विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 498, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५
परंतु उसकी ऐसी उत्कृष्ट गन्ध कैसे हो गयी; यह बात समझमें नहीं आती ॥ १९ ॥
किं न्विदं स्यादिति च सा विपेक्षन्ती समन्ततः । ददर्श केशवं देवी सहसा लोकभावनम् ॥ २० ॥ तो फिर यह क्या है ? ऐसा कहकर जब देवी सत्यभामाने चारो ओर दृष्टिपात किया, तब उन्हें सहसा विश्वभावन भगवान् श्रीकृष्ण दिखायी दिये ॥ २० ॥
युज्यतीति ततोवाच सहसास्त्राविलेक्षणा । अवतिक्तेव रोषेण बभूव प्रणयान्विता ॥ २१ ॥ तब सहसा उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे गद्गद कण्ठसे उतना ही कह सकीं कि आपके शरीरसे ऐसी सुगन्धका प्रकट होना उचित ही है। भगवान्के प्रति प्रेमभावसे युक्त होनेपर भी वे उस समय रोषसे कुछ तिक्त-सी हो उठी थीं ॥ २१ ॥
सा प्रस्फुरितचार्वोष्ठी निःश्वस्याधोमुखी तदा । मुहूर्तमसितापाङ्गी तस्थावन्यमुखी शुभा ॥ २२ ॥ उनके मनोहर ओंठ फड़कने लगे। उन्होंने लंबी साँस खींचकर मुँह नीचे कर लिया; फिर कजरारे नेत्रोंवाली वे शुभलक्षणा देवी दो घड़ीतक दूसरी ओर मुँह करके बैठी रहीं ॥ २२ ॥
निवध्य भ्रुकुटिं वामां सम्यग् विक्षिप्य लोचने । निवेश्य वदनं हस्ते शोभसीत्यब्रवीद्धरिम् ॥ २३ ॥ फिर अपने मुखको हाथपर रखकर बायीं भौंह चढ़ाये भलीभाँति दृष्टिपात करके वे श्रीहरिसे बोलीं, 'बड़ी शोभा पा रहे हैं आप !' ॥ २३ ॥
तस्याः सस्राव नेत्राभ्यां वारि प्रणयकोपजम् । कुशेशयपलाशाभ्यामवश्यायजलं यथा ॥ २४ ॥ इतना कहकर उनके नेत्रोंसे प्रणयकोपजनित जलकी धारा बहने लगी, मानो कमलके दलोंसे तुषारका जल गिर रहा हो ॥ २४ ॥
समुत्पत्य जलं तत्र पतितं वदनाम्बुजात् । प्रतिजग्राह पद्माक्षः कराभ्यामतिसत्वरः ॥ २५ ॥ तब कमलनयन श्रीकृष्ण अत्यन्त उतावले हो उछलकर पलंगपर आ गये और प्रियतमाके मुखारविन्दसे गिरते हुए अश्रुजलको उन्होंने दोनों हाथोंमें ले लिया ॥ २५ ॥
अथोरसि पतत्तोयं श्रीवत्साङ्कोऽम्बुजेक्षणः । प्रियानयनजं देवः परिमृज्येदमब्रवीत् ॥ २६ ॥ श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित कमलनयन भगवान् गोविन्दने प्रियाके नेत्रोंसे गिरते हुए उस जलको लेकर अपनी छातीमे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ २६ ॥
स्रवत्यसितपत्राक्षि किमर्थं तव भामिनि । तोयं सुन्दरि नेत्राभ्यां पुष्कराभ्यामिवोदकम् ॥ २७ ॥ 'नील कमलदलके समान नेत्रोंवाली भामिनि ! सुन्दरि ! जैसे कमलोंसे जल टपक रहा हो, उसी तरह तुम्हारे युगल नेत्रोंसे यह अश्रुजल कैसे गिर रहा है ? ॥ २७ ॥
प्रभाते पूर्णचन्द्रस्य मध्याह्ने पङ्कजस्य च । बिभर्ति तव किं वक्त्रं वपुस्तव मनोहरे ॥ २८ ॥ 'मनोहारिणी प्रिये ! तुम्हारा मुख प्रभातकालके शोभाहीन पूर्ण चन्द्रमा तथा मध्याह्नकालके मुरझाये हुए कमलका स्वरूप क्यों धारण करता है ? ॥ २८ ॥
किमर्थं कौसुमं वासो महाराजंतमेव च । नानुगृह्णासि सुश्रोणि शुक्लं वासोऽनुगृह्यते ॥ २९ ॥ 'सुश्रोणि ! कुंकुम और कुसुम्भ रंगकी साड़ी क्यों नहीं धारण करती हो ? श्वेत वस्त्रपर ही आज इतना अनुग्रह क्यों है ? ॥ २९ ॥
वास्येते तवाभीष्टे महाराजतकौसुमे । देवाभिगमनादूर्ध्वं शुक्लं नेष्टं हि तत्स्त्रियाः ॥ ३० ॥ 'ये कुसुम्भ और कुंकुमके रंगमें रँगे हुए युगल वस्त्र हैं, जो तुम्हें बहुत प्रिय हैं। देवपूजा करके देवताओंका विसर्जन कर देनेके बाद स्त्रीके लिये श्वेत वस्त्र धारण करना अभीष्ट नहीं है ॥ ३० ॥
किञ्चानाभरणं गात्रं सुगात्रि तव कथ्यताम् । चित्रकस्थानमाक्रान्तं कस्मादवरवर्णिनि ॥ ३१ ॥ 'सुन्दर अङ्गोंवाली देवि ! बताओ, आज तुम्हारा शरीर आभूषणोंसे भूषित क्यों नहीं है ? धूसर कान्तिवाली सत्ये ! जो चित्रक—पत्रभङ्ग-रचनाका स्थान है, वह तुम्हारा मुख-मण्डल आज आँसुओंसे क्लिन्न क्यों हो रहा है ? ॥ ३१ ॥
श्वेतेन तव पट्टेन वाससा प्रियदर्शने । ललाटं सेव्यते कस्माच्चन्दनेन सुगन्धिना ॥ ३२ ॥ सरसेनायतापाङ्गि कान्तेन हृदयप्रिये । 'प्रियदर्शने ! विशाल नयनप्रान्तवाली हृदयवल्लभे ! आज तुम्हारा ललाट श्वेत पट्टवस्त्र और सरस सुगन्धित एवं कमनीय चन्दनद्वारा कैसे सेवित हो रहा है ? ॥ ३२ ॥
प्रभोपमर्दं केनापि कारणेनाननस्य च । करोषि मम चात्यर्थं मनो ग्लापयसि प्रिये ॥ ३३ ॥ 'प्रिये ! किस कारणसे तुम अपने मुखकी प्रभाका उपमर्दन (शोभाका निवारण) कर रही हो अथवा यह सब करके क्यों मेरे मनको अत्यन्त ग्लानि पहुँचा रही हो ? ॥ ३३ ॥
प्रसृतश्चन्दनरसः कपोलप्रणयी तव । पत्रलेखासपत्नत्वं प्राप्तो नातिविराजते ॥ ३४ ॥