भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 488
[ विष्णुपूर्व ]चतुःषष्टितमोऽध्यायः४६५

अदितिके दोनों कुण्डल ले गोविन्दकी सेवामे उपस्थित हुई और इस प्रकार बोलीं—॥ १२४ ॥

दत्तस्त्वयैव गोविन्द त्वयैव विनिपातितः।
यथेच्छसि तथा क्रीड बालः क्रीडनकैरिव ॥ १२५ ॥
इमे ते कुण्डले देव प्रजास्तस्यानुपालय ॥ १२६ ॥

'गोविन्द ! आपहीने मुझे यह पुत्र प्रदान किया था और आपहीने इसे मार गिराया। प्रभो ! आपकी जैसी इच्छा हो वैसी क्रीडा कीजिये, ठीक वैसे ही, जैसे बालक खिलौनोंसे खेला करता है। देव ! ये ही वे दोनों कुण्डल हैं; इन्हें लीजिये और उस नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये' ॥ १२५-१२६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नरकवधे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नरकासुरका वधविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥


चतुःषष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका नरकासुरके भवनमें प्रवेश करके वहाँके धन-वैभव तथा सोलह हजार कुमारियोंको द्वारका भेजना और स्वयं देवलोकमें जा अदितिको कुण्डल दे वहाँसे पारिजात लेकर लौटना

वैशम्पायन उवाच

निहत्य नरकं भौमं वासवोपमविक्रमम्।
वासवावरजो विष्णुर्ददर्श नरकालयम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इन्द्रके समान पराक्रमी भूमिपुत्र नरकासुरका वध करके इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उसके भवनका निरीक्षण किया ॥ १ ॥

अथार्थगृहमासाद्य नरकस्य जनार्दनः।
ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ॥ २ ॥

तदनन्तर नरकासुरके धनागार (खजाने) में जाकर भगवान् जनार्दनने अक्षय धन और भाँति-भाँतिके रत्न देखे ॥ २ ॥

मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यस्य च संचयान्।
मासारगल्वकूटानि तथा वज्रस्य संचयान् ॥ ३ ॥
जाम्बूनदमयान्यस्य शातकुम्भमयानि च।
प्रदीप्तज्वलनाभानि शीतरश्मिनिभानि च ॥ ४ ॥

मणि, मोती, मूँगे, वैडूर्यमणिके ढेर, चन्द्रकान्त मणिकी पर्वतोपम राशि तथा हीरोंके संग्रह देखे। जाम्बूनद तथा शातकुम्भ नामक सुवर्णोंकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रज्वलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३-४ ॥

शयनानि महार्हाणि तथा सिंहासनानि च।
हिरण्यदण्डरुचिरं शीतरश्मिसमप्रभम् ॥ ५ ॥
ददर्श तन्महच्छत्रं वर्षमाणमिवाम्बुदम् ।
जातरूपस्य शुभ्रस्य धाराः शतसहस्रशः ॥ ६ ॥

बहुमूल्य शय्या तथा सिंहासन भी देखनेमें आये। वहीं उन्होंने वह विशाल छत्र भी देखा, जो वर्षा करनेवाले मेघके समान उज्ज्वल सुवर्णकी लाखों धाराएँ बहा रहा था, उसका सुन्दर दण्ड सुवर्णका बना हुआ था तथा उसकी कान्ति चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णकी थी ॥ ५-६ ॥

वरुणादाहृतं पूर्वं नरकेणेति नः श्रुतम्।
यावद्रत्नं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ॥ ७ ॥
नैव राज्ञः कुबेरस्य न शक्रस्य यमस्य च।
रत्नसंनिचयस्तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुतः ॥ ८ ॥

हमने सुना है कि वह छत्र नरकासुर पहले वरुणके यहाँसे छीन लाया था। नरकासुरके घरमें जितना रत्न और असंख्य धन देखा गया, उतना राजा कुबेर, इन्द्र और यमके पास भी नहीं था। रत्नोंका वैसा संग्रह कुबेर आदिके यहाँ भी न तो कभी देखा गया और न सुना ही गया ॥ ७-८ ॥

हते भौमे निसुन्दे च हयग्रीवे च दानवे।
उपानिन्युस्ततस्तानि रत्नान्यन्तःपुराणि च ॥ ९ ॥
दानवा हतशिष्टा ये कोशसंचयरक्षिणः।
केशवाय महार्हाणि यान्यर्हति जनार्दनः ॥ १० ॥

भौमासुर, निसुन्द और दानव हयग्रीवके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए जो दानव और खजानेके रक्षक थे, वे उन बहुमूल्य रत्नों और अन्तःपुरकी वस्तुओंको भगवान् श्रीकृष्णके पास ले आये, जिन्हें पाने और रखनेकी योग्यता एकमात्र श्रीकृष्णमें ही थी ॥ ९-१० ॥

दैत्या ऊचुः

इमानि मणिरत्नानि विविधानि बहूनि च।
भीमरूपाश्च मातङ्गाः प्रवालविकृताः कुथाः ॥ ११ ॥
हेमसूत्रा महाकक्षाश्चापतोमरशालिनः।
रुचिराभिः पताकाभिः शवला रुचिरांकुशाः ॥ १२ ॥
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्यः करेणवः।
अष्टौ शत सहस्राणि देशजाश्वोत्तमा हयाः ॥ १३ ॥
गोषु चापि कृतो यावान् कामस्तव जनार्दन।
तावतीः प्रापयिष्यामो वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १४ ॥

दैत्योंने कहा—जनार्दन ! ये जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक मणिरत्न हैं तथा जो भयंकर रूपवाले गजराज हैं,