विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] सप्तषष्टितमोऽध्यायः ४७७
परंतु अब सम्पूर्ण लोकगतिको ही मैं अस्थिर (क्षणभङ्गुर) समझने लगी हूँ ॥ ४८ ॥
अमृताया द्वितीयोऽपि जन्मौहि मम सर्वथा ।
किमत्र बहुनोक्तेन हृदयं वेद्मि तेऽच्युत ॥ ४९ ॥
'अच्युत ! मैं जबतक जीवित हूँ, तबतक तुम्हीं मेरे लिये द्वितीय (आत्मा, जीवन-सङ्गी, सहायक एवं प्रियतम पति) हो । इसी प्रकार तुम्हारे लिये मैं ही द्वितीया (आत्मा, जीवनसङ्गिनी, सहायिका एवं प्राणवल्लभा पत्नी) हूँ। ऐसा मानकर मैंने अपने जन्म और जीवनको सर्वथा सफल समझा था, परंतु अब यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? तुम्हारा हृदय कैसा है, यह मैं अच्छी तरह जान गयी ॥ ४९ ॥
वाङ्मात्रमेव पश्यामि माधुर्यं सम्प्रयुज्यते ।
मयि स्नेहश्च कृतकस्त्वान्यत्र न कृत्रिमः ॥ ५० ॥
'देखती हूँ कि तुम मेरे पास (केवल मीठी-मीठी बातें ही बनाया करते हो) वाणीमात्रके ही माधुर्यका प्रयोग करते हो । मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह कृत्रिम (बनावटी) है; परंतु दूसरी जगह कृत्रिम नहीं स्वाभाविक है ॥ ५० ॥
ऋजुस्वभावां भक्तां च सर्वथा पुरुषोत्तम ।
अवजानासि जानन् मां कैतवीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५१ ॥
'पुरुषोत्तम ! मेरा स्वभाव सरल है और सर्वथा तुम्हारे प्रति भक्तिभाव रखती हूँ—इस बातको जानते हुए तुम छल-कपटका आश्रय लेकर मेरी अवहेलना करते हो ॥ ५१ ॥
एतावत् खलु पर्याप्तं दृष्टं द्रष्टव्यमव्ययम् ।
श्रुतं चाप्यथ यच्छ्राव्यं दृष्टः स्नेहफलोदयः ॥ ५२ ॥
'अस्तु, इतना ही बहुत है । जो कुछ अपरिवर्तनीय दृश्य देखना था, वह मैंने देख लिया । जो सुनने योग्य बात थी, वह मैंने सुन ली । तुम्हारे स्नेहके फलका उदय कहाँ किस प्रकार होता है, यह भी प्रत्यक्ष हो गया ॥ ५२ ॥
यदि त्वहमनुग्राह्या मामनुज्ञातुमर्हसि ।
तपस्येऽहं परं कृत्वा निश्चयं पुरुषोत्तम ॥ ५३ ॥
'पुरुषोत्तम ! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र होऊँ तो मुझे आज्ञा दे दो । मैं उत्तम निश्चय लेकर तपस्या करूँगी ॥ ५३ ॥
भर्तुश्छन्देन नारीणां तपो वा व्रतकानि वा ।
निष्फलं खलु यद् भर्तुरच्छन्देन क्रियेत हि ॥ ५४ ॥
'क्योंकि पतिकी इच्छासे ही किये गये नारियोंके तप अथवा व्रत सफल होते हैं । स्वामीकी इच्छाके बिना जो कुछ भी किया जाय, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है' ॥ ५४ ॥
इतीदमुक्त्वा पुनरेव शोभना
मुमोच तोयं नयनोद्भवं सती ।
प्रहाय पीतं हरिवाससः शुभा
पटान्तमाधाय मुखे शुचिस्मिता ॥ ५५॥
ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी शुभलक्षणा सती सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णके पीत-वस्त्रका अञ्चल ले उसीसे अपने मुँहको ढककर पुनः नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ ५५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णके पूछनेपर सत्यभामाका उन्हें अपने रोष एवं खेदका कारण बताना, श्रीकृष्णका उनके लिये पारिजात वृक्ष लानेका विश्वास दिलाकर उन्हें संतुष्ट करना, सत्यभामा और श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका सत्कार तथा नारदजीके द्वारा पारिजातकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
नारायणः सत्यभामां पुनरेवैष भारत ।
प्रोवाच प्रणयात् क्रुद्धामभिमानवर्ती सतीम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत ! नारायणस्वरूप श्रीकृष्णने प्रेमवश कुपित हुई अपनी अभिमानिनी पत्नी सती सत्यभामासे पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच
दहतीव ममाङ्गानि शोकः कमललोचने ।
किमु तत् कारणं येन त्वमेवमतिविक्लवा ॥ २ ॥
श्रीभगवान् बोले—कमललोचने ! तुम्हारा दुःख देखकर मुझे जो शोक हुआ है, वह मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध-सा कर रहा है । वह कौन-सा ऐसा कारण है, जिससे तुम इस तरह अत्यन्त व्याकुल हो उठी हो ॥ २ ॥
शापितासि मम प्राणैराचक्ष्वान्तर्गतं यदि ।
श्रोतव्यं यदि भक्तेन भर्त्रा सर्वाङ्गशोभने ॥ ३ ॥
सर्वाङ्गशोभने ! मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर