भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 517
४९६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ब्रह्मण्यदेवः सर्वात्मा तैस्तैर्भावैर्विकुर्वति ।
जगत्यतिगुणो देवो वैकुण्ठः सर्वभावनः ॥ २८ ॥

'वे भगवान् ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, सबके आत्मा हैं और जगत्में जैसा शरीर धारण करते हैं, उसके अनुसार ही विभिन्न भावों (सुख-दुःखादि धर्मों) द्वारा विकारको प्राप्त होते-से प्रतीत होते हैं। वास्तवमें तो सबकी उत्पत्ति करनेवाले वे भगवान् वैकुण्ठ गुणातीत हैं ॥ २८ ॥

अतः समस्तदेवानां पूज्य एव च केशवः ।
पद्मनाभश्च भगवान् प्रजासर्गकरो विभुः ॥ २९ ॥

'अतः प्रजाकी सृष्टि करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् पद्मनाभ-स्वरूप श्रीकृष्ण समस्त देवताओंके लिये भी पूज्य ही हैं ॥ २९ ॥

अनन्तो धारणार्थं च बिभर्ति च महद्यशः ।
यज्ञ इत्यपि सद्भिंश्च कथ्यते वेदवादिभिः ॥ ३० ॥

'वे ही पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करनेके लिये अनन्त (शेषनाग) के रूपमें प्रकट हुए हैं। वे महान् यश धारण करते हैं। वेदवादी साधु पुरुष उन्हींका 'यज्ञ' नामसे भी प्रतिपादन करते हैं ॥ ३० ॥

श्वेतः कृतयुगे देवो रक्तस्त्रेतायुगे तथा ।
द्वापरे च तथा पीतः कृष्णः कलियुगे विभुः ॥ ३१ ॥

'वे सर्वव्यापी भगवान् सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीत तथा कलियुगमें कृष्ण वर्णका स्वरूप धारण करते हैं* ॥ ३१ ॥


* श्रुतिमें कहा है—
कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः ।
उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन् ॥

इस श्रुतिके साथ उपर्युक्त श्लोककी सङ्गति लगाते हुए आचार्य नीलकण्ठ कहते हैं कि जो अविद्यारूपी निद्रामें सो रहा है अर्थात् जो अत्यन्त मूढ़ पुरुष है, वही कलि है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये इस जगत्में भगवान् श्रीहरि कृष्ण होते हैं (अर्थात् श्रीकृष्णका अवतार ग्रहण करते हैं)। जो कुछ-कुछ कल्याणकी बातोंको देखता और समझता है, जो उस अज्ञान-निद्रासे आधा जग गया है, उस पुरुषको द्वापर कहते हैं। उसके लिये भगवान् पीतवर्ण होते हैं अर्थात् सुवर्णके समान मनोहर कान्ति धारण करते हैं। वह मनुष्य उनके उस दिव्य रूपपर आकृष्ट होकर कुछ भक्तिकी ओर उन्मुख होता है। जो कल्याणकी प्राप्तिके लिये सदा सजग रहकर प्रयत्न करता है, वह साधक त्रेता कहलाता है। उसपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् रक्त माताकी भाँति-अनुरक्त (वात्सल्यभावसे युक्त) होते हैं। जो युधिष्ठिर आदिकी भाँति भगवान्‌का अत्यन्त भक्त है, सदा भक्तिके पथपर ही चलता है, वह कृतकृत्य होनेके कारण कृतयुग अथवा सत्ययुग कहा गया है; उसके प्रति भगवान् शुक्लवर्ण होते हैं अथवा उसके समक्ष वे सदा अपने शुद्ध रूपको ही प्रकाशित करते हैं।


अवधीत् स हिरण्याक्षं दिव्यरूपधरो हरिः ।
दधाराप्सु निमज्जन्तीमेष देवो वसुन्धराम् ॥ ३२ ॥
वाराहं वपुराश्रित्य जगतो हितकाम्यया ।

'उन श्रीहरिने अपने दिव्यरूप धारण करके हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध किया था। उन्होंने जगत्के हितकी कामनासे वाराहरूप धारण करके जलमें डूबती हुई पृथ्वीका उद्धार एवं जलके ऊपर इसका संस्थापन किया था ॥ ३२ ॥

जघ्ने हिरण्यकशिपुं नारसिंहवपुर्हरिः ॥ ३३ ॥
जिगाय जगतीं चैव विष्णुर्वामनरूपधृक् ।
बबन्ध च बलिं देवः श्रीमान् पन्नगबन्धनैः ॥ ३४ ॥

'उन्हीं श्रीहरिने नरसिंह रूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया था और उन्हीं वामनरूपधारी श्रीमान् भगवान् विष्णुने इस पृथ्वीको जीता और बलिको नागपाशमें बाँध लिया ॥ ३३-३४ ॥

देवदानवसम्भूतानाकामयदपि श्रियम् ।
त्वय्यनन्तः पुरा विष्णुरुदारोऽमितविक्रमः ॥ ३५ ॥

'यद्यपि देवताओं और दानवोंके सम्मिलित प्रयत्नसे प्रकट हुई राजलक्ष्मी दोनोंके लिये साधारण थी, तो भी पूर्वकालमें अमितपराक्रमी, उदार हृदय, अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुने तुम्हारे लिये उसपर आक्रमण किया अर्थात् विराटरूपसे तीनों लोकोंको आक्रान्त करके त्रिलोकलक्ष्मी तुम्हें समर्पित कर दी ॥ ३५ ॥

सावशेषं तपो यस्य तन्निहन्ति जनार्दनः ।
अलीकेष्वपि वर्तन्तं व्रतमेतन्महात्मनः ॥ ३६ ॥

'जिसकी तपस्या शेष है, वह भी यदि अलीक—मायामय अर्थात् छल-कपट एवं अन्यायपूर्ण बर्ताव करता है तो भगवान् श्रीकृष्ण उसे मार डालते हैं; क्योंकि दुराचारियोंका यह विनाश इन महात्मा श्रीकृष्णका व्रत है ॥ ३६ ॥

जघ्ने च दानवान् मुख्यान् देवानां ये च शत्रवः।
तव प्रियार्थं गोविन्दो धर्मनित्यः सतां गतिः ॥ ३७ ॥

'सदा धर्मकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले सत्पुरुषोंके आश्रय-भूत भगवान् गोविन्दने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मुख्य-मुख्य दानवोंका तथा जो लोग देवताओंके शत्रु हुए हैं, उनका भी वध कर डाला है ॥ ३७ ॥

रामत्वमपि चावाप्य जघ्ने रावणमात्मवान् ।
भूत्वा कामगुणांश्चैव जघ्नान द्विरदं हरिः ॥ ३८ ॥

'इन मनस्वी प्रभुने ही श्रीरामचन्द्रका रूप धारण करके रावणको मारा था तथा दूसरे-दूसरे अवतार धारण करके इन श्रीहरिने इच्छानुसार शौर्य आदि गुणोंसे युक्त असुरोंका उसी तरह संहार कर डाला था, जैसे सिंह हाथीको नष्ट कर देता है ॥ ३८ ॥