विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 491, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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स पक्षबलविक्षेपैर्हिमाद्रिशिखरोपमः।
दिक्षु सर्वासु संह्रादं जनयामास पक्षिराट् ॥ ४५ ॥
उनका शरीर हिमालयके शिखरके समान विशाल था। वे पक्षिराज अपनी पाँखोंको बलपूर्वक हिला-हिलाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मचाते जा रहे थे ॥ ४५ ॥
आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन्।
संजहार महाभ्राणि विजहार च कानिचित् ॥ ४६ ॥
वे बड़े-बड़े पर्वतशिखरोंको तोड़ डालते, वृक्षोंको उखाड़ फेंकते, बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देते और कुछको अपने साथ उड़ाये लिये जाते थे ॥ ४६ ॥
विषयं समतिक्रम्य देवयोश्चन्द्रसूर्ययोः।
ययौ वातजवः पक्षी जनार्दनवशे स्थितः ॥ ४७ ॥
चन्द्रदेव और सूर्यदेवके प्रदेशको लाँघकर वे वायुके समान वेगशाली पक्षी गरुड़ भगवान् श्रीकृष्णके वशमें होकर चलते थे ॥ ४७ ॥
स मेरुगिरिमासाद्य देवगन्धर्वसेवितम्।
देवसद्मानि सर्वाणि ददर्श मधुसूदनः ॥ ४८ ॥
देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित मेरुगिरिपर पहुँचकर उन भगवान् मधुसूदनने समस्त देवगृहोंका दर्शन किया ॥ ४८ ॥
विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च नराधिप।
भ्राजमानान्यतिक्रामन्नश्विनोश्च परंतप ॥ ४९ ॥
प्राप्य पुण्यतमांल्लोकान् देवलोकमरिंदमः।
शक्रसद्म समासाद्य प्रविवेश जनार्दनः ॥ ५० ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश्वर ! उन्होंने विश्वेदेवों, मरुद्गणों, साध्यों और अश्विनीकुमारोंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँघते हुए पुण्यतम लोकोंमें पहुँचकर देवलोकमें पदार्पण किया। तत्पश्चात् शत्रुदमन जनार्दनने इन्द्रभवनके निकट जाकर उसके भीतर प्रवेश किया ॥ ४९-५० ॥
अवतीर्य स तार्क्ष्यात् तु ददर्श विबुधाधिपम्।
प्रीतश्चैवाभ्यनन्दत् तं देवराजः शतक्रतुः ॥ ५१ ॥
वहाँ गरुड़से उतरकर वे देवेश्वर इन्द्रसे मिले। देवराज इन्द्रने भी प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन किया ॥ ५१ ॥
प्रदाय कुण्डले दिव्ये ववन्दे तं तदाच्युतः।
सभार्यो विबुधश्रेष्ठं नरश्रेष्ठो जनार्दनः ॥ ५२ ॥
उस समय अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले पत्नीसहित नरश्रेष्ठ जनार्दनने वे दोनों दिव्य कुण्डल उन्हें देकर देवप्रवर इन्द्रको प्रणाम किया ॥ ५२ ॥
अर्चितो देवराजेन रत्नैश्च प्रतिपूजितः।
सत्यभामा च पौलोम्या यथावदभिनन्दिता ॥ ५३ ॥
देवराज इन्द्रने नाना प्रकारके रत्नोंद्वारा श्रीकृष्णका आदर-सत्कार किया। इसी प्रकार पुलोमकन्या शचीने भी सत्यभामाका यथोचित रूपसे अभिनन्दन किया ॥ ५३ ॥
वासवो वासुदेवश्च जग्मतुः सहितौ तदा।
अदित्या भवनं दिव्यं देवमातुर्महर्द्धिमत् ॥ ५४ ॥
तदनन्तर इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंने एक साथ होकर देवमाता अदितिके अत्यन्त समृद्धिशाली दिव्य भवनमें प्रवेश किया ॥ ५४ ॥
तत्रादितिमुपास्यन्तीमप्सरोभिः समन्ततः।
ददृशाते महात्मानौ महाभागां तपोऽन्विताम् ॥ ५५ ॥
वहाँ उन दोनों महात्माओंने महाभागा तपस्विनी अदितिका दर्शन किया, जिनकी सब ओरसे अप्सराएँ उपासना (सेवा) करती थीं ॥ ५५ ॥
ततस्ते कुण्डले दिव्ये प्रादाददितिनन्दनः।
ववन्दे तां शचीभर्ता मातरं स्वां पुरंदरः ॥ ५६ ॥
वहाँ अदितिनन्दन शचीवल्लभ पुरन्दर इन्द्रने वे दोनों कुण्डल अपनी माताको दे दिये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ५६ ॥
जनार्दनं पुरस्कृत्य कर्म चैव शशंस तत्।
अदितिस्तौ सुतौ प्रीत्या परिष्वज्याभिनन्द्य च ॥ ५७ ॥
आशीर्भिरनुकूलाभिरुभावप्यवदत् तदा ।
इन्द्रने जनार्दनको आगे करके उनके पराक्रमकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अदितिने अपने उन दोनों पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक हृदयसे लगाकर उनका अभिनन्दन किया और दोनोंके लिये अनुकूल आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ५७½ ॥
पौलोमी सत्यभामा च प्रीत्या परमया युते ॥ ५८ ॥
अगृह्णीतां वराहार्या देव्यास्ते चरणौ शुभौ।
ते चाप्यभ्यवदत् प्रेम्णा देवमाता यशस्विनी ॥ ५९ ॥
शची और सत्यभामाने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ परम पूजनीया देवी अदितिके सुन्दर चरणोंका स्पर्श किया। तब यशस्विनी देवमाताने उन दोनोंसे भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया ॥
यथावदब्रवीच्चैव जनार्दनमिदं वचः।
अधृष्यः सर्वभूतानामवध्यश्च भविष्यसि ॥ ६० ॥
यथैव देवराजोऽयमजितो लोकपूजितः।
इसके बाद अदितिने भगवान् जनार्दनसे यह यथार्थ बात कही—‘वत्स! तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये अजेय और अवध्य होओगे। जैसे ये देवराज इन्द्र हैं, उसी प्रकार तुम भी अपराजित और लोकपूजित होओगे ॥ ६०½ ॥
भवत्वियं वरारोहा नित्यं च प्रियदर्शना ॥ ६१ ॥
सर्वलोकेषु विख्याता दिव्यगन्धा मनोरमा।
सत्यभामोत्तमा स्त्रीणां सुभगा स्थिरयौवना ॥ ६२ ॥
जरां न यास्यति वधूर्यावत्त्वं कृष्ण मानुषः।