भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 499
४७६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'यह फैला हुआ चन्दन-रस तुम्हारे कपोलोंका प्रेमी बनकर पत्र-रचनाका शत्रु बन बैठा है (अर्थात् जहाँ पत्र-रचना होनी चाहिये, वहाँ यह चन्दनका बेढंगा रस फैल रहा है ), अतः अधिक शोभा नहीं पा रहा है ॥ ३४ ॥

रत्नैश्चाभरणैर्मुक्ता तव ग्रीवा न शोभते ।
ग्रहनक्षत्ररहिता द्यौरिवाव्यक्तशारदी ॥ ३५ ॥

'रत्नमय आभूषणोंसे सूनी हुई तुम्हारी यह ग्रीवा, जहाँ शरद् ऋतुकी शोभा प्रकट नहीं हुई है, उस ग्रह-नक्षत्रोंके दर्शनसे रहित वर्षाकालके आकाशकी भाँति शोभा नहीं पा रही है ॥ ३५ ॥

पूर्णचन्द्रसपत्नेन स्मेरेणाद्यल्पभाषिणा ।
किमु नो भाषसे माद्य मुखेनोत्पलगन्धिना ॥ ३६ ॥

'तुम्हारा मुस्कराता हुआ मुख पूर्ण चन्द्रमाका प्रतिद्वन्द्वी बना रहता है । यह बहुत कम बोलता और कमलकी-सी सुगन्ध बिखेरता रहता है । ऐसे मनोहर मुखके द्वारा आज तुम मुझसे बात क्यों नहीं करती हो ? ॥ ३६ ॥

अर्द्धाक्षणापि हि तावन्मां किमर्थं न निरीक्षसे ।
मुञ्चस्येव सनिश्वार्सं तोयमञ्जनदुर्दिनम् ॥ ३७ ॥

'पूरी नहीं तो आधी आँखसे भी मेरी ओर क्यों नहीं देखती हो ? लंबी साँस खींचकर अञ्जनसे मलिन हुआ अश्रुजल बहाती ही जा रही हो ॥ ३७ ॥

अलमिन्दीवरश्यामे रुदितेन मनस्विनि ।
जलमञ्जनकल्माषं मा मोक्षीराननद्विषम् ॥ ३८ ॥

'नील कमलके समान श्याम कान्तिवाली मनस्विनि ! यह रोना-धोना व्यर्थ है । इसे बंद करो । यह अञ्जनमिश्रित अश्रुजल तुम्हारे मुखकी शोभाका वैरी है । इसे अब न बहाओ ॥ ३८ ॥

त्वदीयोऽहं यदा देवि ख्यातो जगति किङ्करः ।
नाज्ञापयसि किं मां त्वं पुरेव वरवर्णिनि ॥ ३९ ॥

'देवि ! जब सारे संसारमें यह प्रसिद्ध है कि मैं तुम्हारा किङ्कर हूँ, तब वरवर्णिनि ! तुम मुझे पहलेकी ही भाँति अभीष्ट सेवाके लिये आज्ञा क्यों नहीं देती हो ? ॥ ३९ ॥

किमकार्यमहं देवि विप्रियं तव भामिनि ।
येनातिमात्रमात्मानमायासासि सुन्दरि ॥ ४० ॥

'देवि ! भामिनि ! सुन्दरि ! मैंने तुम्हारा कौन सा ऐसा अप्रिय कार्य ( अपराध ) किया है, जिससे तुम अपने-आपको अत्यन्त कष्ट दे रही हो ॥ ४० ॥

मनसा कर्मणा वाचा न त्वामतिचराम्यहम् ।
सर्वथा सर्वचार्वङ्गि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ४१ ॥

'सर्वाङ्गसुन्दरी ! मैं तुमसे यह सर्वथा सत्य कहता हूँ कि मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी कभी तुम्हारी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करता हूँ ॥ ४१ ॥

बहुमानोपमान्यास्तु स्त्रीषु सर्वासु शोभने ।
स्नेहश्च बहुमानश्च त्वामृतेऽन्यासु नास्ति मे ॥ ४२ ॥

'शोभने ! यों तो मेरी सभी स्त्रियाँ मेरे द्वारा बहुत सम्मान और आदर पानेकी अधिकारिणी हैं, तथापि मेरा विशेष आदर और स्नेह तुम्हारे सिवा अन्य सब स्त्रियोंमें नहीं है ॥ ४२ ॥

नैव त्वां मदनो जह्यान्मृतेऽपि मयि भामकः ।
इति मे निश्चितं विद्धि चेतः सुरसुतोपमे ॥ ४३ ॥

'देवकन्याओंके समान सुन्दरी सत्यभामे ! मेरा जो तुम्हारे प्रति कामभाव अथवा प्रगाढ़ प्रेम है, वह मेरे मर जानेपर भी तुम्हें नहीं छोड़ सकता—यह मेरी निश्चित धारणा है । इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ ४३ ॥

क्षमाद्यश्च मेदिन्यां शब्दाद्याश्चाम्बरे गुणाः ।
ध्रुवं पङ्कजगर्भाभे त्वयि स्नेहस्तथा मम ॥ ४४ ॥

'कमलके भीतरी भागकी सी आभावाली प्राणवल्लभे ! जैसे पृथ्वीमें क्षमा आदि और आकाशमें शब्द आदि गुण नित्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह भी अटल है ॥४४॥

रुचिरग्नौ यथा दिव्या प्रभा चैव दिवाकरे ।
कान्तिश्च शाश्वती चन्द्रे स्नेहस्त्वयि तथा मम॥ ४५॥

'जैसे अग्निमें दीप्ति, दिवाकर सूर्यमें दिव्य प्रभा और चन्द्रमामें कान्ति सदा बनी रहती है, उसी प्रकार तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह सदा अविचल है' ॥ ४५ ॥

एवंवादिनमात्मेष्टं सत्यभामा जनार्दनम् ।
शनैरूवाच नेत्राभ्यां प्रमृज्य सुभगा जलम् ॥ ४६ ॥

जब श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनेको प्रिय लगनेवाली बात कह रहे थे, उस समय सौभाग्यशालिनी सत्यभामाने अपने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा—॥ ४६ ॥

मदीयस्त्वमिति ह्यासीन्मम नित्यं मनः प्रभो ।
अद्य साधारणं स्नेहं त्वयि तावद् गतास्म्यहम्॥ ४७॥

'प्रभो ! मेरे मनमें सदा यही विश्वास बना हुआ था कि तुम मेरे हो; परंतु आज यह बात मेरी समझमें आ गयी कि तुम्हारे भीतर मेरे लिये भी साधारण ही स्नेह है ( विशेष नहीं ) ॥ ४७ ॥

नाज्ञासिषमहं पूर्वमनित्यं कालपर्ययम् ।
अद्य लोकगतिं कृत्स्नामवगच्छामि न ध्रुवाम् ॥ ४८ ॥

'मैं पहले यह नहीं जानती थी कि यहाँका सब कुछ अनित्य है और समय सभी बातोंमें उलट-फेर कर देता है;