भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

४७४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [हरिवंशे

मधुसूदन स्नेहवश देवी सत्यभामाके रूठी होनेका विचार करते हुए भयभीत-से होकर धीरे-धीरे उनके महलमें गये ॥ ४ ॥

सेवकं द्वारदेशे तु तिष्ठेत्युक्त्वा विवेश ह ।
नारदस्योपचारार्थं प्रद्युम्नं विनियुज्य सः ॥ ५ ॥
अपने साथ आये हुए सेवकको दरवाजेपर खड़े रहनेका आदेश दे और नारदजीके सत्कारके लिये प्रद्युम्नको नियुक्त करके वे उस महलके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ५ ॥

स ददर्श प्रियां दूरात् क्रोधागारगतां तदा ।
प्रेष्यामिव स्थितां कोपान्निःश्वसन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ ६ ॥
उन्होंने दूरसे ही अपनी प्रिया सत्यभामाको कोपभवनके भीतर गयी हुई देखा। वे क्रोधवश बारंबार लंबी साँस खींच रही थीं और दासीकी भाँति वहाँ पड़ी थीं ॥ ६ ॥

करजाग्रावलीढं तु पङ्कजं मुखपङ्कजे ।
संश्लेषयित्वा निःश्वस्य विहसन्तीं पुनः पुनः ॥ ७ ॥
अपने मुखारविन्दपर नखोंसे कुचला हुआ एक कमल सटाये वे बारंबार उच्छ्वास लेती और कभी-कभी हँस पड़ती थीं ॥ ७ ॥

किंचिदाकुलिताग्रेण चरणेन वसुन्धराम् ।
कृत्वा पृष्ठेऽथ वदनं विहरन्तीं पुनः पुनः ॥ ८ ॥
उनके चरणका अग्रभाग कुछ आकुल एवं चञ्चल-सा हो रहा था। उस चरणके द्वारा वे पृथ्वीपर रेखा-सी खींचती और पीछेकी ओर मुँह मोड़कर बार-बार घूमती थीं ॥ ८ ॥

करपद्मे पुनः सव्ये मुखपद्मं निवेश्य च ।
वनिborder: अनितां चारुसर्वाङ्गीं ध्यायन्तीं कमलेक्षणाम् ॥ ९ ॥
फिर बायें करकमलपर अपने मुखारविन्दको रखकर वे किसी चिन्तामें डूब जाती थीं। उनके सारे अङ्ग अत्यन्त मनोहर थे। नेत्र कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। वे एक सुन्दरी वनिता थीं ॥ ९ ॥

सरसं चन्दनं गृह्य प्रेष्याहस्तादनिन्दिताम् ।
प्रह्लादयित्वा हृदयं क्षिपन्तीं निर्दयं पुनः ॥ १० ॥
दासीके हाथसे सरस चन्दन लेकर वे सती साध्वी सत्यभामा पहले तो उस चन्दनकी प्रशंसा करके उस दासीके हृदयको आह्लादित कर देतीं; परंतु पुनः निर्दयतापूर्वक उसको झिड़कने और फटकारने लगती थीं ॥ १० ॥

पुनरुत्थाय शयनात् पतन्तीं च पुनः पुनः ।
तास्ताश्चेष्टाः प्रियायाश्च तथान्या ददृशे हरिः ॥ ११ ॥
शय्यासे बार-बार उठकर फिर वहीं गिर पड़ती थीं। श्रीहरिने अपनी प्रियतमाकी वे तथा और भी बहुत-सी चेष्टाएँ देखीं ॥ ११ ॥

अवगुण्ठ्य यदा वक्त्रमुपधाने न्यवेशयत् ।
इदमन्तरमित्येवं तदा गत्वा जनार्दनः ॥ १२ ॥
जब उन्होंने अपने मुँहको वस्त्रसे ढककर तकियेपर रखा, तब यही उपयुक्त अवसर है—ऐसा सोचकर श्रीकृष्ण उनके पास चले गये ॥ १२ ॥

प्रेष्याजनं स संज्ञाय अनाख्येयोऽस्मि संक्षया ।
स शङ्कितप्रचारश्च चारितोऽन्वगमत् स ताम् ॥ १३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने संकेतसे दासियोंको समझा दिया कि मेरे आनेकी बात इन्हें बताना मत। दासियोंका शंकित होकर इधर-उधर जाना भी रोक दिया। उस दशामें उन्होंने सत्यभामाका अनुसरण किया (अर्थात् वे उनके पीछे जाकर खड़े हो गये) ॥ १३ ॥

गृह्य व्यजनं चैव स्थित्वा स परिपार्श्वतः ।
शनैरिवासृजद् वातं जहास शनकैरिव ॥ १४ ॥
बगलमें खड़े हो हाथमें व्यजन लेकर धीरे-धीरे हवा करने और मुसकराने लगे ॥ १४ ॥

स पारिजातपुष्पस्य संसर्गादनुवासितः ।
वभार भगवान् गन्धं दिव्यं मानुषदुर्लभम् ॥ १५ ॥
उस समय पारिजात-पुष्पके संसर्गसे सुवासित हुए भगवान् श्रीकृष्ण एक ऐसी दिव्य सुगन्ध धारण करते थे, जो मनुष्यमें दुर्लभ है ॥ १५ ॥

अत्यद्भुतं सुगन्धं च जिघ्रित्वा विस्मयान्विता ।
अपावृणोन्मुखं सत्या किमेतदिति चाब्रवीत् ॥ १६ ॥
उस अत्यन्त अद्भुत सुगन्धको सूँघकर सत्यभामाको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने मुँहपरसे कपड़ा हटाया और पूछा, 'यह क्या है ?' ॥ १६ ॥

सोत्थिता पृष्ठतो देवमपश्यन्ती शुचिस्मिता ।
पर्यपृच्छदथो प्रेष्या गन्धस्य प्रभवे तदा ॥ १७ ॥
पवित्र मुसकानवाली सत्यभामा उठकर बैठ गयीं और अपने पीछे खड़े हुए भगवान् श्रीकृष्णको न देखकर दासियोंसे पूछने लगीं, 'यह सुगन्ध कहाँसे प्रकट हुई है ?' ॥ १७ ॥

ताः पृष्टास्त्वप्रभाषन्त्यो जानुभ्यां धरणीं गताः ।
अधोमुख्यस्ततस्तस्थुः कृताञ्जलिपुटास्तदा ॥ १८ ॥
स्वामिनीके इस प्रकार पूछनेपर वे कुछ न बोलीं। धरतीपर घुटने टेककर सिर नीचे किये हाथ जोड़कर बैठी रहीं ॥ १८ ॥

तदपूर्वमदृष्टैव गन्धं मुञ्चति मेदिनी ।
कथमेकतरस्तस्या गन्धोऽयमिति तत् खलु ॥ १९ ॥
गन्धके आश्रयभूत भगवान्को न देखकर वे अनुमान करने लगीं कि पृथ्वी ही उस गन्धको प्रकट कर रही है;