विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः [ ४६९
'यह सुन्दरी सत्यभामा सदा प्रियदर्शना, सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात, दिव्य गन्धवाली, मनोरमा, सुस्थिर-यौवना, सौभाग्यवती तथा स्त्रियोंमें उत्तम हो। श्रीकृष्ण ! जबतक तुम मानव बनकर मनुष्यलोकमें रहोगे, तबतक यह सत्यभामा बूढ़ी नहीं होगी' ॥ ६१ ६२३ ॥
एवमभ्यर्चितः कृष्णो देवमात्रा महाबलः ॥ ६३ ॥
देवराजायनुज्ञातो रत्नैश्च प्रतिपूजितः ।
वैनतेयं समारुह्य सहितः सत्यभामया ॥ ६४ ॥
देवाक्रीडं परिक्रामन् पूज्यमानं सुरर्षिभिः ।
देवमाता अदितिके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर देवराजकी आज्ञा ले उनसे रत्नोंद्वारा पूजित हो महाबली श्रीकृष्ण सत्यभामासहित गरुड़पर आरूढ़ हुए और देवर्षियोंद्वारा प्रशंसित देवताओंके क्रीड़ा-कानन नन्दनवनमें सब ओर घूमने लगे ॥ ६३-६४३ ॥
स ददर्श महाबाहुराक्रीडे वासवस्य ह ॥ ६५ ॥
दिव्यमभ्यर्चितं देवैः पारिजातं महाद्रुमम् ।
नित्यपुष्पधरं दिव्यं पुण्यगन्धमनुत्तमम् ॥ ६६ ॥
इन्द्रके उस क्रीड़ावनमे महाबाहु श्रीकृष्णने पारिजात नामक दिव्य विशाल वृक्षको देखा, जो देवताओंद्वारा पूजित था। वह दिव्य वृक्ष सदा ही फूल धारण करनेवाला, पवित्र गन्धसे सुवासित तथा परम उत्तम था ॥ ६५-६६ ॥
यमासाद्य जनः सर्वो जातिं स्मरति पौर्विकीम् ।
संरक्ष्यमाणं देवैस्तं प्रसद्यामितविक्रमः ॥ ६७ ॥
उत्पाद्यारोपयामास विष्णुस्तं गरुडोपरि ।
उसके पास जानेपर सब लोगोंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो आता था। देवता उस वृक्षकी रक्षा करते थे; परंतु अमितपराक्रमी श्रीकृष्णने उसे बलपूर्वक उखाड़कर गरुड़ की पीठपर रख लिया ॥ ६७३ ॥
सोऽपश्यत् सत्यभामा च दिव्यमप्सरसां गणम् ॥ ६८॥
पृष्ठतः सत्यभामा च दिव्या योषा च वीक्षिता ।
प्रायात् ततो द्वारवतीं वायुजुष्टेन वै पथा ॥ ६९ ॥
यहाँ श्रीकृष्ण तथा सत्यभामाने दिव्य अप्सराओंके समुदायको देखा। उन्होंने भी पीछेसे दिव्य युवती सत्यभामाका दर्शन किया। तदनन्तर वायुसेवित मार्गसे श्रीकृष्ण द्वारकापुरीकी ओर चल दिये ॥ ६८-६९ ॥
श्रुत्वा तं देवराजस्तु कर्म कृष्णस्य तत् तदा ।
अनुमेने महाबाहुः कृतकर्मेति चाब्रवीत् ॥ ७० ॥
महाबाहु देवराज इन्द्रने जब उस समय श्रीकृष्णके पारिजात-हरणरूपी उस कर्मको सुना, तब यह कहकर उसका अनुमोदन किया कि 'श्रीकृष्णने मेरा बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है' ॥ ७० ॥
स पूज्यमानस्त्रिदशैः सप्तर्षिगणसंस्तुतः ।
प्रतस्थे द्वारकां कृष्णो देवलोकादरिंदमः ॥ ७१ ॥
देवताओंसे पूजित और सप्तर्षियोंसे प्रशंसित हो शत्रुदमन श्रीकृष्णने देवलोकसे द्वारकाको प्रस्थान किया ॥ ७१ ॥
सोऽभिपत्य महाबाहुर्दीर्घमध्वानमल्पवत् ।
पूजितो देवराजेन ददृशे यादवीं पुरीम् ॥ ७२ ॥
देवराजसे सम्मानित हुए महाबाहु श्रीकृष्णने उस विशाल मार्गको लघु मार्गकी भाँति थोड़ी ही देरमें तय करके यादवपुरीको देखा ॥ ७२ ॥
तथा कर्म महत् कृत्वा भगवान् वासवानुजः ।
उपायाद् द्वारकां कृष्णः श्रीमान् गरुडवाहनः ॥ ७३ ॥
इन्द्रके छोटे भाई गरुड़वाहन श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्ण वैसा महान् कर्म करके द्वारकामें चले गये ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे द्वारकाप्रवेशे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजात-हरण और द्वारकामें प्रवेशविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
रैवतक पर्वतपर रुक्मिणीके व्रतोद्यापनका उत्सव, उसमें पारिजात-पुष्प देकर श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका सम्मान, नारदजीद्वारा रुक्मिणीके सर्वाधिक सौभाग्यकी प्रशंसा तथा सत्यभामाका कोपभवनमें प्रवेश
जनमेजय उवाच
प्रादुर्भावे मुनिश्रेष्ठ माथुरे चरितं शुभम् ।
शृण्वन्नैवाधिगच्छामि तृप्तिं कृष्णस्य धीमतः ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा-- मुनिश्रेष्ठ ! मथुरामें अवतार लेकर बुद्धिमान् श्रीकृष्णने जो मङ्गलमयी लीलाएँ की हैं, उन्हें सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है ॥ १ ॥
द्वारकायां निवसतः कृतदारस्य षड्गुणम् ।
चरितं ब्रूहि कृष्णस्य सर्वं हि विदितं तव ॥ २ ॥