विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
केचिद् द्विधाकृताः शक्त्या गजाश्वरथवाहनाः।
केचित् कौमोदकीभिन्नाः केचिच्चक्रविदारिताः ॥१०८॥
कोई हाथी, घोड़े और रथोंपर सवार होकर युद्ध करनेवाले योद्धा शक्तिके प्रहारसे दो टूक हो गये थे। कोई कौमोदकी गदाके आघातसे पिस गये थे तथा कितने ही चक्रद्वारा विदीर्ण कर दिये गये थे ॥ १०८ ॥
एवं विमथिता सर्वा नराश्वरथवाहिनी।
तत्रासीन्नरकेणास्य युद्धं परमदारुणम् ॥१०९॥
इस प्रकार मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंसे युक्त वह सारी सेना मथ डाली गयी थी। वहाँ नरकासुरके साथ भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त दारुण युद्ध हुआ था ॥
यत् समासेन वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु।
त्रासनः सुरसंघानां नरकः पुरुषोत्तमम् ॥११०॥
योधयामास तेजस्वी मधुवन्मधुसूदनम्।
क्रोधरक्तातनयनो नरको घनसंनिभः ॥१११॥
यहाँ मैं संक्षेपसे जो कुछ बता रहा हूँ, वह मेरे मुखसे सुनो। देवसमूहको त्रास देनेवाला तेजस्वी नरकासुर मधुकी भाँति मधुसूदन भगवान् पुरुषोत्तमके साथ युद्ध करने लगा। उसके नेत्रप्रान्त क्रोधसे लाल हो रहे थे और उसकी आकृति मेघके समान काली थी ॥ ११०-१११ ॥
जग्राह कार्मुकं वीरः शक्रचापमिवोच्छ्रितम्।
तथार्ककिरणप्रख्यं बाणं जग्राह केशवः ॥११२॥
वीर श्रीकृष्णने इन्द्रधनुषके समान ऊँचा शरासन उठाया और सूर्यकिरणोंके समान चमचमाता हुआ बाण हाथमें लिया॥
दिव्येनास्त्रेण समरे पूरयामास तं रथम्।
उत्तमास्त्रं महापातं मुमोच नरको बली ॥११३॥
उन्होंने समराङ्गणमे अपने दिव्यास्त्रद्वारा नरकासुरके उस रथको भर दिया, तत्र बलवान् नरकासुरने भी बड़े वेगसे आघात करनेवाले उत्तम अस्त्रका प्रहार किया ॥ ११३ ॥
वज्रविस्फूर्जिताकारमायान्तं वीक्ष्य केशवः।
विच्छेदास्त्रं महाभागश्चक्रेण मधुसूदनः ॥११४॥
वज्रके समान गड़गड़ाहट पैदा करते हुए उस अस्त्रको आते देख महाभाग मधुसूदन केशवने चक्रके द्वारा उसका उच्छेद कर डाला ॥ ११४ ॥
व्यहनत् सारथिं चास्य शरेकेण जनार्दनः।
स रथं सध्वजं साश्वं जघान दशभिः शरैः ॥११५॥
भगवान् श्रीकृष्णने एक बाणसे उसके सारथिको मार डाला और दस बाणोंसे ध्वज और घोड़ोंसहित उस रथका संहार कर डाला ॥ ११५ ॥
तनुत्रं चैव चिच्छेद शरेण मधुसूदनः।
ततो विमुक्तकवचः सर्पस्येव तनूर्यथा ॥११६॥
इसके बाद मधुसूदनने एक बाणसे उसके कवचको काट गिराया। कवच कट जानेपर उसका शरीर केंचुलीसे निकले हुए सर्पके समान प्रतीत होने लगा ॥ ११६ ॥
हताश्वोऽपि रणे वीरो वितनुत्रश्च दानवः।
जग्राह विमलज्वालं लोहभारार्पितं दृढम् ॥११७॥
आविध्य सहसा मुक्तं शूलमिन्द्राशनिप्रभम्।
घोड़ोंके मारे जाने तथा कवचके कट जानेपर भी रणभूमिमें खड़े हुए उस दानव वीरने एक निर्मल ज्वालासे युक्त, लोहभारसे सम्पन्न और सुदृढ़ शूल हाथमें लिया, जो इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। उसने उस शूलको सहसा घुमाकर छोड़ दिया ॥ ११७१/२ ॥
तदापतत् स सम्प्रेक्ष्य शूलं हेमपरिष्कृतम् ॥११८॥
द्विधा छिन्नं क्षुरेण कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।
उस सुवर्णभूषित शूलको अपनी ओर आता देख अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने एक क्षुरप्रके द्वारा उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ११८१/२ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरं घोररूपेण रक्षसा ॥११९॥
शस्त्रपातमहाघातं नरकेण महात्मना।
उस समय उनका उस भयानक रूपधारी विशालकाय राक्षस नरकके साथ शस्त्रोंके सम्पात एवं महाघातसे युक्त घोर युद्ध हुआ ॥ ११९१/२ ॥
मुहूर्तं योधयामास नरकं मधुसूदनः ॥१२०॥
अथोग्रचक्रश्चक्रेण प्रदीप्तेनाकरोद् द्विधा।
उग्र चक्रधारी मधुसूदनने दो घड़ीतक नरकासुरके साथ युद्ध किया। तत्पश्चात् प्रज्वलित चक्रद्वारा उसके शरीरके दो टुकड़े कर डाले ॥ १२०१/२ ॥
चक्रद्विधाकृतं तस्य शरीरमपतद् भुवि ॥१२१॥
विभक्तं कुलिशेनेव गिरेः शृङ्गं द्विधाकृतम्।
चक्रसे दो टूक हुआ नरकासुरका शरीर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो किसी पर्वतका शिखर वज्रके आघातसे दो भागोंमें विभक्त होकर धराशायी हो गया हो ॥ १२११/२ ॥
कृष्णमासाद्य देवेशं जगामास्तमिवांशुमान् ॥१२२॥
चक्रोत्कृन्तितगात्रोऽसौ दानवः पतितो रणे।
वज्रप्रहारनिर्भिन्नं यथा गैरिकपर्वतम् ॥१२३॥
देवेश्वर श्रीकृष्णसे टक्कर लेकर वह सूर्यकी भाँति अस्ताचलको चला गया। चक्रसे शरीरके टूक-टूक हो जानेपर वह दानव रणभूमिमें गिर पड़ा। उस समय वह वज्रके प्रहारसे विदीर्ण हुए गेरूके पहाड़-जैसा जान पड़ता था ॥ १२२-१२३
भूमिस्तु पतितं पुत्रं निरीक्ष्यादाय कुण्डले।
उपातिष्ठत गोविन्दं वचनं चेदमब्रवीत् ॥१२४॥
अपने पुत्रको गिरा हुआ देख मूर्तिमती भूमिदेवी