विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकसप्ततितमोऽध्यायः ४९७
हिताय जगतोऽद्यापि लोके वसति मानुषे।
उपेन्द्रो जगतां नाथः सर्वभूतोत्तमोत्तमः ॥ ३९ ॥
‘समस्त भूतोंमें जो उत्तम हैं, उनसे भी उत्तम वे जगदीश्वर उपेन्द्र इस समय भी जगत्के हितके लिये मनुष्यके रूपमें निवास करते हैं ॥ ३९ ॥
जटी कृष्णाजिनी दण्डी दृष्टपूर्वो मया हरिः।
दैत्येषु चरन् देवस्तृणेष्वग्निरिवोद्धतः ॥ ४० ॥
‘जैसे तिनकोंमें प्रज्वलित हुई आग फैल रही हो, उसी प्रकार मैंने पूर्वकालमें दैत्य-समूहोंके बीच श्रीहरिको जटा, काला मृगचर्म एवं पलाश-दण्ड धारण किये वामन ब्रह्मचारी-के रूपमें विचरते देखा है ॥ ४० ॥
अद्राक्षमपि गोविन्दं दानवैकार्णवं जगत्।
कुर्वाणं दानवैर्हीनं जगतो हितकाम्यया ॥ ४१ ॥
‘जब सारा संसार दानवरूपी एकार्णवमें मग्न था, उस समय भी जगत्के हितकी कामनासे इस विश्वको दानवहीन करते हुए श्रीगोविन्दका मैंने दर्शन किया है ॥ ४१ ॥
अवश्यं पारिजातं ते नयिष्यति जनार्दनः।
द्वारकाममरश्रेष्ठ नानृतं च ब्रवीम्यहम् ॥ ४२ ॥
‘अमरश्रेष्ठ ! मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, जनार्दन श्रीकृष्ण तुम्हारे इस पारिजातको अवश्य द्वारकापुरीमें ले जायेंगे।’
भ्रातृस्नेहाभिभूतस्त्वं न कृष्णे प्रहरिष्यसि।
नापि कृष्णस्त्वयि ज्येष्ठे प्रहरिष्यति वासव ॥ ४३ ॥
‘वासव ! तुम भ्रातृ-स्नेहसे अभिभूत होकर श्रीकृष्णपर प्रहार नहीं करोगे और श्रीकृष्ण भी तुमपर बड़े भाईके नाते प्रहार नहीं करेंगे ॥ ४३ ॥
नैव चेच्छ्रोष्यसि प्रोक्तं मया देव कथञ्चन।
पृच्छ त्वं नयधर्मज्ञान् ये हितास्तव मन्त्रिणः ॥ ४४ ॥
‘देव ! यदि मेरी कही हुई बात तुम किसी तरह नहीं सुनोगे तो नीति-धर्मके जाननेवाले जो तुम्हारे हितैषी मन्त्री हों, उनसे जाकर पूछो’ ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु महेन्द्रो जनमेजय।
इदमूत्तरमीशोऽथ प्रत्युवाच जगद्गुरुम् ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय, ! नारदजीके ऐसा कहनेपर देवेश्वर इन्द्रने उन जगद्गुरु मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ४५ ॥
एवंविधप्रभावं त्वं कृष्णं वदसि यद् द्विज।
एवमेतत् सुबहुशः श्रुतं खलु मया मुने ॥ ४६ ॥
‘ब्रह्मन् ! आप श्रीकृष्णको जो ऐसे प्रभावशाली बता रहे हैं, वह ठीक है। मुने ! उनके ऐसे प्रभावकी चर्चा मैंने बहुत बार सुनी है ॥ ४६ ॥
यतश्चैवंविधः कृष्णस्ततोऽहं तस्य वै तरुम्।
न प्रदास्यामि दातव्यं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ४७ ॥
‘जब श्रीकृष्ण ऐसे महान् हैं, तब मैं सत्पुरुषोंके धर्मका स्मरण करते हुए निश्चय ही उन्हें देने योग्य होनेपर भी पारिजात वृक्ष नहीं दूँगा ॥ ४७ ॥
महाप्रभावो नाल्पार्थे रुष्येदिति विचिन्तयन्।
व्यवस्थितोऽहं भद्रं ते मुने सर्वगुणादिति ॥ ४८ ॥
‘मुने ! आपका कल्याण हो। जो महान् प्रभावशाली पुरुष हैं, वे इस छोटी-सी वस्तुके लिये मुझपर रुष्ट नहीं होंगे, ऐसा सोचकर उन सर्वगुणसम्पन्न श्रीकृष्णसे निर्भय होकर स्थित हूँ ॥ ४८ ॥
महाप्रभावाः सततं भवन्ति हि सहिष्णवः।
श्रोतारश्चैव सततं वृद्धानां ज्ञानचक्षुषाम् ॥ ४९ ॥
‘महान् प्रभावशाली महापुरुष सदा सहिष्णु होते हैं और ज्ञानदृष्टि रखनेवाले बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुनते हैं ॥ ४९ ॥
महात्मा कारणे नाल्पे कृष्णो धर्मभृतां वरः।
भ्रात्रा ज्येष्ठेन सर्वज्ञो विरोधं गन्तुमर्हति ॥ ५० ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ सर्वज्ञ महात्मा श्रीकृष्ण इस छोटे-से कारणपर अपने बड़े भाईके साथ विरोध नहीं करेंगे ॥ ५० ॥
यथैवं मम मातुः स वरं प्रादादधोक्षजः।
तथैव तस्याः पुत्राणां ज्येष्ठानां सोढुमर्हति ॥ ५१ ॥
‘जैसे अधोक्षज भगवान् विष्णुने मेरी माताको इस प्रकार वरदान दिया है, वैसे ही उन्हें उसके ज्येष्ठ पुत्रोंके अपराधको भी सहन करना चाहिये ॥ ५१ ॥
यथैवोपेन्द्रतां यातः स्वयमिच्छञ्जनार्दनः।
तथैव भ्रातुरिन्द्रस्य सम्मानं कर्तुमर्हति ॥ ५२ ॥
‘जैसे स्वयं अपनी ही इच्छासे भगवान् विष्णु उपेन्द्र-भावको प्राप्त हुए (मेरे छोटे भाईके रूपमे अवतीर्ण हुए), उसी प्रकार उन्हे अपने बड़े भाई मुझ इन्द्रका सम्मान भी करना चाहिये ॥ ५२ ॥
ज्यैष्ठयमेतेन देवेन नारब्धं किं पुरातने।
अथेदानीमपीच्छेत् स ज्येष्ठोऽस्तु मधुसूदनः ॥ ५३ ॥
‘क्या पूर्वकालमें (वामन-अवतारके समय) इन विष्णु-देवने मेरी ज्येष्ठता नहीं स्वीकार की थी, उसी तरह इस समय भी यदि मधुसूदन चाहें तो स्वयं ही ज्येष्ठ हो जायँ’ ॥ ५३ ॥
सुनिश्चितं बलरिपुमीक्ष्य नारदो
विसर्जितस्त्रिदशवरेण धर्मभृत्।
ययौ पुरीं यदुवृषभाभिरक्षितां
कुशस्थलीं धृतिमतिमांस्तपोधनः ॥ ५४ ॥