विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 494, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपूर्व] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ४७१
तां नारदस्तथोवाच मुनिर्ब्रह्मसुतस्तदा।
तवैवौपयिकं पुष्पमेकं देवि पतिव्रते ॥ १८ ॥
'उस समय ब्रह्मकुमार नारद मुनि उनसे बोले—'देवि! पतिव्रते ! यह एकमात्र पुष्प तुम्हारे ही योग्य था ॥ १८ ॥
अलंकृतं पुष्पमेतत् संसर्गात् तव सर्वथा।
अत्यर्हा च मता मे त्वमेतत्पुष्पाद् धृतव्रते ॥ १९ ॥
'व्रतको धारण करनेवाली देवि ! तुम्हारे संसर्गसे यह फूल सर्वथा अलंकृत हो गया। इस पुष्पको धारण करनेसे तुम मेरी दृष्टिमें अत्यन्त पूजनीय हो गयी हो ॥ १९ ॥
कल्याणगुणसम्पन्ने सततं भर्तृवत्सले।
अम्लानमेतत् सततं पुष्पं भवति कामिनि ॥ २० ॥
संवत्सरपरं कालं कालज्ञे गुणसम्मते।
ईप्सितानपि गन्धांश्च ददाति वदतां वरे ॥ २१ ॥
'कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न पतिवत्सले ! कामिनि ! यह फूल एक वर्षतक सदा ताजा बना रहता है, कभी कुम्हलाता नहीं है। समयका ज्ञान रखनेवाली, अपने गुणोंसे आदर पानेवाली, वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुक्मिणी ! यह फूल एक सालतक मनोवाञ्छित गन्ध प्रदान करता रहता है ॥ २०-२१ ॥
शीतोष्णे चेच्छते देवि पुष्पमेतत् प्रयच्छति।
स्रवत्यपि रसान् देवि मनसाकाङ्क्षितान् वरान्॥२२॥
'देवि ! जितनी सर्दी या गर्मी अभीष्ट हो, यह फूल उसे देता रहता है तथा मनमें जिन श्रेष्ठ रसोंको प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, उन्हें भी यह पुष्प स्वयं ही झरता रहता है ॥
सेव्यमानं च सौभाग्यं ददाति वरवर्णिनि।
स्रवत्यपि तथा गन्धानीप्सितान् प्रीतिवर्धनम् ॥ २३ ॥
'वरवर्णिनि ! इस पुष्पका सेवन किया जाय तो यह सौभाग्य प्रदान करता है तथा मनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली अभीष्ट सुगन्ध झरता रहता है ॥ २३ ॥
यानि यानि च पुष्पाणि त्वं देव्यभिलषिष्यसि।
कुसुमं वृक्षराजस्य तानि तानि प्रदास्यति ॥ २४ ॥
'देवि ! तुम जिन-जिन फूलोंकी अभिलाषा करोगी, वृक्षराज पारिजातका यह फूल उन सबको प्रस्तुत कर देगा ॥
एतदेव भगाधानं धर्मिष्ठे पुत्रदं तथा।
मतिं च नाशुभे धत्ते धार्यमाणं सदा शुभे ॥ २५ ॥
'धर्ममें निष्ठा रखनेवाली शुभे ! देवि ! यह पुष्प ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाला तथा पुत्रदायक है। इसे सदा धारण किया जाय तो यह बुद्धिको अशुभ चिन्तनमे नहीं लगने देता ॥
यद् यदिच्छसि वर्णं च तत् सर्वं धारयिष्यति।
स्वल्पं वा यदि वा स्थूलं छन्दतस्ते भविष्यति ॥ २६ ॥
'तुम इस फूलको जिस-जिस रूप-रंगमें देखना चाहोगी, वह सब यह धारण कर लेगा। तुम्हारी इच्छाके अनुसार यह छोटा-बड़ा, हल्का-भारी अथवा स्थूल-सूक्ष्म हो जायगा ॥ २६ ॥
अनिष्टगन्धहरणमेतत् सद्गन्धवर्द्धनम्।
प्रदीपकर्म रात्रौ च करोति कमलेक्षणे ॥ २७ ॥
'कमललोचने ! यह पुष्प अप्रिय गन्धका निवारण तथा उत्तम गन्धकी वृद्धि करनेवाला है। रातके समय यह दीपकका भी काम करता है ॥ २७ ॥
संतानकस्रजो मालां पुष्पवस्त्रादि वाच्युतम्।
पुष्पमण्डपमुख्यानि चिन्तितेन प्रदास्यति ॥ २८ ॥
'यह चिन्तन करनेमात्रसे संतान नामक दिव्य वृक्षके फूलोंका हार, माला, फूल, कभी नष्ट न होनेवाले वस्त्र आदि तथा अच्छे-अच्छे फूलोंके मण्डप प्रदान करेगा ॥ २८ ॥
बुभुक्षा वा पिपासा वा ग्लानिर्वाप्यथवा जरा।
देववद्धारयन्त्यास्ते स्वच्छन्देन भविष्यति ॥ २९ ॥
'देवताओंके समान इसको धारण करते समय तुम्हें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होगी। ये सारी वस्तुएँ तुम्हारी इच्छाके अधीन हो जायँगी ॥ २९ ॥
अनुगीतानि गीतानि दास्यत्यपि च चिन्तिते।
सुवाद्यान् सुमधुरांस्तथैव तव सम्मतान् ॥ ३० ॥
'इतना ही नहीं, यह चिन्तन करनेपर तुम्हें प्रिय लगने-वाले सुन्दर वाद्यों तथा संगीत-शास्त्रके अनुकूल गीतोंका भी आनन्द प्रदान करेगा ॥ ३० ॥
पूर्णे संवत्सरे देवि पुष्पमेतत् तवान्तिकात्।
निर्वर्त्स्यते तरुवरं समयेन प्रयास्यति ॥ ३१ ॥
'देवि ! वर्ष पूर्ण होनेपर यह फूल तुम्हारे पाससे समयानुसार चला जायगा और वृक्षप्रवर पारिजातसे जुड़ जायगा ॥ ३१ ॥
कृतिरेषा हि भद्रं ते पारिजातस्य सुप्रभे।
निसर्गतः सगंकृता सत्कारार्थेऽसुरद्विषाम् ॥ ३२ ॥
'सुप्रभे ! तुम्हारा कल्याण हो। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजीने असुरद्रोही देवताओंके सत्कारके लिये स्वभावतः पारिजातकी ऐसी सामर्थ्य रच दी है ॥ ३२ ॥
उमा देववरज्येष्ठा हिमालयसुता सती।
धारयन्तीश्वरी नित्यं पुष्पाण्येतानि सुप्रभे ॥ ३३ ॥
'उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली देवि ! देवेश्वर शिवकी प्रियतमा हिमालयपुत्री सती-साध्वी सुरेश्वरी उमा नित्य इन फूलोंको धारण करती हैं ॥ ३३ ॥
अदितिश्च सपौलोमी महेन्द्रसुरतारणी।
सावित्री देवमाता च श्रीश्च सर्वगुणोचिता ॥ ३४ ॥
देवपत्न्यस्तथैवान्या देवाश्च वसुदेवताः।
संवत्सरपरः कालः सर्वेषां न तु संशयः ॥ ३५ ॥