विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ४७३
वे रूप और यौवनसे सम्पन्न थीं। उन्हें अपने सौभाग्य-पर गर्व था; अतः अभिमानिनी देवी सत्यभामा सौतके अभ्युदयका समाचार सुनते ही ईर्ष्याके वशीभूत हो गयीं॥५०॥
समुत्सृजन्ती वसनं सकुंकुमं
शुचिस्मिता शुक्लमथैकमंशुकम्।
जग्राह रोषाकुलितेन चेतसा
वह्नेस्तदा श्रीरिव वर्द्धितेन्धना ॥ ५१ ॥
पवित्र मुसकानवाली सत्यभामाने कुंकुममें रँगी हुई साड़ी उतारकर रोषाकुल चित्तसे एकमात्र श्वेत वस्त्र धारण कर लिया। वे उस समय अधिक ईंधन डाल देनेसे बढ़ी हुई अग्निकी दीप्तिमती शिखाके समान प्रतीत होती थीं॥ ५१ ॥
दन्दह्यमाना ज्वलनेन वर्द्धता
ईर्ष्यासमुत्थेन गतप्रभेव।
क्रोधान्विता क्रोधगृहं विविक्तं
विवेश तारेव घनं सतोयम् ॥ ५२ ॥
उनके मनमें ईर्ष्याजनित आग बढ़ती जा रही थी, जिससे अत्यन्त दग्ध होनेके कारण वे श्रीहीन-सी हो गयी थीं। जैसे तारा सजल जलधरकी ओटमें चली जाय, उसी प्रकार रोषभरी सत्यभामाने वहाँ एकान्त कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥
बद्ध्वा ललाटे हिमचन्द्रशुक्लं
दुकूलपट्टं प्रियरोषचिह्नम्।
पर्यन्तदेशं सरसेन देवी
विलिप्य सा लोहितचन्दनेन ॥ ५३ ॥
देवी सत्यभामाने ललाटमें प्रियतमके प्रति रोषसूचक चिह्नके तौरपर हिम और चन्द्रमाके समान श्वेत दुकूलपट्ट बाँध लिया और उस ललाटके किनारे-किनारे सरस (गीला) लाल चन्दन पोत लिया ॥ ५३ ॥
संस्मृत्य संस्मृत्य शिरः सकोपं
प्रकम्पमाना समुपोपविष्टा।
दीर्घोपधाने शयनेऽपनीय
विभूषणान्येव न्यबद्धवेणी ॥ ५४ ॥
उन बातोंको याद कर-करके वहाँ बड़े तकियेवाले पलंगपर बैठी हुई वह देवी रोषपूर्वक सिर हिला रही थी और सारे आभूषणोंको उतारकर उसने अपने केशोंको एक वेणीके रूपमें बाँध लिया था ॥ ५४ ॥
अकारणार्थेन विकृष्यमाणा
प्रेष्याजनस्याभिजनान्वितापि ।
विचूर्णयामास कुशेशयं सा
निःश्वस्य निःश्वस्य नखैर्नताभ्रूः ॥ ५५ ॥
'आपको अकारण ही क्रोध हुआ है' ऐसा कहकर जब दासियोंने उन्हें कोप-भवनसे बाहर चलनेके लिये खींचा, उस समय उत्तम कुलमें उत्पन्न (अथवा परिजनोंसे युक्त) होनेपर भी झुकी भौंहोंवाली सत्यभामाने रोषवश बारंबार लंबी साँस खींचकर हस्तगत क्रीड़ाकमलको नखोंसे नोंच-नोंचकर चूर्ण-सा कर दिया ॥ ५५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
षट्षष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका सत्यभामाको मनाना और सत्यभामाका मानसिक खेद प्रकट करके उनसे तपस्याके लिये अनुमति माँगना
वैशम्पायन उवाच
उपविष्टं मुनिं ज्ञात्वा रुक्मिण्या सह केशवः।
निष्चक्रामप्रमेयात्मा व्यपदेशेन सर्ववित् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सब कुछ जाननेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण नारदजीको रुक्मिणीके साथ बैठा जान किसी दूसरे कार्यके बहाने वहाँसे निकल गये ॥ १ ॥
जगाम त्वरितश्चैव सत्यभामागृहं महत्।
रम्ये रैवतकोद्देशे निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २ ॥
वहाँसे निकलकर वे बड़ी उतावलीके साथ सत्यभामाके विशाल भवनमें गये, जिसे रैवतक पर्वतके रमणीय शिखरपर साक्षात् विश्वकर्माने बनाया था ॥ २ ॥
अभिमानवतीमिष्टां प्राणैरपि गरीयसीम्।
जानन् सत्राजितीं विष्णुर्विवेश शनकैरिव ॥ ३ ॥
सत्राजित्की पुत्री सत्यभामा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय एवं आदरणीय थीं, परंतु वे स्वभावसे मानिनी थीं; इस बातको जानकर श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उनके भवनमें घुसे ॥ ३ ॥
कुपितामिव तां देवीं स्नेहात् संकल्पयन्निव।
भीतभीतः स शनकैर्विवेश मधुसूदनः ॥ ४ ॥