विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] चतुःषष्टितमोऽध्यायः ४६७
नरकं निहतं ज्ञात्वा मुरं चैव महासुरम् ।
हयग्रीवं निसुन्दं च ताः कृष्णं पर्यवारयन् ॥ २९ ॥
नरकासुर, महान् असुर मुर, हयग्रीव तथा निसुन्दको मारा गया जानकर वे सब स्त्रियाँ श्रीकृष्णको घेरकर खड़ी हुई थीं ॥ २९ ॥
ये चासां रक्षिणो वृद्धा दानवा यदुनन्दनम् ।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे प्रणिपेतुर्वयोऽधिकाः ॥ ३० ॥
जो बड़े-बूढ़े दानव उन कुमारियोंके रक्षक थे, उनकी अवस्था बहुत अधिक थी। उन सबने हाथ जोड़कर यदुनन्दनको प्रणाम किया ॥ ३० ॥
तासां परमनारीणामृषभाक्षं निरीक्ष्य तम् ।
सर्वासामेव संकल्पः पतित्वेनाभवत् ततः ॥ ३१ ॥
वृषभके समान विशाल नेत्रवाले श्रीकृष्णका दर्शन करके उन समस्त सुन्दरियोंके मनमें उन्हें पति बनानेका संकल्प उदित हुआ ॥ ३१ ॥
तस्य चन्द्रोपमं वक्त्रं निरीक्ष्य मुदितेन्द्रियाः ।
सम्पहृष्टा महाबाहुमिदं वचनमब्रुवन् ॥ ३२ ॥
श्रीकृष्णका चन्द्रमाके समान मनोहर मुख देखकर उनकी सारी इन्द्रियाँ आनन्दसिन्धुमें निमग्न हो गयी थीं। वे अत्यन्त हर्षमें भरकर उन महाबाहुसे इस प्रकार बोलीं—॥३२॥
सत्यं च यत् पुरा वायुरिहास्मान् वाक्यमब्रवीत् ।
सर्वभूतमतिज्ञश्च देवर्षिरपि नारदः ॥ ३३ ॥
'भगवन् ! पूर्वकालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके मनोभावको जाननेवाले देवर्षि नारदने भी जो बात कही थी, वह आज सत्य हो गयी ॥ ३३ ॥
विष्णुर्नारायणो देवः शङ्खचक्रगदासिवृत् ।
स भौमं नरकं हत्वा भर्ता च भविता स वः ॥ ३४ ॥
'उन्होंने कहा था कि शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले जो सर्वव्यापी नारायणदेव हैं, वे भूमिपुत्र नरकका वध करके तुम सब लोगोंके पति होंगे ॥ ३४ ॥
सुप्रियं बत पश्यामश्चिरश्रुतमरिंदमम् ।
दर्शनेन कृतार्था हि वयमद्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
'हम चिरकालसे जिन शत्रुदमन श्यामसुन्दरके विषयमें बहुत कुछ सुनती चली आ रही हैं, आज उन्हीं परम प्रियतम प्रभुको प्रत्यक्ष देखनेका हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज आप परमात्माके दर्शनसे हम सब कृतार्थ हो गयीं' ॥ ३५॥
ततस्ताः सान्त्वयामास प्रमदा वासवानुजः ।
सर्वाः कमलपत्राक्षीर्दृष्ट्वा चोवाच माधवः ॥ ३६ ॥
तब इन्द्रके छोटे भाई माधवने उन समस्त कमलनयनी युवतियोंको सान्त्वना दी, उनकी ओर देखा और उनसे वार्तालाप किया ॥ ३६ ॥
यथार्हतः पूजयित्वा समाभाष्य च केशवः ।
यानैः किङ्करसंयुक्तैरुवाह मधुसूदनः ॥ ३७ ॥
इसके बाद मधुसूदन केशवने उनका यथोचित सम्मान तथा उनसे सम्भाषण करके उन्हें किङ्कर नामक दानवोंसे युक्त शिविकाओंपर सवार कराया ॥ ३७ ॥
किङ्कराणां सहस्राणि रक्षसां चातरंहसाम् ।
शिविकां वहतां तत्र निर्घोषः सुमहानभूत् ॥ ३८ ॥
वायुके समान वेगशाली किङ्कर नामक सहस्रों राक्षस उनकी शिविकाएँ ढोने लगे। उस समय उनका महान् घोष सर्वत्र छा गया ॥ ३८ ॥
तस्य पर्वतराजस्य शृङ्गं यत् परमार्चितम् ।
विमलार्केन्दुसंकाशं मणिकाञ्चनतोरणम् ॥ ३९ ॥
उस पर्वतराज मणिपर्वतका जो सर्वोत्तम एवं प्रशंसित शिखर था, वह निर्मल सूर्य एवं चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता था। उसमें मणि एवं सुवर्णके फाटक बने हुए थे ॥३९॥
सपक्षिगणमातङ्गं समृगव्यालपादपम् ।
शाखामृगगणाकीर्णं सुप्रस्तरशिलातलम् ॥ ४० ॥
न्यङ्कुभिश्च वराहेश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
सप्रपातं महासानुं विचित्रशिखरद्रुमम् ॥ ४१ ॥
अत्यद्भुतमचिन्त्यं च मृगवृन्दविलोड़ितम् ।
जीवञ्जीवकसंघैश्च बर्हिभिश्च निनादितम् ॥ ४२ ॥
वहाँ पक्षियोंके समुदाय, हाथी, मृग, सर्प और वृक्ष शोभा पाते थे। बंदरोंके समुदाय सब ओर भरे हुए थे। वहाँके प्रस्तर और शिलाएँ बहुत सुन्दर थीं। न्यङ्कु (बारहसिंगाविशेष), वराह और रुरुमृग उसका सेवन करते थे। वहाँ अनेकानेक झरने गिरते थे। उसके कई बड़े-बड़े आन्तर शिखर थे। उसके शृङ्ग और वृक्ष विचित्र शोभासे सम्पन्न थे। मणिपर्वतका वह शिखर अत्यन्त अद्भुत और अचिन्त्य था। मृगोंके झुंड वहाँ दौड़ लगाते रहते थे। चकोरोंके झुंड और मोर अपने कलरवोंसे उसे प्रतिध्वनित किये रहते थे ॥ ४०–४२ ॥
तदप्यतिबलो विष्णुर्दोर्भ्यामुत्पाट्य भासुरम् ।
आरोपयामास बली गरुडे पक्षिणां वरे ॥ ४३ ॥
अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे उस तेजस्वी पर्वत-शिखरको उखाड़कर पक्षिप्रवर गरुड़की पीठपर रख लिया ॥ ४३ ॥
मणिपर्वतशृङ्गं च सभायै च जनार्दनम् ।
उवाह लीलया पक्षी गरुडः पततां वरः ॥ ४४ ॥
पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ मणिपर्वतके उस शिखरको तथा पत्नीसहित श्रीकृष्णको भी लेकर लीलापूर्वक चलने लगे ॥४४॥