विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
[विष्णुपर्व ] सप्तषष्टितमोऽध्यायः ४७७
परंतु अब सम्पूर्ण लोकगतिको ही मैं अस्थिर (क्षणभङ्गुर) समझने लगी हूँ ॥ ४८ ॥
अमृताया द्वितीयोऽपि जन्मौहि मम सर्वथा ।
किमत्र बहुनोक्तेन हृदयं वेद्मि तेऽच्युत ॥ ४९ ॥
'अच्युत ! मैं जबतक जीवित हूँ, तबतक तुम्हीं मेरे लिये द्वितीय (आत्मा, जीवन-सङ्गी, सहायक एवं प्रियतम पति) हो । इसी प्रकार तुम्हारे लिये मैं ही द्वितीया (आत्मा, जीवनसङ्गिनी, सहायिका एवं प्राणवल्लभा पत्नी) हूँ। ऐसा मानकर मैंने अपने जन्म और जीवनको सर्वथा सफल समझा था, परंतु अब यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? तुम्हारा हृदय कैसा है, यह मैं अच्छी तरह जान गयी ॥ ४९ ॥
वाङ्मात्रमेव पश्यामि माधुर्यं सम्प्रयुज्यते ।
मयि स्नेहश्च कृतकस्त्वान्यत्र न कृत्रिमः ॥ ५० ॥
'देखती हूँ कि तुम मेरे पास (केवल मीठी-मीठी बातें ही बनाया करते हो) वाणीमात्रके ही माधुर्यका प्रयोग करते हो । मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह कृत्रिम (बनावटी) है; परंतु दूसरी जगह कृत्रिम नहीं स्वाभाविक है ॥ ५० ॥
ऋजुस्वभावां भक्तां च सर्वथा पुरुषोत्तम ।
अवजानासि जानन् मां कैतवीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५१ ॥
'पुरुषोत्तम ! मेरा स्वभाव सरल है और सर्वथा तुम्हारे प्रति भक्तिभाव रखती हूँ—इस बातको जानते हुए तुम छल-कपटका आश्रय लेकर मेरी अवहेलना करते हो ॥ ५१ ॥
एतावत् खलु पर्याप्तं दृष्टं द्रष्टव्यमव्ययम् ।
श्रुतं चाप्यथ यच्छ्राव्यं दृष्टः स्नेहफलोदयः ॥ ५२ ॥
'अस्तु, इतना ही बहुत है । जो कुछ अपरिवर्तनीय दृश्य देखना था, वह मैंने देख लिया । जो सुनने योग्य बात थी, वह मैंने सुन ली । तुम्हारे स्नेहके फलका उदय कहाँ किस प्रकार होता है, यह भी प्रत्यक्ष हो गया ॥ ५२ ॥
यदि त्वहमनुग्राह्या मामनुज्ञातुमर्हसि ।
तपस्येऽहं परं कृत्वा निश्चयं पुरुषोत्तम ॥ ५३ ॥
'पुरुषोत्तम ! यदि मैं तुम्हारे अनुग्रहका पात्र होऊँ तो मुझे आज्ञा दे दो । मैं उत्तम निश्चय लेकर तपस्या करूँगी ॥ ५३ ॥
भर्तुश्छन्देन नारीणां तपो वा व्रतकानि वा ।
निष्फलं खलु यद् भर्तुरच्छन्देन क्रियेत हि ॥ ५४ ॥
'क्योंकि पतिकी इच्छासे ही किये गये नारियोंके तप अथवा व्रत सफल होते हैं । स्वामीकी इच्छाके बिना जो कुछ भी किया जाय, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है' ॥ ५४ ॥
इतीदमुक्त्वा पुनरेव शोभना
मुमोच तोयं नयनोद्भवं सती ।
प्रहाय पीतं हरिवाससः शुभा
पटान्तमाधाय मुखे शुचिस्मिता ॥ ५५॥
ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी शुभलक्षणा सती सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णके पीत-वस्त्रका अञ्चल ले उसीसे अपने मुँहको ढककर पुनः नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ ५५ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णके पूछनेपर सत्यभामाका उन्हें अपने रोष एवं खेदका कारण बताना, श्रीकृष्णका उनके लिये पारिजात वृक्ष लानेका विश्वास दिलाकर उन्हें संतुष्ट करना, सत्यभामा और श्रीकृष्णद्वारा नारदजीका सत्कार तथा नारदजीके द्वारा पारिजातकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
नारायणः सत्यभामां पुनरेवैष भारत ।
प्रोवाच प्रणयात् क्रुद्धामभिमानवर्ती सतीम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत ! नारायणस्वरूप श्रीकृष्णने प्रेमवश कुपित हुई अपनी अभिमानिनी पत्नी सती सत्यभामासे पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच
दहतीव ममाङ्गानि शोकः कमललोचने ।
किमु तत् कारणं येन त्वमेवमतिविक्लवा ॥ २ ॥
श्रीभगवान् बोले—कमललोचने ! तुम्हारा दुःख देखकर मुझे जो शोक हुआ है, वह मेरे सारे अङ्गोंको दग्ध-सा कर रहा है । वह कौन-सा ऐसा कारण है, जिससे तुम इस तरह अत्यन्त व्याकुल हो उठी हो ॥ २ ॥
शापितासि मम प्राणैराचक्ष्वान्तर्गतं यदि ।
श्रोतव्यं यदि भक्तेन भर्त्रा सर्वाङ्गशोभने ॥ ३ ॥
सर्वाङ्गशोभने ! मैं अपने प्राणोंकी शपथ दिलाकर
| ४८० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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मन्युरेव प्रमृष्टो हि भवेद् बहुगुणं मम।
सीमन्तिनीनां सर्वासामधिका स्यामधोक्षज ॥ ३४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर हरिवल्लभा सत्यभामा बोलीं—'अच्युत ! यदि इस प्रकार उस वृक्षको यहाँ लाया जा सके तो मैंने यह रोष त्याग दिया और मेरा सुख कई गुना बढ़ सकता है। अधोक्षज ! उस दशामें मैं समस्त भाग्यवती स्त्रियोंमें सबसे अधिक गौरवशालिनी हो जाऊँगी' ॥ ३३-३४ ॥
तथास्तु प्रथमः कल्प इति तां मधुसूदनः।
प्रोवाचाप्रतिमो देवो जगतः प्रभवोऽव्ययः ॥ ३५ ॥
तब जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत अनुपम देवता भगवान् मधुसूदनने उनसे कहा 'अच्छा तो तुम्हारा रोष शान्त करनेके लिये यही सर्वोत्तम उपाय हो' ॥ ३५ ॥
तथेत्युक्तेति कृष्णेन तुतोष समितिंजय।
सत्यभामा सतामिष्टा कंसनाशनवल्लभा ॥ ३६ ॥
युद्धमें विजय पानेवाले जनमेजय ! जब श्रीकृष्णने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, तब सत्पुरुषोंकी इष्टदेवी और कंसनाशन श्रीकृष्णकी वल्लभा सत्यभामा बहुत संतुष्ट हुईं ॥ ३६ ॥
ततः स्नातो जगन्नाथः सर्वेशः सर्वभावनः।
चकारावश्यकं सर्वं सर्वकामप्रदः सताम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर सबकी उत्पत्ति करनेवाले सर्वेश्वर जगन्नाथ श्रीकृष्णने, जो सत्पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता हैं, स्नान और अन्य सब आवश्यक कार्य किया ॥ ३७ ॥
दध्यौ च नारदं देवः स्नातो देवमुनिर्नृप ।
अभ्याजगाम स्नानान्ते मुनिश्रेष्ठो महोदधौ ॥ ३८ ॥
नरेश्वर ! तत्पश्चात् भगवान्ने देवर्षि नारदका चिन्तन किया। नारदजी उस समय महासागरमें स्नान कर रहे थे। स्नानके पश्चात् वे मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णके पास आये ॥ ३८ ॥
तमागतं नरपते सतां गतिरधोक्षजः।
सत्यया सह धर्मात्मा यथाविधि अपूजयत् ॥ ३९ ॥
राजन् ! उन्हें आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता धर्मात्मा अधोक्षज श्रीकृष्णने सत्याके साथ उनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ३९ ॥
पादौ प्रक्षालयाञ्चक्रे मुनेः सत्राजिती स्वयम्।
जलं देवः स्वयं कृष्णो भृङ्गारेण ददौ तदा ॥ ४० ॥
उस समय सत्राजित्की पुत्रीने स्वयं ही नारदजीके दोनों पैर धोये और भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं ही झारीसे जल गिराया ॥ ४० ॥
अथोपकल्पयामास सुखासीनाय केशवः।
परमान्नं स मुनये प्रयतात्मा जगद्गुरुः ॥ ४१ ॥
जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब अपने मनको वशमें रखनेवाले जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णने मुनिके लिये उत्तम अन्न परोसा ॥ ४१ ॥
तल्लोककर्ता सत्कृत्य दत्तं मुनिरुदारधीः।
बुभुजे वदतां श्रेष्ठः श्रद्धया परया युतः ॥ ४२ ॥
लोकस्रष्टा भगवान् श्रीहरिके सत्कारपूर्वक दिये हुए उस अन्नको वक्ताओंमें श्रेष्ठ उदारबुद्धि नारद मुनिने बड़ी श्रद्धाके साथ भोजन किया ॥ ४२ ॥
उपस्पृश्य ततस्तुष्टः प्रददौ चाशिषः प्रभो ।
ताश्च प्रीतेन मनसा प्रतिजग्राह केशवः ॥ ४३ ॥
प्रभो ! तदनन्तर हाथ-मुँह धो आचमन करके तृप्त हुए मुनिने भगवान्को बहुत-से आशीर्वाद दिये और भगवान् केशवने प्रसन्न चित्तसे उन आशीर्वादोंको ग्रहण किया ॥ ४३ ॥
ततः सत्राजितीं देवीं प्रणतां नारदोऽब्रवीत् ।
प्रसार्य दक्षिणं हस्तं सजलं जलजेक्षणाम् ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् नारदजी अपने चरणोंमें प्रणाम करनेवाली कमलनयनी सत्राजित्-पुत्री सत्यभामा देवीसे भीगे हुए दाहिने हाथको फैलाकर बोले—॥ ४४ ॥
यथेदानीं तथैव त्वं भव देवि पतिव्रता।
सविशेषं च सुभगा भव मत्तपसो बलात् ॥ ४५ ॥
'देवि ! तुम इस समय जैसी हो, वैसी ही पतिव्रता सदा बनी रहो तथा मेरे तपके बलसे तुम विशेष सौभाग्यशालिनी होओ' ॥ ४५ ॥
इत्युक्ता मुनिमुख्येन सत्यभामा हरिप्रिया।
उत्तस्थौ महता युक्ता हर्षेण तु नराधिप ॥ ४६ ॥
नरेश्वर ! मुनिप्रवर नारदजीके ऐसा कहनेपर हरिप्रिया सत्यभामा महान् हर्षसे उत्फुल्ल होकर उठीं ॥ ४६ ॥
स कृष्णोऽप्यभ्यनुज्ञां तु लब्ध्वा मुनिवरात् तदा।
बुभुजे विघसं धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ ४७ ॥
उस समय मुनिवर नारदजीसे आज्ञा लेकर अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमान् श्रीकृष्णने भी यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन किया ॥
ततस्त्वावश्यकं कृत्वा सत्यभामापि भारत।
अनुज्ञया तदा भर्तुर्विवेशान्तर्गृहं मुदा ॥ ४८ ॥
भरतनन्दन ! तदनन्तर आवश्यक कृत्य करके सत्यभामा-ने भी पतिकी आज्ञासे अपने घरके भीतर प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया ॥ ४८ ॥
ततो विनिर्गता देवी कृष्णस्यैवाभ्यनुज्ञया।
स्थिता पार्श्वे च कृष्णस्य नमस्कृत्या महात्मने ॥ ४९ ॥
इसके बाद पुनः श्रीकृष्णकी ही आज्ञासे सत्यभामादेवी भीतर-
विष्णुपर्व ] सप्तषष्टितमोऽध्यायः ४८१
से निकलीं और महात्मा नारदजीको नमस्कार करके श्रीकृष्णके पार्श्वभागमें बैठ गयीं ॥ ४९ ॥
ततो मुहूर्तमासित्वा नारदः कृष्णमब्रवीत् । आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शक्रलोकमधोक्षज ॥ ५० ॥
'दो घड़ीतक बैठनेके पश्चात् नारदजीने श्रीकृष्णसे कहा— 'अधोक्षज ! अब मैं इन्द्रलोकको जाऊँगा; अतः जानेकी अनुमति चाहता हूँ ॥ ५० ॥
तत्राद्यं देवमीशानं नमस्कृत्य महेश्वरम् । गास्यन्ति देवगन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५१ ॥
'वहाँ देवगन्धर्व और अप्सराएँ आदिदेव ईशान भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उनकी प्रसन्नताके लिये नृत्य एवं गान करेंगी ॥ ५१ ॥
मासि मास्युचितं ह्येतन्महेन्द्रसदने प्रभो । पूजार्थं देवदेवस्य गान्धर्वं नृत्यमेव च ॥ ५२ ॥
'प्रभो ! देवाधिदेव महादेवजीकी पूजाके लिये महेन्द्र-भवनमें प्रतिमास इस नृत्य और गानका समुचित आयोजन होता है ॥ ५२ ॥
अन्तर्हितो देवदेवः सोमः सप्रवरो विभुः । पश्यत्यमरमुख्येन कृतं भक्त्याद्रिघातिना ॥ ५३ ॥
'पर्वतोंका विघात करनेवाले देवश्रेष्ठ इन्द्रद्वारा भक्तिभावसे किये गये उस आयोजनको अपने श्रेष्ठ पार्षदों तथा भगवती उमासहित देवाधिदेव भगवान् महादेव अदृश्य रहकर देखते हैं ॥ ५३ ॥
निमन्त्रितोऽहं पूर्वेद्युः पुष्पं दत्त्वा महाद्युते । पारिजातस्य भद्रं ते तरुराज्ञो महात्मनः ॥ ५४ ॥
'महाद्युते ! आपका भला हो । इन्द्रने विशालकाय वृक्षराज पारिजातका फूल देकर पहले ही दिन मुझे वहाँ आनेके लिये निमन्त्रित किया था ॥ ५४ ॥
यदेतदाहृतं स्वर्गात् त्वदर्थं तु मया विभो । देवोपभोग्यमेतद्धि तरुराजसमुद्भवम् ॥ ५५ ॥
'प्रभो ! तरुराज पारिजातका यह फूल, जिसे मैं स्वर्गसे आपके लिये ही लाया था, देवताओंके उपभोगकी वस्तु है ॥
हृष्टः स वृक्षः सततं शच्याः पुष्करलोचन । सौभाग्यमावहत्येव पूज्यमानोऽपि नित्यशः ॥ ५६ ॥
'कमलनयन ! वह वृक्ष इन्द्रपत्नी शचीको सदा ही प्रिय है। प्रतिदिन पूजित होनेपर वह अवश्य ही सौभाग्यकी प्राप्ति कराता है ॥ ५६ ॥
पुण्यं कर्तुं तदा सृष्टः पारिजातो महाद्रुमः । अदित्या धर्मनित्येन कश्यपेन महात्मना ॥ ५७ ॥
'धर्मपरायण महात्मा कश्यपने अदिति देवीके पुण्यकर्म-के लिये उस समय पारिजातनामक महावृक्षकी सृष्टि की थी ॥
पुरादित्या महातेजास्तोषितः किल कश्यपः । वरेण च्छन्दयामास मारीचस्तपसो निधिः ॥ ५८ ॥
'कहते हैं, पूर्वकालमें अदितिदेवीने महातेजस्वी कश्यप मुनिको अपनी सेवासे संतुष्ट किया । तब तपोनिधि मरीचिनन्दन कश्यपने उन्हे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥
सोवाच सुभगा येन भवेयं मुनिसत्तम । स्वलंकृता कामतश्च सर्वैरेव विभूषणैः ॥ ५९ ॥ ईप्सितं गीतनृत्यं च भवेन्मम तपोधन । कुमारी नित्यदा चैव भवेयं तपसो निधे ॥ ६० ॥ विरजा शोकरहिता भवेयमिति नित्यदा । पतिभक्तिमती चैव धर्मशीला तथैव च ॥ ६१ ॥
'उस समय उन्होंने उनसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ ! मुझे कोई ऐसी वस्तु दीजिये, जिससे मैं सदा सौभाग्यशालिनी बनी रहूँ। इच्छा होते ही समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो जाऊँ । तपोधन ! मुझे मनोवाञ्छित गीत और नृत्य प्राप्त होता रहे । तपनिधे ! मैं सदा कुमारी-सी ही बनी रहूँ और निर्मल, शोकरहित, पतिभक्तिमती एवं धर्मशीला होऊँ' ॥५९-६१॥
पारिजातं ततोऽस्राक्षीददित्याः प्रियकाम्यया । सर्वकामप्रदः पुष्पैरावृतं नित्यगन्धदैः ॥ ६२ ॥
'तब मुनिवर कश्यपने अदितिका प्रिय करनेकी इच्छासे पारिजातकी सृष्टि की; जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंको देनेमें समर्थ और नित्य सुगन्धप्रद फूलोंसे भरा रहता है ॥
त्रिशाखं सर्वदा दृश्यं सर्वभूतमनाहरम् । सर्वपुष्पाणि दृश्यन्ते तस्मिन्नेव महाद्रुमे ॥ ६३ ॥
'वह सदा तीन शाखाओसे ही युक्त दिखायी देता है और अपनी शोभासे सम्पूर्ण प्राणियोंका मन हर लेता है। उसी महान् वृक्षमे सभी तरहके फूल दिखायी देते हैं ॥६३॥
ईदृशान्यपि पुष्पाणि बिभर्त्येकापि रूपिणी । बहुरूपाणि चाप्यन्या पद्मानि च ततोऽपरा ॥ ६४ ॥
'देवताओंकी कोई रूपवती स्त्री तो ऐसे फूल भी धारण करती है (जैसे मै यहाँ लाया था), दूसरी उसके अनेक रूपवाले फूलोंको ग्रहण करती है तथा तीसरी उस वृक्षसे केवल कमल-जैसे फूलोंको ही चुनती है ॥ ६४ ॥
मन्दारादपि वृक्षाच्च सारमुद्धृत्य कश्यपः । तस्मादेष तरुश्रेष्ठः सर्वेषां श्रेष्ठतां गतः ॥ ६५ ॥
'कश्यपजीने मन्दार-वृक्षसे भी सार निकालकर इस वृक्षका निर्माण किया था; इसलिये यह तरुश्रेष्ठ पारिजात समस्त देववृक्षोमे उत्कृष्ट माना गया है ॥ ६५ ॥
ततस्तत्र निबध्याथ कश्यपं प्रददौ शुभा । अदितिर्मम पुण्यार्थं सौभाग्यार्थं तथैव च ॥ ६६ ॥
म० ह०
४८२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘तदनन्तर शुभलक्षणा देवी अदितिने पुण्य और सौभाग्यकी वृद्धिके लिये उस वृक्षके पास कश्यपजीको बाँधकर मुझे दान कर दिया था ॥ ६६ ॥
अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च तथा मम ।
पुष्पस्रग्भा वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान् ॥ ६७ ॥
‘अदितिने पुण्यके लिये कश्यपजीके गलेमें फूलोंकी माला लपेटकर उन मनस्वी मुनिको मेरे हाथमें दानके रूपमें दे दिया था। उस दानका एकमात्र उद्देश्य था पुण्यकी प्राप्ति एवं वृद्धि ॥ ६७ ॥
निष्क्रयेण मया मुक्तः कश्यपस्तु तपोधनः ।
इन्द्रो दत्तस्त्वथेन्द्राण्या सौभाग्यार्थे ततो मम ॥ ६८ ॥
‘उस समय मैंने निष्क्रय (मूल्य) लेकर तपोधन कश्यपको मुक्त कर दिया था। इसी प्रकार इन्द्राणीने भी सौभाग्यकी वृद्धिके लिये मुझे इन्द्रका दान कर दिया था ॥ ६८ ॥
सोमश्चाप्यथ रोहिण्या ऋद्ध्या च धनदस्तथा ।
एवं सौभाग्यदो वृक्षः पारिजातो न संशयः ॥ ६९ ॥
‘रोहिणीने सोमका तथा ऋद्धिने धनाध्यक्ष कुबेरका दान भी इसी उद्देश्यसे किया था। इस प्रकार वह पारिजात वृक्ष सौभाग्य प्रदान करनेवाला है, इसमें संशय नहीं है ॥
परि जातो विष्णुपद्याः पारिजातेतिशब्दितः ।
मन्दारपुष्पैर्युक्तो मन्दारस्तेन कथ्यते ॥ ७० ॥
‘यह वृक्ष विष्णुपदी गङ्गाके ऊपर प्रकट हुआ था, इसलिये इसका नाम पारिजात हुआ। मन्दारके फूलोंसे भी संयुक्त होनेके कारण यह मन्दार कहलाता है ॥ ७० ॥
कोऽप्ययं दारुरित्याहुरजानन्तो यतो जनाः ।
कोविदार इति ख्यातस्ततः स सुमहातरुः ॥ ७१ ॥
‘जो लोग इसे नहीं जानते थे, वे इसे देखकर कहने लगे—‘कोऽप्ययं दारुः’ (यह कोई दारु है); इसलिये वह महान् वृक्ष कोविदार नामसे विख्यात हो गया ॥ ७१ ॥
मन्दारः कोविदारश्च पारिजातश्च नामभिः ।
स वृक्षो ज्ञायते दिव्यो यस्यैतत् कुसुमोत्तमम् ॥ ७२ ॥
‘इस प्रकार वह दिव्य वृक्ष मन्दार, कोविदार और पारिजात--इन तीन नामोंसे जाना जाता है, जिसका यह उत्तम पुष्प मै लाया था’ ॥ ७२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका पारिजात वृक्ष माँगनेके लिये नारदजीके द्वारा इन्द्रके पास संदेश भेजना और न देनेपर उन्हें गदा मारनेकी धमकी देना
वैशम्पायन उवाच
ततो जिगमिषुं तत्र नारदं मुनिसत्तमम् ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर अनन्त पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रलोकको जानेकी इच्छावाले मुनिश्रेष्ठ नारदसे वहाँ इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
महर्षे धर्मतत्त्वज्ञ स्वर्गं गत्वा त्वयानघ ।
दृष्ट्वा सदस्यान् देवस्य त्रिपुरघ्नस्य धीमतः ॥ २ ॥
अनाज्ञया मद्वचनाद् विज्ञाप्यः पाकशासनः ।
सम्भावयित्वा भ्रातृत्वं पौराणं वेत्सि यन्मुने ॥ ३ ॥
‘धर्मके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप महर्षे ! आप स्वर्गमें जाकर (वहाँ उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए) बुद्धिमान् त्रिपुरविनाशक देव रुद्रके सदस्यों (पार्षद गणों) का दर्शन करके मेरे शब्दोंमें पाकशासन इन्द्रसे मेरी एक प्रार्थना सुनाइयेगा। मुने ! मुझमें और इन्द्रमें जो पुराना (वामनावतारके समयका) भ्रातृभाव है, उसे तो आप जानते ही हैं। उसीको सादर सामने रखते हुए उनसे इस तरह बात कीजियेगा, जिससे मेरी ओरसे आज्ञा देनेका भाव प्रकट न हो ॥ २-३ ॥
यमस्राक्षीन्मुनिश्रेष्ठो भगवान् कश्यपस्तरुम् ।
पारिजातं पुरादित्याः सुखार्थं धर्मसत्तमः ॥ ४ ॥
स पुण्यमतिसौभाग्यं ददाति तरुसत्तमः ।
(नारदजीसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने अपना संदेश इस प्रकार उपस्थित किया—) ‘देवराज ! पूर्वकालमें धर्मात्माओंमें उत्तम मुनिश्रेष्ठ भगवान् कश्यपने देवमाता अदितिको सुख पहुँचानेके लिये जिस पारिजात वृक्षकी सृष्टि की थी, वह सब वृक्षोंमें श्रेष्ठ है और दानमे दिये जानेपर अत्यन्त सौभाग्य तथा पुण्य प्रदान करता है ॥ ४ ½ ॥
तव दत्तं पुरा दानं व्रतेन तरुमुत्तमम् ॥ ५ ॥
देवीभिर्धर्मनित्याभिर्धर्मार्थममरोत्तम ।
दत्तं श्रुत्वाभिकाङ्क्षन्ति दातुं पत्न्यो मम प्रभो ॥ ६ ॥
पुण्यार्थं दानधर्मार्थं मम प्रीत्यर्थमेव च ।
‘अमरश्रेष्ठ ! सुननेमें आया है कि पहले सदा धर्ममें
विष्णुपर्व ] अष्टषष्टितमोऽध्यायः ४८३
तत्पर रहनेवाली अदिति आदि देवियोंने धर्मके लिये ही आपके उस उत्तम वृक्षको व्रतपालनपूर्वक (पतिसहित) दान कर दिया था (और उसे नारदजीने पुनः आपको लौटाया था)। प्रभो! इस बातको सुनकर मेरी पत्नियाँ भी पुण्य, दानधर्म तथा मेरी प्रसन्नताकी प्राप्तिके लिये उसका दान करना चाहती हैं॥ ५-६ १/२ ॥
आनाययद् द्वारवर्तीं पारिजात महाद्रुमम् ॥ ७ ॥
दत्ते दाने पुनः स्वर्गं तरुं त्वं नेतुमर्हसि ।
'इसीलिये आपके इस भाईने उस पारिजातनामक महान् वृक्षको द्वारकापुरीमें मँगवाया है। यहाँ दानका कार्य सम्पन्न हो जानेपर आप पुनः उस वृक्षको स्वर्गलोकमें ले जा सकते हैं॥
स वाच्य एवं भगवान् वलभिद् भगवंस्त्वया ॥ ८ ॥
तथा तथा प्रयत्नश्च कार्योऽस्मिन् मुनिसत्तम ।
यथा तरुवरं दद्यात् पारिजातं सुरेश्वरः ॥ ९ ॥
(अब वे नारदजीको सम्बोधित करके बोले—) 'भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! वलासुरका भेदन करनेवाले ऐश्वर्यशाली इन्द्रको आप मेरा संदेश इसी रूपमे सुनाइयेगा। इस विषयमें आपको वैसा-ही वैसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे देवेश्वर इन्द्र वह तरुश्रेष्ठ पारिजात मुझे दे दें॥ ८-९॥
तत्र दूतगुणं तावत् पश्यामस्ते तपोधन ।
सम्भाव्या सर्वकृत्यानां सम्पद्धि त्वयि मे मता ॥ १० ॥
'तपोधन! दूतमे जितने गुण होने चाहिये, वे सब मुझे आपके भीतर दिखायी देते हैं। मेरे मनमें आपको सौंपे गये सभी कार्योंकी सम्यक्रूपसे सिद्धिके लिये निश्चित सम्भावना बनी हुई है' ॥ १० ॥
एवं नारायणेनोक्तो नारदो भगवानृषिः।
प्रहस्योवाच केशिघ्नमिदं वाक्यं तपोधनः ॥ ११ ॥
नारायणस्वरूप श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर तपोधन भगवान् नारद मुनिने हँसकर केशिनाशन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ ११ ॥
बाढमेवं प्रवक्ष्यामि यदुमुख्य सुरेश्वरम् ।
न तु दास्यति देवेन्द्रः पारिजातं कथंचन ॥ १२ ॥
'यदुश्रेष्ठ! मैं स्वीकार करता हूँ। मैं देवराज इन्द्रसे ऐसी ही बात कहूँगा; परंतु मुझे मालूम है कि देवराज इन्द्र उस पारिजात वृक्षको किसी तरह भी नहीं देंगे ॥ १२ ॥
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं दानवैस्त्रिदशैस्तथा ।
निक्षिप्य तोयधौ पूर्वं पारिजातः समाहृतः ॥ १३ ॥
मन्दरात् पर्वतश्रेष्ठादानयितुं प्रेषितः पुरा ।
पारिजातं हरेणापि लोककर्त्रा जनार्दन ॥ १४ ॥
'जनार्दन ! पहलेकी बात है, दानवों और देवताओंने पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको क्षीरसागरमे डालकर उसका मन्थन करके पारिजात वृक्षको वहाँसे निकाला था। तत्पश्चात् पूर्वकालमें गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलसे लोककर्ता भगवान् शङ्करने उसी पारिजातको लेनेके लिये मुझे इन्द्रके पास भेजा था ॥ १३-१४ ॥
स्वयं विज्ञापितो गत्वा ततः शक्रेण शङ्करः ।
आक्रीडद्रुम उद्याने शच्याः स्यादिति याचितः ॥ १५॥
'उस समय इन्द्रने स्वयं ही जाकर भगवान् शङ्करसे प्रार्थना की और नम्रतापूर्वक यह निवेदन किया कि वह वृक्ष शचीके उद्यानमें क्रीड़ावृक्षके रूपमें रहे ॥ १५ ॥
तथास्त्विति वरो दत्तो महादेवेन चानघ ।
न च नीतः पारिजातो मन्दरं चित्रकन्दरम् ॥ १६ ॥
'अनघ! तब महादेवजीने 'तथास्तु' कहकर इन्द्रको उसे रखनेके लिये वरदान दे दिया। फिर वे विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित मन्दराचलपर उस पारिजात वृक्षको नहीं ले गये॥
क्रीडावृक्षः स शच्या्ति व्यपदेशेन मोक्षितः ।
महेन्द्रेण महाबाहो पारिजातस्ततः पुरा ॥ १७ ॥
'महाबाहो! इस तरह प्राचीनकालमें महेन्द्रने 'वह शचीका क्रीड़ा-वृक्ष है' ऐसा बहाना बनाकर पारिजातको शङ्करजीके अधिकारसे छुड़ा लिया ॥ १७ ॥
प्रियार्थमुमया साक्षात् पारिजातवनं हरः।
गव्यूतिशतविस्तीर्णं मन्दरस्यैव कन्दरम् ॥ १८ ॥
'तब उमादेवीका प्रिय करनेके लिये साक्षात् भगवान् शिवने मन्दराचलकी दो सौ कोस विस्तृत कन्दराको ही पारिजातके वनसे परिपूर्ण कर दिया ॥ १८ ॥
न तत्र सूर्यभाः कृष्ण प्रविशन्ति नगोत्तमे ।
न च चन्द्रप्रभा शीता नैव कृष्ण सदागतिः ॥ १९ ॥
'श्रीकृष्ण! उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ न तो सूर्यकी प्रभा पहुँच पाती है, न चन्द्रमाकी शीतल किरणोंका प्रवेश होता है और न वायुकी ही पहुँच हो पाती है ॥ १९ ॥
शीतोष्णे छन्दतस्तत्र शैलपुत्र्या भवन्ति हि ।
स्वयंप्रभं वनं तद्धि महादेवस्य तेजसा ॥ २० ॥
'वहाँ गिरिराजनन्दिनी उमाकी इच्छाके अनुसार सर्दी और गर्मी होती है। महादेवजीके तेजसे वह वन स्वयं ही प्रकाशित होता रहता है ॥ २० ॥
वर्जयित्वा महादेवी सगणौ यदुनन्दन ।
मां चान्यस्तद्वनं दिव्यं न प्रयाति कथंचन ॥ २१ ॥
'यदुनन्दन! महादेवी पार्वती, महादेव शिव, उन दोनोंके गण तथा मुझको छोड़कर दूसरा कोई उस दिव्य वनमें किसी तरह नहीं जाने पाता है ॥ २१ ॥
स्रवन्ति तत्र वार्ष्णेय पारिजाताः समन्ततः ।
सर्वरत्नानि मुख्यानि मनसा काङ्क्षितानि वै ॥ २२ ॥
४८४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'वृष्णिनन्दन ! वहाँके पारिजात सब ओरसे सम्पूर्ण मनोवाञ्छित श्रेष्ठ रत्न टपकाते रहते हैं ॥ २२ ॥
गणास्तान्युपभुञ्जन्ति प्रवराणां महात्मनाम् ।
आज्ञया देवदेवस्य लोकनाथस्य केशव ॥ २३ ॥
'केशव ! वहाँ देवाधिदेव विश्वनाथकी आज्ञासे महात्मा प्रमथोंके समूह उन रत्नोंका उपभोग करते हैं ॥ २३ ॥
पारिजाताद् बहुगुणं फलं तेषां तथा वनम् ।
अभिमानं प्रभांश्चैव गुणा भूरिगुणास्तथा ॥ २४ ॥
मूर्तिमन्तश्च ते वृक्षाः सोमं देवं वृषध्वजम् ।
उपनिष्ठन्ति सततं प्रवरैः सह केशव ॥ २५ ॥
'स्वर्गीय पारिजातकी अपेक्षा उन मन्दराचलवर्ती पारिजातोंका फल और वन कई गुना अच्छा है। उनमें अभिमान, प्रभा और गुण सभी स्वर्गीय पारिजातसे बढ़कर हैं। केशव ! वहाँके प्रचुर गुणशाली वृक्ष मूर्तिमान् होकर उमासहित भगवान् शङ्करकी प्रमथगणोंके साथ सदा उपासना करते हैं ॥
रौद्रेण तेजसा जुष्टा दुःखरैर्हीनाः सुखान्विताः ।
तरवो मन्दरे ते हि दयिताः शैलकन्यया ॥ २६ ॥
'मन्दराचलपर जो ये पारिजातके वृक्ष हैं, वे भगवान् रुद्रके तेजसे युक्त, दुःखरहित और सुखसे सम्पन्न हैं; अतः गिरिराजकुमारी उमाको वे विशेष प्रिय हैं ॥ २६ ॥
प्रविवेशान्धको नाम घोरस्तत्र महाबलः ।
दैतेयो वरदानेन दर्पितः पापनिश्चयः ॥ २७ ॥
'एक समयकी बात है, अन्धक नामसे प्रसिद्ध घोर महाबली और पापपूर्ण निश्चय रखनेवाला दैत्य, जो वरदानसे मदमत्त रहता था, उस पारिजात-वनमें घुस गया ॥ २७ ॥
स हतो देवदेवेन हरेणामित्रघातिना ।
अवध्यः सर्वभूतानां वृत्राद् दशगुणं बली ॥ २८ ॥
'वह वृत्रासुरसे दस गुना बलवान् और समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य था तो भी वहाँ शत्रुघाती देवाधिदेव महादेवने उसे मार डाला ॥ २८ ॥
एवं दुःखं न ते देव पारिजातं प्रदास्यति ।
पुष्कंराक्ष सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥
'देव ! कमलनयन ! इस प्रकार दुःखके साथ कहना पड़ता है कि सहस्र नेत्रधारी इन्द्र आपको पारिजात नहीं देंगे । यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ २९ ॥
सततं सहितो देव्या शच्या स हि वरद्रुमः ।
सर्वकामप्रदः कृष्ण तथेन्द्राय महौजसे ॥ ३० ॥
'श्रीकृष्ण ! यह श्रेष्ठ वृक्ष हित-साधनकी शक्तिसे युक्त है । वह शचीदेवी तथा महापराक्रमी इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थ देता रहता है' ॥ ३० ॥
श्रीभगवानुवाच
मुने तद् युज्यते साधु महादेवेन धीमता ।
यच्छचीकारणं कृत्वा न नीतः स तरुः पुरा ॥ ३१ ॥
श्रीभगवान् बोले—मुने ! पूर्वकालमें बुद्धिमान् महादेवजी शचीके कारण उस वृक्षको जो मन्दराचलपर नहीं ले गये, वह उनका कार्य ठीक जँचता है ॥ ३१ ॥
स ज्येष्ठः सर्वभूतानां लोककृत् प्रभवोऽव्ययः ।
पारावर्यस्य सदृशं कृतवानिति मे मतिः ॥ ३२ ॥
वे समस्त भूतोंके लिये ज्येष्ठ, लोकस्रष्टा, जगत्की उत्पत्तिके कारण और अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने बड़े-छोटेकी जो लोकमर्यादा है, उसके अनुरूप ही कार्य किया । ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ३२ ॥
अहं यवीयान् देवस्य सर्वथा बलघातिनः ।
लालनीयश्च भगवञ्जयन्त इव सत्तम् ॥ ३३ ॥
परंतु भगवन् ! मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो बलासुर-विनाशन देवेन्द्रका छोटा भाई हूँ; अतः जयन्तकी भाँति उनके द्वारा सर्वथा लाड़-प्यार पाने योग्य हूँ ॥ ३३ ॥
सर्वथा भगवांस्तावदुपायैर्बहुविस्तरैः ।
करोतु यत्नं प्रीत्यर्थं शक्तो ह्यसि तपोधन ॥ ३४ ॥
तपोधन ! आप बहुतेरे उपाय करके ऐसा यत्न करें, जिससे हमलोगोंमें प्रेम बना रहे; क्योंकि आप ऐसा करनेमें समर्थ हैं ॥ ३४ ॥
मया मुने प्रतिज्ञातं पुण्यार्थे सत्यभामया ।
स्वर्गादिहानयिष्यामि पारिजातमिति प्रभो ॥ ३५ ॥
मुने ! प्रभो ! मैंने सत्यभामाके पुण्यकव्रतका सम्पादन करनेके लिये यह प्रतिज्ञा की है कि मैं पारिजात वृक्षको स्वर्गसे यहाँ ले आऊँगा ॥ ३५ ॥
मया तदनृतं कर्तुं कथं शक्यं तपोधन ।
नानृतं हि वचो विप्र प्रोक्तं पूर्वं मयानघ ॥ ३६ ॥
निष्पाप तपोधन ! मैं अपने उस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता हूँ । विप्रवर ! मैंने पहले भी कोई मिथ्या बात नहीं कही है ॥ ३६ ॥
मयि भग्नप्रतिज्ञे वै लोकानां विप्लवो भवेत् ।
यन्मया हि मुनिश्रेष्ठ लोकधर्मा गुणान्विताः ।
परिधार्याः स्थितौ सर्वे स कथं ह्यनृतं वदेत् ॥ ३७॥
मुनिश्रेष्ठ ! मेरी प्रतिज्ञा भग्न हो जानेपर समस्त लोकोंमें विप्लव मच जायगा (सब लोग झूठ बोलने लगेंगे)। मुझे तो जगत्की स्थितिके लिये उत्तम गुणसे युक्त समस्त लोक-धर्मोंको धारण करना चाहिये; जिसपर ऐसा उत्तरदायित्व हो, वह झूठ कैसे बोल सकता है ? ॥ ३७ ॥
विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः [ ४८५
न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः ।
मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते ॥ ३८ ॥
मुने ! आपका कल्याण हो । यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायं तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, नहीं हो सकते ॥ ३८ ॥
स पारिजातं यदि न प्रदास्यति प्रयाच्यमानो भवतामरेश्वरः ।
ततः शचीव्यास्रमुदितानुलेपने गदां विमोक्ष्यामि पुरंदरोरसि ॥ ३९ ॥
यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्षःस्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा ॥
इति प्रवाच्यो यदि सामपूर्वकं प्रयाच्यमानो न तरुं प्रयच्छति ।
सुनिश्चयं मद्गमनाय सर्वथा त्वयापि कार्यः खलु तत्र निश्चयः ॥ ४० ॥
यदि वे शान्तिपूर्वक माँगनेसे पारिजात वृक्ष नहीं देते हैं तो मेरा इन्द्रलोकपर आक्रमण करनेका उत्तम निश्चय सर्वथा अटल है, यह उन्हें बता दीजियेगा तथा उस दशामें आपको भी वहाँ अवश्य यही निश्चय करना चाहिये ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदकृष्णभाषणे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें नारद और श्रीकृष्णका वार्तालापविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
स्वर्गमें महादेवजीकी परिचर्याके लिये नृत्य-गीत आदि उत्सव, नारदजीका इन्द्रको श्रीकृष्णका पारिजातके लिये प्रार्थनाविषयक संदेश सुनाना और इन्द्रका अनेक कारण बताकर पारिजातको न देनेका विचार प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
नारदोऽथ मुनिर्गत्वा महेन्द्रसदनं प्रति ।
तां रात्रिमवसत् तत्र ददृशे च महोत्सवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर नारद मुनिने महेन्द्रभवनमें जाकर उस रातमें वहीं निवास किया और पूर्वोक्त महोत्सवको भी देखा ॥ १ ॥
तत्रादित्या महात्मानो वसवश्च सुरोत्तमाः ।
राजर्षयश्च विद्वांसः स्वर्गताः कर्मभिः शुभैः ॥ २ ॥
नागा यक्षाश्च सिद्धाश्च चारणाश्च तपोधनाः ।
ब्रह्मर्षयश्च शतशो देवर्षिमनवस्तथा ॥ ३ ॥
सुपर्णाश्च महात्मानो मरुतश्च महाबलाः ।
दिवौकसां निकायाश्च शतशोऽन्ये समागताः ॥ ४ ॥
वहाँ महात्मा आदित्यगण, सुरश्रेष्ठ वसुगण, अपने शुभ कर्मोंसे स्वर्गमें गये हुए विद्वान् राजर्षिगण, नाग, यक्ष, सिद्ध, चारण, तपोधन ब्रह्मर्षि, सैकड़ों देवर्षि और मनु, महामना गरुड़ पक्षी, महाबली मरुद्गण तथा देवताओंके जो अन्य सैकड़ों समुदाय हैं, वे सब उस उत्सवमें पधारे थे ॥ २-४ ॥
उपर्युपरि सर्वेषां सोमो देवो महेश्वरः ।
तस्थावमितविक्रान्तः स्वैर्गणैः परिवारितः ॥ ५ ॥
देवर्षिभिर्मुनिश्श्रेष्ठैः संवृतः सर्वभावनः ।
कल्पान्तरसहस्रेषु क्षयो येषां न विद्यते ॥ ६ ॥
सबके ऊपर उमासहित अमित पराक्रमी भगवान् महेश्वर अपने प्रमथगणोंसे घिरे हुए खड़े थे । वे सर्वभावन भगवान् शिव उन मुनिश्रेष्ठ देवर्षियोंसे घिरे हुए थे, जिनका सहस्रों कल्पान्तरोंमें भी विनाश नहीं होता है ॥ ५-६ ॥
यानर्चयन्ति सततं देवा देवेश्वरोपमाः ।
आत्मज्ञा नावलेपान्धा ये च धर्मपथि स्थिताः ॥ ७ ॥
जो अभिमानसे अन्धे नहीं हुए हैं तथा जो धर्मके मार्गपर स्थित रहनेवाले हैं, वे देवेश्वरोंके समान प्रभावशाली आत्मज्ञानी देवता भी उन देवर्षियोंकी सतत आराधना करते हैं ॥ ७ ॥
रुद्राश्च काश्यपा देवमभ्युपासन्त भारत ।
स्कन्दश्च भगवानग्निर्गङ्गा च सरितां वरा ॥ ८ ॥
अर्चिष्मांस्तुम्बुरुश्चैव भारिश्च वदतां वरः ।
भरतनन्दन ! रुद्रगण, कश्यपजीके पुत्र (देवगण), भगवान् स्कन्द, अग्निदेव, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा तथा अर्चिष्मान्, तुम्बुरु और वक्ताओंमें श्रेष्ठ भारि (ये तीनों गन्धर्व) वहाँ महादेवजीकी सेवामें उनके पास ही खड़े थे ॥
नेतारो देवदेवानामेते हि तपसान्विताः ॥ ९ ॥
| ४८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
एताननुविधीयन्ते सर्वदेवगणा नृप।
धर्मनित्यास्तपोनित्याः सतां मार्गमुपाश्रिताः ॥ १०॥
ये सब-के-सब तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण देवाधिदेवोंके भी नेता हैं (उनका नेतृत्व करनेमें समर्थ हैं)। नरेश्वर ! जो नित्य-निरन्तर धर्म और तपमें संलग्न रहकर सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय ले चुके हैं, वे समस्त देवगण इन रुद्र आदिका अनुसरण करते हैं ॥ ९-१० ॥
ये त्विमे मानुषा देवानर्चयन्ति शुभार्थिनः।
तानर्चयन्ति ह्यमरास्तथा राजञ्छुभार्थिनः ॥ ११॥
राजन् ! जो ये मनुष्य मङ्गलकी कामना रखकर उन देवताओंकी पूजा करते हैं, वे देवता भी उन शुभार्थी मनुष्योंको अभीष्ट फल देकर उनका सत्कार करते हैं ॥ ११ ॥
पितृकृत्येषु देवानां संन्यासं ये त्वनुष्ठिताः।
स्वाध्यायवन्तः कौरव्य सदा नियमचारिणः ॥ १२॥
कुरुनन्दन ! जो देवताओं और पितरोंके कृत्योंमें लगे रहते हैं, जिन्होंने संन्यासधर्मका अनुष्ठान किया है, जो सदा स्वाध्यायशील तथा नियमोंके पालनमें तत्पर रहते हैं (उन मनुष्योंको भी अभीष्ट फल देकर ये देवता उनका सत्कार करते हैं) ॥ १२ ॥
गन्धर्वाधिपतिः श्रीमांस्तत्र चित्ररथो नृप।
सपुत्रो वादयामास देववाद्यानि हृष्टवत् ॥ १३॥
नरेश्वर ! उस उत्सवके समय वहाँ श्रीमान् गन्धर्वराज चित्ररथ पुत्रसहित प्रसन्नतापूर्वक देवसम्बन्धी वाद्य बजा रहे थे ॥ १३ ॥
ऊर्णायुश्चित्रसेनश्च हाहा हूहूस्तथैव च।
डुम्बरस्तुम्बुरुश्चैव जगुरन्ये च षड्गुणान् ॥ १४॥
ऊर्णायु, चित्रसेन, हाहा, हूहू, डुम्बर, तुम्बुरु तथा अन्य गन्धर्व छः गुणोंसे युक्त गीत गा रहे थे ॥ १४ ॥
उर्वशी विप्रचित्तिश्च हेमा रम्भा च भारत।
हेमदन्ता घृताची च सहजन्या तथैव च ॥ १५॥
भारत ! उर्वशी, विप्रचित्ति, हेमा, रम्भा, हेमदन्ता, घृताची और सहजन्या—ये अप्सराएँ भी अपने नृत्य और गीत-कलाका प्रदर्शन करती थीं ॥ १५ ॥
जुजोष भगवान् देवस्तदुपस्थानमात्मवान्।
वृत्तेन तुष्टः शक्रस्य जगाम जगतो गतिः ॥ १६॥
आत्मसंयमशील जगदाधार भगवान् महादेव अपनी आराधनासे सम्बन्ध रखनेवाले उस नृत्य-गीत आदिको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते—उसका आनन्द लेते थे। इन्द्रके उस बर्ताव एवं व्यवहारसे संतुष्ट हो वे भगवान् शिव पुनः अपने स्थानको चले गये ॥ १६ ॥
गते भूतपतौ सर्वे नृपा जग्मुर्यथागतम्।
महेन्द्रेणार्चिता देवाः स्वानेव निलयान् गताः ॥ १७॥
भगवान् भूतनाथके चले जानेपर समस्त राजर्षि (जो अपने पुण्यफलसे स्वर्गमें आये थे,) वहाँसे अपने-अपने स्थानको लौट गये तथा देवता भी देवराज इन्द्रसे सम्मानित हो अपने भवनोंको ही चले गये ॥ १७ ॥
ततः सर्वेषु यातेषु सुखासीनं पुरंदरम्।
सदस्यैः स्वैः सहासीनं नारदोऽभिययौ मुनिः ॥ १८॥
जब सब लोग विदा हो गये और देवराज इन्द्र सुखपूर्वक सिंहासनपर बैठ गये, उस समय अपने सदस्योंके साथ बैठे हुए इन्द्रके पास नारद मुनि गये ॥ १८ ॥
तमिन्द्रः पूजयामास समुत्थाय तपोधनम्।
दिदेश कुशगर्भे च पीठमात्मासनोपमम् ॥ १९॥
इन्द्रने उठकर उन तपोधनका पूजन किया और अपने आसनके समान ही एक पीठ उन्हें बैठनेके लिये दिया, जिसके भीतर कुश बिछा हुआ था ॥ १९ ॥
नारदोऽथ महातेजा महेन्द्रमिदमब्रवीत्।
दूतोऽहममरश्रेष्ठ विष्णोरतुलतेजसः ॥ २०॥
किंतु महातेजस्वी नारदने (खड़े-खड़े ही) महेन्द्रसे कहा—'अमरश्रेष्ठ ! मैं इस समय अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुका दूत हूँ ॥ २० ॥
किञ्चित्कार्यं पुरस्कृत्य प्रेषितोऽस्मि महात्मना।
आनर्तादार्तिहरणं तस्यैचानघतेजसः ॥ २१॥
'उन महात्मा श्रीकृष्णने कुछ कार्य सामने रखकर मुझे आनर्तदेश (द्वारकापुरी) से यहाँ भेजा है। उन निर्मल तेजस्वी श्रीकृष्णका ही कष्ट दूर करना आजका मुख्य कार्य है (जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ)' ॥ २१ ॥
प्रीतिवाक्यानि हृद्यानि प्रयुज्य मुनये तदा।
ततः प्रहृष्टो भगवानब्रवीत् पाकशासनः ॥ २२॥
तब हर्षमें भरे हुए भगवान् इन्द्रने देवर्षि नारदके प्रति मनको प्रिय लगनेवाले प्रेमपूर्ण वचनोंका प्रयोग करके इस प्रकार पूछा—॥ २२ ॥
किमाह पुरुषश्रेष्ठः शीघ्रमाचक्ष्व मे मुने।
चिरस्य खलु कृष्णेन संस्मृतोऽस्मि महात्मना ॥ २३॥
'मुने ! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका कौन-सा संदेश है, यह मुझे शीघ्र बताइये। निश्चय ही महात्मा श्रीकृष्णने चिरकालके पश्चात् मेरा स्मरण किया है' ॥ २३ ॥
नारद उवाच
महेन्द्रैन्द्रानुजं द्रष्टुं गतोऽहं भ्रातरं तव।
कथञ्चिद् द्वारकां तत्र काश्यपानां यशस्करम् ॥ २४॥
१. वक्रम, स्निग्ध, मधुर, लास्य, विभक्त तथा अवबद्ध—ये गीतके छः गुण हैं। (नीलकण्ठीसे)
विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ४८७
नारदजीने कहा—महेन्द्र ! मैं तुम्हारे छोटे भाई श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये किसी तरह द्वारका जा पहुँचा था, जो वहाँ रहकर कश्यपकी संतानों (देवताओं) के यशका विस्तार करते हैं ॥ २४ ॥
तं तु रैवतकेऽद्राक्षं तदासीनमरिंदमम् ।
रुक्मिण्या सहितं वीरमुमयेव वृषध्वजम् ॥ २५ ॥
वे शत्रुदमन वीर उस समय (द्वारकापुरीके निकटवर्ती) रैवतक पर्वतपर रुक्मिणी देवीके साथ उसी तरह विराजमान थे, जैसे भगवान् शङ्कर उमा देवीके साथ (कैलास या मन्दराचलपर) विराज रहे हों ॥ २५ ॥
पारिजाततरोः पुष्पं तस्य दत्तं मयानघ ।
विस्सापनार्थं देवेश पत्नीनामरुतेजसः ॥ २६ ॥
निष्पाप देवेश्वर ! वहाँ मैंने उन महातेजस्वी श्रीकृष्णके हाथमें उनकी पत्नियोंको विस्मयमें डालनेके लिये पारिजात वृक्षका एक फूल दिया ॥ २६ ॥
तद् दृष्ट्वा तस्य पत्न्यस्तु विस्मयं परमं ययुः ।
बहुकामप्रदं पुष्पं वृक्षराजसमुद्भवम् ॥ २७ ॥
वृक्षराज पारिजातके उस पुष्पको, जो बहुत-सी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, देखकर उनकी पत्नियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २७ ॥
गुणास्तासां मया ख्यातास्तस्य पुष्पस्य मानद ।
सृष्टिश्च पारिजातस्य कश्यपेन महात्मना ॥ २८ ॥
मानद ! वहाँ मैंने उनकी पत्नियोंको उस फूलके गुण भी बताये और यह भी कहा कि महात्मा कश्यपने पारिजातकी सृष्टि की है ॥ २८ ॥
अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च यथा मम ।
पुष्पदाम्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान् ॥ २९ ॥
त्वं च दत्तो यथा शच्या देवाश्चान्ये सुरेश्वर ।
निष्क्रयश्च यथा दत्तः कश्यपाद्यैर्महर्षिभिः ॥ ३० ॥
सुरेश्वर ! फिर अदितिने पुण्यकी प्राप्तिके लिये आत्मसंयमी महर्षि कश्यपके गलेमे फूलोंकी माला लपेटकर जिस तरह मेरे हाथमें उनका दान कर दिया था तथा शचीने जिस प्रकार तुम्हारा दान किया था और अन्य देवता भी जिस प्रकार अपनी पत्नियोंद्वारा दानमें दिये गये थे एवं कश्यप आदि महर्षियोंने जिस प्रकार मुझे अपना निष्क्रय (मूल्य) दिया था, (वह सारा प्रसङ्ग मैंने वहाँ सुनाया) ॥ २९-३०॥
तच्छ्रुत्वा तस्य पत्न्येका सत्यभामेति विश्रुता ।
पुण्यकार्यं मनश्चक्रे दयिता ते यवीयसः ॥ ३१ ॥
वह सुनकर उनकी एक पत्नीने, जिसका नाम सत्यभामा है तथा जो तुम्हारे छोटे भाईकी बहुत ही प्रिय है, अपने मनमें वह दानरूप पुण्यकार्य करनेका विचार किया ॥ ३१ ॥
तया चाभ्यर्थितो भर्ता देव देव्या गणेश्वरः ।
प्रतिजज्ञे स धर्मार्थं यवीयांस्तव मानद ॥ ३२ ॥
दूसरोंको मान देनेवाले देव ! जैसे देवी पार्वती प्रमथगणोंके स्वामी भगवान् शिवसे कोई बात कहती हैं, उसी प्रकार सत्यभामाने अपने पतिसे पारिजात वृक्षके लिये प्रार्थना की और तुम्हारे छोटे भाईने उसके धर्मकार्यकी सिद्धिके लिये उस वृक्षको ला देनेकी प्रतिज्ञा कर दी ॥ ३२॥
ततो मामुक्तवान् वीरो विष्णुर्बलवतां वरः ।
यथावत् सुरमुख्येश ब्रुवतः शृणु भावतः ॥ ३३ ॥
देवप्रमुख ! देवेश्वर ! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर श्रीकृष्णने तुमसे कहनेके लिये मुझसे जो बात कही थी, उसे ज्यों-की-त्यों सुना रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३३॥
लालनीयो यवीयांस्ते प्रणिपत्याच्युतोऽब्रवीत् ।
आनयेयं सुरश्रेष्ठ पारिजातं वरद्रुमम् ॥ ३४ ॥
तुम्हारे छोटे भाई अच्युतने, जो तुमसे लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं, तुम्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा है—'सुर-श्रेष्ठ ! मैं उत्तम वृक्ष पारिजातको यहाँ लाना चाहता हूँ ॥ ३४॥
मनोरथोऽस्तु सफलो वध्वास्तेऽसुरसूदन ।
धर्मकृत्ये विशेषेण वध्वास्ते सुरसत्तम ॥ ३५ ॥
'असुरसूदन ! सुरश्रेष्ठ ! आपकी बहू सत्यभामाका यह मनोरथ, जो विशेषतः धर्मकार्यसे सम्बन्ध रखता है, सफल होना चाहिये ॥ ३५ ॥
अयं दर्शितकल्याणो लोको लोकगणेश्वर ।
पश्यन्त्यमरकल्याणं मत्प्रभावाच्च मानवाः ॥ ३६ ॥
'लोकगणेश्वर ! यह मनुष्यलोक भी उस कल्याणमय वृक्षका दर्शन कर सके (ऐसी कृपा कीजिये)। मेरे प्रभावसे मनुष्य भी देवताओंके लिये कल्याणकारी वृक्ष पारिजातका दर्शन कर लें (ऐसा अवसर दीजिये)' ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
वासुदेववचः श्रुत्वा महेन्द्रः कुरुनन्दन ।
नारदं वदतां श्रेष्ठमिदं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! भगवान् वासुदेवका वह संदेश सुनकर देवराज इन्द्रने वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीसे इस प्रकार कहा—॥ ३७ ॥
भज्यासनं द्विजश्रेष्ठ युक्तमुक्तं त्वया द्विज ।
संदेशं प्रतिदास्यामि विष्णोरतुलतेजसः ॥ ३८ ॥
'द्विजश्रेष्ठ ! पहले आसन तो ग्रहण कीजिये । ब्रह्मन् ! आपने उचित बात कही है। मैं अनुपम तेजस्वी विष्णुके लिये संदेशका उत्तर दूँगा' ॥ ३८ ॥
आसीने नारदे शक्रो लब्धानुज्ञोऽथ नारदात् ।
स्वमासनं ततो भेजे तस्यैव सदृशं प्रभो ॥ ३९ ॥
| ४८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
प्रभो ! जब नारदजी बैठ गये, तब उन्हींसे आज्ञा लेकर इन्द्र अपने सिंहासनपर बैठे, जो उन्हींके अनुरूप था ॥ ३९ ॥
उपविष्टः सुरपतिरथोवाच तपोधनम् ।
निरीक्ष्य स्वबलं वीर्यं हर्षदं वृत्रनाशनः ॥ ४० ॥
सिंहासनपर बैठकर वृत्रासुरका विनाश करनेवाले देवराज इन्द्रने अपने हर्षदायक बल और पराक्रमकी ओर दृष्टिपात करके तपोधन नारदजीसे कहा ॥ ४० ॥
शक्र उवाच
महर्षे कुशलं पृष्ट्वा वक्तव्यस्ते जनार्दनः ।
वचनान्मम धर्मज्ञ सर्वभूतसुखावहः ॥ ४१ ॥
इन्द्र बोले—धर्मज्ञ महर्षे ! आप मेरी ओरसे कुशल पूछकर समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले जनार्दनसे मेरे ही शब्दोंमें इस प्रकार कहियेगा—॥ ४१ ॥
मदनन्तरमीशस्त्वं जगतो नात्र संशयः ।
त्वदीयः पारिजातश्च रत्नान्यन्यानि चाच्युत ॥ ४२ ॥
'अच्युत ! मेरे बाद तुम्हीं इस जगत्के ईश्वर हो, इसमें संशय नहीं है। इस दृष्टिसे पारिजात तथा दूसरे-दूसरे रत्न भी तुम्हारे ही हैं ॥ ४२ ॥
त्वं तु भारावतरणं कर्तुं देव महीं गतः ।
मानुष्यं सर्ववृत्तानां स्थितः कार्यस्य सिद्धये ॥ ४३ ॥
'परंतु देव ! तुम पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर गये हो और अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये सभी बर्तावों और व्यवहारोंमें मानवीय मर्यादाका ही आश्रय लेते हो ॥ ४३ ॥
त्वयि तीर्णप्रतिज्ञे हि पुनः प्राप्ते त्रिविष्टपम् ।
पूरयिष्यामि वध्वास्ते दृष्टान् कामानधोक्षज ॥ ४४ ॥
'अधोक्षज ! जब तुम भूभारहरणकी प्रतिज्ञा पूरी करके पुनः स्वर्गलोकमें आओगे, उस समय मैं तुम्हारी पत्नी सत्यभामाके सभी अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करूँगा ॥ ४४ ॥
स्वर्गीयानि च रत्नानि न नेतव्यानि केशव ।
स्वल्पार्थे मानुषं लोकमिति पूर्वकृता स्थितिः ॥ ४५ ॥
'केशव ! किसी छोटे-मोटे कार्यके लिये स्वर्गीय रत्नोंको मनुष्यलोकमें नहीं ले जाना चाहिये। यह पूर्वकालकी ही बाँधी गयी मर्यादा है ॥ ४५ ॥
उत्क्रम्य हि स्थितिं दैवीं प्रवर्तेयि महाबल ।
यद्यहं किं प्रवक्ष्यन्ति प्रजापतिगणाः प्रभो ॥ ४६ ॥
'महान् बलशाली प्रभो ! यदि मैं देवलोककी मर्यादाका उल्लङ्घन करके कोई नया बर्ताव करूँ, तो प्रजापतिगण मुझे क्या कहेंगे ॥ ४६ ॥
ब्रह्मणा सह पुत्रेण सपौत्रेण महात्मना ।
नियमाः सर्वकृत्यानां स्थापिता जगतो ध्रुवाः ॥ ४७ ॥
'पुत्र और पौत्रोंसहित महात्मा ब्रह्माजीने जगत्के समस्त कार्योंके लिये कुछ अटल नियम निश्चित कर दिये हैं ॥ ४७ ॥
प्रजापतिकृतं मार्गमपास्य व्रजतो मम ।
श्रुत्वा प्रजापतिर्धीमान्क्रुद्धःशापमप्युत्सृजेत् प्रभुः ॥ ४८ ॥
'यदि मैं प्रजापति ब्रह्माद्वारा नियत किये गये मार्गको छोड़कर चलूँ तो इसे सुनकर बुद्धिमान् भगवान् प्रजापति मुझे शाप भी दे सकते हैं ॥ ४८ ॥
अस्माभिर्भिद्यमानं हि मर्यादासेतुबन्धनम् ।
भेत्स्यन्त्यशङ्किता दैत्या दैत्यपक्षास्तथापरे ॥ ४९ ॥
'यदि हमलोग ही प्राचीन मर्यादारूपी सेतुका बन्धन तोड़ दें तब तो दैत्य तथा दैत्यपक्षके दूसरे लोग निःशङ्क होकर उन मर्यादाओंका भेदन करने लगेंगे ॥ ४९ ॥
स्त्रीनिमित्तमितो नीते पारिजाते द्रुमेश्वरे ।
स्वर्गौकसो भविष्यन्ति विमनस्काश्च मानद ॥ ५० ॥
'मानद ! यदि केवल एक स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये स्वर्गसे वृक्षराज पारिजातको भूतलपर पहुँचा दिया जाय तो स्वर्गलोकके निवासियोंका मन उदास हो जायगा ॥ ५० ॥
उपभोगा मनुष्याणां विहिता ये स्वयंभुवा ।
तैस्तु तुष्यतु मे भ्राता सम् build पश्यन् कालपर्ययम् ॥ ५१ ॥
'स्वयम्भू ब्रह्माने मनुष्योंके लिये जो उपभोगकी वस्तुएँ बनायी हैं, समयके परिवर्तनको देखते हुए मेरे भाईको उन्हींसे संतोष करना चाहिये ॥ ५१ ॥
इहापि तात त्रिदिवे मम यः स्यात् परिग्रहः ।
त्रिदिवस्थोऽपि तं कृष्णः सर्वं भोक्तुमिहार्हति ॥ ५२ ॥
'तात ! इस स्वर्गलोकमें मेरे पास जो भोग-सामग्रियोंका संग्रह है, वह सब श्रीकृष्ण यहाँ रहकर भी तो भोग सकते हैं।
दृष्टे ह्यामिषमोज्यानामभिमानाज्जनार्दनः ।
ततो धर्मं समुत्सृज्य पापमेवानुवर्तते ॥ ५३ ॥
'मर्त्यलोककी भोग्य वस्तुओंसे हृष्ट-पुष्ट होनेके कारण जनार्दन श्रीकृष्णको कुछ अभिमान हो गया है। उस अभिमानके कारण ही वे धर्मका परित्याग करके पापका ही अनुसरण कर रहे हैं ॥ ५३ ॥
स्त्रीवश्यता ख्याप्यमाना कृष्णस्य हि महात्मनः ।
जगत्ययशसा योगं जनयेदिति मे मतिः ॥ ५४ ॥
महात्मा श्रीकृष्ण स्त्रीके वशीभूत रहते हैं, इस बातकी प्रसिद्धि तो उनके लिये संसारमें अयश या कलङ्ककी ही प्राप्ति करायेगी; ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५४ ॥
विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ४८९
मानुष्यं मानुषे प्राप्तो यदेतन्मधुसूदनः ।
कुर्यान्निर्वन्धनीयं यद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन नारद ॥ ५५ ॥
नारद ! मनुष्यलोकमें मानवशरीरको प्राप्त हुए मधुसूदन यदि मुझ बड़े भाईके साथ दुराग्रहपूर्ण बर्ताव करें तो यह उनके लिये उचित नहीं है ॥ ५५ ॥
स्वर्गरत्नविलोपेन धर्षणा स्यान्ममानघ ।
ज्ञातितो धर्षणा चैव विशेषेणैव गर्हिता ॥ ५६ ॥
निष्पाप देवर्षे ! स्वर्गीय रत्नके विलोप होने—उसके लूटे जानेसे मेरा तिरस्कार होगा और अपने भाई-बन्धुसे तिरस्कार पाना तो बहुत ही निन्दित है ॥ ५६ ॥
धर्ममर्थं च कामं च क्रमेण मधुसूदनः ।
सेवत्वेष सतां धर्मान् स्थापितान् पद्मयोनिना ॥ ५७ ॥
ये मधुसूदन क्रमशः धर्म, अर्थ और कामका सेवन करें। ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये हुए सत्पुरुषोंके धर्मोंका आश्रय लें ॥ ५७ ॥
महीतलं पारिजातमर्पयिष्याम्यहं यदि ।
पौलोमीमादितः कृत्वा को नु मां बहु मंस्यते ॥ ५८ ॥
यदि मैं पारिजातको भूतलपर भेज दूँगा तो शचीसे लेकर कौन ऐसा स्वर्गवासी होगा, जो मुझे अधिक आदरकी दृष्टि से देखेगा ॥ ५८ ॥
पारिजातं महीपृष्ठे दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च मानुषाः ।
स्वर्गार्थं नोद्यमिष्यन्ति दृष्ट्वा स्वर्गफलं क्षितौ ॥ ५९ ॥
भूतलपर पारिजातका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य पृथ्वीपर ही स्वर्गका फल उपलब्ध हुआ देख स्वर्गकी प्राप्ति-के लिये उद्यम हो नहीं करेंगे ॥ ५९ ॥
पारिजातगुणान् मर्त्या जुषन्ति यदि नारद ।
देवतानां मनुष्याणां न विशेषो भविष्यति ॥ ६० ॥
नारद ! यदि मनुष्य पारिजातके गुणो (और उससे मिलने-वाले लाभों)का सेवन करने लगेंगे तो देवताओं और मनुष्योंमें कोई अन्तर ही नहीं रह जायगा ॥ ६० ॥
तत्र यत् क्रियते कर्म इह तद् भुज्यते नरैः ।
स्वर्गार्थं न यतिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६१ ॥
मर्त्यलोकमें जो शुभकर्म किया जाता है, उसका फल मनुष्य यहाँ स्वर्गमें आकर भोगते हैं। जब उन्हे भूतलपर ही पारिजातके गुण (लाभ) प्राप्त होने लगेंगे, तब वे स्वर्गके लिये यत्न नहीं करेंगे ॥ ६१ ॥
सर्वरत्नवरः स्वर्गे पारिजातस्तपोधन ।
तुल्यं देवसमैर्मर्त्यैः सर्वदैव जगद् भवेत् ॥ ६२ ॥
तपोधन ! पारिजात स्वर्गके सब रत्नोंमे श्रेष्ठ है। यदि यह भूतल-पर चला गया तो मनुष्य देवताओके समान हो जायेंगे और (उनसे भरा हुआ) सारा जगत् सदा ही (स्वर्गके) तुल्य हो जायगा ॥
यज्ञैर्मर्त्या न यक्ष्यन्ति लब्धस्वर्गफला भुवि ।
न पूर्तानि प्रदास्यन्ति तुल्यत्वममरैर्गताः ॥ ६३ ॥
पृथ्वीपर स्वर्गका फल पाकर देवताओंकी समानताको प्राप्त हुए मनुष्य न तो यज्ञोंद्वारा देवताओंका यजन करेंगे और न पूर्तकर्मोंमें ही धन लगायेंगे ॥ ६३ ॥
यज्ञैर्जप्यादिकैश्चैव नित्यमाप्याययन्ति नः ।
मानुषाः स्वर्गमिच्छन्तः श्रद्धानास्तपोधन ॥ ६४ ॥
तपोधन ! श्रद्धालु मनुष्य स्वर्गकी अभिलाषा रखकर यज्ञ, जप तथा नित्य कर्मोंके द्वारा सदा हमलोगोंको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं ॥ ६४ ॥
तत् सर्वं न करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ।
निस्तेजसो भविष्यम ते गतास्तद्विहीनताम् ॥ ६५ ॥
परंतु पारिजातका लाभ मिल जानेपर मनुष्य वह सब कुछ नहीं करेंगे; फिर तो उन यज्ञ आदिसे वञ्चित होकर हम सब देवता निस्तेज हो जायेंगे ॥ ६५ ॥
इतः सुवृष्ट्या सस्यैस्ते जीवन्ति पुरुषा भुवि ।
आप्यायन्तस्तेऽप्यस्मान् दानैर्यज्ञैस्तथैव च ॥ ६६ ॥
स्वर्गकी ओरसे जब अच्छी वर्षा की जाती है, तब उससे पैदा होनेवाले सस्यों (अनाजों) द्वारा भूतलके मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं और वे भी दान एवं यज्ञोंद्वारा हम देवताओं-का पोषण करते हैं॥ ६६ ॥
न बुभुक्षा पिपासा वा बाधते यदि मानुषान् ।
रोगो जरा वा मृत्युर्वा धर्मज्ञारतिरेव च ॥ ६७ ॥
दौर्गन्ध्यं वा सुघोरा वा ईतयः कर्मसम्भवाः ।
किमुद्योगं करिष्यन्ति पारिजातगुणान्विताः ॥ ६८ ॥
धर्मज्ञ नारद ! पारिजातका लाभ मिल जानेपर यदि मनुष्योंको भूख-प्यास नहीं सतायेगी, रोग, बुढ़ापा, अरति (असंतोष या दुःख-शोक) अथवा मृत्युकी प्राप्ति नहीं होगी, उनमे दुर्गन्ध नहीं रहेगा और कर्मजनित भयंकर ईतियाँ १ उन्हे बाधा नहीं देंगी तो वे स्वर्गके लिये क्यों उद्योग करेंगे ॥
सर्वथा नयनं तत्र पारिजातस्य न क्षमम् ।
इति वाच्यस्त्वया विप्र विष्णुरक्लिष्टकर्मकृत् ॥ ६९ ॥
विप्रवर ! पारिजातका मर्त्यलोकमें ले जाया जाना सर्वथा अनुचित है। यह बात आप अनायास ही महान् कर्म करने-वाले भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) से कह दीजियेगा ॥ ६९ ॥
यथा यथा च मे भ्राता तुष्येत्तद् विचारयन् ।
तथा तथा त्वया कार्यं कार्यं मत्प्रीतिमिच्छता ॥ ७० ॥
१. खेतीको हानि पहुँचानेवाले उपद्रव ईति कहलाते हैं। ये छः प्रकारके हैं—१ अतिवृष्टि, २ अनावृष्टि, ३ टिड्डी पड़ना, ४ चूहे लगना, ५ पक्षियोंकी अधिकता और ६ दूसरे राजाकी चढ़ाई।
| ४९० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [हरिवंशे |
|---|
मुने ! मेरी प्रसन्नताकी इच्छा रखकर आपको वहाँ वैसा ही कार्य या प्रयत्न करना चाहिये, जिससे मेरे इस कथनपर विचार करके मेरे भाई श्रीकृष्ण संतुष्ट हो जायँ ॥ ७० ॥
हारांश्च मणयश्चैव चन्दनान्यगुरूणि च।
वस्त्राणि च विचित्राणि बध्वास्त्वं द्वारकां नय ॥ ७१ ॥
देवर्षे ! आप बहू सत्यभामाके लिये यहाँसे हार, मणि, चन्दन, अगुरु और विचित्र वस्त्र द्वारकाको ले जाइये ॥
योग्यानि यानि मर्त्यानां यावदिच्छति केशवः।
न स्वर्गपरिमोपं तु कर्तुमर्हति साम्प्रतम् ॥ ७२ ॥
जो-जो वस्तुएँ मनुष्योंके योग्य हैं, उन्हें श्रीकृष्ण जितना चाहें ले सकते हैं; परंतु उन्हें इस समय स्वर्गलोकको लूटकर इसे कंगाल बना देना उचित नहीं है ॥ ७२ ॥
ददामि रत्नानि यथेप्सितान्यहं
बहूनि चित्राणि विभूषणानि च।
न पारिजातं च कथंचन द्रुमं
मुने प्रदास्यामि दिवौकसां प्रियम्॥ ७३॥
मुने ! मैं श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार बहुत-से रत्न और विचित्र आभूषण दे रहा हूँ, परंतु पारिजात वृक्षको मैं किसी प्रकार नहीं दूँगा; क्योंकि यह स्वर्गवासियोंको बहुत प्रिय है (इसे वे अन्यत्र जाने देना नहीं चाहते) ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे इन्द्रवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९ ॥
सप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णके द्वारा गदाप्रहारकी धमकी सुनकर कुपित हुए इन्द्रका नारदजीसे उनके बर्तावकी कटु आलोचना करना और युद्ध किये बिना पारिजात वृक्षको न देनेका ही निश्चय करना
वैशम्पायन उवाच
देवराजवचः श्रुत्वा नारदः कुरुनन्दन।
प्रोवाच वाक्यं वाक्यज्ञो धर्मात्मा धर्मवित्तमः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! देवराज इन्द्रकी बात सुनकर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा बातचीत करनेकी कला जाननेवाले धर्मात्मा नारदजीने यह बात कही—॥ १ ॥
अवश्यमेव वक्तव्यं हितं बलनिषूदन।
मया तव महाबाहो बहुमानोऽस्ति मे त्वयि ॥ २ ॥
'महाबाहु बलसूदन ! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति बहुत आदर है, इसलिये मुझे तुम्हारे हितकी बात अवश्य बतानी चाहिये ॥ २ ॥
उक्तो मया वासुदेवो जानता भवतो मतम्।
न दत्तः पारिजातोऽयं हरस्यापि त्वया पुरा ॥ ३ ॥
'मैं तुम्हारे इस विचारको जानता था; क्योंकि तुमने पहले महादेवजीके माँगनेपर भी यह पारिजात वृक्ष उन्हें नहीं दिया था; इसलिये मैंने तुम्हारी ओरसे श्रीकृष्णको सब कुछ बताया था ॥ ३ ॥
हेतवश्च मया तस्य दर्शितास्ते समासतः।
न चावगतवान् देवः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥
'तुमने पारिजात न देनेके विषयमें जो कारण बताये हैं, उन्हें भी मैंने संक्षेपसे उनको दर्शाया था; परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें स्वीकार नहीं किया, यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
उपेन्द्रोऽहं महेन्द्रेण लालनीयः सदेति माम्।
उवाच पुण्डरीकाक्षो दत्तमुत्तरमेव च ॥ ५ ॥
'मेरी बातका उत्तर देते हुए कमलनयन श्रीकृष्ण कहने लगे, 'मैं उपेन्द्र (इन्द्रका छोटा भाई) हूँ; अतः महेन्द्रको सदा ही मेरा लाड़-प्यार करना चाहिये' ॥ ५ ॥
पुनः पुनर्मया चास्य हेतवो देव दर्शिताः।
ततो न बुद्धिव्यावृत्ता वृत्रनाशन तस्य वै ॥ ६ ॥
'वृत्रासुरविनाशन देव ! मैंने बारंबार उन्हें कारण दिखाये; परंतु उनका विचार नहीं बदला ॥ ६ ॥
अपि चाप्युक्तवान् देवो वाक्यान्ये मधुसूदनः।
प्रत्याह पुरुषश्रेष्ठः सरोषमिव वासव ॥ ७ ॥
'इन्द्र ! मेरी बातके अन्तमें पुरुषश्रेष्ठ भगवान् मधुसूदनने कुछ रुष्ट-से होकर उत्तर देते हुए कहा—॥ ७ ॥
न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा
न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः।
मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता
मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते ॥ ८ ॥
'मुने ! आपका कल्याण हो। यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायँ तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; नहीं हो सकते ॥ ८ ॥
स पारिजातं यदि न प्रदास्यति
प्रयाच्यमानो भवतामनेश्वरः।
[विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९१
ततः शचीव्यामृदितानुलेपने
गदां विमोक्ष्यामि पुरंदरोरसि ॥ ९ ॥
'यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्षःस्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा' ॥ ९ ॥
उपेन्द्रस्य महेन्द्रायं भ्रातुस्ते निश्चयः परः ।
यदत्र मन्यसे न्याय्यं सम्प्रधार्य कुरुष्व तत् ॥ १० ॥
'महेन्द्र ! तुम्हारे भाई उपेन्द्रका यही अन्तिम निश्चय है। अब यहाँ तुम जो न्यायोचित कार्य समझो, उसका विचार करके वही करो ॥ १० ॥
तत्त्वं हितं च देवेश श्रूयतां वदतो मम ।
नयनं पारिजातस्य द्वारकां मम रोचते ॥ ११ ॥
'देवेश्वर ! मैं तुम्हें तत्त्व और हितकी बात बताता हूँ, सुनो; मुझे पारिजातका द्वारकामें ले जाया जाना ही ठीक जँचता है' ॥ ११ ॥
नारदेनैवमुक्तस्तु सुव्यक्तं बलदेहभित् ।
रोषाविष्टः सहस्राक्षोऽब्रवीदेतन्नराधिप ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! जब नारदजीने इस प्रकार सुस्पष्ट बात कह दी, तब वलासुरका विनाश करनेवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्र रोषके आवेशमें आकर बोले—॥ १२ ॥
अनागसि मयि ज्येष्ठे सोदरे यदि केशवः ।
एवं प्रवृत्तः किं शक्यं कर्तुमद्य तपोधन ॥ १३ ॥
'तपोधन ! यदि श्रीकृष्ण अपने निरपराध एवं ज्येष्ठ सहोदर भाईके प्रति ऐसा अनुचित बर्ताव करनेके लिये उद्यत हैं तो अब क्या किया जा सकता है ? ॥ १३ ॥
बहूनि प्रतिलोमानि पुरा स कृतवान् मयि ।
कृष्णो नारद सोढानि भ्रातेति स्म मया सदा ॥ १४ ॥
'नारद ! श्रीकृष्णने पहले भी मेरे प्रतिकूल बहुत-से कार्य किये हैं; परंतु यह मेरा छोटा भाई है, ऐसा समझकर मैंने सदा उन बातोंको सहन किया है ॥ १४ ॥
खाण्डवे चार्जुनरथं पुरा वाहयता सता ।
मदीया वारिता मेघाः शमयन्तोऽग्निमुद्धतम् ॥ १५ ॥
'पहलेकी बात है, ये खाण्डव वनमें अर्जुनका रथ हाँक रहे थे; उस समय उस वनमे लगी हुई प्रचण्ड आगको बुझानेके लिये मैंने जो मेघ नियुक्त किये थे, मेरे उन सभी मेघोंका इन्होंने निवारण कर दिया था ॥ १५ ॥
गोवर्धनं धारयता विप्रियं च कृतं मम ।
तथा वृत्रवधे प्राप्ते साहाय्यार्थं वृतो मया ॥ १६ ॥
समोऽहमिति सर्वेषां भूतानामिति चोक्तवान् ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य वृत्रश्च निहतो मया ॥ १७ ॥
'इसी तरह गोवर्धन पर्वतको धारण करके इन्होंने मेरा अप्रिय किया था। जब वृत्रासुरके वधका अवसर प्राप्त हुआ, उस समय मैंने इनसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी; परंतु इन्होंने यह कहकर मुझे कोरा जवाब दे दिया कि मैं तो समस्त प्राणियोंके लिये सम हूँ (मेरा किसीसे राग या द्वेष नहीं है)। तब मैंने अपने ही बाहुबलका आश्रय लेकर वृत्रासुरका वध किया था ॥ १६-१७ ॥
देवासुरेषु प्राप्तेषु संग्रामेषु च नारद ।
युध्यत्यात्मेच्छया कृष्णो मुने सुविदितं तव ॥ १८ ॥
'मुने ! नारद ! जब-जब देवासुर-संग्रामके अवसर आते हैं, तब-तब विष्णु अपनी इच्छासे ही युद्ध करते हैं (जीमें आया तो करते हैं और नहीं तो चल देते हैं)। यह बात आपको अच्छी तरह ज्ञात है ॥ १८ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन तस्माद् दिष्ट्या प्रवर्तताम् ।
ज्ञातिभेदो न नः कार्यः साक्षी त्वं मम नारद ॥ १९ ॥
'इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ (बात बढ़ानेसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है); अतः यदि प्रारब्धवश युद्ध ही होना है तो हो; परंतु नारदजी ! आप मेरी ओरसे इस बातके साक्षी हैं कि हमलोगोंको अपने भाईसे कलह करना अभीष्ट नहीं है ॥ १९ ॥
ममोरसि गदां मोक्तुमुद्यतो यदि केशवः ।
अनुश्लाघ्याथ पौलोमी गुणः क इह दृश्यते ॥ २० ॥
'यदि केशव मेरी छातीमें गदा मारनेको ही उद्यत हैं तो पुलोमकुमारी शचीका नामोल्लेख करके ऐसी बात कहनेमें यहाँ कौन-सा लाभ दिखायी देता है ? ॥ २० ॥
उद्वासगतो धीमान् पिता नः कश्यपः प्रभुः ।
अदित्या सह मे मात्रा तयोर्वाक्यमिदं भवेत् ॥ २१ ॥
'मेरे बुद्धिमान् पिता भगवान् कश्यप मेरी माता अदितिके साथ क्षीरसागरमें जलवास करनेके लिये गये हैं। वे दोनों मेरे प्रति ऐसी बात कह सकते थे (क्योंकि माता-पिताको यह अधिकार है कि वह पुत्रको राहपर लानेके लिये उसे ताड़ना दे) ॥ २१ ॥
अजितात्मा मम भ्राता रजसा तमसा वृतः ।
कामेन च स्त्रियो वाक्यादेवं मामुक्तवान् गुरुम् ॥ २२ ॥
'परंतु मेरे भाई श्रीकृष्ण अजितात्मा हैं, अपने मनपर काबू नहीं पा सके हैं; साथ ही रजोगुण और तमोगुणसे घिरे हुए हैं; अतः कामवश एक स्त्रीके कहनेमात्रसे मुझ अपने गुरुजनके प्रति उन्होंने ऐसी बात कह डाली है ॥ २२ ॥
धिक्स्त्रियः सर्वथा विप्र धिग् राजसमितिं तथा ।
यत्राधिक्षिप्तवान् विष्णुरेवं मां स्त्रीजितो द्विज ॥ २३ ॥
'विप्रवर ! स्त्रियोंको सर्वथा धिक्कार है तथा उस राज-
४९२ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सभाको भी धिक्कार है, जहाँ स्त्रीके वशीभूत हुए श्रीकृष्णने मुझपर इस प्रकार आक्षेप किया है ॥ २३ ॥
न दृष्टं कश्यपकुले व्यपदेश्यं महामुने ।
नैव दक्षकुले दृष्टं मातुर्मे यत्र सम्भवः ॥ २४ ॥
'महामुने ! महर्षि कश्यपके कुलमें अबतक कोई निन्दनीय बात नहीं देखी गयी है तथा जहाँ मेरी माताका जन्म हुआ है, उस दक्षकुलमें भी ऐसी कोई बात देखनेमें नहीं आयी है ॥ २४ ॥
न ज्येष्ठता न राजत्वं देवानां प्रतिमानितम् ।
कामरागाभिभूतेन कृष्णेन खलु नारद ॥ २५ ॥
'नारद ! काम और रागसे आक्रान्त हुए श्रीकृष्णने न तो मेरे बड़प्पनका आदर किया है और न मेरे देवराज पदका ही सम्मान किया है ॥ २५ ॥
पुत्रदारसहस्रैर्हि भ्रातानघ विशिष्यते ।
सद्वृत्तो ज्ञानसम्पन्न इति ब्रह्मा पुराऽब्रवीत् ॥ २६ ॥
'निष्पाप देवर्षे ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने ऐसा कहा था कि सदाचारी और ज्ञानसम्पन्न भाई हजारों स्त्रियों और पुत्रोंसे बढ़कर है ॥ २६ ॥
नास्ति भ्रातृसमो बन्धुराहार्य इतरो जनः ।
इति मामब्रवीन्माता पिता चैव प्रजापतिः ॥ २७ ॥
'मेरी माता तथा मेरे पिता प्रजापति कश्यपजीने मुझसे कहा था कि भाईके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है; क्योंकि वह स्वाभाविक बन्धु है और दूसरे लोग भोजन आदि देकर बनाये हुए हैं ॥ २७ ॥
सोदरे तु विशेषं तु पिता मे कश्यपोऽब्रवीत् ।
दृप्ता मया विरुद्ध्यन्ते दानवाः पापनिश्चयाः ॥ २८ ॥
'मेरे पिता कश्यपने सहोदर भाईमें विशेष बन्धुत्व बताया है। यद्यपि दानव भी हमारे भाई ही हैं, तथापि वे घमंडी और पापपूर्ण विचार रखनेवाले हो गये हैं; इसलिये मैं उनका विरोध करता हूँ ॥ २८ ॥
काममेतन्न वक्तव्यं स्वयमात्मस्तवान्वितम् ।
प्राप्तस्त्ववसरो विप्र यदिहाद्योच्यते मया ॥ २९ ॥
'विप्रवर ! जो बात अपनी प्रशंसासे युक्त हो, उसे स्वयं ही नहीं कहना चाहिये, इसमें संशय नहीं है तथापि इस समय यहाँ मेरे द्वारा जो बात कही जाती है, उसके कहनेका अवसर आ गया है ॥ २९ ॥
धनुर्ज्यायां मुनिश्रेष्ठ छिन्नायां हि पुरानघ ।
धन्वीभिरमराणां च वरदानान्महामते ॥ ३० ॥
उत्कृत्तशिरसो विष्णोः पुरा देहो धृतो मया ।
सन्धितं च शिरो यत्नाच्छिन्नं रौद्रेण तेजसा ॥ ३१ ॥
'मुनिश्रेष्ठ ! महामते ! पूर्वकालमें (दक्षयज्ञ-विध्वंसके समय) जब भगवान् शंकरके धनुर्धर पार्षदोंने वरदानके प्रभावसे देवताओंके धनुषोंकी प्रत्यञ्चा काट डाली और यज्ञरूपी विष्णुका सिर काट लिया गया था, उस समय मैंने ही उनके धड़को धारण किया था तथा रुद्रके तेजसे कटे हुए उनके सिरको यत्नपूर्वक धड़से जोड़ा था ॥ ३०-३१ ॥
अहं विशिष्टो देवानामित्युक्त्वा पुनरच्युतः ।
धनुरारोप्य दर्पेण स्थितो नारद केशवः ॥ ३२ ॥
नारदजी ! जब उनका मस्तक जुड़ गया, तब वे अच्युत-स्वरूप केशव पुनः धनुष चढ़ाकर बड़े घमंडके साथ यह कहते हुए खड़े हो गये कि मैं इन देवताओंमें सबसे बढ़कर हूँ ॥ ३२ ॥
किं मां पिता वा माता वा वक्ष्यतीति मया मुने ।
स्नेहेन च स्थितं विष्णोः शरीरं मुनिसत्तम ॥ ३३ ॥
मुने ! ऋषिश्रेष्ठ ! मैंने उस समय यह सोचकर कि यदि मैं नहीं बचाता हूँ तो मेरे पिता-माता मुझे क्या कहेंगे, बड़े स्नेहके साथ विष्णुके शरीरको थाम लिया था ॥ ३३ ॥
ऐन्द्रं वैष्णवमस्यैव मुने भागमहं ददौ ।
यवीयांसमहं प्रेम्णा कृष्णं पश्यामि नारद ॥ ३४ ॥
'नारद मुने ! (वर्षा ऋतुमें जो सत्कर्म या पूजन किया जाता है, उसपर (मुझ) इन्द्रका ही आधिपत्य है; क्योंकि उस समय श्रीविष्णु शयन करते हैं) उस ऐन्द्रभागको ही वैष्णव भाग बनाकर मैंने इन्हें अर्पित किया है*। इस प्रकार मैं अपने छोटे भाई कृष्णको सदा प्रेमपूर्ण दृष्टिसे ही देखता हूँ ॥ ३४ ॥
संग्रामेषु प्रहर्तव्यं तेन पूर्वं तपोधन ।
राजा किलाहं समरे प्रहराम्यग्रतो ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
'तपोधन ! संग्रामके अवसरोंपर (यदि कृष्ण मेरे विरोधमें खड़े हों तो) पहले उन्हींको मुझपर प्रहार करना चाहिये। अन्यत्र युद्धमें मैं अवश्य ही पहले प्रहार करता हूँ; क्योंकि मैं राजा हूँ ॥ ३५ ॥
प्रादुर्भावेषु सर्वेषु स्वशरीरमिवानघ ।
यत्नाद् रक्षामि धर्मज्ञ केशवं भक्तिमाश्रितम् ॥ ३६ ॥
'पापरहित धर्मज्ञ नारदजी ! सभी अवतारोंके समय मुझमें भक्ति रखनेवाले केशवकी मैं अपने शरीरके समान यत्नपूर्वक रक्षा करता आया हूँ ॥ ३६ ॥
इदं भङ्क्त्वा मदीयं च भुवनं विष्णुना कृतम् ।
उपर्युपरि लोकानामधिकं भुवनं मुने ॥ ३७ ॥
* हरिवंशपर्वके पचपनवें अध्यायके श्लोक २६ से भी इस बातका समर्थन होता है। देखिये पृष्ठ १८९।
विष्णुपर्व ] सप्ततितमोऽध्यायः ४९३
'मुने ! विष्णुने मेरे इस भुवन ( स्वर्गलोक ) की मर्यादा भंग करके सब लोकोंसे ऊपर-ऊपर अपने भुवन ( वैकुण्ठ-धाम ) को प्रतिष्ठित किया और उसे अन्य लोकोंसे बढ़कर महत्त्व दिया ॥ ३७ ॥
अवमानः स च मया पृष्ठतः क्रियते मुने ।
लालनीयो मया बाल इत्येवं भ्रातृगौरवात् ॥ ३८ ॥
'मुने ! वह अपमान मैंने पीछे कर दिया (भुला दिया)। बड़े भाईका जो गौरव है, उसपर ध्यान देकर मैंने सदा यही सोचा है कि यह बालक है। अतः मेरे द्वारा लाड़-प्यार पानेके योग्य है ॥ ३८ ॥
बालोऽयं मम पुत्रेति यवीयानिति नारद ।
पित्रा मात्रा च गोविन्दो मानी च परिभावितः ॥ ३९ ॥
'नारद ! श्रीकृष्णके विषयमें मेरा सदा यही भाव रहा है कि यह बालक है, मेरा छोटा भाई है; अतः मेरे द्वारा पुत्रके समान लाड़ लड़ानेके योग्य है, किंतु उनके विषयमें मेरे माता-पिताने भी अपना यही विचार व्यक्त किया है कि गोविन्द मानी है ॥ ३९ ॥
दृष्टस्तत्र जनानां च केशवः सुविशेषतः ।
वयं द्वेष्या न संदेहस्तत्र स्नेहोऽतिरिच्यते ॥ ४० ॥
'वहाँ ( मनुष्यलोक ) के लोगोंको श्रीकृष्ण विशेष प्रिय हैं और हमलोग उनके द्वेषके पात्र हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसका कारण यही है कि श्रीकृष्णका उन मनुष्योंके प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा है ॥ ४० ॥
सर्वज्ञो बलवाञ्छूरः पात्रं मानयिता तथा ।
केशवेत्येव च ध्यानं यत्तद्वितथतां गतम् ॥ ४१ ॥
'अबतक जो मेरा यह खयाल था कि केशव सर्वज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सुपात्र तथा दूसरोंको मान देनेवाले हैं, वह सब निष्फल हो गया ॥ ४१ ॥
गच्छ नारद वक्तव्यः केशवो वचनान्मम ।
आहूतो न निवर्तेयं समरं प्रति शत्रुभिः ॥ ४२ ॥
'नारदजी ! जाइये और मेरे शब्दोंमें श्रीकृष्णसे कह दीजिये कि 'मैं शत्रुओंके आह्वान करने या ललकारनेपर युद्ध-से पीछे नहीं हट सकता ॥ ४२ ॥
यदीच्छसि तदागच्छ सहां ते यत्त्वमिच्छसि ।
प्रहरस्व च पूर्वं त्वं भार्याजित यथेच्छसि ॥ ४३ ॥
'पत्नीके वशमें रहनेवाले श्रीकृष्ण ! यदि तुम मुझपर गदाका प्रहार करना चाहते हो तो आ जाओ। तुम जो चाहते हो, तुम्हारे उस प्रहारको सहन किया जायगा। जैसे तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार पहले तुम्हीं प्रहार करो ॥
रथाङ्गेनाथ शार्ङ्गेण गदया नन्दकेन च ।
प्रहरारुह्य गरुडं दृढो भूत्वा जनार्दन ॥ ४४ ॥
प्रहृते प्रहरिष्यामि यथाशक्त्या च केशव ।
अहो धिग् यदि मां स्नेहो विक्लवं न करिष्यति ॥ ४५ ॥
'जनार्दन ! तुम गरुड़पर चढ़कर सुदृढ़ होकर मेरे ऊपर सुदर्शन चक्र, शार्ङ्ग धनुष, कौमोदकी गदा और नन्दकनामक खड्गके द्वारा प्रहार करो। केशव ! यदि भ्रातृस्नेह मुझे व्याकुल नहीं कर देगा तो तुम्हारे प्रहार करनेपर मैं भी यथाशक्ति तुमपर प्रहार करूँगा। अहो, ऐसी परिस्थितिको धिक्कार है ! ॥ ४४-४५ ॥
यावन्न संग्रामगतो जितोऽहं चक्रपाणिना ।
पारिजातं न दास्यामि तावद् भो मुनिसत्तम ॥ ४६ ॥
'मुनिश्रेष्ठ ! जबतक मैं संग्रामभूमिमें उपस्थित होकर चक्रपाणि श्रीकृष्णके द्वारा पराजित नहीं हो जाऊँगा, तबतक उन्हें पारिजात नहीं दूँगा ॥ ४६ ॥
मां समाह्वयते ज्येष्ठं यवीयान् स तपोधन ।
अहो तं मर्षयिष्यामि किमर्थं स्त्रीजितं हरिम् ॥ ४७ ॥
'अहो तपोधन ! जब श्रीकृष्ण छोटे होकर मुझ बड़े भाईको युद्धके लिये ललकार रहे हैं, तब पत्नीके गुलाम बने हुए उन केशवके इस बर्तावको मैं किस लिये सहन करूँ ॥
अद्यैव गच्छ भगवन् द्वारकां कृष्णपालिताम् ।
विवादे संस्थितः सोऽज्ञ इति वाच्यस्त्वयाच्युतः ॥ ४८ ॥
'भगवन् ! आप आज ही श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारका-पुरीको चले जाइये और विवादके लिये तैयार खड़े हुए उस अज्ञानी अच्युतसे इस प्रकार मेरा उत्तर सुना दीजिये ॥४८॥
पलाशपत्रार्द्धमपि त्वयाजितो
न पारिजातस्य तव प्रदास्यति ।
इति प्रवाच्यो मधुसूदनस्त्वया
वचो मदीयं स्मरता तपोधन ॥ ४९ ॥
'जबतक तुम पराजित नहीं कर दोगे, तबतक पारिजात वृक्षकी तो बात ही क्या है, उसकी आधी पत्ती भी इन्द्र तुम्हें नहीं देगा। तपोधन ! मेरी इस बातको याद रखते हुए आपको मधुसूदन श्रीकृष्णसे इन्हीं शब्दोंमें यह बात कहनी चाहिये ॥ ४९ ॥
पुनः प्रवाच्यो भगवंस्त्वयाच्युतो
मम प्रियार्थं खलु निर्विशङ्कितम् ।
न मायया हर्तुमिहार्हसि द्रुमं
सुयुद्धमेवास्तु धिगस्तु जिह्मताम् ॥ ५० ॥
'भगवन् ! आपको मेरा प्रिय करनेके लिये अच्युतसे
४९४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
पुनः निःशङ्क होकर यह बात कह देनी चाहिये कि माया (छल-कपट) के द्वारा पारिजात वृक्षका अपहरण करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। विशुद्ध युद्ध ही होना चाहिये। कुटिलतापूर्ण बर्तावको धिक्कार है' ॥ ५० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजाताहरणे इन्द्रवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजात-हरणके प्रसंगमें इन्द्रका वाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
एकसप्ततितमोऽध्यायः
नारदजीके द्वारा श्रीकृष्णकी महत्ताका प्रतिपादन सुनकर भी इन्द्रका उन्हें पारिजात देनेको उद्यत न होना
वैशम्पायन उवाच
महेन्द्रवचनं श्रुत्वा नारदो वदतां वरः।
विविक्ते देवराजानमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने एकान्तमें उनसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
कामं प्रियाणि राजानो वक्तव्या नात्र संशयः।
प्राप्तकालं तु वक्तव्यं हितमप्रियमप्युत ॥ २ ॥
'देवेश्वर ! अवश्य ही राजाओंसे वे ही बात कहनी चाहिये, जो उन्हें प्रिय लगें; इसमें संशय नहीं है तथापि जिसका अवसर प्राप्त हुआ हो, ऐसा हितकारक वचन तो अप्रिय होनेपर भी उनसे कह देना ही उचित है ॥ २ ॥
अनियुक्तपुरोभागो न स्यादिति वदन्ति हि।
सुलोकगतितत्त्वज्ञो नयविज्ञानकोविदः ॥ ३ ॥
'जो उत्तम लोकगतिके तत्त्वका ज्ञाता है और नीतिके विज्ञानमें भी कुशल है, ऐसा पुरुष बिना कहे-सुने कहीं अगुआ न बने, यह बुद्धिमान् पुरुषोंका कथन है ॥ ३ ॥
कार्याकार्ये समुत्पन्ने परिपृच्छसि मां भवान् ।
यतस्ततः प्रवक्ष्यामि गृह्यतां यदि रोचते ॥ ४ ॥
'कर्तव्याकर्तव्यकी समस्या खड़ी होनेपर प्रायः तुम मुझसे पूछते और सलाह लेते हो, इसलिये इस समय भी मैं तुमसे कुछ कहूँगा। यदि अच्छा लगे तो इसे काममें लाना ॥४॥
अनुक्तेनापि सुहृदा वक्तव्यं जानता हितम् ।
न्याय्यं च प्राप्तकालं च पराभवमनिच्छता ॥ ५ ॥
'जो राजाकी पराजय नहीं चाहता और किस बातमें उसका हित है, यह अच्छी तरह जानता है,—ऐसे सुहृद्को बिना कहे भी न्यायसंगत और समयोचित हितकर वचन अवश्य कहना चाहिये ॥ ५ ॥
वक्तव्यं सर्वथा सद्भिर्प्रिय चापि यद्धितम् ।
आनृण्यमेतत् स्नेहस्य सद्भिरेवादृतं पुरा ॥ ६ ॥
'सत्पुरुषोंको उचित है कि वे सर्वथा हितकी ही बात बतावें, भले ही वह सुननेमें अप्रिय हो। यही स्नेहसे उऋण होनेका उपाय है, जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने ही प्राचीन कालसे आदर किया है ॥ ६ ॥
अनृते धर्मभग्ने च न शुश्रूषति चाप्रिये ।
न प्रियं न हितं वाच्यं सद्भिरेवेति निन्दिताः ॥ ७ ॥
'जो असत्यवादी, धर्म-मर्यादाको भंग करनेवाले, किसीका उपदेश सुननेकी इच्छा न रखनेवाले और सबके अप्रिय (द्वेषपात्र) हैं, ऐसे लोगोंसे न तो प्रिय बात कहनी चाहिये और न हितकी ही। ऐसा कहकर सत्पुरुषोंने इन सबकी निन्दा की है ॥ ७ ॥
सर्वथा देव वक्तव्यं श्रूयतां शृण्वतां वर।
श्रुत्वा च कुरु सर्वज्ञ मम श्रेयस्करं वचः ॥ ८ ॥
'श्रोताओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ देव ! मुझे तुमको सर्वथा हितकी बात बतानी है, सुनो और सुनकर मेरे कल्याणकारी वचनका पालन करो ॥ ८ ॥
अन्योन्यभेदो भ्रातॄणां सुहृदां वा बलान्तक।
भवत्यानन्दकृद् देव द्विषतां नात्र संशयः ॥ ९ ॥
'बलासुरका विनाश करनेवाले देव ! भाइयों अथवा सुहृदोंमें यदि परस्पर भेद (वैरभाव) हो जाय तो वह शत्रुओंको आनन्द देनेवाला होता है, इसमें संशय नहीं है ॥९॥
हितानुबन्धसहितं कार्यं ज्ञेयं सुरेश्वर ।
विपरीतं च तद् बुद्ध्वा नित्यं बुद्धिमतां वर ॥ १० ॥
यत् स्यात् तापकरं पश्चादारब्धं कार्यमीदृशम्।
आरभेन्नैव तद् विद्वानेष बुद्धिमतां नयः ॥ ११ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सुरेश्वर ! अपने कल्याणसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्यको जानना चाहिये तथा जो इसके विपरीत हो, उसको भी सदा समझ लेना चाहिये। समझ लेनेके बाद जो कार्य आरम्भ करनेपर पीछे संताप देनेवाला हो, ऐसे कार्यको विद्वान् पुरुष कदापि आरम्भ न करे—यही बुद्धिमानोंकी नीति है ॥ १०-११ ॥
विष्णुपर्व ] , एकसप्ततितमोऽध्यायः । ४९५
विपाकमस्य कार्यस्य नानु पश्यामि शोभनम् ।
यदत्र कारणं देव निबोध विबुधाधिप ॥ १२ ॥
'देव ! विबुधेश्वर ! मैं इस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं देखता हूँ। इसमें जो कारण है, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ १२॥
य एको विश्वमध्यास्ते प्रधानं जगतो हरिः ।
प्रकृत्या यं परं सर्वं क्षेत्रज्ञं वै विदुबुर्धाः ॥ १३ ॥
'जो अकेले ही कार्यभूत जगत् और उसके कारणभूत प्रधानके भी अधिष्ठाता (संचालक) हैं, वे श्रीहरि ही श्रीकृष्ण हैं। जिन्हें समस्त विद्वान् प्रकृतिसे परे विराजमान क्षेत्रज्ञके रूपमें जानते हैं ॥ १३ ॥
तस्याव्यक्तस्य यो व्यक्तो भागः सर्वभवोद्भवः ।
तस्यात्मा परमो देवो विष्णुः सर्वस्य धीमतः ॥ १४ ॥
'उस अव्यक्त प्रकृतिके जो व्यक्तभाग (महत्तत्त्व या समष्टिबुद्धिके अभिमानी चेतन) ब्रह्मा हैं, वे ही समस्त संसारकी उत्पत्तिके कारण हैं। उनके तथा सम्पूर्ण चेतन जीवमात्रके आत्मा वे परमदेव श्रीविष्णु ही हैं ॥ १४ ॥
प्रकृत्याः प्रथमो भाग उमा देवी यशस्विनी ।
व्यक्तः सर्वमयो विश्वः स्त्रीसंज्ञो लोकभावनः ॥ १५ ॥
यशस्विनी उमादेवी प्रकृतिका मुख्य भाग (व्यक्त जगत्स्वरूप) हैं। अतः सर्वमय व्यक्त विश्व स्त्रीसंज्ञक (सम्पूर्ण भोग्य वस्तुरूप) है, जो चेतनमात्रको तृप्त करनेवाला है ॥ १५ ॥
रुक्मिण्याद्याः स्त्रियस्तस्या व्यक्तत्वं प्रथमो गुणः ।
अव्यया प्रकृतिर्देवी गुणी देवो महेश्वरः ॥ १६ ॥
'रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ भी प्रकृतिका मुख्य गुण (भाग) अर्थात् व्यक्तरूप हैं। अविनाशिनी प्रकृति उमादेवी है, जो गुणरूपा है और उनसे युक्त गुणी पुरुष भगवान् महेश्वर हैं। १६।
न विशेषोऽस्य रुद्रस्य विष्णोश्चामरसत्तम ।
गुणिनश्चाव्ययः शास्ता सदा च प्रथमोऽगुणः ॥ १७ ॥
नारायणो महातेजाः सर्वकृल्लोकभावनः ।
'देवश्रेष्ठ ! (इसी प्रकार लक्ष्मी या रुक्मिणी गुणमयी अविनाशिनी प्रकृति हैं और विष्णु या श्रीकृष्ण गुणी पुरुष हैं) इन गुणवान् मायावी रुद्र और विष्णुमें कोई अन्तर नहीं है। त्रिगुणात्मक जगत्के जो प्रथम अविनाशी शासक निर्गुण परमात्मा हैं, वे ही महातेजस्वी नारायण हैं। वे सबके स्रष्टा और समस्त जगत्के उत्पादक हैं ॥ १७३ ॥
भोक्ता महेश्वरो देवः कर्ता विष्णुरधोक्षजः ॥ १८ ॥
ब्रह्मा देवगणांश्चान्ये पश्चात् सृष्टा महात्मना ।
महादेवेन देवेश प्रजापतिगणास्तथा ॥ १९ ॥
'देवेश्वर ! इन परमात्मा परमदेव नारायणके द्वारा ही भोक्ता महेश्वरदेव, कर्ता अधोक्षज विष्णु, ब्रह्मा, अन्य देव-समुदाय तथा प्रजापतिगण—इन सबकी पीछे सृष्टि हुई है ॥ १८-१९ ॥
एवं पुराणपुरुषो विष्णुर्देवेषु पठ्यते ।
अचिन्त्यश्चाप्रमेयश्च गुणेभ्यश्च परस्तथा ॥ २० ॥
'इस प्रकार पुराणपुरुष भगवान् विष्णु देवताओंमें अचिन्त्य, अप्रमेय और गुणातीत कहे जाते हैं ॥ २० ॥
अदित्या तपसा विष्णुर्महात्माऽऽराधितः पुरा ।
वरेण च्छन्दिता तेन परितुष्टेन चादितिः ॥ २१ ॥
'पूर्वकालमें देवमाता अदितिने तपस्याद्वारा परमात्मा विष्णुकी आराधना की। उससे संतुष्ट हो भगवान् विष्णुने भी अदितिको इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी ॥ २१ ॥
तयोक्तस्त्वत्समं पुत्रमिच्छामीति सुरोत्तम ।
प्रणिपत्य च विज्ञाय नारायणमधोक्षजम् ॥ २२ ॥
'सुरश्रेष्ठ ! उस समय अदितिने अधोक्षज (इन्द्रियातीत) भगवान् नारायणको पहचानकर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'प्रभो ! मैं आपके समान पुत्र चाहती हूँ' । २२।
तेनोक्तं भुवने नास्ति मत्समः पुरुषोऽपरः ।
अंशेन तु भविष्यामि पुत्रः खल्वहमेव ते ॥ २३ ॥
'तब उन्होंने कहा—'देवि ! समस्त भुवनोंमें मेरे समान दूसरा कोई पुरुष नहीं है। अतः मैं ही अपने अंशसे तुम्हारा पुत्र होऊँगा ॥ २३ ॥
स जातः सर्वकृद् देवो भ्राता तव सुरेश्वर ।
नारायणो महातेजा यमुपेन्द्रं प्रचक्षते ॥ २४ ॥
'सुरेश्वर ! (इस निश्चयके अनुसार) वे सबकी सृष्टि करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण तुम्हारे भाईके रूपमें अवतीर्ण हुए, जिन्हें उपेन्द्र कहते हैं ॥ २४ ॥
इच्छन्नेव हरिर्देव काश्यपत्वमुपागतः ।
तैस्तैर्भावैर्विंकुरुते भूतमभव्यभवाप्ययः ॥ २५ ॥
'देव ! भूत और भविष्यकी उत्पत्ति एवं संहारके अधिष्ठानभूत श्रीहरि स्वेच्छासे ही कश्यपजीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे तथा अपनी इच्छाके अनुसार ही वे विभिन्न रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं ॥ २५ ॥
प्रादुर्भावं गतो देवो जगतो हितकाम्यया ।
माथुरं जगतो नाथः कर्ता हर्ता च केशवः ॥ २६ ॥
'जगत्के संरक्षक, स्रष्टा और संहारक भगवान् केशव जगत्के हितकी कामनासे ही मथुरामे अवतीर्ण हुए हैं ॥ २६॥
यथा पललपिण्डः स्याद् व्याप्तः स्नेहेन मानद ।
तथा जगदिदं व्याप्तं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २७ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले देवेन्द्र ! जैसे मांसपिण्ड स्नेह (चर्बी या चिकनाई) से व्याप्त होता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् प्रभावशाली भगवान् विष्णुसे व्याप्त है ॥ २७ ॥
| ४९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ब्रह्मण्यदेवः सर्वात्मा तैस्तैर्भावैर्विकुर्वति ।
जगत्यतिगुणो देवो वैकुण्ठः सर्वभावनः ॥ २८ ॥
'वे भगवान् ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, सबके आत्मा हैं और जगत्में जैसा शरीर धारण करते हैं, उसके अनुसार ही विभिन्न भावों (सुख-दुःखादि धर्मों) द्वारा विकारको प्राप्त होते-से प्रतीत होते हैं। वास्तवमें तो सबकी उत्पत्ति करनेवाले वे भगवान् वैकुण्ठ गुणातीत हैं ॥ २८ ॥
अतः समस्तदेवानां पूज्य एव च केशवः ।
पद्मनाभश्च भगवान् प्रजासर्गकरो विभुः ॥ २९ ॥
'अतः प्रजाकी सृष्टि करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् पद्मनाभ-स्वरूप श्रीकृष्ण समस्त देवताओंके लिये भी पूज्य ही हैं ॥ २९ ॥
अनन्तो धारणार्थं च बिभर्ति च महद्यशः ।
यज्ञ इत्यपि सद्भिंश्च कथ्यते वेदवादिभिः ॥ ३० ॥
'वे ही पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करनेके लिये अनन्त (शेषनाग) के रूपमें प्रकट हुए हैं। वे महान् यश धारण करते हैं। वेदवादी साधु पुरुष उन्हींका 'यज्ञ' नामसे भी प्रतिपादन करते हैं ॥ ३० ॥
श्वेतः कृतयुगे देवो रक्तस्त्रेतायुगे तथा ।
द्वापरे च तथा पीतः कृष्णः कलियुगे विभुः ॥ ३१ ॥
'वे सर्वव्यापी भगवान् सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीत तथा कलियुगमें कृष्ण वर्णका स्वरूप धारण करते हैं* ॥ ३१ ॥
* श्रुतिमें कहा है—
कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन् ॥
इस श्रुतिके साथ उपर्युक्त श्लोककी सङ्गति लगाते हुए आचार्य नीलकण्ठ कहते हैं कि जो अविद्यारूपी निद्रामें सो रहा है अर्थात् जो अत्यन्त मूढ़ पुरुष है, वही कलि है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये इस जगत्में भगवान् श्रीहरि कृष्ण होते हैं (अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार ग्रहण करते हैं)। जो कुछ-कुछ कल्याणकी बातोंको देखता और समझता है, जो उस अज्ञान-निद्रासे आधा जग गया है, उस पुरुषको द्वापर कहते हैं। उसके लिये भगवान् पीतवर्ण होते हैं अर्थात् सुवर्णके समान मनोहर कान्ति धारण करते हैं। वह मनुष्य उनके उस दिव्य रूपपर आकृष्ट होकर कुछ भक्तिकी ओर उन्मुख होता है। जो कल्याणकी प्राप्तिके लिये सदा सजग रहकर प्रयत्न करता है, वह साधक त्रेता कहलाता है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् रक्त माताकी भाँति-अनुरक्त (वात्सल्यभावसे युक्त) होते हैं। जो युधिष्ठिर आदिकी भाँति भगवान्का अत्यन्त भक्त है, सदा भक्तिके पथपर ही चलता है, वह कृतकृत्य होनेके कारण कृतयुग अथवा सत्ययुग कहा गया है; उसके प्रति भगवान् शुक्लवर्ण होते हैं अथवा उसके समक्ष वे सदा अपने शुद्ध रूपको ही प्रकाशित करते हैं।
अवधीत् स हिरण्याक्षं दिव्यरूपधरो हरिः ।
दधाराप्सु निमज्जन्तीमेष देवो वसुन्धराम् ॥ ३२ ॥
वाराहं वपुराश्रित्य जगतो हितकाम्यया ।
'उन श्रीहरिने अपने दिव्यरूप धारण करके हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध किया था। उन्होंने जगत्के हितकी कामनासे वाराहरूप धारण करके जलमें डूबती हुई पृथ्वीका उद्धार एवं जलके ऊपर इसका संस्थापन किया था ॥ ३२ ॥
जघ्ने हिरण्यकशिपुं नारसिंहवपुर्हरिः ॥ ३३ ॥
जिगाय जगतीं चैव विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
बबन्ध च बलिं देवः श्रीमान् पन्नगबन्धनैः ॥ ३४ ॥
'उन्हीं श्रीहरिने नरसिंह रूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया था और उन्हीं वामनरूपधारी श्रीमान् भगवान् विष्णुने इस पृथ्वीको जीता और बलिको नागपाशमें बाँध लिया ॥ ३३-३४ ॥
देवदानवसम्भूतानाकामयदपि श्रियम् ।
त्वय्यनन्तः पुरा विष्णुरुदारोऽमितविक्रमः ॥ ३५ ॥
'यद्यपि देवताओं और दानवोंके सम्मिलित प्रयत्नसे प्रकट हुई राजलक्ष्मी दोनोंके लिये साधारण थी, तो भी पूर्वकालमें अमितपराक्रमी, उदार हृदय, अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुने तुम्हारे लिये उसपर आक्रमण किया अर्थात् विराटरूपसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके त्रिलोकलक्ष्मी तुम्हें समर्पित कर दी ॥ ३५ ॥
सावशेषं तपो यस्य तन्निहन्ति जनार्दनः ।
अलीकेष्वपि वर्तन्तं व्रतमेतन्महात्मनः ॥ ३६ ॥
'जिसकी तपस्या शेष है, वह भी यदि अलीक—मायामय अर्थात् छल-कपट एवं अन्यायपूर्ण बर्ताव करता है तो भगवान् श्रीकृष्ण उसे मार डालते हैं; क्योंकि दुराचारियोंका यह विनाश इन महात्मा श्रीकृष्णका व्रत है ॥ ३६ ॥
जघ्ने च दानवान् मुख्यान् देवानां ये च शत्रवः।
तव प्रियार्थं गोविन्दो धर्मनित्यः सतां गतिः ॥ ३७ ॥
'सदा धर्मकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले सत्पुरुषोंके आश्रय-भूत भगवान् गोविन्दने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मुख्य-मुख्य दानवोंका तथा जो लोग देवताओंके शत्रु हुए हैं, उनका भी वध कर डाला है ॥ ३७ ॥
रामत्वमपि चावाप्य जघ्ने रावणमात्मवान् ।
भूत्वा कामगुणांश्चैव जघ्नान द्विरदं हरिः ॥ ३८ ॥
'इन मनस्वी प्रभुने ही श्रीरामचन्द्रका रूप धारण करके रावणको मारा था तथा दूसरे-दूसरे अवतार धारण करके इन श्रीहरिने इच्छानुसार शौर्य आदि गुणोंसे युक्त असुरोंका उसी तरह संहार कर डाला था, जैसे सिंह हाथीको नष्ट कर देता है ॥ ३८ ॥
विष्णुपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः ४९७
हिताय जगतोऽद्यापि लोके वसति मानुषे।
उपेन्द्रो जगतां नाथः सर्वभूतोत्तमोत्तमः ॥ ३९ ॥
‘समस्त भूतोंमें जो उत्तम हैं, उनसे भी उत्तम वे जगदीश्वर उपेन्द्र इस समय भी जगत्के हितके लिये मनुष्यके रूपमें निवास करते हैं ॥ ३९ ॥
जटी कृष्णाजिनी दण्डी दृष्टपूर्वो मया हरिः।
दैत्येषु चरन् देवस्तृणेष्वग्निरिवोद्धतः ॥ ४० ॥
‘जैसे तिनकोंमें प्रज्वलित हुई आग फैल रही हो, उसी प्रकार मैंने पूर्वकालमें दैत्य-समूहोंके बीच श्रीहरिको जटा, काला मृगचर्म एवं पलाश-दण्ड धारण किये वामन ब्रह्मचारी-के रूपमें विचरते देखा है ॥ ४० ॥
अद्राक्षमपि गोविन्दं दानवैकार्णवं जगत्।
कुर्वाणं दानवैर्हीनं जगतो हितकाम्यया ॥ ४१ ॥
‘जब सारा संसार दानवरूपी एकार्णवमें मग्न था, उस समय भी जगत्के हितकी कामनासे इस विश्वको दानवहीन करते हुए श्रीगोविन्दका मैंने दर्शन किया है ॥ ४१ ॥
अवश्यं पारिजातं ते नयिष्यति जनार्दनः।
द्वारकाममरश्रेष्ठ नानृतं च ब्रवीम्यहम् ॥ ४२ ॥
‘अमरश्रेष्ठ ! मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, जनार्दन श्रीकृष्ण तुम्हारे इस पारिजातको अवश्य द्वारकापुरीमें ले जायेंगे।’
भ्रातृस्नेहाभिभूतस्त्वं न कृष्णे प्रहरिष्यसि।
नापि कृष्णस्त्वयि ज्येष्ठे प्रहरिष्यति वासव ॥ ४३ ॥
‘वासव ! तुम भ्रातृ-स्नेहसे अभिभूत होकर श्रीकृष्णपर प्रहार नहीं करोगे और श्रीकृष्ण भी तुमपर बड़े भाईके नाते प्रहार नहीं करेंगे ॥ ४३ ॥
नैव चेच्छ्रोष्यसि प्रोक्तं मया देव कथञ्चन।
पृच्छ त्वं नयधर्मज्ञान् ये हितास्तव मन्त्रिणः ॥ ४४ ॥
‘देव ! यदि मेरी कही हुई बात तुम किसी तरह नहीं सुनोगे तो नीति-धर्मके जाननेवाले जो तुम्हारे हितैषी मन्त्री हों, उनसे जाकर पूछो’ ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु महेन्द्रो जनमेजय।
इदमूत्तरमीशोऽथ प्रत्युवाच जगद्गुरुम् ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय, ! नारदजीके ऐसा कहनेपर देवेश्वर इन्द्रने उन जगद्गुरु मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ४५ ॥
एवंविधप्रभावं त्वं कृष्णं वदसि यद् द्विज।
एवमेतत् सुबहुशः श्रुतं खलु मया मुने ॥ ४६ ॥
‘ब्रह्मन् ! आप श्रीकृष्णको जो ऐसे प्रभावशाली बता रहे हैं, वह ठीक है। मुने ! उनके ऐसे प्रभावकी चर्चा मैंने बहुत बार सुनी है ॥ ४६ ॥
यतश्चैवंविधः कृष्णस्ततोऽहं तस्य वै तरुम्।
न प्रदास्यामि दातव्यं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ४७ ॥
‘जब श्रीकृष्ण ऐसे महान् हैं, तब मैं सत्पुरुषोंके धर्मका स्मरण करते हुए निश्चय ही उन्हें देने योग्य होनेपर भी पारिजात वृक्ष नहीं दूँगा ॥ ४७ ॥
महाप्रभावो नाल्पार्थे रुष्येदिति विचिन्तयन्।
व्यवस्थितोऽहं भद्रं ते मुने सर्वगुणादिति ॥ ४८ ॥
‘मुने ! आपका कल्याण हो। जो महान् प्रभावशाली पुरुष हैं, वे इस छोटी-सी वस्तुके लिये मुझपर रुष्ट नहीं होंगे, ऐसा सोचकर उन सर्वगुणसम्पन्न श्रीकृष्णसे निर्भय होकर स्थित हूँ ॥ ४८ ॥
महाप्रभावाः सततं भवन्ति हि सहिष्णवः।
श्रोतारश्चैव सततं वृद्धानां ज्ञानचक्षुषाम् ॥ ४९ ॥
‘महान् प्रभावशाली महापुरुष सदा सहिष्णु होते हैं और ज्ञानदृष्टि रखनेवाले बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुनते हैं ॥ ४९ ॥
महात्मा कारणे नाल्पे कृष्णो धर्मभृतां वरः।
भ्रात्रा ज्येष्ठेन सर्वज्ञो विरोधं गन्तुमर्हति ॥ ५० ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ महात्मा श्रीकृष्ण इस छोटे-से कारणपर अपने बड़े भाईके साथ विरोध नहीं करेंगे ॥ ५० ॥
यथैवं मम मातुः स वरं प्रादादधोक्षजः।
तथैव तस्याः पुत्राणां ज्येष्ठानां सोढुमर्हति ॥ ५१ ॥
‘जैसे अधोक्षज भगवान् विष्णुने मेरी माताको इस प्रकार वरदान दिया है, वैसे ही उन्हें उसके ज्येष्ठ पुत्रोंके अपराधको भी सहन करना चाहिये ॥ ५१ ॥
यथैवोपेन्द्रतां यातः स्वयमिच्छञ्जनार्दनः।
तथैव भ्रातुरिन्द्रस्य सम्मानं कर्तुमर्हति ॥ ५२ ॥
‘जैसे स्वयं अपनी ही इच्छासे भगवान् विष्णु उपेन्द्र-भावको प्राप्त हुए (मेरे छोटे भाईके रूपमे अवतीर्ण हुए), उसी प्रकार उन्हे अपने बड़े भाई मुझ इन्द्रका सम्मान भी करना चाहिये ॥ ५२ ॥
ज्यैष्ठयमेतेन देवेन नारब्धं किं पुरातने।
अथेदानीमपीच्छेत् स ज्येष्ठोऽस्तु मधुसूदनः ॥ ५३ ॥
‘क्या पूर्वकालमें (वामन-अवतारके समय) इन विष्णु-देवने मेरी ज्येष्ठता नहीं स्वीकार की थी, उसी तरह इस समय भी यदि मधुसूदन चाहें तो स्वयं ही ज्येष्ठ हो जायँ’ ॥ ५३ ॥
सुनिश्चितं बलरिपुमीक्ष्य नारदो
विसर्जितस्त्रिदशवरेण धर्मभृत्।
ययौ पुरीं यदुवृषभाभिरक्षितां
कुशस्थलीं धृतिमतिमांस्तपोधनः ॥ ५४ ॥
| ४९८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
धृति और बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा तपोधन नारद बलविनाशन इन्द्रको अपने निश्चयपर अटल देख उन देवेश्वरसे विदा ले यदुपति श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुशस्थली (द्वारका) पुरीको चले गये॥ ५४॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदस्य स्वर्गात्पुनरागपने एकसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें नारदजीका स्वर्गलोकसे पुनरागमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका नारदजीको अमरावतीपर आक्रमण करनेका निश्चय बताकर इन्द्रके पास संदेश भेजना, इन्द्र और बृहस्पतिकी बातचीत, बृहस्पतिका कश्यपजीको यह समाचार बताना और कश्यपजीका युद्धकी शान्तिके लिये भगवान् शंकरकी स्तुति करना
वैशम्पायन उवाच
अथैत्य द्वारकां रम्यां नारदो मुनिसत्तमः।
ददर्श पुरुषश्रेष्ठं नारायणमरिंदमम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर रमणीय द्वारकापुरीमें जाकर मुनिवर नारदने शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषप्रवर नारायण (भगवान् श्रीकृष्ण) का दर्शन किया॥ १॥
स्ववेश्मनि सुखासीनं सहितं सत्यभामया।
विराजमानं वपुषा सर्वतेजोऽतिगामिना॥ २॥
वे अपने भवनमें सत्यभामाके साथ सुखपूर्वक बैठे थे और सम्पूर्ण तेजोंका अतिक्रमण करनेवाले अपने दिव्य विग्रहसे विराजमान हो रहे थे॥ २॥
तमेवार्थं महात्मानं चिन्तयन्तं दृढव्रतम्।
केवलं योजयन्तं च वाक्यमात्रेण भामिनीम्॥ ३॥
दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करनेवाले महात्मा श्रीकृष्ण उसी (पारिजात) के विषयमें सोच रहे थे और भामिनी सत्यभामाको केवल वाणीमात्रसे सान्त्वना दे रहे थे॥
दृष्ट्वैव नारदं देवः प्रत्युत्थाय अधोक्षजः।
पूजयामास च तथा विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ४॥
नारदजीको देखते ही भगवान् अधोक्षज उठकर खड़े हो गये तथा उन्होंने शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन किया॥
सुखोपविष्टं विश्रान्तं प्रहस्य मधुसूदनः।
वृत्तान्तं परिपप्रच्छ पारिजाततरुं प्रति॥ ५॥
जब वे सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये और विश्राम कर चुके, तब मधुसूदन श्रीकृष्णने हँसकर उनसे पारिजात-वृक्षके विषयमें समाचार पूछा॥ ५॥
अथाचष्ट मुनिः सर्वं विस्तरेण तपोधनः।
इन्द्रानुजायेन्दवाक्यं निखिलं जनमेजय॥ ६॥
जनमेजय! तब तपोधन मुनि नारदजीने सारा समाचार विस्तारपूर्वक बतलाया और इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णके लिये इन्द्रकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं॥ ६॥
श्रुत्वा कृष्णस्तु तत् सर्वं नारदं वाक्यमब्रवीत्।
अमरावतीं पुरीं यास्ये श्वोऽहं धर्मभृतां वर॥ ७॥
वह सब सुनकर श्रीकृष्णने नारदजीसे कहा—'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वर! मैं कल अमरावतीपुरीकी यात्रा करूँगा'॥ ७॥
इत्युक्त्वा नारदेनैव सहितः सागरं ययौ।
संदिदेश ततस्तत्र विविक्ते नारदं हरिः॥ ८॥
ऐसा कहकर श्रीहरि नारदजीके साथ ही समुद्र-तटपर गये और वहाँ एकान्तमें उन्होंने उन देवर्षिको यह संदेश दिया—॥ ८॥
महेन्द्रभवनं गत्वा अद्य ब्रूहि तपोधन।
अभिवाद्य महात्मानं मद्वाक्यममरोत्तमम्॥ ९॥
न युद्धे प्रमुखे शक्र स्थातुमर्हसि मे प्रभो।
पारिजातस्य नयने निश्चितं त्वमवेहि माम्॥ १०॥
'तपोधन! आप आज ही इन्द्र-भवनमें जाकर मेरी ओरसे अमरश्रेष्ठ महात्मा इन्द्रको प्रणाम करके उनसे मेरी यह बात बता दीजिये कि इन्द्र! प्रभो! आप युद्धमें मेरे सामने नहीं ठहर सकेंगे। आपको यह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मैं पारिजातको वहाँसे ले आनेका दृढ़ निश्चय कर चुका हूँ'॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदस्त्रिदिवं गतः।
आचचक्षेऽथ कृष्णोक्तं देवेन्द्रस्यामितौजसः॥ ११॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर नारदजी स्वर्गलोकको चले गये। वहाँ उन्होंने अमिततेजस्वी देवराज इन्द्रको श्रीकृष्णकी कही हुई सारी बात बता दी॥ ११॥
ततो बृहस्पतेः शक्रः शशंस बलनाशनः।
श्रुत्वा बृहस्पतिर्देवमुवाच कुरुनन्दन॥ १२॥