्रययौ यत्र ते स्थिताः ॥ ४५ ॥

आकाशचारी पक्षी गरुड़के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण क्षणभरमें प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। उन्होंने दूरसे ही उन राक्षसोंको देखकर जहाँ वे खड़े थे, उधर ही यात्रा की ॥४५॥

अपश्यद् द्वारि तत्रस्थां हस्त्यश्वरथवाहिनीम् ।
क्षुरान्तान् मौरवान् पाशान् षट्सहस्रान् ददर्श ह ॥ ४६ ॥

श्रीकृष्णने देखा, प्राग्ज्योतिषपुरके द्वारपर हाथी, घोड़े और रथोंकी विशाल वाहिनी खड़ी है। उन्होंने मुर दैत्यके बनाये हुए छः हजार पाश देखे, जिनके किनारेके भागोंमें छुरे लगे हुए थे ॥ ४६ ॥

४६०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वैशम्पायन उवाच

गरुडस्योपरि श्रीमाञ्छङ्खचक्रगदाधरः।
विभ्रन्नीलाम्बुदाकारं पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४७॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण श्याम मेघके समान सुन्दर विग्रह धारण किये गरुड़पर बैठे थे । उनके अङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे चार भुजाओंसे विभूषित थे ॥ ४७॥

घनमालाकुलोरस्कः श्रीवत्साङ्कितभूषणः।
किरीटमूर्द्धा सूर्याभः सविद्युदिव चन्द्रमाः॥ ४८॥

उनका वक्षःस्थल वनमालासे व्याप्त था । वे श्रीवत्सचिह्नसे अलंकृत थे । उनके मस्तकपर किरीट शोभा पाता था, जिससे वे सूर्यके समान प्रकाशमान और विद्युतसहित चन्द्रमाके सदृश शोभायमान दिखायी देते थे ॥ ४८ ॥

ज्यां विक्षूजन्महाशब्दः श्रूयतेऽशनिनिःस्वनः।
ज्ञात्वा च दानवः सर्वं स्वयं विष्णुरिहागतः॥ ४९॥

उन्होंने धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचकर जब उसकी टंकारध्वनि फैलायी, उस समय वज्रपातके समान महाभयंकर शब्द सुनायी दिया। तब दानव मुरने वह सब जानकर यह समझ लिया कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही यहाँ पधारे हैं ॥ ४९ ॥

क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो मुरुः कालान्तकोपमः।
अभ्यधावत वेगेन शक्तिं गृह्य महासुरः॥ ५०॥

इससे मुरुको बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोषसे दुगुनी लाल हो गयीं। काल और अन्तकके समान भयंकर वह महान् असुर हाथमें शक्ति लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़ा ॥ ५० ॥

चिक्षेप सुमहाशक्तिं वज्रकाञ्चनभूषिताम्।
तामापतन्तीं शक्तिं तु महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ५१॥
समाधत्त शरं चैकं रुक्मपुङ्खं जनार्दनः।
द्विधाच्छिनत् क्षुरप्रेण वासुदेवः स वीर्यवान् ॥ ५२॥

उसने हीरे और सुवर्णसे भूषित वह महाशक्ति भगवान् श्रीकृष्णपर चलायी । जलती हुई बड़ी भारी उल्काके समान उस शक्तिको अपनी ओर आती देख पराक्रमी वसुदेवपुत्र श्रीकृष्णने एक सोनेके पंखवाले बाणको धनुषपर रक्खा । उस क्षुरप्रके द्वारा उन्होंने मुरुकी शक्तिके दो टुकड़े कर डाले॥

शक्तिं विच्छेद्य तत्रासौ विद्युत्पुञ्ज इव ज्वलन्।
पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो मुरुर्जग्राह महागदाम् ॥ ५३॥

जब उन्होंने शक्ति काट डाली, तब वहाँ खड़ा हुआ मुरु, जो विद्युत्-पुञ्जके समान प्रज्वलित हो रहा था, पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके एक विशाल गदा हाथमें ले ली ॥


इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विक्षिप्त इव निःस्वनः।
आकर्णमुक्तं चिक्षेप अर्धचन्द्रं सुरोत्तमः॥ ५४॥
मध्यदेशे तु चिच्छेद गदां तां रुक्मभूषिताम्।
पुनश्चिच्छेद भल्लेन दानवस्य शिरो रणे॥ ५५॥

इतनेहीमें सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने अर्धचन्द्रनामक बाण हाथमें लिया, मानो इन्द्रने वज्र उठा लिया हो । उस समय धनुषको खींचनेसे वज्र गिरनेके समान ही शब्द हुआ । भगवान्ने उस अर्धचन्द्रको कानतक खींचकर चलाया । उसने उस सुवर्णभूषित गदाको बीचसे ही काट गिराया । फिर श्रीकृष्णने एक भल्लद्वारा रणभूमिमें उस दानवका सिर उड़ा दिया ॥

संछिद्य पाशान् सर्वांस्तान् मुरुं हत्वा सबान्धवम्।
सोऽग्र्यान् रक्षोगणान् हत्वा नरकस्य महाबलान्॥५६॥
शिलासंधानतिक्रम्य भगवान् देवकीसुतः।
अपश्यद् दानवं सैन्यं निसुन्दं च महाबलम् ॥ ५७॥
हयग्रीवं च दितिजं तथान्यांश्चित्रयोधिनः।

मुरुके समस्त पाशोंका छेदन करके उसे भाई-बन्धुओंसहित मारकर नरकासुरके महाबली अग्रगामी राक्षसोंका संहार करनेके अनन्तर शिलासमूहोंको लाँघकर भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णने दानवोंकी विशाल सेनाको और महाबली निसुन्द दैत्य, हयग्रीव तथा विचित्र युद्ध करनेवाले अन्यान्य दैत्योंको भी देखा ॥ ५६-५७३॥

रोधयामास तन्मार्गं स्वसैन्येन महाबलः॥ ५८॥
निसुन्दो बलिनां श्रेष्ठो रथमारुह्य सत्वरम्।
जग्राह कार्मुकं दिव्यं हेमपृष्ठं दुरासदम् ॥ ५९॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली निसुन्दने अपनी सेनाके द्वारा श्रीकृष्णका मार्ग रोक दिया और तुरंत रथपर आरूढ़ हो सोनेकी पीठवाले दिव्य दुर्जय धनुषको हाथमें ले लिया ॥

विव्याध दशभिर्बाणैर्निसुन्दो मधुसूदनम्।
केशवश्चापि सप्तत्या विव्याध निशितैः शरैः ॥ ६०॥

इसके बाद निसुन्दने दस बाणोंसे मधुसूदनको वेध दिया । तब श्रीकृष्णने भी उसपर सत्तर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ ६० ॥

अप्राप्तांश्चान्तरिक्षे ताञ्छरांश्चिच्छेद माधवः।
ते सर्वे सैनिकाः कृष्णं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ६१ ॥
शरजालेन महता छाद्यमानः सुरोत्तमः।
दृष्ट्वा तान् दानवान् सर्वान् सक्रोधो मधुसूदनः ॥ ६२॥

उन दानवके बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले आकाशमें ही श्रीकृष्णने काट डाला । तब उसके सैनिकोने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और बाणोंके विशाल जालसे ढकना आरम्भ किया । तब उन समस्त दानवोंको देखकर भगवान् मधुसूदन कुपित हो उठे ॥ ६१-६२ ॥

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ ततो दिव्येन चास्त्रेण पार्जन्येन जनार्दनः । महता शरवर्षेण धारयामास तद्बलम् ॥ ६३ ॥ जनार्दनने पार्जन्यनामक दिव्य अस्त्रसे बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उसकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ पञ्चपञ्चशरैस्तेषु एकैकेन च तान् बहून् । पार्जन्यस्य प्रभावेण सर्वान् मर्मस्वताडयत् ॥ ६४ ॥ उन्होंने पार्जन्य अस्त्रके प्रभावसे एक-एक करके उन सब बहुसंख्यक दानवोंके मर्मस्थानोंमें पाँच-पाँच बाणोंका प्रहार किया ॥ ६४ ॥ दुद्रुवुर्भयसंत्रस्ता भग्नास्ते दानवा रणे । स्वसैन्यं विद्रुतं दृष्ट्वा निष्क्राम पुनर्मृधे ॥ ६५ ॥ वे सभी दानव भयसे संत्रस्त होकर रणभूमिसे भाग खड़े हुए। अपनी सेनाको भागती देख निसुन्द पुनः युद्धके लिये निकला ॥ ६५ ॥ विसृजञ्छरवर्षाणि छादयामास केशवम् । न विभाति रणे सूर्यो नापि व्योम दिशो दश ॥ ६६ ॥ वह बाणोंकी वर्षा करता हुआ श्रीकृष्णको आच्छादित करने लगा। उस समय युद्धमें न तो सूर्यका पता चलता था और न आकाश तथा दसों दिशाओंका ही ॥ ६६ ॥ शरैः संछादयामास निसुन्दो गरुडध्वजम् । सावित्रं नाम दिव्यास्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः ॥ ६७ ॥ निसुन्दने अपने बाणोंसे गरुड़-ध्वजको ढक दिया। तब पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सावित्र नामक दिव्यास्त्रको ग्रहण किया॥ तेन बाणेन तान् बाणांश्चिच्छेद समरे हरिः । बाणैर्बाणांश्च संछिद्य तस्य कृष्णो महाबलः ॥ ६८ ॥ छत्रमेकेन बाणेन रथेषां च त्रिभिः शरैः । पुनश्चिच्छेद तानश्वांश्चतुर्भिः शरैः ॥ ६९ ॥ सारथिं पञ्चभिर्बाणैर्ध्वजमेकेन चिच्छिदे । उस अस्त्रद्वारा छोड़े हुए बाणसे समराङ्गणमें श्रीहरिने निसुन्दके उन सभी बाणोंको काट डाला। महाबली श्रीकृष्णने अपने बाणोंद्वारा उसके सायकोंके टुकड़े-टुकड़े करके एक बाणसे उसका छत्र और तीन बाणोंसे उसके रथका हरसा काट डाला; फिर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको और पाँच बाणोंसे सारथिको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजा काट डाली॥ शरैकेन वपुः कृष्णः सुतीक्ष्णेन शितेन वै ॥ ७० ॥ शिरश्चिच्छेद भल्लेन निसुन्दस्य सुरोत्तमः । फिर सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने एक अत्यन्त तीखे बाणसे उसके शरीरको और एक भल्लके द्वारा निसुन्दके मस्तकको भी काट गिराया ॥ ७०३ ॥ यः सहस्रसमास्त्वेकः सर्वान् देवानयोधयत् ॥ ७१ ॥ निसुन्दं पतितं दृष्ट्वा हयग्रीवः प्रतापवान् । शिलां प्रगृह्य महतीं तोलयामास दानवः ॥ ७२ ॥ जिसने अकेले ही लगातार एक सहस्र वर्षोंतक सम्पूर्ण देवताओंके साथ युद्ध किया था, उसी निसुन्दको धराशायी हुआ देख प्रतापी दानव हयग्रीवने एक बहुत बड़ी चट्टान लेकर उसे हाथोंपर तोला ॥ ७१-७२ ॥ आविध्य सहसामुच्छ्रितां शैलसमां प्रभुः । गृहीत्वा दिव्यपार्जन्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ७३ ॥ दिव्यास्त्रेण शिलां विष्णुः सप्तधाकृत तेजसा । तद् विदार्य महद्द्याश्म पातयामास भूतले ॥ ७४ ॥ फिर सहसा घुमाकर वह पहाड़-जैसी शिला उसने श्रीकृष्णपर दे मारी, परंतु अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णु- ने दिव्य पार्जन्यास्त्र लेकर उसके द्वारा अपने तेजसे उस शिलाके सात टुकड़े कर डाले। उस बहुत बड़ी चट्टानको विदीर्ण करके उन्होंने पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ७३-७४ ॥ ततस्तैः शार्ङ्गनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । यथा देवासुरं युद्धमभवद् भरतर्षभ । नानाप्रहरणाकीर्णं तथा घोरमवर्तत ॥ ७५ ॥ भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर शार्ङ्गधनुषसे छोड़े गये नाना प्रकारके महान् बाणोंद्वारा देवासुर-संग्रामके समान घोर युद्ध आरम्भ हो गया। उसमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र छोड़े जाने लगे, जिससे सारा युद्धस्थल व्याप्त हो गया ॥ ७५ ॥ ततः शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्नानावर्णैर्महाशरैः । गरुडस्थो महाबाहुर्निजघान महासुरान् ॥ ७६ ॥ तत्पश्चात् गरुड़पर बैठे हुए महाबाहु श्रीकृष्णने शार्ङ्ग- धनुषसे छोड़े गये भाँति-भाँतिके रंगवाले विशाल बाणोंद्वारा बड़े-बड़े असुरोंका संहार करना आरम्भ किया ॥ ७६ ॥ महासाङ्गलनिर्भिन्नाः शङ्खशक्तिनिपातिताः । विनेशुर्दानवाः सर्वे समासाद्य जनार्दनम् ॥ ७७ ॥ वे समस्त दानव भगवान् श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर उनके द्वारा चलाये गये महान् हलसे विदीर्ण तथा उनके शङ्खकी शक्तिसे धराशायी होकर नष्ट हो गये ॥ ७७ ॥ केचिच्चक्राग्निनिर्दग्धा दानवाः पेतुरम्बरात् । संनिकर्षगताः केचिद् गतासुविकृताननाः ॥ ७८ ॥ कितने ही दानव उनके निकट आकर चक्राग्निसे दग्ध हो आकाशमे पृथ्वीपर गिर पड़े। प्राणशून्य होनेपर उनके मुख विकराल हो गये थे ॥ ७८ ॥ असृजञ्छरवर्षाणि वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः । विकृताङ्गासुराः सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ ७९ ॥ शोणिताक्ताः स्म दृश्यन्ते पुष्पिता इव किंशुकाः व्यद्रवन्त सुवित्रस्ता भग्नास्त्राश्चित्रयोधिनः ॥ ८० ॥

४६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे वे असुर वर्षा करनेवाले बादलोंकी भाँति श्रीकृष्णपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे; परंतु श्रीकृष्णके सायकोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर उन सबके अंग-भंग हो गये और वे खूनसे रँग जानेके कारण फूले हुए पलाशके समान दिखायी देते थे। विचित्र युद्ध करनेवाले वे दानव अपने अस्त्र-शस्त्रोंके भंग हो जानेसे अत्यन्त भयभीत हो भाग खड़े हुए ॥ ७९-८० ॥ पुनश्च क्रोधरक्ताक्षो वायुवेगेन दानवः । दशव्यामोच्छ्रितं वृक्षं समारुह्य वनस्पतिम् ॥ ८१ ॥ वृक्षमुत्पाट्य वेगेन प्रतिगृह्याभ्यधावत । तब पुनः क्रोधसे लाल आँखें करके दानव हयग्रीव वायु- के समान वेगसे चढ़ आया। उसने दस व्याम¹ ऊँचे एक वनस्पतिको उखाड़ा और उखाड़कर उस वृक्षको हाथोंमें लिये हुए वह बड़े वेगसे श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा ॥ ८१½ ॥ चिक्षेप स महावृक्षं शिक्षया सुघनाकृतिः ॥ ८२ ॥ वृक्षवेगानिलोद्भूतः शुश्रुवे सुमहान्स्वनः । काले बादलके समान आकारवाले हयग्रीवने उस विशाल वृक्षको शिक्षाके अनुसार कुशलतापूर्वक श्रीकृष्णपर दे मारा। उस वृक्षके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा बड़े जोरका शब्द सुनायी पड़ा ॥ ८२½ ॥ ततः शरसहस्रेण यतमानो जनार्दनः ॥ ८३ ॥ नैकधा तं प्रचिच्छेद चित्रभानुनिभाकृतिम् । तब विजयके लिये प्रयत्न करते हुए भगवान् श्रीकृष्णने एक सहस्र बाण मारकर उस वृक्षके बहुतेरे टुकड़े कर डाले। उस समय उसकी आकृति चित्रलिखित सूर्यके समान जान पड़ती थी ॥ ८३½ ॥ पुनश्चैकेन बाणेन हयग्रीवस्य चोरसि ॥ ८४ ॥ विव्याध स्तनयोर्मध्ये सायको ज्वलनप्रभः । विवेश सोऽपि वेगेन हृदं भित्त्वा विनिर्गतः ॥ ८५ ॥ फिर उन्होंने एक बाणसे हयग्रीवकी छाती छेद डाली। अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला वह बाण उसके दोनों स्तनोंके बीचमें गहरा आघात करता हुआ वेगपूर्वक भीतर घुस गया और हृदय विदीर्ण करके बाहर निकल गया ॥ तं जघान महाघोरं हयग्रीवं महाबलम् । अपारतेजा दुर्धर्षः स वै यादवनन्दनः ॥ ८६ ॥ मध्ये लोहितगङ्गस्य भगवान् देवकीसुतः । औदकायां विरूपाक्षं पाप्मानं पुरुषोत्तमः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार अपार तेजस्वी दुर्धर्ष वीर यादवनन्दन भगवान् देवकीपुत्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने लोहितगङ्गा* नामक प्रदेशके मध्यभागमें औदका ( या अलका ) के समीप कुरूप नेत्रोंवाले महाभयंकर और महाबली पापी हयग्रीवको कालके गालमें डाल दिया ॥ ८६-८७ ॥ अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतपः । निहत्य पुरुषव्याघ्रः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ॥ ८८ ॥ तत्पश्चात् आठ लाख दानवोंका संहार करके शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह श्रीकृष्णने प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ॥ ८८ ॥ हत्वा पञ्चनदं नाम नरकस्य महासुरम् । ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ॥ ८९ ॥ पुरमासादयामास युद्धं तत्राभवन्महत् । नरकासुरके प्रमुख योद्धा महान् असुर पंचनद ( या पञ्चजन ) को मारकर वे प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे, जो अपनी शोभासे देदीप्यमान-सा हो रहा था। वहाँ असुरोंके साथ उनका महान् युद्ध हुआ ॥ ८९½ ॥ ततः प्राध्मापयच्छङ्खं पाञ्चजन्यं महाबलः ॥ ९० ॥ शुश्रुवे सुमहाशब्दः संवर्तकनिनदो यथा । श्रूयते त्रिषु लोकेषु भीमगम्भीरनिःस्वनः । तं श्रुत्वा नरकश्चासीत् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ९१ ॥ तत्पश्चात् महाबली श्रीकृष्णने अपना पाञ्चजन्यनामक शङ्ख बजाया। उसका महान् शब्द उसी प्रकार सुनायी दिया, जैसे प्रलयकालीन संवर्तक मेघकी भयानक गम्भीर गर्जना तीनों लोकोंमें सुनायी पड़ती है। उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर नरकासुरकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं ॥ ९०-९१ ॥ लोहचक्राष्टसंयुक्तं त्रिनलप्रतिमं रथम् । रक्तकाञ्चनचित्राढ्यं वेदिकाभोगविस्तरम् ॥ ९२ ॥ वज्रध्वजेन महता काञ्चनेन विराजितम् । हेमदण्डपताकाढ्यं वैदूर्यमणिकूवरम् ॥ ९३ ॥ युक्तमश्वसहस्रेण रथं पररथारुजम् । लोहजालैश्च संछन्नं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ९४ ॥ वह एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें लोहेके आठ १. दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियों- के सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे व्याम कहते हैं।

  • यह सिन्धुका ही प्रदेशविशेष था। २. वहाँ जलकी अधिकता थी या जलसे भरी हुई खाई थी, इसलिये उस पुर या स्थानका नाम 'औदका' रक्खा गया था। महाभारत सभापर्व पृष्ठ ८०५ में भी इसका वर्णन आया है। हरिवंशके इसी अध्यायमें १४ वें श्लोकमें इसका नाम अलका आया है।

विष्णुपर्व ] त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ४६३


पहिये लगे थे । उसकी लंबाई तीन नलवेके बराबर थी १। वह रत्न और सुवर्णसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न था । उसकी बैठक बहुत विस्तृत थी। वह रथ सुवर्ण-निर्मित तथा हीरकजटित विशाल ध्वजसे सुशोभित था। उसकी पताकामें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उस रथका कूबर वैदूर्य मणिका बना हुआ था। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे और वह शत्रुक्षके रथोंको तोड़ डालनेमें समर्थ था। उसे ऊपरसे लोहेकी जालीद्वारा ढक दिया गया था और वह रथ विचित्र बेल-बूटोंसे सुशोभित था ॥ ९२-९४ ॥

रथमध्यगतो वीरः ससंध्य इव भास्करः।
नानाप्रहरणाकीर्णं रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ ९५ ॥

उस रथके मध्यभागमें बैठा हुआ नरकासुर संध्या-कालसे युक्त सूर्यके समान जान पड़ता था । उसका वह सुवर्णभूषित रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ था ॥

वज्रं तथोरश्छदमिन्दुवर्णं व्यनन्दमुक्तानलतुल्यतेजाः ।
किरीटमूर्द्धार्कहुताशनाभः कर्णौ तथा कुण्डलयोज्ज्वलन्तौ ॥ ९६ ॥

हीरेका बना हुआ वक्षःस्थलको ढकनेवाला उसका कवच चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था । मुक्ताकी माला धारण करके वह अग्निके तुल्य तेजस्वी प्रतीत होता था । मस्तकपर उद्दीप्त किरीट धारण करके वह सूर्य एवं अग्निकी-सी प्रभासे प्रकाशित होता था तथा उसके दोनों कान सुन्दर कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे ॥ ९६ ॥

धूम्रवर्णा महाकाया रक्ताक्षा विकृताननाः ।
नानाकवचिनः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ९७ ॥

उसके साथ धुएँके समान रंगवाले विशालकाय लाल नेत्र और विकराल मुखवाले जो दैत्य, दानव और राक्षस आये थे, वे सब-के-सब नाना प्रकारके कवच धारण किये हुए थे ॥ ९७ ॥

खड्गचर्मधराः केचित् केचित् तूणधनुर्भृतः ।
शक्तिहस्तास्तथा केचिच्छूलहस्तास्तथापरे ॥ ९८ ॥

कोई ढाल और तलवार लिये हुए थे तो कोई धनुष, बाण और तरकस । किन्हींके हाथमें शक्ति थी तो किन्हींके हाथमें शूल ॥ ९८ ॥

गजवाजिरथौघैश्च चालयन्तश्च मेदिनीम् ।
निर्ययुर्नगरात् सर्वे सुसंनद्धाः प्रहारिणः ॥ ९९ ॥

वे सब भलीभाँति कवच आदिसे सुसज्जित एवं प्रहार करनेके लिये उद्यत हो हाथी, घोड़े तथा रथसमूहोंद्वारा पृथ्वीको कम्पित करते हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ९९ ॥

वृतो दैत्यगणैः सार्द्धं नरकः कालसंनिभः ।
भेरीशङ्खमृदङ्गानां पणवानां सहस्रशः ॥ १०० ॥
शुश्राव वाद्यमानानां जीमूतनिनदोपमम् ।

दैत्य-समूहोंसे घिरे हुए कालसदृश नरकासुरने बजते हुए शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग तथा पणव आदि सहस्रों वाद्योंका मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द सुना ॥ १०० $\frac{१}{२}$ ॥

यतः कृष्णस्ततो गत्वा सर्वे ते विकृताननाः ॥ १०१ ॥
परिवार्य गरुत्मन्तं सर्वेऽयुध्यन्त संगताः ।

वे सभी विकराल मुखवाले निशाचर जहाँ कृष्ण थे, उधर ही जाकर गरुड़को घेरकर खड़े हो गये और सब-के-सब संगठित होकर युद्ध करने लगे ॥ १०१ $\frac{१}{२}$ ॥

महता छादयामासुः शरवर्षेण सैनिकाः ॥ १०२ ॥
शक्तिशूलगदाप्रासस्तोमरान् सायकान् बहून् ।
आकाशं छादयामासुर्विमुञ्चन्तः सहस्रशः ॥ १०३ ॥

उन समस्त सैनिकोंने बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके भगवान्‌को ढक दिया । उन्होंने कई सहस्र शक्ति, शूल, गदा, प्रास, तोमर और सायकोंका प्रहार करके आकाशको आच्छादित कर दिया ॥ १०२-१०३ ॥

कृष्णः कृष्णाम्बुदाकारः शार्ङ्गं गृह्य धनुस्ततः ।
विस्फार्य सुमहच्चापं धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ १०४ ॥
व्यसृजच्छरवर्षाणि दानवानां जनार्दनः ।
शरवर्षेण तत्सैन्यं व्यद्रवत् तु महाहवात् ॥ १०५ ॥

काले मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले जनार्दन श्रीकृष्णने मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले शार्ङ्गनामक सुविशाल धनुषको हाथमें लेकर उसे खींचा और दानवोंपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । उस बाण-वृष्टिसे भयभीत हो असुरोंकी वह सेना उस महासमरसे भाग खड़ी हुई ॥ १०४-१०५ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ।
भग्नव्यूहाश्च ते सर्वे कृष्णबाणप्रपीडिताः ॥ १०६ ॥

उस भयंकर रूपधारी राक्षसके साथ श्रीकृष्णका घोर युद्ध हुआ । वे सभी दानव श्रीकृष्णके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी सेनाका व्यूह भंग करके भाग गये ॥ १०६ ॥

केचिच्छिन्नभुजाश्चैव च्छिन्नग्रीवाशिराननाः ।
केचिच्चक्रद्विधाच्छिन्नाः केचिद् बाणार्दितोरसः ॥ १०७ ॥

किन्हींकी भुजाएँ कट गयी थीं, किन्हींके कण्ठ, मस्तक और मुख छिन्न-भिन्न हो गये थे । किन्हींके चक्रद्वारा दो टुकड़े हो गये थे और किन्हींके वक्षःस्थल बाणोंके आघातसे पीड़ित हो रहे थे ॥ १०७ ॥


१. प्राचीन कालकी मान्यताके अनुसार भूमिकी एक प्रकारकी नाप या परिमाण, जो किसीके मतसे सौ हाथका और किसीके मतसे चार सौ हाथका होता था ।

४६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


केचिद् द्विधाकृताः शक्त्या गजाश्वरथवाहनाः।
केचित् कौमोदकीभिन्नाः केचिच्चक्रविदारिताः ॥१०८॥

कोई हाथी, घोड़े और रथोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले योद्धा शक्तिके प्रहारसे दो टूक हो गये थे। कोई कौमोदकी गदाके आघातसे पिस गये थे तथा कितने ही चक्रद्वारा विदीर्ण कर दिये गये थे ॥ १०८ ॥

एवं विमथिता सर्वा नराश्वरथवाहिनी।
तत्रासीन्नरकेणास्य युद्धं परमदारुणम् ॥१०९॥

इस प्रकार मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंसे युक्त वह सारी सेना मथ डाली गयी थी। वहाँ नरकासुरके साथ भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त दारुण युद्ध हुआ था ॥

यत् समासेन वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु।
त्रासनः सुरसंघानां नरकः पुरुषोत्तमम् ॥११०॥
योधयामास तेजस्वी मधुवन्मधुसूदनम्।
क्रोधरक्तातनयनो नरको घनसंनिभः ॥१११॥

यहाँ मैं संक्षेपसे जो कुछ बता रहा हूँ, वह मेरे मुखसे सुनो। देवसमूहको त्रास देनेवाला तेजस्वी नरकासुर मधुकी भाँति मधुसूदन भगवान् पुरुषोत्तमके साथ युद्ध करने लगा। उसके नेत्रप्रान्त क्रोधसे लाल हो रहे थे और उसकी आकृति मेघके समान काली थी ॥ ११०-१११ ॥

जग्राह कार्मुकं वीरः शक्रचापमिवोच्छ्रितम्।
तथार्ककिरणप्रख्यं बाणं जग्राह केशवः ॥११२॥

वीर श्रीकृष्णने इन्द्रधनुषके समान ऊँचा शरासन उठाया और सूर्यकिरणोंके समान चमचमाता हुआ बाण हाथमें लिया॥

दिव्येनास्त्रेण समरे पूरयामास तं रथम्।
उत्तमास्त्रं महापातं मुमोच नरको बली ॥११३॥

उन्होंने समराङ्गणमे अपने दिव्यास्त्रद्वारा नरकासुरके उस रथको भर दिया, तत्र बलवान् नरकासुरने भी बड़े वेगसे आघात करनेवाले उत्तम अस्त्रका प्रहार किया ॥ ११३ ॥

वज्रविस्फूर्जिताकारमायान्तं वीक्ष्य केशवः।
विच्छेदास्त्रं महाभागश्चक्रेण मधुसूदनः ॥११४॥

वज्रके समान गड़गड़ाहट पैदा करते हुए उस अस्त्रको आते देख महाभाग मधुसूदन केशवने चक्रके द्वारा उसका उच्छेद कर डाला ॥ ११४ ॥

व्यहनत् सारथिं चास्य शरेकेण जनार्दनः।
स रथं सध्वजं साश्वं जघान दशभिः शरैः ॥११५॥

भगवान् श्रीकृष्णने एक बाणसे उसके सारथिको मार डाला और दस बाणोंसे ध्वज और घोड़ोंसहित उस रथका संहार कर डाला ॥ ११५ ॥

तनुत्रं चैव चिच्छेद शरेण मधुसूदनः।
ततो विमुक्तकवचः सर्पस्येव तनूर्यथा ॥११६॥

इसके बाद मधुसूदनने एक बाणसे उसके कवचको काट गिराया। कवच कट जानेपर उसका शरीर केंचुलीसे निकले हुए सर्पके समान प्रतीत होने लगा ॥ ११६ ॥

हताश्वोऽपि रणे वीरो वितनुत्रश्च दानवः।
जग्राह विमलज्वालं लोहभारार्पितं दृढम् ॥११७॥
आविध्य सहसा मुक्तं शूलमिन्द्राशनिप्रभम्।

घोड़ोंके मारे जाने तथा कवचके कट जानेपर भी रणभूमिमें खड़े हुए उस दानव वीरने एक निर्मल ज्वालासे युक्त, लोहभारसे सम्पन्न और सुदृढ़ शूल हाथमें लिया, जो इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। उसने उस शूलको सहसा घुमाकर छोड़ दिया ॥ ११७१/२ ॥

तदापतत् स सम्प्रेक्ष्य शूलं हेमपरिष्कृतम् ॥११८॥
द्विधा छिन्नं क्षुरेण कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।

उस सुवर्णभूषित शूलको अपनी ओर आता देख अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने एक क्षुरप्रके द्वारा उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ११८१/२ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ॥११९॥
शस्त्रपातमहाघातं नरकेण महात्मना।

उस समय उनका उस भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस नरकके साथ शस्त्रोंके सम्पात एवं महाघातसे युक्त घोर युद्ध हुआ ॥ ११९१/२ ॥

मुहूर्तं योधयामास नरकं मधुसूदनः ॥१२०॥
अथोग्रचक्रश्चक्रेण प्रदीप्तेनाकरोद् द्विधा।

उग्र चक्रधारी मधुसूदनने दो घड़ीतक नरकासुरके साथ युद्ध किया। तत्पश्चात् प्रज्वलित चक्रद्वारा उसके शरीरके दो टुकड़े कर डाले ॥ १२०१/२ ॥

चक्रद्विधाकृतं तस्य शरीरमपतद् भुवि ॥१२१॥
विभक्तं कुलिशेनेव गिरेः शृङ्गं द्विधाकृतम्।

चक्रसे दो टूक हुआ नरकासुरका शरीर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो किसी पर्वतका शिखर वज्रके आघातसे दो भागोंमें विभक्त होकर धराशायी हो गया हो ॥ १२११/२ ॥

कृष्णमासाद्य देवेशं जगामास्तमिवांशुमान् ॥१२२॥
चक्रोत्कृन्तितगात्रोऽसौ दानवः पतितो रणे।
वज्रप्रहारनिर्भिन्नं यथा गैरिकपर्वतम् ॥१२३॥

देवेश्वर श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर वह सूर्यकी भाँति अस्ताचलको चला गया। चक्रसे शरीरके टूक-टूक हो जानेपर वह दानव रणभूमिमें गिर पड़ा। उस समय वह वज्रके प्रहारसे विदीर्ण हुए गेरूके पहाड़-जैसा जान पड़ता था ॥ १२२-१२३

भूमिस्तु पतितं पुत्रं निरीक्ष्यादाय कुण्डले।
उपातिष्ठत गोविन्दं वचनं चेदमब्रवीत् ॥१२४॥

अपने पुत्रको गिरा हुआ देख मूर्तिमती भूमिदेवी

[ विष्णुपूर्व ]चतुःषष्टितमोऽध्यायः४६५

अदितिके दोनों कुण्डल ले गोविन्दकी सेवामे उपस्थित हुई और इस प्रकार बोलीं—॥ १२४ ॥

दत्तस्त्वयैव गोविन्द त्वयैव विनिपातितः।
यथेच्छसि तथा क्रीड बालः क्रीडनकैरिव ॥ १२५ ॥
इमे ते कुण्डले देव प्रजास्तस्यानुपालय ॥ १२६ ॥

'गोविन्द ! आपहीने मुझे यह पुत्र प्रदान किया था और आपहीने इसे मार गिराया। प्रभो ! आपकी जैसी इच्छा हो वैसी क्रीडा कीजिये, ठीक वैसे ही, जैसे बालक खिलौनोंसे खेला करता है। देव ! ये ही वे दोनों कुण्डल हैं; इन्हें लीजिये और उस नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये' ॥ १२५-१२६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नरकवधे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नरकासुरका वधविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥


चतुःषष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका नरकासुरके भवनमें प्रवेश करके वहाँके धन-वैभव तथा सोलह हजार कुमारियोंको द्वारका भेजना और स्वयं देवलोकमें जा अदितिको कुण्डल दे वहाँसे पारिजात लेकर लौटना

वैशम्पायन उवाच

निहत्य नरकं भौमं वासवोपमविक्रमम्।
वासवावरजो विष्णुर्ददर्श नरकालयम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इन्द्रके समान पराक्रमी भूमिपुत्र नरकासुरका वध करके इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उसके भवनका निरीक्षण किया ॥ १ ॥

अथार्थगृहमासाद्य नरकस्य जनार्दनः।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥ २ ॥

तदनन्तर नरकासुरके धनागार (खजाने) में जाकर भगवान् जनार्दनने अक्षय धन और भाँति-भाँतिके रत्न देखे ॥ २ ॥

मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यस्य च संचयान्।
मासारगल्वकूटानि तथा वज्रस्य संचयान् ॥ ३ ॥
जाम्बूनदमयान्यस्य शातकुम्भमयानि च।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिनिभानि च ॥ ४ ॥

मणि, मोती, मूँगे, वैडूर्यमणिके ढेर, चन्द्रकान्त मणिकी पर्वतोपम राशि तथा हीरोंके संग्रह देखे। जाम्बूनद तथा शातकुम्भ नामक सुवर्णोंकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३-४ ॥

शयनानि महार्हाणि तथा सिंहासनानि च।
हिरण्यदण्डरुचिरं शीतरश्मिसमप्रभम् ॥ ५ ॥
ददर्श तन्महच्छत्रं वर्षमाणमिवाम्बुदम् ।
जातरूपस्य शुभ्रस्य धाराः शतसहस्रशः ॥ ६ ॥

बहुमूल्य शय्या तथा सिंहासन भी देखनेमें आये। वहीं उन्होंने वह विशाल छत्र भी देखा, जो वर्षा करनेवाले मेघके समान उज्ज्वल सुवर्णकी लाखों धाराएँ बहा रहा था, उसका सुन्दर दण्ड सुवर्णका बना हुआ था तथा उसकी कान्ति चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णकी थी ॥ ५-६ ॥

वरुणादाहृतं पूर्वं नरकेणेति नः श्रुतम्।
यावद्रत्नं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥ ७ ॥
नैव राज्ञः कुबेरस्य न शक्रस्य यमस्य च।
रत्नसंनिचयस्तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुतः ॥ ८ ॥

हमने सुना है कि वह छत्र नरकासुर पहले वरुणके यहाँसे छीन लाया था। नरकासुरके घरमें जितना रत्न और असंख्य धन देखा गया, उतना राजा कुबेर, इन्द्र और यमके पास भी नहीं था। रत्नोंका वैसा संग्रह कुबेर आदिके यहाँ भी न तो कभी देखा गया और न सुना ही गया ॥ ७-८ ॥

हते भौमे निसुन्दे च हयग्रीवे च दानवे।
उपानिन्युस्ततस्तानि रत्नान्यन्तःपुराणि च ॥ ९ ॥
दानवा हतशिष्टा ये कोशसंचयरक्षिणः।
केशवाय महार्हाणि यान्यर्हति जनार्दनः ॥ १० ॥

भौमासुर, निसुन्द और दानव हयग्रीवके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए जो दानव और खजानेके रक्षक थे, वे उन बहुमूल्य रत्नों और अन्तःपुरकी वस्तुओंको भगवान् श्रीकृष्णके पास ले आये, जिन्हें पाने और रखनेकी योग्यता एकमात्र श्रीकृष्णमें ही थी ॥ ९-१० ॥

दैत्या ऊचुः

इमानि मणिरत्नानि विविधानि बहूनि च।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥ ११ ॥
हेमसूत्रा महाकक्षाश्चापतोमरशालिनः।
रुचिराभिः पताकाभिः शवला रुचिरांकुशाः ॥ १२ ॥
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः।
अष्टौ शत सहस्राणि देशजाश्वोत्तमा हयाः ॥ १३ ॥
गोषु चापि कृतो यावान् कामस्तव जनार्दन।
तावतीः प्रापयिष्यामो वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १४ ॥

दैत्योंने कहा—जनार्दन ! ये जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक मणिरत्न हैं तथा जो भयंकर रूपवाले गजराज हैं,

४६६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जिनके ऊपर बिछायी जानेवाली कालीनें मूँगोंसे विभूषित हैं, जो सोनेके तारोंके बने हुए रस्सोंसे कसे जाते हैं, जिनकी जंजीरें बहुत बड़ी हैं, जो धनुष और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित होते हैं, जिनके अंकुश बड़े सुन्दर हैं तथा जो नाना प्रकारकी सुन्दर पताकाओं‌द्वारा चितकबरे दिखायी देते हैं, उन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है। इनसे दूनी हथिनियाँ हैं। आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं। इनके सिवा बहुत-सी गौएँ हैं। इनमेंसे जिनके लिये आपको जितनी आवश्यकता हो, उतनी संख्यामें हम इन सबको वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा देंगे ॥ ११-१४ ॥

आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च ।
कामव्याहारिणश्चैव पक्षिणः प्रियदर्शनाः ॥ १५ ॥
चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीयकान्यपि ।
वस्तु यत् त्रिषु लोकेषु धर्मेणाधिगतं तव ।
प्रापयिष्याम तत् सर्वं वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १६ ॥
देवगन्धर्वरत्नानि पन्नगानां च यद् वसु ।
तानि सर्वाणि सन्तीह नरकस्य निवेशने ॥ १७ ॥

प्रभो ! महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत-से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले और देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुकाष्ठ, कालागुरु तथा तीनों लोकोंमें जो धन और रत्न यहाँ सञ्चित हैं, उन सबपर आपका धर्मतः अधिकार हो गया है। हम उन सबको वृष्ण्यन्धकपुरी द्वारकामें पहुँचा देंगे। देवताओं और गन्धर्वोंके यहाँ जो रत्न हैं तथा नागोंके यहाँ जो वैभव है, वे सब यहाँ नरकासुरके भवनमें विद्यमान हैं ॥ १५-१७ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्च सर्वं हृषीकेशः परिगृह्य परीक्ष्य च ।
सर्वमाहारयामास दानवैर्द्वारकां पुरीम् ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने वह सारा वैभव लेकर उसकी परीक्षा करके सब-का-सब दानवोंद्वारा द्वारकापुरीको पहुँचा दिया ॥ १८ ॥

ततस्तद् वारुणं छत्रं स्वयमुत्क्षिप्य माधवः ।
हिरण्यवर्षं वर्षन्तमारुरोह विहङ्गमम् ॥ १९ ॥
गरुडं पतगश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवाम्बुदम् ।
ततोऽभ्ययाद् गिरिश्रेष्ठमभितो मणिपर्वतम् ॥ २० ॥

तदनन्तर माधवने सुवर्णकी वर्षा करते हुए वरुणके उस छत्रको स्वयं ही उठाकर गरुड़पर रख दिया और मूर्तिमान् मेघके समान आकाशगामी पक्षिप्रवर गरुड़पर वे स्वयं भी बैठ गये। तत्पश्चात् वे गिरिश्रेष्ठ मणिपर्वतके समीप गये ॥ १९-२० ॥

तत्र पुण्या ववुर्वाता द्युभवंश्चामलाः प्रभाः ।
मणीनां हेमवर्णानामभिभूय दिवाकरम् ॥ २१ ॥

यहाँ बड़ी पवित्र हवा चल रही थी। सोनेके समान रंगवाली मणियोंकी निर्मल प्रभाएँ सूर्यको तिरस्कृत-सा करके प्रकाशित हो रही थीं ॥ २१ ॥

तत्र वैदूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः ।
सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ २२ ॥

वहाँ मधुसूदनने बहुत-से वैदूर्यमणिके समान रंगवाले प्रकाशमान द्वार और घर देखे, जहाँ वन्दनवारें बँधी थीं और पताकाएँ फहरा रही थीं ॥ २२ ॥

विद्युद्ग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः ।
हेमचित्रवितानैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥ २३ ॥

वह मणिपर्वत (जो कन्याओंका अन्तःपुर था) बिजलीसे गुँथे हुए मेघके समान प्रकाशित होता था। जिनमें सोनेके विचित्र चँदोवे तने हुए थे, ऐसे महल उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २३ ॥

तत्र ता वरहेमाभा ददर्श मधुसूदनः ।
गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तथा ॥ २४ ॥
ददर्श पृथुलश्रोणीः संरुद्धा गिरिकन्दरे ।
नरकेण समानीता रक्ष्यमाणाः समन्ततः ॥ २५ ॥

वहाँ मधुसूदनने श्रेष्ठ सुवर्णके समान कान्तिवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और देवताओंकी उन प्यारी पुत्रियोंको देखा, जो उस पर्वतकी कन्दरामें कैद की गयी थीं। उन सबके नितम्बभाग स्थूल और मांसल थे। नरकासुरने सब ओरसे लाकर उन्हें रख छोड़ा था ॥ २४-२५ ॥

त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तीरपराजिताः ।
निर्वशन्त्यो यथा देव्यः सुखिन्यः कामवर्जिताः ॥ २६ ॥

वह प्रदेश स्वर्गके समान सुखद था। वहाँ रहती हुई वे कुमारियाँ नरकासुरसे पराजित नहीं हुई थीं। उन्होंने कामभोगका परित्याग कर रक्खा था और वे देवियोंके समान वहाँ सुखपूर्वक रहती थीं ॥ २६ ॥

परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः ।
सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ २७ ॥

एक वेणी धारण करनेवाली तथा काषाय वस्त्रसे अपने अङ्गोंको आच्छादित करनेवाली उन समस्त कुमारियोंने महाबाहु श्रीकृष्णको चारों ओरसे घेर लिया। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको पूर्णतः संयममें रक्खा था ॥ २७ ॥

व्रतोपवासतन्वङ्ग्यः काङ्क्षन्त्यः कृष्णदर्शनम् ।
समेत्य यदुसिंहस्य सर्वाश्चक्रुः स्त्रियोऽञ्जलीन् ॥ २८ ॥

व्रत और उपवास करनेके कारण उनके सारे अङ्ग दुबले हो गये थे। वे सदा ही श्रीकृष्णके दर्शनकी अभिलाषा रखती थीं। यदुकुलके सिंह श्रीकृष्णके पास जाकर उन सब कुमारियोंने हाथ जोड़ लिये ॥ २८ ॥

विष्णुपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ४६७

नरकं निहतं ज्ञात्वा मुरं चैव महासुरम् ।
हयग्रीवं निसुन्दं च ताः कृष्णं पर्यवारयन् ॥ २९ ॥
नरकासुर, महान् असुर मुर, हयग्रीव तथा निसुन्दको मारा गया जानकर वे सब स्त्रियाँ श्रीकृष्णको घेरकर खड़ी हुई थीं ॥ २९ ॥

ये चासां रक्षिणो वृद्धा दानवा यदुनन्दनम् ।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे प्रणिपेतुर्वयोऽधिकाः ॥ ३० ॥
जो बड़े-बूढ़े दानव उन कुमारियोंके रक्षक थे, उनकी अवस्था बहुत अधिक थी। उन सबने हाथ जोड़कर यदुनन्दनको प्रणाम किया ॥ ३० ॥

तासां परमनारीणामृषभाक्षं निरीक्ष्य तम् ।
सर्वासामेव संकल्पः पतित्वेनाभवत् ततः ॥ ३१ ॥
वृषभके समान विशाल नेत्रवाले श्रीकृष्णका दर्शन करके उन समस्त सुन्दरियोंके मनमें उन्हें पति बनानेका संकल्प उदित हुआ ॥ ३१ ॥

तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रं निरीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः ।
सम्पहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ॥ ३२ ॥
श्रीकृष्णका चन्द्रमाके समान मनोहर मुख देखकर उनकी सारी इन्द्रियाँ आनन्दसिन्धुमें निमग्न हो गयी थीं। वे अत्यन्त हर्षमें भरकर उन महाबाहुसे इस प्रकार बोलीं—॥३२॥

सत्यं च यत् पुरा वायुरिहास्मान् वाक्यमब्रवीत् ।
सर्वभूतमतिज्ञश्च देवर्षिरपि नारदः ॥ ३३ ॥
'भगवन् ! पूर्वकालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके मनोभावको जाननेवाले देवर्षि नारदने भी जो बात कही थी, वह आज सत्य हो गयी ॥ ३३ ॥

विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिवृत् ।
स भौमं नरकं हत्वा भर्ता च भविता स वः ॥ ३४ ॥
'उन्होंने कहा था कि शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले जो सर्वव्यापी नारायणदेव हैं, वे भूमिपुत्र नरकका वध करके तुम सब लोगोंके पति होंगे ॥ ३४ ॥

सुप्रियं बत पश्यामश्चिरश्रुतमरिंदमम् ।
दर्शनेन कृतार्था हि वयमद्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
'हम चिरकालसे जिन शत्रुदमन श्यामसुन्दरके विषयमें बहुत कुछ सुनती चली आ रही हैं, आज उन्हीं परम प्रियतम प्रभुको प्रत्यक्ष देखनेका हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज आप परमात्माके दर्शनसे हम सब कृतार्थ हो गयीं' ॥ ३५॥

ततस्ताः सान्त्वयामास प्रमदा वासवानुजः ।
सर्वाः कमलपत्राक्षीर्दृष्ट्वा चोवाच माधवः ॥ ३६ ॥
तब इन्द्रके छोटे भाई माधवने उन समस्त कमलनयनी युवतियोंको सान्त्वना दी, उनकी ओर देखा और उनसे वार्तालाप किया ॥ ३६ ॥

यथार्हतः पूजयित्वा समाभाष्य च केशवः ।
यानैः किङ्करसंयुक्तैरुवाह मधुसूदनः ॥ ३७ ॥
इसके बाद मधुसूदन केशवने उनका यथोचित सम्मान तथा उनसे सम्भाषण करके उन्हें किङ्कर नामक दानवोंसे युक्त शिविकाओंपर सवार कराया ॥ ३७ ॥

किङ्कराणां सहस्राणि रक्षसां चातरंहसाम् ।
शिविकां वहतां तत्र निर्घोषः सुमहानभूत् ॥ ३८ ॥
वायुके समान वेगशाली किङ्कर नामक सहस्रों राक्षस उनकी शिविकाएँ ढोने लगे। उस समय उनका महान् घोष सर्वत्र छा गया ॥ ३८ ॥

तस्य पर्वतराजस्य शृङ्गं यत् परमार्चितम् ।
विमलार्केन्दुसंकाशं मणिकाञ्चनतोरणम् ॥ ३९ ॥
उस पर्वतराज मणिपर्वतका जो सर्वोत्तम एवं प्रशंसित शिखर था, वह निर्मल सूर्य एवं चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता था। उसमें मणि एवं सुवर्णके फाटक बने हुए थे ॥३९॥

सपक्षिगणमातङ्गं समृगव्यालपादपम् ।
शाखामृगगणाकीर्णं सुप्रस्तरशिलातलम् ॥ ४० ॥
न्यङ्कुभिश्च वराहेश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
सप्रपातं महासानुं विचित्रशिखरद्रुमम् ॥ ४१ ॥
अत्यद्भुतमचिन्त्यं च मृगवृन्दविलोड़ितम् ।
जीवञ्जीवकसंघैश्च बर्हिभिश्च निनादितम् ॥ ४२ ॥
वहाँ पक्षियोंके समुदाय, हाथी, मृग, सर्प और वृक्ष शोभा पाते थे। बंदरोंके समुदाय सब ओर भरे हुए थे। वहाँके प्रस्तर और शिलाएँ बहुत सुन्दर थीं। न्यङ्कु (बारहसिंगाविशेष), वराह और रुरुमृग उसका सेवन करते थे। वहाँ अनेकानेक झरने गिरते थे। उसके कई बड़े-बड़े आन्तर शिखर थे। उसके शृङ्ग और वृक्ष विचित्र शोभासे सम्पन्न थे। मणिपर्वतका वह शिखर अत्यन्त अद्भुत और अचिन्त्य था। मृगोंके झुंड वहाँ दौड़ लगाते रहते थे। चकोरोंके झुंड और मोर अपने कलरवोंसे उसे प्रतिध्वनित किये रहते थे ॥ ४०–४२ ॥

तदप्यतिबलो विष्णुर्दोर्भ्यामुत्पाट्य भासुरम् ।
आरोपयामास बली गरुडे पक्षिणां वरे ॥ ४३ ॥
अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे उस तेजस्वी पर्वत-शिखरको उखाड़कर पक्षिप्रवर गरुड़की पीठपर रख लिया ॥ ४३ ॥

मणिपर्वतशृङ्गं च सभायै च जनार्दनम् ।
उवाह लीलया पक्षी गरुडः पततां वरः ॥ ४४ ॥
पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ मणिपर्वतके उस शिखरको तथा पत्नीसहित श्रीकृष्णको भी लेकर लीलापूर्वक चलने लगे ॥४४॥

४६८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

स पक्षबलविक्षेपैर्हिमाद्रिशिखरोपमः।
दिक्षु सर्वासु संह्रादं जनयामास पक्षिराट् ॥ ४५ ॥

उनका शरीर हिमालयके शिखरके समान विशाल था। वे पक्षिराज अपनी पाँखोंको बलपूर्वक हिला-हिलाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मचाते जा रहे थे ॥ ४५ ॥

आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन्।
संजहार महाभ्राणि विजहार च कानिचित् ॥ ४६ ॥

वे बड़े-बड़े पर्वतशिखरोंको तोड़ डालते, वृक्षोंको उखाड़ फेंकते, बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देते और कुछको अपने साथ उड़ाये लिये जाते थे ॥ ४६ ॥

विषयं समतिक्रम्य देवयोश्चन्द्रसूर्ययोः।
ययौ वातजवः पक्षी जनार्दनवशे स्थितः ॥ ४७ ॥

चन्द्रदेव और सूर्यदेवके प्रदेशको लाँघकर वे वायुके समान वेगशाली पक्षी गरुड़ भगवान् श्रीकृष्णके वशमें होकर चलते थे ॥ ४७ ॥

स मेरुगिरिमासाद्य देवगन्धर्वसेवितम्।
देवसद्मानि सर्वाणि ददर्श मधुसूदनः ॥ ४८ ॥

देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित मेरुगिरिपर पहुँचकर उन भगवान् मधुसूदनने समस्त देवगृहोंका दर्शन किया ॥ ४८ ॥

विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च नराधिप।
भ्राजमानान्यतिक्रामन्नश्विनोश्च परंतप ॥ ४९ ॥
प्राप्य पुण्यतमांल्लोकान् देवलोकमरिंदमः।
शक्रसद्म समासाद्य प्रविवेश जनार्दनः ॥ ५० ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश्वर ! उन्होंने विश्वेदेवों, मरुद्गणों, साध्यों और अश्विनीकुमारोंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँघते हुए पुण्यतम लोकोंमें पहुँचकर देवलोकमें पदार्पण किया। तत्पश्चात् शत्रुदमन जनार्दनने इन्द्रभवनके निकट जाकर उसके भीतर प्रवेश किया ॥ ४९-५० ॥

अवतीर्य स तार्क्ष्यात् तु ददर्श विबुधाधिपम्।
प्रीतश्चैवाभ्यनन्दत् तं देवराजः शतक्रतुः ॥ ५१ ॥

वहाँ गरुड़से उतरकर वे देवेश्वर इन्द्रसे मिले। देवराज इन्द्रने भी प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन किया ॥ ५१ ॥

प्रदाय कुण्डले दिव्ये ववन्दे तं तदाच्युतः।
सभार्यो विबुधश्रेष्ठं नरश्रेष्ठो जनार्दनः ॥ ५२ ॥

उस समय अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले पत्नीसहित नरश्रेष्ठ जनार्दनने वे दोनों दिव्य कुण्डल उन्हें देकर देवप्रवर इन्द्रको प्रणाम किया ॥ ५२ ॥

अर्चितो देवराजेन रत्नैश्च प्रतिपूजितः।
सत्यभामा च पौलोम्या यथावदभिनन्दिता ॥ ५३ ॥

देवराज इन्द्रने नाना प्रकारके रत्नोंद्वारा श्रीकृष्णका आदर-सत्कार किया। इसी प्रकार पुलोमकन्या शचीने भी सत्यभामाका यथोचित रूपसे अभिनन्दन किया ॥ ५३ ॥

वासवो वासुदेवश्च जग्मतुः सहितौ तदा।
अदित्या भवनं दिव्यं देवमातुर्महर्द्धिमत् ॥ ५४ ॥

तदनन्तर इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंने एक साथ होकर देवमाता अदितिके अत्यन्त समृद्धिशाली दिव्य भवनमें प्रवेश किया ॥ ५४ ॥

तत्रादितिमुपास्यन्तीमप्सरोभिः समन्ततः।
ददृशाते महात्मानौ महाभागां तपोऽन्विताम् ॥ ५५ ॥

वहाँ उन दोनों महात्माओंने महाभागा तपस्विनी अदितिका दर्शन किया, जिनकी सब ओरसे अप्सराएँ उपासना (सेवा) करती थीं ॥ ५५ ॥

ततस्ते कुण्डले दिव्ये प्रादाददितिनन्दनः।
ववन्दे तां शचीभर्ता मातरं स्वां पुरंदरः ॥ ५६ ॥

वहाँ अदितिनन्दन शचीवल्लभ पुरन्दर इन्द्रने वे दोनों कुण्डल अपनी माताको दे दिये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ५६ ॥

जनार्दनं पुरस्कृत्य कर्म चैव शशंस तत्।
अदितिस्तौ सुतौ प्रीत्या परिष्वज्याभिनन्द्य च ॥ ५७ ॥
आशीर्भिरनुकूलाभिरुभावप्यवदत् तदा ।

इन्द्रने जनार्दनको आगे करके उनके पराक्रमकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अदितिने अपने उन दोनों पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक हृदयसे लगाकर उनका अभिनन्दन किया और दोनोंके लिये अनुकूल आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ५७½ ॥

पौलोमी सत्यभामा च प्रीत्या परमया युते ॥ ५८ ॥
अगृह्णीतां वराहार्या देव्यास्ते चरणौ शुभौ।
ते चाप्यभ्यवदत् प्रेम्णा देवमाता यशस्विनी ॥ ५९ ॥

शची और सत्यभामाने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ परम पूजनीया देवी अदितिके सुन्दर चरणोंका स्पर्श किया। तब यशस्विनी देवमाताने उन दोनोंसे भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया ॥

यथावदब्रवीच्चैव जनार्दनमिदं वचः।
अधृष्यः सर्वभूतानामवध्यश्च भविष्यसि ॥ ६० ॥
यथैव देवराजोऽयमजितो लोकपूजितः।

इसके बाद अदितिने भगवान् जनार्दनसे यह यथार्थ बात कही—‘वत्स! तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये अजेय और अवध्य होओगे। जैसे ये देवराज इन्द्र हैं, उसी प्रकार तुम भी अपराजित और लोकपूजित होओगे ॥ ६०½ ॥

भवत्वियं वरारोहा नित्यं च प्रियदर्शना ॥ ६१ ॥
सर्वलोकेषु विख्याता दिव्यगन्धा मनोरमा।
सत्यभामोत्तमा स्त्रीणां सुभगा स्थिरयौवना ॥ ६२ ॥
जरां न यास्यति वधूर्यावत्त्वं कृष्ण मानुषः।

विष्णुपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः [ ४६९

'यह सुन्दरी सत्यभामा सदा प्रियदर्शना, सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात, दिव्य गन्धवाली, मनोरमा, सुस्थिर-यौवना, सौभाग्यवती तथा स्त्रियोंमें उत्तम हो। श्रीकृष्ण ! जबतक तुम मानव बनकर मनुष्यलोकमें रहोगे, तबतक यह सत्यभामा बूढ़ी नहीं होगी' ॥ ६१ ६२३ ॥

एवमभ्यर्चितः कृष्णो देवमात्रा महाबलः ॥ ६३ ॥
देवराजायनुज्ञातो रत्नैश्च प्रतिपूजितः ।
वैनतेयं समारुह्य सहितः सत्यभामया ॥ ६४ ॥
देवाक्रीडं परिक्रामन् पूज्यमानं सुरर्षिभिः ।
देवमाता अदितिके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर देवराजकी आज्ञा ले उनसे रत्नोंद्वारा पूजित हो महाबली श्रीकृष्ण सत्यभामासहित गरुड़पर आरूढ़ हुए और देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित देवताओंके क्रीड़ा-कानन नन्दनवनमें सब ओर घूमने लगे ॥ ६३-६४३ ॥

स ददर्श महाबाहुराक्रीडे वासवस्य ह ॥ ६५ ॥
दिव्यमभ्यर्चितं देवैः पारिजातं महाद्रुमम् ।
नित्यपुष्पधरं दिव्यं पुण्यगन्धमनुत्तमम् ॥ ६६ ॥
इन्द्रके उस क्रीड़ावनमे महाबाहु श्रीकृष्णने पारिजात नामक दिव्य विशाल वृक्षको देखा, जो देवताओंद्वारा पूजित था। वह दिव्य वृक्ष सदा ही फूल धारण करनेवाला, पवित्र गन्धसे सुवासित तथा परम उत्तम था ॥ ६५-६६ ॥

यमासाद्य जनः सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम् ।
संरक्ष्यमाणं देवैस्तं प्रसद्यामितविक्रमः ॥ ६७ ॥
उत्पाद्यारोपयामास विष्णुस्तं गरुडोपरि ।
उसके पास जानेपर सब लोगोंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो आता था। देवता उस वृक्षकी रक्षा करते थे; परंतु अमितपराक्रमी श्रीकृष्णने उसे बलपूर्वक उखाड़कर गरुड़ की पीठपर रख लिया ॥ ६७३ ॥

सोऽपश्यत् सत्यभामा च दिव्यमप्सरसां गणम् ॥ ६८॥
पृष्ठतः सत्यभामा च दिव्या योषा च वीक्षिता ।
प्रायात् ततो द्वारवतीं वायुजुष्टेन वै पथा ॥ ६९ ॥
यहाँ श्रीकृष्ण तथा सत्यभामाने दिव्य अप्सराओंके समुदायको देखा। उन्होंने भी पीछेसे दिव्य युवती सत्यभामाका दर्शन किया। तदनन्तर वायुसेवित मार्गसे श्रीकृष्ण द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ ६८-६९ ॥

श्रुत्वा तं देवराजस्तु कर्म कृष्णस्य तत् तदा ।
अनुमेने महाबाहुः कृतकर्मेति चाब्रवीत् ॥ ७० ॥
महाबाहु देवराज इन्द्रने जब उस समय श्रीकृष्णके पारिजात-हरणरूपी उस कर्मको सुना, तब यह कहकर उसका अनुमोदन किया कि 'श्रीकृष्णने मेरा बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है' ॥ ७० ॥

स पूज्यमानस्त्रिदशैः सप्तर्षिगणसंस्तुतः ।
प्रतस्थे द्वारकां कृष्णो देवलोकादरिंदमः ॥ ७१ ॥
देवताओंसे पूजित और सप्तर्षियोंसे प्रशंसित हो शत्रुदमन श्रीकृष्णने देवलोकसे द्वारकाको प्रस्थान किया ॥ ७१ ॥

सोऽभिपत्य महाबाहुर्दीर्घमध्वानमल्पवत् ।
पूजितो देवराजेन ददृशे यादवीं पुरीम् ॥ ७२ ॥
देवराजसे सम्मानित हुए महाबाहु श्रीकृष्णने उस विशाल मार्गको लघु मार्गकी भाँति थोड़ी ही देरमें तय करके यादवपुरीको देखा ॥ ७२ ॥

तथा कर्म महत् कृत्वा भगवान् वासवानुजः ।
उपायाद् द्वारकां कृष्णः श्रीमान् गरुडवाहनः ॥ ७३ ॥
इन्द्रके छोटे भाई गरुड़वाहन श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण वैसा महान् कर्म करके द्वारकामें चले गये ॥ ७३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे द्वारकाप्रवेशे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजात-हरण और द्वारकामें प्रवेशविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥


पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

रैवतक पर्वतपर रुक्मिणीके व्रतोद्यापनका उत्सव, उसमें पारिजात-पुष्प देकर श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका सम्मान, नारदजीद्वारा रुक्मिणीके सर्वाधिक सौभाग्यकी प्रशंसा तथा सत्यभामाका कोपभवनमें प्रवेश

जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावे मुनिश्रेष्ठ माथुरे चरितं शुभम् ।
शृण्वन्नैवाधिगच्छामि तृप्तिं कृष्णस्य धीमतः ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा-- मुनिश्रेष्ठ ! मथुरामें अवतार लेकर बुद्धिमान् श्रीकृष्णने जो मङ्गलमयी लीलाएँ की हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥ १ ॥

द्वारकायां निवसतः कृतदारस्य षड्गुणम् ।
चरितं ब्रूहि कृष्णस्य सर्वं हि विदितं तव ॥ २ ॥

४७०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

द्वारकामें निवास करके सपत्नीक हो जानेपर श्रीकृष्णने जो षड्गुणसंपन्न चरित्र किये हैं, उन्हें बताइये; क्योंकि श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ आपको विदित हैं॥ २॥

वैशम्पायन उवाच

जनमेजय कृष्णस्य कृतदारस्य भारत।
निबोध चरितं चित्रं तस्यैव सदृशं प्रभो ॥ ३॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन जनमेजय! पत्नी परिग्रह करनेके पश्चात् श्रीकृष्णके जो विचित्र चरित्र हैं, उन्हें सुनो। प्रभो! वे चरित्र उन्हींके अनुरूप हैं॥ ३॥

प्राप्तदारो महातेजा वासुदेवः प्रतापवान्।
रुक्मिण्या सहितो देव्या ययौ रैवतकं नृप ॥ ४॥

नरेश्वर! सपत्नीक होनेके पश्चात् एक समय महातेजस्वी एवं प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण महारानी रुक्मिणीके साथ रैवतक पर्वतपर गये॥ ४॥

उपवासावसानं हि रुक्मिण्याः प्रतिपूजयन्।
तर्पयिष्यन् स्वयं विप्राञ्जगाम मधुसूदनः ॥ ५॥

उस रुक्मिणी देवीके उपवास-व्रतका उद्यापन था। उसका समादर करते हुए भगवान् मधुसूदन स्वयं ही ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करनेके लिये वहाँ गये॥ ५॥

कुमाराः प्रययुस्तत्र पुत्रभ्रातर एव च।
प्रेषिता वासुदेवेन नारदस्याभ्यनुज्ञया ॥ ६॥

देवर्षि नारदकी अनुमतिसे भगवान् वासुदेवके भेजनेपर यदुकुलके कुमार, पुत्र और भाई भी वहाँ गये॥ ६॥

षोडश स्त्रीसहस्राणि जग्मुरेव च धीमतः।
ऋद्धया परमया राजन् विष्णोरेवानुरूपया ॥ ७॥

राजन्! परम बुद्धिमान् विष्णुरूप श्रीकृष्णके अनुरूप उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न सोलह हजार स्त्रियाँ भी उस उत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये गयीं॥ ७॥

ततस्तत्र द्विजातीनां कामान् प्रादादधोक्षजः।
अर्थिनां धर्मनित्यानां वन्दिनामिष्टवादिनाम् ॥ ८॥
कल्याणानामगोत्राणां महतां पुण्यकर्मणाम्।
योनैः श्रुतैश्च यज्ञैश्च शुद्धानां कुरुनन्दन ॥ ९॥

कुरुनन्दन! तदनन्तर वहाँ भगवान् श्रीकृष्णने प्रार्थी, नित्य धर्मपरायण, वन्दी, प्रियवादी, माङ्गलिक नाम-गोत्रसे युक्त, महान् पुण्यकर्मा तथा योनि, विद्या और यज्ञके सम्बन्धसे शुद्ध ब्राह्मणोंको मनोवाञ्छित पदार्थ दिये॥ ८-९॥


१. समग्र ऐश्वर्य, समग्र ज्ञान, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र वैराग्य और समग्र धर्म—ये छः भग (ऐश्वर्य) ही छः गुण हैं। अथवा सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, अलुप्तशक्तिता और अनन्त शक्ति का होना—ये परमेश्वरके स्वरूपभूत गुण ही यहाँ छः गुणोंके नामसे स्मरण किये गये हैं।

तर्पयित्वा द्विजान् कामैरिष्टैरिष्टः सतां गतिः।
ज्ञातीन् संतर्पयामास यथार्हं भक्तवत्सलः ॥ १०॥

ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुओंसे तृप्त करके सत्पुरुषोंके प्रिय आश्रय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने अपने भाई-बन्धुओंको भी यथायोग्य संतुष्ट किया॥ १०॥

उपवासावसानेऽथ भगवान् स विशेषतः।
बहु मेने प्रियां भार्या रुक्मिणीं भीष्मकात्मजाम् ॥ ११॥

उपवासके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्यारी पत्नी भीष्मकराजकुमारी रुक्मिणीका विशेषरूपसे बहुत आदर किया॥ ११॥

वसतस्तस्य कृष्णस्य सदारस्यामितौजसः।
सहासीनस्य रुक्मिण्या नारदोऽभ्याययौ मुनिः ॥ १२॥

अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण पत्नियोंसहित वहाँ रहकर जब रुक्मिणीदेवीके साथ बैठे हुए थे, उसी समय नारदमुनि उनके निकट आये॥ १२॥

आगतं चाप्रमेयात्मा मुनिमिन्द्रानुजस्तदा।
शास्त्रदृष्टेन विधिना अर्चयामास केशवः ॥ १३॥

अप्रमेयस्वरूप इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्णने उस समय वहाँ आये हुए नारदमुनिका शास्त्रोक्त विधिसे पूजन किया॥ १३॥

सोऽर्चितो वासुदेवेन मुनिरर्च्यतमः सताम्।
पारिजाततरोः पुष्पं ददौ कृष्णाय भारत ॥ १४॥

भरतनन्दन! भगवान् वासुदेवसे पूजित हो सत्पुरुषोंके परम पूजनीय मुनिने वहाँ श्रीकृष्णके हाथमें पारिजात वृक्षका एक फूल दिया॥ १४॥

तद् वृक्षराजकुसुमं रुक्मिण्याः प्रददौ हरिः।
पार्श्वस्था सा हि कृष्णस्य भोज्या नरवराभवत् ॥ १५॥

नरश्रेष्ठ! वृक्षराज पारिजातके उस फूलको श्रीहरिने रुक्मिणीदेवीके हाथमें दे दिया; क्योंकि वे भोजकुलनन्दिनी रुक्मिणी श्रीकृष्णके पास उनके बगलमें ही बैठी हुई थीं॥ १५॥

प्रतिगृह्य तु तत् पुष्पं कामारिणरनिन्दिता।
शिरस्यमलपत्राक्षी ददौ कृष्णेङ्गितानुगा ॥ १६॥

उस पुष्पको हाथमें लेकर प्रद्युम्नजननी सती-साध्वी कमलनयनी रुक्मिणीने, जो श्रीकृष्णके संकेतका अनुसरण करनेवाली थीं, अपने सिरके बालोंमें लगा लिया॥ १६॥

त्रैलोक्यरूपसर्वस्वं नारायणमनोहरा।
शुशुभे देवपुष्पेण द्विगुणं भैष्मकी तदा ॥ १७॥

त्रिभुवनकी सारी रूपसम्पत्ति जिनमें निहित थी, वे इन नारायणकी मनोहारिणी लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी उस देवपुष्पको धारण करनेसे दुगुनी शोभा पाने लगीं॥ १७॥

[विष्णुपूर्व] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ४७१

तां नारदस्तथोवाच मुनिर्ब्रह्मसुतस्तदा।
तवैवौपयिकं पुष्पमेकं देवि पतिव्रते ॥ १८ ॥
'उस समय ब्रह्मकुमार नारद मुनि उनसे बोले—'देवि! पतिव्रते ! यह एकमात्र पुष्प तुम्हारे ही योग्य था ॥ १८ ॥

अलंकृतं पुष्पमेतत् संसर्गात् तव सर्वथा।
अत्यर्हा च मता मे त्वमेतत्पुष्पाद् धृतव्रते ॥ १९ ॥
'व्रतको धारण करनेवाली देवि ! तुम्हारे संसर्गसे यह फूल सर्वथा अलंकृत हो गया। इस पुष्पको धारण करनेसे तुम मेरी दृष्टिमें अत्यन्त पूजनीय हो गयी हो ॥ १९ ॥

कल्याणगुणसम्पन्ने सततं भर्तृवत्सले।
अम्लानमेतत् सततं पुष्पं भवति कामिनि ॥ २० ॥
संवत्सरपरं कालं कालज्ञे गुणसम्मते।
ईप्सितानपि गन्धांश्च ददाति वदतां वरे ॥ २१ ॥
'कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न पतिवत्सले ! कामिनि ! यह फूल एक वर्षतक सदा ताजा बना रहता है, कभी कुम्हलाता नहीं है। समयका ज्ञान रखनेवाली, अपने गुणोंसे आदर पानेवाली, वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुक्मिणी ! यह फूल एक सालतक मनोवाञ्छित गन्ध प्रदान करता रहता है ॥ २०-२१ ॥

शीतोष्णे चेच्छते देवि पुष्पमेतत् प्रयच्छति।
स्रवत्यपि रसान् देवि मनसाकाङ्क्षितान् वरान्॥२२॥
'देवि ! जितनी सर्दी या गर्मी अभीष्ट हो, यह फूल उसे देता रहता है तथा मनमें जिन श्रेष्ठ रसोंको प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, उन्हें भी यह पुष्प स्वयं ही झरता रहता है ॥

सेव्यमानं च सौभाग्यं ददाति वरवर्णिनि।
स्रवत्यपि तथा गन्धानीप्सितान् प्रीतिवर्धनम् ॥ २३ ॥
'वरवर्णिनि ! इस पुष्पका सेवन किया जाय तो यह सौभाग्य प्रदान करता है तथा मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली अभीष्ट सुगन्ध झरता रहता है ॥ २३ ॥

यानि यानि च पुष्पाणि त्वं देव्यभिलषिष्यसि।
कुसुमं वृक्षराजस्य तानि तानि प्रदास्यति ॥ २४ ॥
'देवि ! तुम जिन-जिन फूलोंकी अभिलाषा करोगी, वृक्षराज पारिजातका यह फूल उन सबको प्रस्तुत कर देगा ॥

एतदेव भगाधानं धर्मिष्ठे पुत्रदं तथा।
मतिं च नाशुभे धत्ते धार्यमाणं सदा शुभे ॥ २५ ॥
'धर्ममें निष्ठा रखनेवाली शुभे ! देवि ! यह पुष्प ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाला तथा पुत्रदायक है। इसे सदा धारण किया जाय तो यह बुद्धिको अशुभ चिन्तनमे नहीं लगने देता ॥

यद् यदिच्छसि वर्णं च तत् सर्वं धारयिष्यति।
स्वल्पं वा यदि वा स्थूलं छन्दतस्ते भविष्यति ॥ २६ ॥
'तुम इस फूलको जिस-जिस रूप-रंगमें देखना चाहोगी, वह सब यह धारण कर लेगा। तुम्हारी इच्छाके अनुसार यह छोटा-बड़ा, हल्का-भारी अथवा स्थूल-सूक्ष्म हो जायगा ॥ २६ ॥

अनिष्टगन्धहरणमेतत् सद्गन्धवर्द्धनम्।
प्रदीपकर्म रात्रौ च करोति कमलेक्षणे ॥ २७ ॥
'कमललोचने ! यह पुष्प अप्रिय गन्धका निवारण तथा उत्तम गन्धकी वृद्धि करनेवाला है। रातके समय यह दीपकका भी काम करता है ॥ २७ ॥

संतानकस्रजो मालां पुष्पवस्त्रादि वाच्युतम्।
पुष्पमण्डपमुख्यानि चिन्तितेन प्रदास्यति ॥ २८ ॥
'यह चिन्तन करनेमात्रसे संतान नामक दिव्य वृक्षके फूलोंका हार, माला, फूल, कभी नष्ट न होनेवाले वस्त्र आदि तथा अच्छे-अच्छे फूलोंके मण्डप प्रदान करेगा ॥ २८ ॥

बुभुक्षा वा पिपासा वा ग्लानिर्वाप्यथवा जरा।
देववद्धारयन्त्यास्ते स्वच्छन्देन भविष्यति ॥ २९ ॥
'देवताओंके समान इसको धारण करते समय तुम्हें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होगी। ये सारी वस्तुएँ तुम्हारी इच्छाके अधीन हो जायँगी ॥ २९ ॥

अनुगीतानि गीतानि दास्यत्यपि च चिन्तिते।
सुवाद्यान् सुमधुरांस्तथैव तव सम्मतान् ॥ ३० ॥
'इतना ही नहीं, यह चिन्तन करनेपर तुम्हें प्रिय लगने-वाले सुन्दर वाद्यों तथा संगीत-शास्त्रके अनुकूल गीतोंका भी आनन्द प्रदान करेगा ॥ ३० ॥

पूर्णे संवत्सरे देवि पुष्पमेतत् तवान्तिकात्।
निर्वर्त्स्यते तरुवरं समयेन प्रयास्यति ॥ ३१ ॥
'देवि ! वर्ष पूर्ण होनेपर यह फूल तुम्हारे पाससे समयानुसार चला जायगा और वृक्षप्रवर पारिजातसे जुड़ जायगा ॥ ३१ ॥

कृतिरेषा हि भद्रं ते पारिजातस्य सुप्रभे।
निसर्गतः सगंकृता सत्कारार्थेऽसुरद्विषाम् ॥ ३२ ॥
'सुप्रभे ! तुम्हारा कल्याण हो। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजीने असुरद्रोही देवताओंके सत्कारके लिये स्वभावतः पारिजातकी ऐसी सामर्थ्य रच दी है ॥ ३२ ॥

उमा देववरज्येष्ठा हिमालयसुता सती।
धारयन्तीश्वरी नित्यं पुष्पाण्येतानि सुप्रभे ॥ ३३ ॥
'उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली देवि ! देवेश्वर शिवकी प्रियतमा हिमालयपुत्री सती-साध्वी सुरेश्वरी उमा नित्य इन फूलोंको धारण करती हैं ॥ ३३ ॥

अदितिश्च सपौलोमी महेन्द्रसुरतारणी।
सावित्री देवमाता च श्रीश्च सर्वगुणोचिता ॥ ३४ ॥
देवपत्न्यस्तथैवान्या देवाश्च वसुदेवताः।
संवत्सरपरः कालः सर्वेषां न तु संशयः ॥ ३५ ॥

४७२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'देवराज इन्द्रकी माता अदिति, देवेन्द्रपत्नी शची, देवमाता सावित्री, सर्वगुणसम्पन्ना लक्ष्मी तथा अन्य देवपत्नियाँ, देवगण और वसु देवता—ये सब इस पुष्पको धारण करते हैं। उन सबके लिये भी इस पुष्पके धारणका अधिक-से-अधिक समय एक वर्षतक ही है। इसमें संशय नहीं है॥

षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये त्वं खलु वर्तसे।
ज्येष्ठां वासुदेवस्य वेद्मि त्वां भोजनन्दिनि ॥ ३६ ॥

'भोजनन्दिनि ! आज मुझे मालूम हो गया कि इन सोलह हजार स्त्रियोंके बीच भगवान् वासुदेवको तुम्हीं सबसे अधिक प्रिय हो ॥ ३६ ॥

सपत्न्यस्ते गुणोपेते सर्वाः सर्वेश्वरप्रिये ।
अवमानावसेकेन त्वया सिक्ताद्य भामिनि ॥ ३७ ॥

'सर्वेश्वरप्रिये ! सद्गुणवती भामिनि ! आज तुमने अपनी सारी सौतोंको अपमानके जलसे सींच दिया ॥ ३७ ॥

प्रकाशमद्य सौभाग्यमनिवार्यं यशश्च ते।
मन्दारकुसुमं दत्तं यत् ते मधुनिघातिना ॥ ३८ ॥

'आज तुम्हारा अनिवार्य सौभाग्य और यश प्रकाशमें आ गया, क्योंकि भगवान् मधुसूदनने यह मन्दार-पुष्प केवल तुम्हारे हाथमे दिया है ॥ ३८ ॥

अद्य सत्राजिती देवी ज्ञास्यते वरवर्णिनी ।
सौभाग्याख्यं सदा वेत्ति याऽऽत्मानं सुभगं सती ॥३९॥

'आज सत्राजित्की पुत्री परम सुन्दरी सती सत्यभामा देवी, जो अपने-आपको सदा सबसे अधिक भाग्यशालिनी एवं सुभगा समझती रही हैं, जान लेंगी कि किसका सौभाग्य अधिक है ॥ ३९ ॥

साम्बमाता च गान्धारी भार्याश्चान्या महात्मनः।
सौभाग्यार्थोद्यताकाङ्क्षामद्य मोक्ष्यन्ति निःस्पृहाः॥४०॥

'साम्बमाता जाम्बवती तथा गान्धारी आदि, जो महात्मा श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ हैं, वे आज निःस्पृह होकर सौभाग्य-के लिये उठी हुई आकाङ्क्षाका परित्याग कर देंगी ॥ ४० ॥

सौभाग्यैकरथो जैत्रस्तव देव्यद्य निःसृतः।
मनोरथरथानां यः सहस्रैरपि दुर्जयः ॥ ४१ ॥

'देवि ! आज तुम्हारे सौभाग्यका एकमात्र विजयशील रथ बाहर निकला है, जो सहस्रों मनोरथरूपी रथोंके लिये दुर्जय है ॥ ४१ ॥

अद्याहमवगच्छामि सर्वथा सर्वशोभने ।
आत्मा द्वितीयः कृष्णस्य भोजे त्वमिति भामिनि ॥ ४२ ॥

'सर्वाङ्गसुन्दरी भामिनि ! भोजराजकन्ये ! आज मैं सर्वथा इस बातको समझ गया कि श्रीकृष्णकी दूसरी आत्मा तुम्हीं हो ॥ ४२ ॥

त्रैलोक्यरत्नसर्वस्वमददाद् यत् तथाच्युतः।
जीवितातिशयस्तेन त्वया प्राप्तो हरिप्रिये ॥ ४३ ॥

'हरिप्रिये ! तीनों लोकोंके रत्नोंका सर्वस्वरूप यह पारिजात पुष्प भगवान् श्रीकृष्णने जो तुम्हें ही दिया है, इससे तुमने आज प्राणोंसे भी अधिक उत्कृष्ट वस्तु प्राप्त कर ली है (अथवा तुम्हें आज समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट जीवन प्राप्त हुआ है ।)' ॥ ४३ ॥

नारदेनैवमुक्तं तु तथ्यं वाक्यं नराधिप ।
तत्रस्थाः शुश्रुवुः प्रेष्याः प्रेषिताः सत्यभामया ॥ ४४ ॥

'नरेश्वर ! सत्यभामाकी भेजी हुई दासियाँ वहाँ खड़ी थीं। उन्होंने नारदजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये यथार्थ वचनोंको सुना ॥ ४४ ॥

देवीनां च तथान्यासां पत्नीनां च विशाम्पते।
दृष्ट्वा ताः सविशेषं च नारदेनाभ्युदाहृतम् ॥ ४५ ॥

प्रजानाथ ! अन्य देवियों तथा पत्नियोंकी दासियाँ भी वहाँ खड़ी थीं । उन सबको देखकर नारदजीने उपर्युक्त बातें और भी बढ़ा-चढ़ाकर कही थीं ॥ ४५ ॥

तच्च श्रुत्वा सुनिखिलं प्रेष्याभिः स्त्रीस्वभावतः ।
प्रकाशीकृतमेवासीद् विष्णोरन्तःपुरे तदा ॥ ४६ ॥

उस समय वे सारी बातें सुनकर उन दूतियोंने स्त्री-स्वभावके कारण भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उन्हें प्रकट कर ही दिया ॥ ४६ ॥

कर्णाकर्णि ततो देव्यः कौलीनमिव संघशः ।
मन्त्रयांचक्रिरे हृष्टा रुक्मिण्यतिगुणोदयम् ॥ ४७ ॥

कानोंकान वह सब जानकर श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र हो हर्षमे भरकर रुक्मिणीके अत्यन्त गुणयुक्त भाग्योदयकी चर्चा करने लगीं, मानो कुलके किसी गूढ़ रहस्यपर गुप्त मन्त्रणा कर रही हों ॥४७॥

अर्हति पुत्रमातेति ज्येष्ठेति च समागताः।
प्रायेण प्रवदन्ति स्म हृष्टा दामोदरस्त्रियः ॥ ४८ ॥

हर्षसे उत्फुल्ल हुई भगवान् दामोदरकी वे स्त्रियाँ एकत्र होकर प्रायः इस प्रकार कहने लगीं कि वे (रुक्मिणी) हम सब लोगोंकी पूजनीया हैं, ज्येष्ठ पुत्रकी माता हैं और स्वयं भी ज्येष्ठा हैं ॥ ४८ ॥

ममृषे न सपत्न्यास्तु तत् सौभाग्यगुणोदयम् ।
सत्यभामा प्रिया नित्यं विष्णोरतुलतेजसः ॥ ४९ ॥

परंतु अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णकी नित्य प्रिया सत्यभामा अपनी सौतके उस सौभाग्य-गुणका उदय नहीं सहन कर सकीं ॥ ४९ ॥

रूपयौवनसम्पन्ना स्वसौभाग्येन गर्विता।
अभिमानवती देवी श्रुत्यैवेर्ष्यावशं गता ॥ ५० ॥

[विष्णुपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ४७३

वे रूप और यौवनसे सम्पन्न थीं। उन्हें अपने सौभाग्य-पर गर्व था; अतः अभिमानिनी देवी सत्यभामा सौतके अभ्युदयका समाचार सुनते ही ईर्ष्याके वशीभूत हो गयीं॥५०॥

समुत्सृजन्ती वसनं सकुंकुमं
शुचिस्मिता शुक्लमथैकमंशुकम्।
जग्राह रोषाकुलितेन चेतसा
वह्नेस्तदा श्रीरिव वर्द्धितेन्धना ॥ ५१ ॥

पवित्र मुसकानवाली सत्यभामाने कुंकुममें रँगी हुई साड़ी उतारकर रोषाकुल चित्तसे एकमात्र श्वेत वस्त्र धारण कर लिया। वे उस समय अधिक ईंधन डाल देनेसे बढ़ी हुई अग्निकी दीप्तिमती शिखाके समान प्रतीत होती थीं॥ ५१ ॥

दन्दह्यमाना ज्वलनेन वर्द्धता
ईर्ष्यासमुत्थेन गतप्रभेव।
क्रोधान्विता क्रोधगृहं विविक्तं
विवेश तारेव घनं सतोयम् ॥ ५२ ॥

उनके मनमें ईर्ष्याजनित आग बढ़ती जा रही थी, जिससे अत्यन्त दग्ध होनेके कारण वे श्रीहीन-सी हो गयी थीं। जैसे तारा सजल जलधरकी ओटमें चली जाय, उसी प्रकार रोषभरी सत्यभामाने वहाँ एकान्त कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥

बद्ध्वा ललाटे हिमचन्द्रशुक्लं
दुकूलपट्टं प्रियरोषचिह्नम्।
पर्यन्तदेशं सरसेन देवी
विलिप्य सा लोहितचन्दनेन ॥ ५३ ॥

देवी सत्यभामाने ललाटमें प्रियतमके प्रति रोषसूचक चिह्नके तौरपर हिम और चन्द्रमाके समान श्वेत दुकूलपट्ट बाँध लिया और उस ललाटके किनारे-किनारे सरस (गीला) लाल चन्दन पोत लिया ॥ ५३ ॥

संस्मृत्य संस्मृत्य शिरः सकोपं
प्रकम्पमाना समुपोपविष्टा।
दीर्घोपधाने शयनेऽपनीय
विभूषणान्येव न्यबद्धवेणी ॥ ५४ ॥

उन बातोंको याद कर-करके वहाँ बड़े तकियेवाले पलंगपर बैठी हुई वह देवी रोषपूर्वक सिर हिला रही थी और सारे आभूषणोंको उतारकर उसने अपने केशोंको एक वेणीके रूपमें बाँध लिया था ॥ ५४ ॥

अकारणार्थेन विकृष्यमाणा
प्रेष्याजनस्याभिजनान्वितापि ।
विचूर्णयामास कुशेशयं सा
निःश्वस्य निःश्वस्य नखैर्नताभ्रूः ॥ ५५ ॥

'आपको अकारण ही क्रोध हुआ है' ऐसा कहकर जब दासियोंने उन्हें कोप-भवनसे बाहर चलनेके लिये खींचा, उस समय उत्तम कुलमें उत्पन्न (अथवा परिजनोंसे युक्त) होनेपर भी झुकी भौंहोंवाली सत्यभामाने रोषवश बारंबार लंबी साँस खींचकर हस्तगत क्रीड़ाकमलको नखोंसे नोंच-नोंचकर चूर्ण-सा कर दिया ॥ ५५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥


षट्षष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका सत्यभामाको मनाना और सत्यभामाका मानसिक खेद प्रकट करके उनसे तपस्याके लिये अनुमति माँगना

वैशम्पायन उवाच
उपविष्टं मुनिं ज्ञात्वा रुक्मिण्या सह केशवः।
निष्चक्रामप्रमेयात्मा व्यपदेशेन सर्ववित् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सब कुछ जाननेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीको रुक्मिणीके साथ बैठा जान किसी दूसरे कार्यके बहाने वहाँसे निकल गये ॥ १ ॥

जगाम त्वरितश्चैव सत्यभामागृहं महत्।
रम्ये रैवतकोद्देशे निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २ ॥

वहाँसे निकलकर वे बड़ी उतावलीके साथ सत्यभामाके विशाल भवनमें गये, जिसे रैवतक पर्वतके रमणीय शिखरपर साक्षात् विश्वकर्माने बनाया था ॥ २ ॥

अभिमानवतीमिष्टां प्राणैरपि गरीयसीम्।
जानन् सत्राजितीं विष्णुर्विवेश शनकैरिव ॥ ३ ॥

सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय एवं आदरणीय थीं, परंतु वे स्वभावसे मानिनी थीं; इस बातको जानकर श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उनके भवनमें घुसे ॥ ३ ॥

कुपितामिव तां देवीं स्नेहात् संकल्पयन्निव।
भीतभीतः स शनकैर्विवेश मधुसूदनः ॥ ४ ॥

४७४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [हरिवंशे

मधुसूदन स्नेहवश देवी सत्यभामाके रूठी होनेका विचार करते हुए भयभीत-से होकर धीरे-धीरे उनके महलमें गये ॥ ४ ॥

सेवकं द्वारदेशे तु तिष्ठेत्युक्त्वा विवेश ह ।
नारदस्योपचारार्थं प्रद्युम्नं विनियुज्य सः ॥ ५ ॥
अपने साथ आये हुए सेवकको दरवाजेपर खड़े रहनेका आदेश दे और नारदजीके सत्कारके लिये प्रद्युम्नको नियुक्त करके वे उस महलके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ५ ॥

स ददर्श प्रियां दूरात् क्रोधागारगतां तदा ।
प्रेष्यामिव स्थितां कोपान्निःश्वसन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ ६ ॥
उन्होंने दूरसे ही अपनी प्रिया सत्यभामाको कोपभवनके भीतर गयी हुई देखा। वे क्रोधवश बारंबार लंबी साँस खींच रही थीं और दासीकी भाँति वहाँ पड़ी थीं ॥ ६ ॥

करजाग्रावलीढं तु पङ्कजं मुखपङ्कजे ।
संश्लेषयित्वा निःश्वस्य विहसन्तीं पुनः पुनः ॥ ७ ॥
अपने मुखारविन्दपर नखोंसे कुचला हुआ एक कमल सटाये वे बारंबार उच्छ्वास लेती और कभी-कभी हँस पड़ती थीं ॥ ७ ॥

किंचिदाकुलिताग्रेण चरणेन वसुन्धराम् ।
कृत्वा पृष्ठेऽथ वदनं विहरन्तीं पुनः पुनः ॥ ८ ॥
उनके चरणका अग्रभाग कुछ आकुल एवं चञ्चल-सा हो रहा था। उस चरणके द्वारा वे पृथ्वीपर रेखा-सी खींचती और पीछेकी ओर मुँह मोड़कर बार-बार घूमती थीं ॥ ८ ॥

करपद्मे पुनः सव्ये मुखपद्मं निवेश्य च ।
वनिborder: अनितां चारुसर्वाङ्गीं ध्यायन्तीं कमलेक्षणाम् ॥ ९ ॥
फिर बायें करकमलपर अपने मुखारविन्दको रखकर वे किसी चिन्तामें डूब जाती थीं। उनके सारे अङ्ग अत्यन्त मनोहर थे। नेत्र कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। वे एक सुन्दरी वनिता थीं ॥ ९ ॥

सरसं चन्दनं गृह्य प्रेष्याहस्तादनिन्दिताम् ।
प्रह्लादयित्वा हृदयं क्षिपन्तीं निर्दयं पुनः ॥ १० ॥
दासीके हाथसे सरस चन्दन लेकर वे सती साध्वी सत्यभामा पहले तो उस चन्दनकी प्रशंसा करके उस दासीके हृदयको आह्लादित कर देतीं; परंतु पुनः निर्दयतापूर्वक उसको झिड़कने और फटकारने लगती थीं ॥ १० ॥

पुनरुत्थाय शयनात् पतन्तीं च पुनः पुनः ।
तास्ताश्चेष्टाः प्रियायाश्च तथान्या ददृशे हरिः ॥ ११ ॥
शय्यासे बार-बार उठकर फिर वहीं गिर पड़ती थीं। श्रीहरिने अपनी प्रियतमाकी वे तथा और भी बहुत-सी चेष्टाएँ देखीं ॥ ११ ॥

अवगुण्ठ्य यदा वक्त्रमुपधाने न्यवेशयत् ।
इदमन्तरमित्येवं तदा गत्वा जनार्दनः ॥ १२ ॥
जब उन्होंने अपने मुँहको वस्त्रसे ढककर तकियेपर रखा, तब यही उपयुक्त अवसर है—ऐसा सोचकर श्रीकृष्ण उनके पास चले गये ॥ १२ ॥

प्रेष्याजनं स संज्ञाय अनाख्येयोऽस्मि संक्षया ।
स शङ्कितप्रचारश्च चारितोऽन्वगमत् स ताम् ॥ १३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने संकेतसे दासियोंको समझा दिया कि मेरे आनेकी बात इन्हें बताना मत। दासियोंका शंकित होकर इधर-उधर जाना भी रोक दिया। उस दशामें उन्होंने सत्यभामाका अनुसरण किया (अर्थात् वे उनके पीछे जाकर खड़े हो गये) ॥ १३ ॥

गृह्य व्यजनं चैव स्थित्वा स परिपार्श्वतः ।
शनैरिवासृजद् वातं जहास शनकैरिव ॥ १४ ॥
बगलमें खड़े हो हाथमें व्यजन लेकर धीरे-धीरे हवा करने और मुसकराने लगे ॥ १४ ॥

स पारिजातपुष्पस्य संसर्गादनुवासितः ।
वभार भगवान् गन्धं दिव्यं मानुषदुर्लभम् ॥ १५ ॥
उस समय पारिजात-पुष्पके संसर्गसे सुवासित हुए भगवान् श्रीकृष्ण एक ऐसी दिव्य सुगन्ध धारण करते थे, जो मनुष्यमें दुर्लभ है ॥ १५ ॥

अत्यद्भुतं सुगन्धं च जिघ्रित्वा विस्मयान्विता ।
अपावृणोन्मुखं सत्या किमेतदिति चाब्रवीत् ॥ १६ ॥
उस अत्यन्त अद्भुत सुगन्धको सूँघकर सत्यभामाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने मुँहपरसे कपड़ा हटाया और पूछा, 'यह क्या है ?' ॥ १६ ॥

सोत्थिता पृष्ठतो देवमपश्यन्ती शुचिस्मिता ।
पर्यपृच्छदथो प्रेष्या गन्धस्य प्रभवे तदा ॥ १७ ॥
पवित्र मुसकानवाली सत्यभामा उठकर बैठ गयीं और अपने पीछे खड़े हुए भगवान् श्रीकृष्णको न देखकर दासियोंसे पूछने लगीं, 'यह सुगन्ध कहाँसे प्रकट हुई है ?' ॥ १७ ॥

ताः पृष्टास्त्वप्रभाषन्त्यो जानुभ्यां धरणीं गताः ।
अधोमुख्यस्ततस्तस्थुः कृताञ्जलिपुटास्तदा ॥ १८ ॥
स्वामिनीके इस प्रकार पूछनेपर वे कुछ न बोलीं। धरतीपर घुटने टेककर सिर नीचे किये हाथ जोड़कर बैठी रहीं ॥ १८ ॥

तदपूर्वमदृष्टैव गन्धं मुञ्चति मेदिनी ।
कथमेकतरस्तस्या गन्धोऽयमिति तत् खलु ॥ १९ ॥
गन्धके आश्रयभूत भगवान्को न देखकर वे अनुमान करने लगीं कि पृथ्वी ही उस गन्धको प्रकट कर रही है;

[विष्णुपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५

परंतु उसकी ऐसी उत्कृष्ट गन्ध कैसे हो गयी; यह बात समझमें नहीं आती ॥ १९ ॥

किं न्विदं स्यादिति च सा विपेक्षन्ती समन्ततः । ददर्श केशवं देवी सहसा लोकभावनम् ॥ २० ॥ तो फिर यह क्या है ? ऐसा कहकर जब देवी सत्यभामाने चारो ओर दृष्टिपात किया, तब उन्हें सहसा विश्वभावन भगवान् श्रीकृष्ण दिखायी दिये ॥ २० ॥

युज्यतीति ततोवाच सहसास्त्राविलेक्षणा । अवतिक्तेव रोषेण बभूव प्रणयान्विता ॥ २१ ॥ तब सहसा उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे गद्गद कण्ठसे उतना ही कह सकीं कि आपके शरीरसे ऐसी सुगन्धका प्रकट होना उचित ही है। भगवान्के प्रति प्रेमभावसे युक्त होनेपर भी वे उस समय रोषसे कुछ तिक्त-सी हो उठी थीं ॥ २१ ॥

सा प्रस्फुरितचार्वोष्ठी निःश्वस्याधोमुखी तदा । मुहूर्तमसितापाङ्गी तस्थावन्यमुखी शुभा ॥ २२ ॥ उनके मनोहर ओंठ फड़कने लगे। उन्होंने लंबी साँस खींचकर मुँह नीचे कर लिया; फिर कजरारे नेत्रोंवाली वे शुभलक्षणा देवी दो घड़ीतक दूसरी ओर मुँह करके बैठी रहीं ॥ २२ ॥

निवध्य भ्रुकुटिं वामां सम्यग् विक्षिप्य लोचने । निवेश्य वदनं हस्ते शोभसीत्यब्रवीद्धरिम् ॥ २३ ॥ फिर अपने मुखको हाथपर रखकर बायीं भौंह चढ़ाये भलीभाँति दृष्टिपात करके वे श्रीहरिसे बोलीं, 'बड़ी शोभा पा रहे हैं आप !' ॥ २३ ॥

तस्याः सस्राव नेत्राभ्यां वारि प्रणयकोपजम् । कुशेशयपलाशाभ्यामवश्यायजलं यथा ॥ २४ ॥ इतना कहकर उनके नेत्रोंसे प्रणयकोपजनित जलकी धारा बहने लगी, मानो कमलके दलोंसे तुषारका जल गिर रहा हो ॥ २४ ॥

समुत्पत्य जलं तत्र पतितं वदनाम्बुजात् । प्रतिजग्राह पद्माक्षः कराभ्यामतिसत्वरः ॥ २५ ॥ तब कमलनयन श्रीकृष्ण अत्यन्त उतावले हो उछलकर पलंगपर आ गये और प्रियतमाके मुखारविन्दसे गिरते हुए अश्रुजलको उन्होंने दोनों हाथोंमें ले लिया ॥ २५ ॥

अथोरसि पतत्तोयं श्रीवत्साङ्कोऽम्बुजेक्षणः । प्रियानयनजं देवः परिमृज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित कमलनयन भगवान् गोविन्दने प्रियाके नेत्रोंसे गिरते हुए उस जलको लेकर अपनी छातीमे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ २६ ॥

स्रवत्यसितपत्राक्षि किमर्थं तव भामिनि । तोयं सुन्दरि नेत्राभ्यां पुष्कराभ्यामिवोदकम् ॥ २७ ॥ 'नील कमलदलके समान नेत्रोंवाली भामिनि ! सुन्दरि ! जैसे कमलोंसे जल टपक रहा हो, उसी तरह तुम्हारे युगल नेत्रोंसे यह अश्रुजल कैसे गिर रहा है ? ॥ २७ ॥

प्रभाते पूर्णचन्द्रस्य मध्याह्ने पङ्कजस्य च । बिभर्ति तव किं वक्त्रं वपुस्तव मनोहरे ॥ २८ ॥ 'मनोहारिणी प्रिये ! तुम्हारा मुख प्रभातकालके शोभाहीन पूर्ण चन्द्रमा तथा मध्याह्नकालके मुरझाये हुए कमलका स्वरूप क्यों धारण करता है ? ॥ २८ ॥

किमर्थं कौसुमं वासो महाराजंतमेव च । नानुगृह्णासि सुश्रोणि शुक्लं वासोऽनुगृह्यते ॥ २९ ॥ 'सुश्रोणि ! कुंकुम और कुसुम्भ रंगकी साड़ी क्यों नहीं धारण करती हो ? श्वेत वस्त्रपर ही आज इतना अनुग्रह क्यों है ? ॥ २९ ॥

वास्येते तवाभीष्टे महाराजतकौसुमे । देवाभिगमनादूर्ध्वं शुक्लं नेष्टं हि तत्स्त्रियाः ॥ ३० ॥ 'ये कुसुम्भ और कुंकुमके रंगमें रँगे हुए युगल वस्त्र हैं, जो तुम्हें बहुत प्रिय हैं। देवपूजा करके देवताओंका विसर्जन कर देनेके बाद स्त्रीके लिये श्वेत वस्त्र धारण करना अभीष्ट नहीं है ॥ ३० ॥

किञ्चानाभरणं गात्रं सुगात्रि तव कथ्यताम् । चित्रकस्थानमाक्रान्तं कस्मादवरवर्णिनि ॥ ३१ ॥ 'सुन्दर अङ्गोंवाली देवि ! बताओ, आज तुम्हारा शरीर आभूषणोंसे भूषित क्यों नहीं है ? धूसर कान्तिवाली सत्ये ! जो चित्रक—पत्रभङ्ग-रचनाका स्थान है, वह तुम्हारा मुख-मण्डल आज आँसुओंसे क्लिन्न क्यों हो रहा है ? ॥ ३१ ॥

श्वेतेन तव पट्टेन वाससा प्रियदर्शने । ललाटं सेव्यते कस्माच्चन्दनेन सुगन्धिना ॥ ३२ ॥ सरसेनायतापाङ्गि कान्तेन हृदयप्रिये । 'प्रियदर्शने ! विशाल नयनप्रान्तवाली हृदयवल्लभे ! आज तुम्हारा ललाट श्वेत पट्टवस्त्र और सरस सुगन्धित एवं कमनीय चन्दनद्वारा कैसे सेवित हो रहा है ? ॥ ३२ ॥

प्रभोपमर्दं केनापि कारणेनाननस्य च । करोषि मम चात्यर्थं मनो ग्लापयसि प्रिये ॥ ३३ ॥ 'प्रिये ! किस कारणसे तुम अपने मुखकी प्रभाका उपमर्दन (शोभाका निवारण) कर रही हो अथवा यह सब करके क्यों मेरे मनको अत्यन्त ग्लानि पहुँचा रही हो ? ॥ ३३ ॥

प्रसृतश्चन्दनरसः कपोलप्रणयी तव । पत्रलेखासपत्नत्वं प्राप्तो नातिविराजते ॥ ३४ ॥

४७६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'यह फैला हुआ चन्दन-रस तुम्हारे कपोलोंका प्रेमी बनकर पत्र-रचनाका शत्रु बन बैठा है (अर्थात् जहाँ पत्र-रचना होनी चाहिये, वहाँ यह चन्दनका बेढंगा रस फैल रहा है ), अतः अधिक शोभा नहीं पा रहा है ॥ ३४ ॥

रत्नैश्चाभरणैर्मुक्ता तव ग्रीवा न शोभते ।
ग्रहनक्षत्ररहिता द्यौरिवाव्यक्तशारदी ॥ ३५ ॥

'रत्नमय आभूषणोंसे सूनी हुई तुम्हारी यह ग्रीवा, जहाँ शरद् ऋतुकी शोभा प्रकट नहीं हुई है, उस ग्रह-नक्षत्रोंके दर्शनसे रहित वर्षाकालके आकाशकी भाँति शोभा नहीं पा रही है ॥ ३५ ॥

पूर्णचन्द्रसपत्नेन स्मेरेणाद्यल्पभाषिणा ।
किमु नो भाषसे माद्य मुखेनोत्पलगन्धिना ॥ ३६ ॥

'तुम्हारा मुस्कराता हुआ मुख पूर्ण चन्द्रमाका प्रतिद्वन्द्वी बना रहता है । यह बहुत कम बोलता और कमलकी-सी सुगन्ध बिखेरता रहता है । ऐसे मनोहर मुखके द्वारा आज तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती हो ? ॥ ३६ ॥

अर्द्धाक्षणापि हि तावन्मां किमर्थं न निरीक्षसे ।
मुञ्चस्येव सनिश्वार्सं तोयमञ्जनदुर्दिनम् ॥ ३७ ॥

'पूरी नहीं तो आधी आँखसे भी मेरी ओर क्यों नहीं देखती हो ? लंबी साँस खींचकर अञ्जनसे मलिन हुआ अश्रुजल बहाती ही जा रही हो ॥ ३७ ॥

अलमिन्दीवरश्यामे रुदितेन मनस्विनि ।
जलमञ्जनकल्माषं मा मोक्षीराननद्विषम् ॥ ३८ ॥

'नील कमलके समान श्याम कान्तिवाली मनस्विनि ! यह रोना-धोना व्यर्थ है । इसे बंद करो । यह अञ्जनमिश्रित अश्रुजल तुम्हारे मुखकी शोभाका वैरी है । इसे अब न बहाओ ॥ ३८ ॥

त्वदीयोऽहं यदा देवि ख्यातो जगति किङ्करः ।
नाज्ञापयसि किं मां त्वं पुरेव वरवर्णिनि ॥ ३९ ॥

'देवि ! जब सारे संसारमें यह प्रसिद्ध है कि मैं तुम्हारा किङ्कर हूँ, तब वरवर्णिनि ! तुम मुझे पहलेकी ही भाँति अभीष्ट सेवाके लिये आज्ञा क्यों नहीं देती हो ? ॥ ३९ ॥

किमकार्यमहं देवि विप्रियं तव भामिनि ।
येनातिमात्रमात्मानमायासासि सुन्दरि ॥ ४० ॥

'देवि ! भामिनि ! सुन्दरि ! मैंने तुम्हारा कौन सा ऐसा अप्रिय कार्य ( अपराध ) किया है, जिससे तुम अपने-आपको अत्यन्त कष्ट दे रही हो ॥ ४० ॥

मनसा कर्मणा वाचा न त्वामतिचराम्यहम् ।
सर्वथा सर्वचार्वङ्गि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ४१ ॥

'सर्वाङ्गसुन्दरी ! मैं तुमसे यह सर्वथा सत्य कहता हूँ कि मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी कभी तुम्हारी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करता हूँ ॥ ४१ ॥

बहुमानोपमान्यास्तु स्त्रीषु सर्वासु शोभने ।
स्नेहश्च बहुमानश्च त्वामृतेऽन्यासु नास्ति मे ॥ ४२ ॥

'शोभने ! यों तो मेरी सभी स्त्रियाँ मेरे द्वारा बहुत सम्मान और आदर पानेकी अधिकारिणी हैं, तथापि मेरा विशेष आदर और स्नेह तुम्हारे सिवा अन्य सब स्त्रियोंमें नहीं है ॥ ४२ ॥

नैव त्वां मदनो जह्यान्मृतेऽपि मयि भामकः ।
इति मे निश्चितं विद्धि चेतः सुरसुतोपमे ॥ ४३ ॥

'देवकन्याओंके समान सुन्दरी सत्यभामे ! मेरा जो तुम्हारे प्रति कामभाव अथवा प्रगाढ़ प्रेम है, वह मेरे मर जानेपर भी तुम्हें नहीं छोड़ सकता—यह मेरी निश्चित धारणा है । इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ ४३ ॥

क्षमाद्यश्च मेदिन्यां शब्दाद्याश्चाम्बरे गुणाः ।
ध्रुवं पङ्कजगर्भाभे त्वयि स्नेहस्तथा मम ॥ ४४ ॥

'कमलके भीतरी भागकी सी आभावाली प्राणवल्लभे ! जैसे पृथ्वीमें क्षमा आदि और आकाशमें शब्द आदि गुण नित्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह भी अटल है ॥४४॥

रुचिरग्नौ यथा दिव्या प्रभा चैव दिवाकरे ।
कान्तिश्च शाश्वती चन्द्रे स्नेहस्त्वयि तथा मम॥ ४५॥

'जैसे अग्निमें दीप्ति, दिवाकर सूर्यमें दिव्य प्रभा और चन्द्रमामें कान्ति सदा बनी रहती है, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह सदा अविचल है' ॥ ४५ ॥

एवंवादिनमात्मेष्टं सत्यभामा जनार्दनम् ।
शनैरूवाच नेत्राभ्यां प्रमृज्य सुभगा जलम् ॥ ४६ ॥

जब श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनेको प्रिय लगनेवाली बात कह रहे थे, उस समय सौभाग्यशालिनी सत्यभामाने अपने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा—॥ ४६ ॥

मदीयस्त्वमिति ह्यासीन्मम नित्यं मनः प्रभो ।
अद्य साधारणं स्नेहं त्वयि तावद् गतास्म्यहम्॥ ४७॥

'प्रभो ! मेरे मनमें सदा यही विश्वास बना हुआ था कि तुम मेरे हो; परंतु आज यह बात मेरी समझमें आ गयी कि तुम्हारे भीतर मेरे लिये भी साधारण ही स्नेह है ( विशेष नहीं ) ॥ ४७ ॥

नाज्ञासिषमहं पूर्वमनित्यं कालपर्ययम् ।
अद्य लोकगतिं कृत्स्नामवगच्छामि न ध्रुवाम् ॥ ४८ ॥

'मैं पहले यह नहीं जानती थी कि यहाँका सब कुछ अनित्य है और समय सभी बातोंमें उलट-फेर कर देता है;

[विष्णुपर्व ] सप्तषष्टितमोऽध्यायः ४७७


परंतु अब सम्पूर्ण लोकगतिको ही मैं अस्थिर (क्षणभङ्गुर) समझने लगी हूँ ॥ ४८ ॥

अमृताया द्वितीयोऽपि जन्मौहि मम सर्वथा ।
किमत्र बहुनोक्तेन हृदयं वेद्मि तेऽच्युत ॥ ४९ ॥

'अच्युत ! मैं जबतक जीवित हूँ, तबतक तुम्हीं मेरे लिये द्वितीय (आत्मा, जीवन-सङ्गी, सहायक एवं प्रियतम पति) हो । इसी प्रकार तुम्हारे लिये मैं ही द्वितीया (आत्मा, जीवनसङ्गिनी, सहायिका एवं प्राणवल्लभा पत्नी) हूँ। ऐसा मानकर मैंने अपने जन्म और जीवनको सर्वथा सफल समझा था, परंतु अब यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? तुम्हारा हृदय कैसा है, यह मैं अच्छी तरह जान गयी ॥ ४९ ॥

वाङ्मात्रमेव पश्यामि माधुर्यं सम्प्रयुज्यते ।
मयि स्नेहश्च कृतकस्त्वान्यत्र न कृत्रिमः ॥ ५० ॥

'देखती हूँ कि तुम मेरे पास (केवल मीठी-मीठी बातें ही बनाया करते हो) वाणीमात्रके ही माधुर्यका प्रयोग करते हो । मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह कृत्रिम (बनावटी) है; परंतु दूसरी जगह कृत्रिम नहीं स्वाभाविक है ॥ ५० ॥

ऋजुस्वभावां भक्तां च सर्वथा पुरुषोत्तम ।
अवजानासि जानन् मां कैतवीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५१ ॥

'पुरुषोत्तम ! मेरा स्वभाव सरल है और सर्वथा तुम्हारे प्रति भक्तिभाव रखती हूँ—इस बातको जानते हुए तुम छल-कपटका आश्रय लेकर मेरी अवहेलना करते हो ॥ ५१ ॥

एतावत् खलु पर्याप्तं दृष्टं द्रष्टव्यमव्ययम् ।
श्रुतं चाप्यथ यच्छ्राव्यं दृष्टः स्नेहफलोदयः ॥ ५२ ॥

'अस्तु, इतना ही बहुत है । जो कुछ अपरिवर्तनीय दृश्य देखना था, वह मैंने देख लिया । जो सुनने योग्य बात थी, वह मैंने सुन ली । तुम्हारे स्नेहके फलका उदय कहाँ किस प्रकार होता है, यह भी प्रत्यक्ष हो गया ॥ ५२ ॥

यदि त्वहमनुग्राह्या मामनुज्ञातुमर्हसि ।
तपस्येऽहं परं कृत्वा निश्चयं पुरुषोत्तम ॥ ५३ ॥

'पुरुषोत्तम ! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र होऊँ तो मुझे आज्ञा दे दो । मैं उत्तम निश्चय लेकर तपस्या करूँगी ॥ ५३ ॥

भर्तुश्छन्देन नारीणां तपो वा व्रतकानि वा ।
निष्फलं खलु यद् भर्तुरच्छन्देन क्रियेत हि ॥ ५४ ॥

'क्योंकि पतिकी इच्छासे ही किये गये नारियोंके तप अथवा व्रत सफल होते हैं । स्वामीकी इच्छाके बिना जो कुछ भी किया जाय, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है' ॥ ५४ ॥

इतीदमुक्त्वा पुनरेव शोभना
मुमोच तोयं नयनोद्भवं सती ।
प्रहाय पीतं हरिवाससः शुभा
पटान्तमाधाय मुखे शुचिस्मिता ॥ ५५॥

ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी शुभलक्षणा सती सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णके पीत-वस्त्रका अञ्चल ले उसीसे अपने मुँहको ढककर पुनः नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ ५५ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥


सप्तषष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णके पूछनेपर सत्यभामाका उन्हें अपने रोष एवं खेदका कारण बताना, श्रीकृष्णका उनके लिये पारिजात वृक्ष लानेका विश्वास दिलाकर उन्हें संतुष्ट करना, सत्यभामा और श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका सत्कार तथा नारदजीके द्वारा पारिजातकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
नारायणः सत्यभामां पुनरेवैष भारत ।
प्रोवाच प्रणयात् क्रुद्धामभिमानवर्ती सतीम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत ! नारायणस्वरूप श्रीकृष्णने प्रेमवश कुपित हुई अपनी अभिमानिनी पत्नी सती सत्यभामासे पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

श्रीभगवानुवाच
दहतीव ममाङ्गानि शोकः कमललोचने ।
किमु तत् कारणं येन त्वमेवमतिविक्लवा ॥ २ ॥

श्रीभगवान् बोले—कमललोचने ! तुम्हारा दुःख देखकर मुझे जो शोक हुआ है, वह मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध-सा कर रहा है । वह कौन-सा ऐसा कारण है, जिससे तुम इस तरह अत्यन्त व्याकुल हो उठी हो ॥ २ ॥

शापितासि मम प्राणैराचक्ष्वान्तर्गतं यदि ।
श्रोतव्यं यदि भक्तेन भर्त्रा सर्वाङ्गशोभने ॥ ३ ॥

सर्वाङ्गशोभने ! मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर