भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 489
४६६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जिनके ऊपर बिछायी जानेवाली कालीनें मूँगोंसे विभूषित हैं, जो सोनेके तारोंके बने हुए रस्सोंसे कसे जाते हैं, जिनकी जंजीरें बहुत बड़ी हैं, जो धनुष और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुशोभित होते हैं, जिनके अंकुश बड़े सुन्दर हैं तथा जो नाना प्रकारकी सुन्दर पताकाओं‌द्वारा चितकबरे दिखायी देते हैं, उन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है। इनसे दूनी हथिनियाँ हैं। आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं। इनके सिवा बहुत-सी गौएँ हैं। इनमेंसे जिनके लिये आपको जितनी आवश्यकता हो, उतनी संख्यामें हम इन सबको वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा देंगे ॥ ११-१४ ॥

आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च ।
कामव्याहारिणश्चैव पक्षिणः प्रियदर्शनाः ॥ १५ ॥
चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीयकान्यपि ।
वस्तु यत् त्रिषु लोकेषु धर्मेणाधिगतं तव ।
प्रापयिष्याम तत् सर्वं वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १६ ॥
देवगन्धर्वरत्नानि पन्नगानां च यद् वसु ।
तानि सर्वाणि सन्तीह नरकस्य निवेशने ॥ १७ ॥

प्रभो ! महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत-से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले और देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुकाष्ठ, कालागुरु तथा तीनों लोकोंमें जो धन और रत्न यहाँ सञ्चित हैं, उन सबपर आपका धर्मतः अधिकार हो गया है। हम उन सबको वृष्ण्यन्धकपुरी द्वारकामें पहुँचा देंगे। देवताओं और गन्धर्वोंके यहाँ जो रत्न हैं तथा नागोंके यहाँ जो वैभव है, वे सब यहाँ नरकासुरके भवनमें विद्यमान हैं ॥ १५-१७ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्च सर्वं हृषीकेशः परिगृह्य परीक्ष्य च ।
सर्वमाहारयामास दानवैर्द्वारकां पुरीम् ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने वह सारा वैभव लेकर उसकी परीक्षा करके सब-का-सब दानवोंद्वारा द्वारकापुरीको पहुँचा दिया ॥ १८ ॥

ततस्तद् वारुणं छत्रं स्वयमुत्क्षिप्य माधवः ।
हिरण्यवर्षं वर्षन्तमारुरोह विहङ्गमम् ॥ १९ ॥
गरुडं पतगश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवाम्बुदम् ।
ततोऽभ्ययाद् गिरिश्रेष्ठमभितो मणिपर्वतम् ॥ २० ॥

तदनन्तर माधवने सुवर्णकी वर्षा करते हुए वरुणके उस छत्रको स्वयं ही उठाकर गरुड़पर रख दिया और मूर्तिमान् मेघके समान आकाशगामी पक्षिप्रवर गरुड़पर वे स्वयं भी बैठ गये। तत्पश्चात् वे गिरिश्रेष्ठ मणिपर्वतके समीप गये ॥ १९-२० ॥

तत्र पुण्या ववुर्वाता द्युभवंश्चामलाः प्रभाः ।
मणीनां हेमवर्णानामभिभूय दिवाकरम् ॥ २१ ॥

यहाँ बड़ी पवित्र हवा चल रही थी। सोनेके समान रंगवाली मणियोंकी निर्मल प्रभाएँ सूर्यको तिरस्कृत-सा करके प्रकाशित हो रही थीं ॥ २१ ॥

तत्र वैदूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदनः ।
सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ॥ २२ ॥

वहाँ मधुसूदनने बहुत-से वैदूर्यमणिके समान रंगवाले प्रकाशमान द्वार और घर देखे, जहाँ वन्दनवारें बँधी थीं और पताकाएँ फहरा रही थीं ॥ २२ ॥

विद्युद्ग्रथितमेघाभः प्रबभौ मणिपर्वतः ।
हेमचित्रवितानैश्च प्रासादैरुपशोभितः ॥ २३ ॥

वह मणिपर्वत (जो कन्याओंका अन्तःपुर था) बिजलीसे गुँथे हुए मेघके समान प्रकाशित होता था। जिनमें सोनेके विचित्र चँदोवे तने हुए थे, ऐसे महल उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २३ ॥

तत्र ता वरहेमाभा ददर्श मधुसूदनः ।
गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तथा ॥ २४ ॥
ददर्श पृथुलश्रोणीः संरुद्धा गिरिकन्दरे ।
नरकेण समानीता रक्ष्यमाणाः समन्ततः ॥ २५ ॥

वहाँ मधुसूदनने श्रेष्ठ सुवर्णके समान कान्तिवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और देवताओंकी उन प्यारी पुत्रियोंको देखा, जो उस पर्वतकी कन्दरामें कैद की गयी थीं। उन सबके नितम्बभाग स्थूल और मांसल थे। नरकासुरने सब ओरसे लाकर उन्हें रख छोड़ा था ॥ २४-२५ ॥

त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तीरपराजिताः ।
निर्वशन्त्यो यथा देव्यः सुखिन्यः कामवर्जिताः ॥ २६ ॥

वह प्रदेश स्वर्गके समान सुखद था। वहाँ रहती हुई वे कुमारियाँ नरकासुरसे पराजित नहीं हुई थीं। उन्होंने कामभोगका परित्याग कर रक्खा था और वे देवियोंके समान वहाँ सुखपूर्वक रहती थीं ॥ २६ ॥

परिवव्रुर्महाबाहुमेकवेणीधराः स्त्रियः ।
सर्वाः काषायवासिन्यः सर्वाश्च नियतेन्द्रियाः ॥ २७ ॥

एक वेणी धारण करनेवाली तथा काषाय वस्त्रसे अपने अङ्गोंको आच्छादित करनेवाली उन समस्त कुमारियोंने महाबाहु श्रीकृष्णको चारों ओरसे घेर लिया। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको पूर्णतः संयममें रक्खा था ॥ २७ ॥

व्रतोपवासतन्वङ्ग्यः काङ्क्षन्त्यः कृष्णदर्शनम् ।
समेत्य यदुसिंहस्य सर्वाश्चक्रुः स्त्रियोऽञ्जलीन् ॥ २८ ॥

व्रत और उपवास करनेके कारण उनके सारे अङ्ग दुबले हो गये थे। वे सदा ही श्रीकृष्णके दर्शनकी अभिलाषा रखती थीं। यदुकुलके सिंह श्रीकृष्णके पास जाकर उन सब कुमारियोंने हाथ जोड़ लिये ॥ २८ ॥