विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४७२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'देवराज इन्द्रकी माता अदिति, देवेन्द्रपत्नी शची, देवमाता सावित्री, सर्वगुणसम्पन्ना लक्ष्मी तथा अन्य देवपत्नियाँ, देवगण और वसु देवता—ये सब इस पुष्पको धारण करते हैं। उन सबके लिये भी इस पुष्पके धारणका अधिक-से-अधिक समय एक वर्षतक ही है। इसमें संशय नहीं है॥
षोडशस्त्रीसहस्राणां मध्ये त्वं खलु वर्तसे।
ज्येष्ठां वासुदेवस्य वेद्मि त्वां भोजनन्दिनि ॥ ३६ ॥
'भोजनन्दिनि ! आज मुझे मालूम हो गया कि इन सोलह हजार स्त्रियोंके बीच भगवान् वासुदेवको तुम्हीं सबसे अधिक प्रिय हो ॥ ३६ ॥
सपत्न्यस्ते गुणोपेते सर्वाः सर्वेश्वरप्रिये ।
अवमानावसेकेन त्वया सिक्ताद्य भामिनि ॥ ३७ ॥
'सर्वेश्वरप्रिये ! सद्गुणवती भामिनि ! आज तुमने अपनी सारी सौतोंको अपमानके जलसे सींच दिया ॥ ३७ ॥
प्रकाशमद्य सौभाग्यमनिवार्यं यशश्च ते।
मन्दारकुसुमं दत्तं यत् ते मधुनिघातिना ॥ ३८ ॥
'आज तुम्हारा अनिवार्य सौभाग्य और यश प्रकाशमें आ गया, क्योंकि भगवान् मधुसूदनने यह मन्दार-पुष्प केवल तुम्हारे हाथमे दिया है ॥ ३८ ॥
अद्य सत्राजिती देवी ज्ञास्यते वरवर्णिनी ।
सौभाग्याख्यं सदा वेत्ति याऽऽत्मानं सुभगं सती ॥३९॥
'आज सत्राजित्की पुत्री परम सुन्दरी सती सत्यभामा देवी, जो अपने-आपको सदा सबसे अधिक भाग्यशालिनी एवं सुभगा समझती रही हैं, जान लेंगी कि किसका सौभाग्य अधिक है ॥ ३९ ॥
साम्बमाता च गान्धारी भार्याश्चान्या महात्मनः।
सौभाग्यार्थोद्यताकाङ्क्षामद्य मोक्ष्यन्ति निःस्पृहाः॥४०॥
'साम्बमाता जाम्बवती तथा गान्धारी आदि, जो महात्मा श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ हैं, वे आज निःस्पृह होकर सौभाग्य-के लिये उठी हुई आकाङ्क्षाका परित्याग कर देंगी ॥ ४० ॥
सौभाग्यैकरथो जैत्रस्तव देव्यद्य निःसृतः।
मनोरथरथानां यः सहस्रैरपि दुर्जयः ॥ ४१ ॥
'देवि ! आज तुम्हारे सौभाग्यका एकमात्र विजयशील रथ बाहर निकला है, जो सहस्रों मनोरथरूपी रथोंके लिये दुर्जय है ॥ ४१ ॥
अद्याहमवगच्छामि सर्वथा सर्वशोभने ।
आत्मा द्वितीयः कृष्णस्य भोजे त्वमिति भामिनि ॥ ४२ ॥
'सर्वाङ्गसुन्दरी भामिनि ! भोजराजकन्ये ! आज मैं सर्वथा इस बातको समझ गया कि श्रीकृष्णकी दूसरी आत्मा तुम्हीं हो ॥ ४२ ॥
त्रैलोक्यरत्नसर्वस्वमददाद् यत् तथाच्युतः।
जीवितातिशयस्तेन त्वया प्राप्तो हरिप्रिये ॥ ४३ ॥
'हरिप्रिये ! तीनों लोकोंके रत्नोंका सर्वस्वरूप यह पारिजात पुष्प भगवान् श्रीकृष्णने जो तुम्हें ही दिया है, इससे तुमने आज प्राणोंसे भी अधिक उत्कृष्ट वस्तु प्राप्त कर ली है (अथवा तुम्हें आज समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट जीवन प्राप्त हुआ है ।)' ॥ ४३ ॥
नारदेनैवमुक्तं तु तथ्यं वाक्यं नराधिप ।
तत्रस्थाः शुश्रुवुः प्रेष्याः प्रेषिताः सत्यभामया ॥ ४४ ॥
'नरेश्वर ! सत्यभामाकी भेजी हुई दासियाँ वहाँ खड़ी थीं। उन्होंने नारदजीके द्वारा इस प्रकार कहे गये यथार्थ वचनोंको सुना ॥ ४४ ॥
देवीनां च तथान्यासां पत्नीनां च विशाम्पते।
दृष्ट्वा ताः सविशेषं च नारदेनाभ्युदाहृतम् ॥ ४५ ॥
प्रजानाथ ! अन्य देवियों तथा पत्नियोंकी दासियाँ भी वहाँ खड़ी थीं । उन सबको देखकर नारदजीने उपर्युक्त बातें और भी बढ़ा-चढ़ाकर कही थीं ॥ ४५ ॥
तच्च श्रुत्वा सुनिखिलं प्रेष्याभिः स्त्रीस्वभावतः ।
प्रकाशीकृतमेवासीद् विष्णोरन्तःपुरे तदा ॥ ४६ ॥
उस समय वे सारी बातें सुनकर उन दूतियोंने स्त्री-स्वभावके कारण भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उन्हें प्रकट कर ही दिया ॥ ४६ ॥
कर्णाकर्णि ततो देव्यः कौलीनमिव संघशः ।
मन्त्रयांचक्रिरे हृष्टा रुक्मिण्यतिगुणोदयम् ॥ ४७ ॥
कानोंकान वह सब जानकर श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र हो हर्षमे भरकर रुक्मिणीके अत्यन्त गुणयुक्त भाग्योदयकी चर्चा करने लगीं, मानो कुलके किसी गूढ़ रहस्यपर गुप्त मन्त्रणा कर रही हों ॥४७॥
अर्हति पुत्रमातेति ज्येष्ठेति च समागताः।
प्रायेण प्रवदन्ति स्म हृष्टा दामोदरस्त्रियः ॥ ४८ ॥
हर्षसे उत्फुल्ल हुई भगवान् दामोदरकी वे स्त्रियाँ एकत्र होकर प्रायः इस प्रकार कहने लगीं कि वे (रुक्मिणी) हम सब लोगोंकी पूजनीया हैं, ज्येष्ठ पुत्रकी माता हैं और स्वयं भी ज्येष्ठा हैं ॥ ४८ ॥
ममृषे न सपत्न्यास्तु तत् सौभाग्यगुणोदयम् ।
सत्यभामा प्रिया नित्यं विष्णोरतुलतेजसः ॥ ४९ ॥
परंतु अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णकी नित्य प्रिया सत्यभामा अपनी सौतके उस सौभाग्य-गुणका उदय नहीं सहन कर सकीं ॥ ४९ ॥
रूपयौवनसम्पन्ना स्वसौभाग्येन गर्विता।
अभिमानवती देवी श्रुत्यैवेर्ष्यावशं गता ॥ ५० ॥