विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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द्वारकामें निवास करके सपत्नीक हो जानेपर श्रीकृष्णने जो षड्गुणसंपन्न चरित्र किये हैं, उन्हें बताइये; क्योंकि श्रीकृष्णकी सारी लीलाएँ आपको विदित हैं॥ २॥
वैशम्पायन उवाच
जनमेजय कृष्णस्य कृतदारस्य भारत।
निबोध चरितं चित्रं तस्यैव सदृशं प्रभो ॥ ३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन जनमेजय! पत्नी परिग्रह करनेके पश्चात् श्रीकृष्णके जो विचित्र चरित्र हैं, उन्हें सुनो। प्रभो! वे चरित्र उन्हींके अनुरूप हैं॥ ३॥
प्राप्तदारो महातेजा वासुदेवः प्रतापवान्।
रुक्मिण्या सहितो देव्या ययौ रैवतकं नृप ॥ ४॥
नरेश्वर! सपत्नीक होनेके पश्चात् एक समय महातेजस्वी एवं प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण महारानी रुक्मिणीके साथ रैवतक पर्वतपर गये॥ ४॥
उपवासावसानं हि रुक्मिण्याः प्रतिपूजयन्।
तर्पयिष्यन् स्वयं विप्राञ्जगाम मधुसूदनः ॥ ५॥
उस रुक्मिणी देवीके उपवास-व्रतका उद्यापन था। उसका समादर करते हुए भगवान् मधुसूदन स्वयं ही ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करनेके लिये वहाँ गये॥ ५॥
कुमाराः प्रययुस्तत्र पुत्रभ्रातर एव च।
प्रेषिता वासुदेवेन नारदस्याभ्यनुज्ञया ॥ ६॥
देवर्षि नारदकी अनुमतिसे भगवान् वासुदेवके भेजनेपर यदुकुलके कुमार, पुत्र और भाई भी वहाँ गये॥ ६॥
षोडश स्त्रीसहस्राणि जग्मुरेव च धीमतः।
ऋद्धया परमया राजन् विष्णोरेवानुरूपया ॥ ७॥
राजन्! परम बुद्धिमान् विष्णुरूप श्रीकृष्णके अनुरूप उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न सोलह हजार स्त्रियाँ भी उस उत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये गयीं॥ ७॥
ततस्तत्र द्विजातीनां कामान् प्रादादधोक्षजः।
अर्थिनां धर्मनित्यानां वन्दिनामिष्टवादिनाम् ॥ ८॥
कल्याणानामगोत्राणां महतां पुण्यकर्मणाम्।
योनैः श्रुतैश्च यज्ञैश्च शुद्धानां कुरुनन्दन ॥ ९॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर वहाँ भगवान् श्रीकृष्णने प्रार्थी, नित्य धर्मपरायण, वन्दी, प्रियवादी, माङ्गलिक नाम-गोत्रसे युक्त, महान् पुण्यकर्मा तथा योनि, विद्या और यज्ञके सम्बन्धसे शुद्ध ब्राह्मणोंको मनोवाञ्छित पदार्थ दिये॥ ८-९॥
१. समग्र ऐश्वर्य, समग्र ज्ञान, समग्र यश, समग्र श्री, समग्र वैराग्य और समग्र धर्म—ये छः भग (ऐश्वर्य) ही छः गुण हैं। अथवा सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि बोध, स्वतन्त्रता, अलुप्तशक्तिता और अनन्त शक्ति का होना—ये परमेश्वरके स्वरूपभूत गुण ही यहाँ छः गुणोंके नामसे स्मरण किये गये हैं।
तर्पयित्वा द्विजान् कामैरिष्टैरिष्टः सतां गतिः।
ज्ञातीन् संतर्पयामास यथार्हं भक्तवत्सलः ॥ १०॥
ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुओंसे तृप्त करके सत्पुरुषोंके प्रिय आश्रय भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने अपने भाई-बन्धुओंको भी यथायोग्य संतुष्ट किया॥ १०॥
उपवासावसानेऽथ भगवान् स विशेषतः।
बहु मेने प्रियां भार्या रुक्मिणीं भीष्मकात्मजाम् ॥ ११॥
उपवासके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्यारी पत्नी भीष्मकराजकुमारी रुक्मिणीका विशेषरूपसे बहुत आदर किया॥ ११॥
वसतस्तस्य कृष्णस्य सदारस्यामितौजसः।
सहासीनस्य रुक्मिण्या नारदोऽभ्याययौ मुनिः ॥ १२॥
अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण पत्नियोंसहित वहाँ रहकर जब रुक्मिणीदेवीके साथ बैठे हुए थे, उसी समय नारदमुनि उनके निकट आये॥ १२॥
आगतं चाप्रमेयात्मा मुनिमिन्द्रानुजस्तदा।
शास्त्रदृष्टेन विधिना अर्चयामास केशवः ॥ १३॥
अप्रमेयस्वरूप इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्णने उस समय वहाँ आये हुए नारदमुनिका शास्त्रोक्त विधिसे पूजन किया॥ १३॥
सोऽर्चितो वासुदेवेन मुनिरर्च्यतमः सताम्।
पारिजाततरोः पुष्पं ददौ कृष्णाय भारत ॥ १४॥
भरतनन्दन! भगवान् वासुदेवसे पूजित हो सत्पुरुषोंके परम पूजनीय मुनिने वहाँ श्रीकृष्णके हाथमें पारिजात वृक्षका एक फूल दिया॥ १४॥
तद् वृक्षराजकुसुमं रुक्मिण्याः प्रददौ हरिः।
पार्श्वस्था सा हि कृष्णस्य भोज्या नरवराभवत् ॥ १५॥
नरश्रेष्ठ! वृक्षराज पारिजातके उस फूलको श्रीहरिने रुक्मिणीदेवीके हाथमें दे दिया; क्योंकि वे भोजकुलनन्दिनी रुक्मिणी श्रीकृष्णके पास उनके बगलमें ही बैठी हुई थीं॥ १५॥
प्रतिगृह्य तु तत् पुष्पं कामारिणरनिन्दिता।
शिरस्यमलपत्राक्षी ददौ कृष्णेङ्गितानुगा ॥ १६॥
उस पुष्पको हाथमें लेकर प्रद्युम्नजननी सती-साध्वी कमलनयनी रुक्मिणीने, जो श्रीकृष्णके संकेतका अनुसरण करनेवाली थीं, अपने सिरके बालोंमें लगा लिया॥ १६॥
त्रैलोक्यरूपसर्वस्वं नारायणमनोहरा।
शुशुभे देवपुष्पेण द्विगुणं भैष्मकी तदा ॥ १७॥
त्रिभुवनकी सारी रूपसम्पत्ति जिनमें निहित थी, वे इन नारायणकी मनोहारिणी लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी उस देवपुष्पको धारण करनेसे दुगुनी शोभा पाने लगीं॥ १७॥